लेखक  -कुमार प्रभात 

शहर की स्ट्रीट लाईट्स की रौशनी जहाँ खत्म होती है, उसके बगल से निकलने वाली सड़क, जिस ओर मुड़ती है, उसे ही गाँव कहते हैं…रात के ग्यारह बजे, जिस वक्त शहरों की ज़िंदगी शाम होने का एहसास करती है ठीक उसी वक्त जहाँ लोग एक बार सोकर जग जाते हैं, उसे गाँव कहते हैं…दो घंटे बिजली गूल रहने पर मीडिया बवाल कर देती है, विपक्षी, सत्ता पक्ष से इस्तीफा मांगने लगते हैं, उसी देश में जहाँ महीनों बिजली नहीं आती, उसे गाँव कहते हैं…यानी इक्कीसवीं सदी की चकाचौंध और बढ़ते-बदलते देश में, वो जगह जहाँ हुनर और इच्छाएँ तो हैं लेकिन अवसर और माध्यम की दरकार है, उसे गाँव कहते हैं…बुनियादी अंतर को नज़रंदाज़ कर दें तो हर गाँव एक सरीखा है…उसकी ताकत एक है, उसका दुर्भाग्य एक है…

कभी मौका मिले तो ‘बिहार’ जाईये…बेगुसराई से तीस-बत्तीस किलोमीटर उत्तर जाने पर एक गाँव मिलेगा ‘अकोपुर’…लगभग दो किलोमीटर लंबा और एक से ढाई किलोमीटर चौड़ा, ये गाँव अपने आप में अदभुत है…उसके बगल से बहने वाली ‘बूढी गंडक’ नदी, जहाँ एक तरफ इसकी मिट्टी को उपजाऊ बनाने में लगी है वहीं दूसरी तरफ हर शाम हनुमान मंदिर पर रामायण पाठ कर, यहाँ पौराणिक लुप्त होती संस्कृति को संजीवनी दी जाती है…सौ साल पहले आई बाढ़ से इस गाँव की उत्तरी सीमा पर बना तालाब आज भी वैसा ही है और दस साल पहले शुरू हुई ग्रामीण हाट की रौनकता वक्त के साथ कभी नहीं घटी…कृषि यहाँ का एक मात्र मुख्य पेशा है लेकिन जिस परिवार की ज़रूरतें ज़मीन के चन्द टुकड़ों से तृप्त नहीं हो पाती, वो शहर की बस पकड़ लेते हैं…पलायन का अपना दर्द होता है जिसकी टीस दिवाली और छठ की भीड़ भरी ट्रैन में जगह ना मिलने पर महसूस होती है…

गाँव वाले बता रहे थे कि वहाँ की अधिकांश ‘मुनिया’ दसवीं में अच्छे नंबर से पास कर जाती हैं…लेकिन उनके पास इस सवाल का जवाब नहीं था कि दसवीं के बाद मुनिया का क्या होता है? जवाब तो इसका भी नहीं था कि गाँव के अधिकांश छोटू के उस ज़ज्बे का दुखद अंत क्यूँ होता है, जिस ज़ज्बे के साथ वो बचपन में मिट्टी का तेल जलाकर थोड़ी रौशनी पैदा करते थे और फिर आँखें गड़ा कर घंटों पढ़ने की पीड़ा बड़ी खुशी से उठाते थे…उसके बाद गाँव के एक बुजुर्ग व्यक्ति के साथ बैठने का मौका मिला…शुद्ध दूध की चाय करीब चार साल बाद मिली थी तो चुस्की में अपना मज़ा था और उनके संग बातचीत के अनुभव का अपना स्वाद…थोड़ी देर बात हुई तो पुरानी चिंतित पीढ़ी का दर्द छलक आया…उनकी चिंता थी कि गाँव के युवा नशे की लत में पड़ते जा रहे हैं…शराबों पर लगने वाले टैक्स से सरकार तो बहुत कमाती है लेकिन उसकी कीमत कौन चुका रही है ये मैंने उस बुजुर्ग की बेबस आँखों में देखा…उसी बुजुर्ग व्यक्ति के घर के सामने एक ट्रैक्टर पर गन्ना लदा था..उत्सुकता बढ़ी तो उस गन्ने के मालिक से मिला…उन्होंने बताया कि हर साल गन्ने की खासी पैदावार होती है…फिर मैंने गन्ने से होने वाली उनकी वार्षिक कमाई का हिसाब लगाया तो पाया कि उनसे ज्यादा तो शहर में गन्ने का रस बेचने वाला कमा लेता है…फिर मुझमें हिम्मत नहीं हुई कि उनसे अन्य फसलों के सन्दर्भ में बात कर सकूँ…कमाल का दुर्भाग्य था कि जिसके उत्पाद पर शहरों की कई दुकानें गुलज़ार रहती हैं उसे पैदा करने वाला दो वक्त की रोटी की चिंता में सुबह-शाम डूबा रहता है…

वहाँ से आगे बढ़ा तो एक किशोर भैंस की पीठ पर बैठा कहीं जा रहा था…मैंने उसे रोका और कहा, “मुझे पूरा गाँव घूमा दो, बदले में मैं तुम्हें पैसे दूंगा…” ये सुनते ही वो व्यस्क जोर-जोर से हंसते हुये कहा, “क्या साहब घुमाने का पैसा मिलता है…?” उसकी हंसीं सुनकर मैं उसके सामने उल्लू सा बन गया लेकिन मन ही मन सोचा कि लोग आगरा के ताजमहल को दिखा कर पैसे छाप रहे हैं और इसे पता भी नहीं है कि घुमाने के भी पैसे मिलते हैं…तभी एक आदमी मेरे पास आया और पूछा, “आप इस गाँव के बारे में क्या जानना चाहते हैं?” मैंने जवाब दिया, “जो आप बता दें…” उस आदमी ने मुझे बताया कि इस गाँव के लोग इंजीनियर भी हैं, डॉक्टर भी हैं, फौज में भी हैं, मीडिया में भी हैं और व्यवसाय में भी हैं…मुझे ये सब सुनकर बड़ा अच्छा लगा लेकिन जब वैसे सफल लोगों का औसत निकाला तो उसकी संख्या देख कर ज़ेहन में कई सवाल पैदा हुये…और मैं सोचने लगा…

तब तक शाम हो चुकी थी और शाम होते ही लाउडस्पीकर की आवाज़ आने लगी…उस आवाज़ की सार्थकता मेरी समझ से परे थी…तभी बगल से गुजर रहे एक लड़के को रोका और उससे पूछा, “ये किस चीज़ की आवाज़ है?” उस लड़के ने जवाब दिया, “मेरा नाम सौरव है, घर वाले मुझे मोनू कह कर बुलाते हैं…आज यहाँ छठ है और करीब पिछले सौ सालों की तरह ही इस बार भी नाटक का आयोजन किया गया है…मैंने अपने जन्म से लेकर आज तक हर एक नाटक को देखा है…आप भी चलिए…बड़ा मज़ा आयेगा..” मैं उस बच्चे की मासूम बातें चुप-चाप सुनते हुये मुस्कुरा रहा था और फिर उसके पीछे-पीछे चलने लगा…

गंतव्य स्थान पहुँचा तो देखा कि एक मंच बना था…उसके ऊपर लिखा था “श्री भैरव नाट्य कला परिषद्”…उसी लड़के ने बताया कि भैरव बाबा इस गाँव के कुल देवता हैं और उन्हीं के नाम पर इस नाटक मण्डली का नाम रखा गया है…मल्टीप्लेक्स में टिकट कटाने की जो भीड़ और उतावलापन होता है उससे ज्यादा उत्तेजना वहाँ के बच्चों में थी जो बोरा से अपनी जगह सुनिश्चित कर रहे थे…थोड़ी ही देर में पूरा प्रांगण भीड़ से खचा-खच भर गया…परदे के पीछे से भगवान के नारे लगाये जाते और हर बार भ्रम होता कि इस नारे के बाद नाटक शुरू हो जायेगा लेकिन हर बार भ्रम टूटता गया…लेकिन एक बार सच में नारों की शोर के बीच पर्दा उठा और तालियों की गूंज से पूरा माहौल कलामय हो गया….फिर एक बुजुर्ग व्यक्ति से स्टेज पर आकार दो शब्द कहने की गुजारिश की गई…उनका नाम ‘किरणदेव मिश्रा’ था…उनके बारे में मुझे सौरव उर्फ मोनू ने बताया कि किसी ज़माने के वो इस मंच के धाकड़ अभिनेता थे…पेशे से शिक्षक थे…सेवानिवृत हो चुके है…और इस नाटक मण्डली के अध्यक्ष हैं…ढलती उम्र के कारण अब वो स्टेज पर अभिनय तो नहीं करते लेकिन नाटक की हर रात वो अपने अनुजों को आशीर्वाद देने ज़रूर आते हैं…” उनके दो शब्दों के संबोधन पश्चात नाटक प्रारंभ हुआ…हर एक सीन मुझे मुंबई नगरी की याद दिला रहा था और हर एक पात्र की अभिनय कला से मैं मंत्र मुग्ध हो रहा था…वो पूरी रात उसी अभिनय और अभिनेताओं के बीच बीती…हज़ारों की संख्या में लोग थे और दर्शक इतने सहज और जागरूक कि ऐसी तालियाँ बड़े-बड़े अभिनेताओं को ना मिली हो…

सुबह गाँव वालों से नाटक के बारे में बात की…बच्चों से हीरो के नाम पूछे तो कुछ ने दिनकर का नाम लिया, कुछ ने नीरज का नाम लिया, कुछ ने पंकज का नाम लिया तो कुछ ने गोविन्द, राजा, गोपाल, माधव वगैरह का नाम लिया….कुछ ने तो यहाँ तक बताया कि अवधेश और अलोक नाम के दो डॉक्टर हैं वो भी नाटक के समय डॉक्टरी छोड़ देते हैं…मैंने आज तक इन अभिनेताओं का नाम तो नहीं सुना था लेकिन अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं था कि ये लोग वही अभिनेता हैं जो कल रात मंच पर अभिनय से इन दर्शकों के दिलों पर राज़ कर रहे थे…फिर मुलाक़ात हुई उस नाटक मण्डली के उपाध्यक्ष ‘राम वशिष्ट मिश्र’ से..उन्होंने इस नाटक मण्डली के सफर की दास्तान सुनाई…उन्होंने ये भी कहा कि कैसे वो  कुछ कलाकारों को प्रशिक्षण लेने हेतु यथासंभव मंडली के खर्च पर आगे बढाते हैं…उनकी बातों में निःस्वार्थता और कटिबद्धता इस स्तर का था कि सम्मान से सर खुद ही झुक गया…फिर उस नाटक मण्डली के निर्देशक से मिलने की इच्छा हुई…कुछ लोगों ने बताया कि निर्देशक ही इस नाटक मण्डली के प्राण हैं…उनकी मेहनत और उनके प्रयासों से ही अब तक ये सांकृतिक धरोहर ज़िंदा है….मैंने किसी से उस निर्देशक के घर का पता पूछा फिर उनके घर की तरफ चल दिया….एक आदमी उनके घर के दरवाज़े पर लूँगी पहने किसी से कुछ बात कर रहा था…मैंने पूछा, “ सुरेन्द्र शर्मा जी कहाँ मिलेंगें..” उस आदमी ने सर से पांव तक मुझे देखा और फिर जवाब दिया, “जी मैं ही हूँ…” मैंने फिर पूछा कि आप मुझे बतायेंगें कि आप ये नाटक मंडली कैसे चलाते हैं…” शर्मीले स्वभाव और अंतर्मुखी व्यक्तित्व के धनी शर्मा जी कुछ नहीं बोंले सिवाय इसके कि सब बाबा भैरव की कृपा है…” मेरे पास भी पूछने को कुछ नहीं बचा और मैं उनसे विदा लेकर चल दिया…तभी वो हंसते हुये पीछे से बोंले, “अरे बबुआ, सब होए जाई छै…बस लोग सब अब पहले नहैंत नें रह्ले…चन्दा भी ठीक से नें दें छै…” उनकी उस हँसी में छुपे दर्द को मैं महसूस कर सकता था…लेकिन अफ़सोस कि उनके दर्द को कम नहीं कर पाया…

फिर मैं उस गाँव की यात्रा खत्म कर वापस आने लगा…सामने कुछ बच्चे आपस में खेल रहे थे…उनमें से एक बच्चा कुछ अजीब सी हरकतें कर रहा था और बाकी सब उसे देख, हँस रहे थे…उन हंसते बच्चों में से मैंने एक से पूछा, “तुम लोग हँस क्यूँ रहे हो और ये बच्चा क्या कर रहा है?” उस बच्चे ने जवाब दिया, “हमारे गाँव में एक सतीश चा हैं, वो भी स्टेज पर ऐसा ही करते हैं और हम सब की हंसीं का मतलब यही है…” सोच कर मैं दंग रह गया कि सतीश नाम का वो एक्टर कितना बड़ा होगा जो बच्चों के दिलों में राज यूँ करता है…शायद दुनिया की पृष्ठभूमि पर उनकी पहचान गुमनाम हो लकिन क्या ये कम है कि एक गाँव के इतिहास से लिपटी उनकी यादें हैं और भविष्य की तस्वीर में उनका भी एक अंश होगा…

ये सोचते हुए मैं उस गाँव से विदा हुआ…रास्ते भर सोचता रहा कि क्या कुछ नहीं था उस गाँव में…हुनर था, कला थी, संस्कृति प्रेम था, धर्म पर आस्था थी, मेहनत का रंग था, ज़माने के संग चलने के लिये पैर तैयार थे, मिलकर समस्याओं से दो-दो हाथ करने हेतु हाथ तैयार थे…बस नहीं थी तो जानकारी नहीं थी…नहीं था तो वो धागा नहीं था जो उस गाँव को देश के मुख्य धारा से जोड़ के रख सके…क्यूंकि एक सच तो ये है ही कि जो गाँव वाले हल चला सकते हैं , लालटेन की धुँधली रौशनी में भविष्य खोज सकते हैं, ज़िंदगी के सबसे संघर्षमयी रूप में जिंदादिली से जी सकते हैं उनके हाथों में माउस दे दिया जाये तो वो भला क्या नहीं कर सकते हैं…?

फिर मैं मुंबई की व्यस्त ज़िंदगी में रम गया…अकोपुर गाँव इस दुनिया में कहीं है या नहीं ये तो नहीं पता लेकिन इस देश का हर गाँव अकोपुर सरीखा है, जिसकी सीमाओं पर संभावनाएं बाहें फैलाए चौबीसों घंटें खड़ी रहती है ताकि कोई उन्हें भी मेन स्ट्रीम ज़िंदगी से जोड़ जाये…उनकी आशामायी आँखें हर सरकार, हर हुकमरान से मूक भाषा में यही कहती हैं- “साहब, शहर के रास्ते में कई गाँव पड़ते हैं….”

हमेशा की तरह एक शायरी के साथ मैं आपको छोड़े जाता हूँ…शायरी किसकी लिखी है मुझे भी नहीं पता लेकिन मैंने उसी गाँव के नाटक में, वहाँ के एंकर ‘राहुल जी’ से सुना था जो जुबां पर चढ गई…

कलाकार मरते नहीं, ज़िंदा दफनाए जाते हैं

कब्र खोद के देखो,

मंच की कशिश, सीने में अब भी दबाये होते हैं…

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