हमनें देखा है इतिहासों में पलटा जाना तख्तों का, लिखा जाना तारीखों में शहंशाहों की तानाशाही और दरियादिली के किस्से, अबुल फज्ल और बदायुनी की तबीयत से करी गयी कोशिशें, सच को उधेड़ देने की.. बनना शहरों का, बाशिंदों में उधेड़बुन के सिलसिले. इमारतों में, मीनारों पर जमी धुल के नीचे लिखा कुछ, जिस पर अब होते हैं विमर्श!!

और वो भी..  जो हमें दिखता नहीं और ना ही किसी तारीख़ पर दर्ज है..  वो आवाजें जो कभी सुनी ही नहीं गयी

हम उन तारीखों से इतर..कुछ नया ढूँढने निकले हैं!!

 

कुछ पन्ने इतिहास से खोजे ; कुछ कलम की धार से

कुछ मुहब्बत के भी किस्से; कुछ मुलाकाते तलवार से

जो मिला जो खोजा हमने; वो आज समेट के लाये है

काले काले अक्षरों में; जीवन अपना भर लाये है

 

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