सुबह-सुबह मंदिर के घंटों की आवाज़ जब कान में पड़ी, तो नींद टूट गयी। आँख मींजते हुए बिछावन से उठा ही था कि मेरी आठ साल की बेटी ‘मेरे बेरोजगार पापा’ कहते हुए मुझसे आकर लिपट गयी। अगले ही पल चाय की एक प्याली के साथ मेरी पत्नी मेरे पास आई और प्यार भरी मुस्कान के साथ उसने मुझसे कहा, “ए जी, जब से बेरोजगार हुए हैं, आप बड़े प्यारे लग रहे हैं। भगवान करे कि मुझे हर जन्म में आपके जैसा बेरोजगार पति ही मिले…” मेरी पत्नी ने इतना कहा ही था कि तभी पड़ोस के शर्मा जी धमक पड़े। मूंछें नहीं हैं उनकी लेकिन मूंछो पर ताव देने की उनकी अदा पूरे गाँव में विख्यात है। उनके आते ही मेरी पत्नी ने लोक-लाज वश अपनी घूँघट गिरा ली। शर्मा जी मेरी पत्नी की घूँघट को उठा कर मेरी तरफ इशारा करते हुए कहा, “अजी बहू, जिसका पति ऐसा बेरोजगार व्यक्ति हो, उसे तो फक्र होना चाहिये, ना की घूँघट गिरा कर अपनी उपस्थिति की दृष्टिगोचरता धूमिल करनी चाहिये।” मैं थोड़ा मंद बुद्धि का हूँ इसलिए शर्मा जी की कही भारी-भरकम बातों को समझने की कोशिश में तन्मयता से जुट गया। तभी हाथ में प्रसाद लिये मेरी माँ तेज़ क़दमों से मेरी तरफ आते दिखी। वो आते ही शर्मा जी के हाथों में दो लड्डू देते हुए कही, “शर्मा जी…लड्डू खाईये, मेरा बेटा आज से बेरोजगार है।” शर्मा जी दो लड्डू को एक निवाला बनाते हुए सटक गये। फिर उस लड्डू को खाने से उन्हें जितनी ऊर्जा मिली, सबका एक साथ ही इश्तेमाल कर, वो चिल्ला-चिल्ला कर मेरी बेरोज़गारी की बातें आस-पड़ोस के लोगों से कहने लगे। माँ घर-घर जा कर यही बात औरतों से करने लगी। पत्नी फोन पर सास से लेकर सास की बहन के बेटे की बड़ी चाची को बताने लगी कि उसके भाग्य में मेरे जैसा बेरोजगार पति उसके दस सोमवारी और बारह एकादशी का ही फल है। उधर इस सब के बीच मेरे गले से लिपटी मेरी बेटी ने धीमे स्वर में मुझसे कहा, “पापा, बेरोजगार होने में इतना वक्त क्यूँ लगा दिये आप?” थोड़े ही समय में पूरा गाँव मेरी शक्ल देखने इकठ्ठा हो गया। कुछ बड़े बुजुर्ग मेरे पैर तक छूने लगे और कहने लगे, “मुझे भी आशीर्वाद दो कि मेरे खानदान में भी तुम्हारे जैसा बेरोजगार बच्चे पैदा हो।” कुछ ही मिनटों में मेरे दरवाज़े पर एक मेला सा लग गया। इसी बीच एक पत्रकार साहब, एक पुरानी डायरी और एक नई कलम लेकर मेरे पास पहुंचे और पहुँचते ही कहे, “अरे साहब, अपनी बेरोज़गारी की महागाथा अपनी जुबानी बताईये ताकि उसे हिन्दुस्तान के सारे लोग सुन सकें।” अनुरोध का सलीका ऐसा था कि मानो रामायण काल में हनुमान ने श्री राम से पूछा हो कि प्रभु भक्त क्या है और भक्ति में शक्ति कितनी है, इस प्रसंग की व्याख्या विस्तार से कीजिये। लोग मेरे सामने आसान लगा कर बैठ गये और सब एक टक मेरी शक्ल देखने लगे। उन सब के चेहरों पर ऐसी श्रद्धा भाव थी कि मैं कुछ बोलूं और उन्हें अमृत की प्राप्ति हो जाये।”

खैर, मैंने अपनी कहानी शुरू की। बात करीब पाँच साल पहले की थी। ठीक-ठाक पढाई करने के बावजूद भी मुझे कोई काम नहीं मिला। ज्ञान के सामने अंग्रेज़ी जीत जाती, अवसर के सामने पैरवी बाजी मार लेता, योग्यता के समक्ष धांधली आगे बढ़ जाती। और तो और, कई जगह मेरे मर्द होने की स्थिति बॉस की परिस्थिती से मेल नहीं खाती। इसी बीच मेरी शादी भी हो गयी थी और बीवी का आना अपने आप में एक आत्म-नियंत्रण यंत्र की विधिवत स्थापना के बराबर होता है। काम करने की ज़रूरत बढती गयी और काम मिलने की संभावनाएं घटती गयीं। उन तनाव के दिनों में मैं हर शाम, बीवी के ताने और माँ की सहानुभूति स्वीकार कर, सीधे मंदिर चला जाता था। मंदिर में एक बाबा थे। वो दिन भर शंकर भगवान की प्रतिमा के समक्ष बैठ कर लोगों को बताते रहते कि कौन सा प्रसाद चढाने पर शंकर भगवान उनकी सुनेगें? श्रद्धा जहाँ एक तरफ आत्मा तक परमात्मा की रौशनी पहुंचाती है, वहीं दूसरी तरफ कई आँख वालों को अंधा भी बना देती है। गाँव वाले भी बाबा के कहे मुताबिक़ कभी बेसन का पकवान, कभी नारंगी का प्रसाद तो कभी शुद्ध देशी घी में बने लड्डू को चढाते। और हर प्रसाद का भोग बाबा स्वयं करते। इस तरह बाबा हर दिन ब्रेकफास्ट से डिनर तक मनचाहा खाना खाते, वो भी बिना मेहनत, बिना पैसे दिये। यही देख, मेरे दिमाग में एक नये रोज़गार की परिकल्पना जन्म ली। अगले दिन रात की आखिरी बस पकड़, मैं घर से भाग गया।

शहर पहुंचा तो देखा कि यहाँ तो मेरे गाँव के उस बाबा की तरह हज़ारों आदमी हैं। मंदिर से लेकर राजनीतिक पार्टियों के ऑफिस तक, धर्म गुरुओं के दरबार से गैर सरकारी संगठनों के दफ्तर तक। पंचायत से लेकर कट्टर गाँव के कुछ नुमायिन्दों तक। मैं फ़ौरन समझ गया कि भाई यहाँ धंधा बहुत अच्छा होगा, पैसे बहुत मिलेंगें। फिर मैं इस तलाश में निकल गया कि इस धंधे का सबसे बड़ा खिलाडी कौन है क्यूंकि खिलाड़ी बड़े होने से संभावनाएं बड़ी हो जाती हैं। इसी खोजने के क्रम में एक खान चाचा मिले। चाचा की साख यू-पी में कमाल की है। जो ठाठ से वो रहते हैं वो शायद बह्मा जी भी अपने ब्रह्मलोक में नहीं रहते होंगें। उनकी ख़ास बात ये थी कि अपने भतीजों के बीच उन्होंने दीवार बड़ी मजबूत बना रखी है। उन्हें विश्वास है कि अम्बुजा सीमेंट की दीवार भले ही गिर जाये लेकिन चाचा की ये दीवार क़यामत के बाद भी पूर्ववत ही रहेगी। ऐसी ही एक और दीवार की नींव डालती एक साध्वी को भी देखा। चाचा की तरह वो भी सत्ता पक्ष की ही थी, बस अंतर केन्द्र और राज्य का था।

उसके बाद मैं एक अनोखी जगह पहुंचा जहाँ एक भाई साहब भोपू लगा कर चिल्ला रहे थे कि चार बच्चे पैदा कीजिये। उन्ही भाई साहब के बगल में बैठी एक बहन ये भी लोगों को बता रही थी कि जब चार बच्चे पैदा हो जायें तो उनका क्या करेंगें आप ? ये देख मुझे सत्य का ज्ञान हुआ कि इस ख़ास तरह के व्यवसाय को अकेला ही करना चाहिये। फिर क्या था, कभी मेरठ पहुँच जाता, कभी आगरा, कभी पटना, कभी जयपुर, कभी अहमदाबाद और लोगों का धर्म बदलवा देता। ये बहुत आसान काम था, बस लोगों को ये समझाना था कि धर्म बदलने से ईश्वर बदल जाता है और नये धर्म का ईश्वर पुराने से ज्यादा अच्छा है। और ऐसा करते ही मेरा व्यवसाय चल पड़ा, पैसों की कमी खत्म हो गयी, और जीवन में मज़े ही मज़े आ गये। मुझे एहसास नहीं था कि ऐसे व्यवसायी के पास पॉवर बहुत होता है। मेरे पास रोज़ सत्ता पक्ष के नेताओं से लेकर विपक्ष के महामंत्री तक आने लगे। सब चढावा लाते और अपनी फ़रियाद सुना कर लौट जाते। मैं कुछ ही दिनों में बहुत बड़ा व्यवसायी बन गया। बढ़ते रुतबे के साथ आत्म्प्रलोभन की जाल भी घनी होने लगती है। मुझे लगने लगा कि ये व्यवसास कभी खत्म नहीं होगा और मैं आजीवन ऐसे ही राज़ करूँगा।

इसी दौरान मेरे पास एक क्लाईंट आया। मैंने उसकी फ़रियाद सुनी और अगले ही पल मेरे आदमिओं ने तीन लोगों को उठा लाये। तीनों को अलग-अलग कमरे में रखा गया। मैं पहले कमरे में गया। वो आदमी मुझे देखते ही डर गया और खड़ा हो गया। मैंने उससे कहा, “तुम्हें इस्लाम कबूल करना होगा।” उसने जवाब दिया, “मैं मुसलमान ही हूँ।” मैंने फिर पूछा, “अच्छा अगर तुम मुसलमान हो तो कुरान में लिखी कुछ बातें बताओ।” उस आदमी ने मुझे बहुत सारी बातें बताई और मुझे यकीन हो चला कि वो मुसलमान ही था। उस आदमी को बाइज्ज़त छोड़ दिया गया। उसके बाद मैं दूसरे कमरे में गया। वो भी मुझे देखते ही डर गया। मैंने उससे कहा, “तुम्हें हिंदू बनना होगा।” उसने जवाब दिया, “हिंदू ही हूँ।” मैंने फिर पूछा, “अगर हिंदू ही हो तो गीता में क्या लिखा है, बताओ ?” उस आदमी ने भी मुझे बहुत सारी बातें बतायी और मैं मान लिया कि वो हिंदू है।” मैंने उसे भी बाइज्ज़त छोड़ दिया। उसके बाद मैं तीसरे कमरे में गया। वो आदमी भी मुझे देखते ही डर गया। मैंने उससे कहा, “तुम्हें अभी ईसाई बनना होगा।” उसने जवाब दिया, “मैं ईसाई ही हूँ।” मैंने उससे कहा, “अगर तुम ईसाई हो तो बाईबल में क्या लिखा है बताओ।” उस आदमी ने भी मुझे बहुत सारी बातें बताईं और मैं समझ गया कि वो भी सही कह रहा था। उसे भी बाइज्ज़त छोड़ दिया गया। मुझे ऐसा प्रतीत हुआ कि मेरे आदमिओं ने इस बार गलत लोगों को उठा कर लाये हैं। मैं गुस्से में अपने लोगों पर चिल्लाने लगा  लगा। तभी वो तीनों एक साथ मेरे पास आये और सब ने एक साथ कहा, “नहीं साहब…हम तीनों ने आपसे झुठ बोला था। हम तीनों ही सिख हैं।” उनके जवाब को सुनकर मैं झल्ला गया। तीनों से मैंने बारी-बारी से पूछा, “फिर तुम्हें कुरान, तुम्हें गीता और तुम्हें बाईबल के बारे में इतना कुछ कैसे पता?” तीनों ने एक साथ मुझे जवाब दिया, “क्यूंकि, तुम्हें खुद नहीं पता कि तीनों ग्रंथों में लिखा क्या है? अगर तुम पढ़े होते तो उसी समय हमें रोकते। तुम सब अनपढ़ हो और जिस दिन हम तीनों की तरह सारे लोग हो जायेंगें तो तुम सब का धंधा बंद हो जायेगा। चाचा और साध्वी दोनों अपने घर बैठ जायेंगे। और मुझे उम्मीद है कि ये तुम्हारा धंधा ज्यादा दिन और नहीं चलने वाला है।” ये कह कर वो तीनों वहाँ से चले गये और मैं इस आशंका से डर गया कि कहीं मेरा धंधा बंद ना हो जाये। मैं इस सोच में डूब गया कि जिस दिन ये धंधा बंद होगा आवाम सबसे पहले हिसाब हम जैसे लोगों से लेगी। इतिहास के पन्नों में लिखी हर बात के लिये हमें सजा मिलेगीं। मैंने निश्चय किया कि मैं गाँव वापस चला जाऊँगा क्यूंकि मुझमें बदले कल के सवाल का सामना करने की हिम्मत नहीं बची।

अगले दिन अपने गाँव जाने वाली ट्रैन में बैठ गया। तभी एक गरीब आदमी मेरे पास दौड़ता हुआ आया और मुझसे कहा, “आप वही हैं ना जो धर्म बदलवाते हैं। मुझे भी धर्म बदलना है। मेरा धर्म भी बदलवा दीजिये, बदले में मैं अपनी सारी कमाई आपको दे दूँगा।” उस गरीब आदमी ने अपनी जेब से कुछ खुले पैसे निकाले और सारे पैसे मेरे समक्ष रख दिये। पैसों को देख, लालच आ गयी और मैंने सोचा जाते-जाते आखिर बार कुछ कमा लूँ।“ मैंने उस आदमी से पूछा, “किस धर्म को अपनाना चाहते हो?” उस गरीब ने पहले तो मुझे बड़े गौर से देखा और फिर जवाब दिया, “जिस धर्म के ठेकेदार हमें दो वक्त की रोटी और थोड़ा सुकून देने का वादा करें, उसी धर्म में मुझे जाना है।” उसके जवाब को सुनते ही मैं स्तब्ध सा रह गया। कुछ नहीं बोल पाया। सीटी की आवाज़ के साथ ट्रैन चल पड़ी और उसके साथ ही मेरी नींद खुल गयी।

अब समझ में आया कि मैं सपना देख रहा था। मेरी पत्नी और मेरी माँ हमेशा की तरह मुझ पर चिल्लाते हुए कह रही थी कि उम्र पैंतीस की हो गयी है और आज तक बेरोजगार बैठा है। पता नहीं कैसे जीवन चलेगा? मैं मन ही मन मुस्कुरा रहा था। मैं सोच रहा था कि इन लोगों को कैसे समझाऊं कि बहुत से रोजगारों की तुलना में मैं बेरोजगार ही अच्छा हूँ। माँ और बीवी दोनों मुझे डाँटने के सुबह का कोटा पूरा कर, अपने-अपने काम में चली गयी और मैं पास वाले मंदीर के बाबा से मिलने निकल गया, इस उद्देश्य के साथ कि आज कम से कम उस बाबा को तो अपनी तरह बेरोजगार ज़रूर बनाऊँगा।

 

 

 

 

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