-संतोष कुमार

 

56749-48508

युगों से बदलती दुनिया के

सत्य के अन्वेषण का

निरंतर जो प्रयास है

पुरातन को नवीन बनाना

निर्जीव को सजीव कर जाना

सीख सीख के सीख भुलाना

इसी का नाम इतिहास है…..

 

कुछ ऐसे ही शब्द यूँ ही  मज़े मज़े मे उकेर दिए थे, ब्लॅकबोर्ड पर चॉक से. तब कदाचित् ये आभास नही था कि इतिहास हमारे जीवन मे कुछ ऐसा समा जायगा की जहाँ भी जाऊ जो भी देखूं, उसमे इतिहास नज़र आएगा.

आज किसी रिश्तेदार के घर पूजा थी, सुंदर कांड का पाठ चल रहा था. ज़्यादा धार्मिक नही हूँ तो मेरा ध्यान कहीं और ही था. ढोल बज रहे थे और स्त्री- पुरुष सब मिलकर गा रहे थे या फिर यूँ कहे गाने की कोशिश कर रहे थे  बीच बीच में गाते थे और बीच बीच में पंक्तियाँ भूलकर चुप हो जाते थे  पर अचानक से कानो में शब्द सुनाई दिए

 

“ढोल गँवार शुद्र पशु नारी

सकल ताड़ना के अधिकारी”

 

रामचरितमानस से वाकिफ़ हर एक शख्स इस चौपाई से परिचित होगा. तुलसीदास की आलोचना का एक सिरा इसी चौपाई पर घूमता फिरता है. खैर ये चौपाई सुनते ही अंदर का इतिहासकार जाग गया. नारीवाद पर जितना भी चिंतन इन सालो मे किया था सब आँखों के सामने आ गया.  मन ही मन उन दोहो को याद करने लगे जहाँ तुलसीदास ने अपना पुरषवादी मानसिकता का परिचय दिया था. यथा सीता- अनुसूया संवाद अथवा शिव- पार्वती संवाद आदि.

“अमित दानी भरता बयदेही अधम सो नारी जो सेवा न तेहि ”. ये पंक्तियाँ अनुसूया की कम और तुलसीदास के मन की कुंठा अधिक प्रतीत होती है

पर अधिक आश्चर्य इस बात ये की उस घर की औरतो के चेहरे पर शिकन नही आई, तब भी नही जब हवन के लिए केवल पुरुषो को आहुति डालने का अधिकार मिला. मेरी माँ  ने दबी आवाज़ मे इस बाबत प्रश्न किया तो “रिवाज़” का चादर ओढ़ा के ऐसे विरोधी स्वरों को तहखाने  मे बंद कर दिया गया. इस कारण मेरा मन जो खराब हुआ की लगा अभी पूजा से उठ कर चला जाऊ .

 

लिखते हुए ये ख़याल आता है की आख़िर ऐसा क्या हुआ जो अब हर चीज़ को संशय की दृष्टि से देखता हूँ, हर शब्द का छुपा मतलब तलाशने का प्रयास करता हूँ, रीति रिवाज़ो के ढकोसले अब आँखो को ज़्यादा चुभने लगे  है, हर चीज़ पर सवाल उठाने लगता हूँ. मेरी आँखों पर इतिहास का चश्मा लग गया है शायद.

जब से b.a. history(hons.) मे एडमिशन लिया तब से दुनिया को देखने का नज़रिया ही बदल गया. हाँ  तभी से, माँ से नोकझोंक भी बढ़ी क्योंकि शायद इतिहास ने हमको धर्म को नये तरीके से समझने की विधि सिखाई जो शायद किसी भी धार्मिक इंसान को पहली बार में अखरेगी

पर हमारे एक सर थे डॉ. नीरज सहाय उनसे एक चीज़ सीखी. कैसे आप धार्मिक होते हुए भी तार्किक हो सकते है. सीखा कि  घर पर धर्म के कितने भी बड़े अनुयायी हो जिस पल तुम्हारे कदम कॉलेज पर पड़े तुम एक इतिहास के छात्र हो. धर्म के प्रति मेरा रुझान बढ़ता ही गया परन्तु ये रुझान मोक्ष प्राप्ति या ईश्वर की खोज से हटकर उन प्रक्रियाओं की समझ की  ओर मुड़ गया जो धर्म को बनाते है और जो ईश्वर की कल्पना को आकृति देते है .

 

और यहाँ से मेरे और ईश्वर के बीच एक अजीब सा रिश्ता शुरू हो गया. मैं ईश्वर को नकार भी नहीं सकता था  और न बिना सवाल किये पूजा पाठ और करम कांडो को अपना ही सकता था. अंत में फैसला किया की ईश्वर और धर्म अलग अलग सत्ताये है. मैं ईश्वर  को मान सकता हूँ धर्म को नहीं. और यही से मेरी कविताओ में भी परिवर्तन की लहर दौड़ पड़ी. ईश्वर को समर्पित कविताओ में अब धर्म का कटाक्ष शामिल हो गया

“बुझे दिल से दीपक जलाना हमें कभी गवारा न था

उन्हें लगा हमें जीवन में खुदा कभी प्यारा न था ”

 

कहते है न “नज़र को बदलो नज़ारे बदल जायेंगे”,  तो आज आलम कुछ ऐसा है कि  कोई देश की बात करे तो हमें बेनेडिक्ट एंडरसन याद आ जाते है और हम देश को  “imagined communities” मानने लगते है. कभी कभी कम जानना ही अच्छा होता है शायद. पिछले साल एक डिबेट में हिस्सा लिया और अखंड भारत के कांसेप्ट पर प्रश्नचिन्ह लगा दिया. उन्ही दिनों हमने William Jones, Max Muller आदि के बारे में पढ़ा था जिनके द्वारा की गयी उपाधियाँ भारत देश के लोग अपनी सांस्कृतिक विरासत मान के बैठे है. आज है उन दिनों हमने बेनेडिक्ट एंडरसन नहीं पढ़ा था वरना क्या जाने हम राष्ट्र की परिकल्पना को ही प्रश्नों से भर देते. कुछ ऐसा ही बदलाव हमारी पसंद नापसंदो पर भी आया है. कोई हमसे पूछता है की कौनसा देशभक्त तुम्हारी प्रेरणा है तो हमसे कोई जवाब देते नहीं बनता. शायद इसलिए कि देशभक्त, देशभक्ति, क्रांति आदि शब्द अब  शरीर को सिहरन नहीं देते अपितु बुद्धि को चिंतन देते है. क्या रानी लक्ष्मीबाई, मंगल पाण्डेय, तांत्या टोपे, नाना साहब पेशवा आदि वास्तव में देश के लिए लड़ रहे थे? जब कोई देश की अवधारणा नहीं थी तो देशभक्ति की अवधारणा कहाँ से आई? नायक होते  है या बनाये जाते है? क्या हमारे नायक पूर्वनिर्धारित होते है फिर चाहे वो जीते या हारे? अगर कृष्ण कौरवो के साथ होते या अगर कौरव महाभारत का युद्ध जीत जाते तो क्या वो नायक होते? इतिहास ने हमें विवश कर दिया की हम सिक्के का दूसरा पहलू देखे. और इसी बात पर अपने परिवार की गलियां भी खायी. उन्होंने शायद मेरी इतिहास की समझ को शहीदों का अपमान समझ लिया. और ऐसे अवसरों पर दिल से आह भरी पंक्तियाँ निकली

“हमें समझती नहीं दुनिया

और समझाना हम चाहते नहीं

दोमुंही  इस दुनिया को

अपनाना हम चाहते नहीं “

मेरे अन्दर का इतिहासकार मेरे साथ चलता है. जो दिख जाये उसका इतिहास खोजने लगते है और जहाँ स्पष्ट इतिहास न मिले वहां उसके इतिहास की रचना अपनी कल्पनाओ में ही कर लेते है, और मन ही मन खुश होते है की हमने इतिहास की नज़र से देखा. अपने गाँव की पुश्तैनी हवेली अब हमें आर्किटेक्चर और सांस्कृतिक विरासत की निशानी लगने लगी है. रामायण या दुर्गा शप्तशती का पाठ करते करते नज़ारे किसी श्लोक या चौपाई पर ठहर जाने लगी है और उन पुराने पन्नो से  पित्रसत्तात्मकता की बू आने लगती है. कोई फिल्म कोई किताब घर पर रखी तस्वीर भी हमारी नज़र से महफूज़ नहीं. सबको इतिहास के चश्मे से देखता हूँ, घूरता हूँ उसके अन्दर के छुपे इतिहास को. और अब तो एक नया ज्ञान मिला है जिसे लिंग्विस्टिक्स या भाषा विज्ञानं कहते है. Post modernist विद्वानों की अनुकम्पा से अब इतिहास की नज़र और भी चौड़ी हो गयी है. अब हर शब्द, हर भाषा, हर मुहावरा हर कहानी, सबमे एक छुपा अर्थ ढूँढ़ते है. कभी कभी सोचते सोचते अचानक से ठहर जाते है और ये सोचने लगते है की जो हम सोच रहे थे क्या उसमे भी कोई समाज की देन  है, क्या उसमे भी कोई छुपा अर्थ है, क्या उसमे भी इतिहास का पुट है.

अब तो ऐसा लगता है की अगर ये चश्मा उतर दिया तो दुनिया के ब्लैकबोर्ड का दुनियादारी के चॉक से लिखी इबारत, कभी नहीं पढ़ पाउँगा. जैसे ही चश्मा उतारता हूँ सब धुंधला धुंधला दिखता  है. आँखों के  चश्मे का नंबर बढ़ गया कुछ महीनो पहले, इसे मायोपिया कहते है. दिमाग के चश्मे का नंबर भी बढ़ गया है पर इस मर्ज़ का नाम क्या है नहीं पता

मेरी बीमारी भी इतिहास मेरी दवा भी इतिहास और उससे इतर जो जीवन में बचा वो भी इतिहास हैं

 

 

 

 

 

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