-संतोष कुमार

इस निबंध का आशय इतिहास को बेसिरपैर कहने का नहीं है, न ही ऐसा कहने का मुझे कोई अधिकार है अपितु मैं आपका ध्यान उन चीज़ों की और आकृष्ट करना चाहता हूँ जिन्हें हम साधारण और सामान्य मान  चुके है और शायद ही कभी हमने ये विचार होगा की इन चीज़ों का भी बहुत गहरा इतिहास है . दुनिया की हर चीज़ जिन्हें हम जानते है सबका एक इतिहास है परन्तु दुर्भाग्य ये की इस ज्ञात विश्व के इस साधारण से  इतिहास से हम अनिभिज्ञ है. और हो भी क्यूँ न , हर चीज़ का इतिहास खोजना अपनी सरल से जीवन को जटिल बनाने जैसा है. जो लोग फल खाना चाहते है उनको फलो के इतिहास से कोई फर्क नहीं पड़ता. मेरा उद्देश्य यहाँ आपको इतिहास पढ़ाना नहीं है पर इतिहास से अवगत कराना है . वो इतिहास जो तारीखों, तथ्यों और आंकड़ो में नहीं मिलता.

बचपन में दादी- नानी की कहानी सबने सुनी होगी. उनकी कहानी अपने गाँव से लेकर स्वर्ग के देवी देवताओ तक फैली होती थी. बचपन में सुनते थे पर थोड़े बड़े हुए तो लगा की ये भी कोई कहानी है न सर न पैर. कितनी आसानी से स्वर्ग के देवी देवता लोगो को दर्शन देते थे और कैसे अपनी कहानियों से अपने  रीति रिवाजों को सही साबित करने का प्रयास होता था. पर इतिहास में हमने सीखा की ये किस्से कहानियां भी इतिहास है जिसे “मौखिक इतिहास” कहते है. और तब ऐसा प्रतीत हुआ की शायद उन कहानियों को सहेज के रखना चाहिए था. क्या पता वो अपने अन्दर कौनसा इतिहास कौनसा राज़ छुपाये बैठी हो.  बचपन में हम लोग एक बचकानी सी कविता पर बहुत हँसा करते थे. कविता कुछ यूँ थी- “ एक था राजा, एक थी रानी, दोनों मर गए, खत्म कहानी. राजा मरा लड़ाई में, रानी मरी कढ़ाई  में, बच्चे मरे पढाई में”. पूरी रचना का कोई मतलब ढूंढे नहीं मिलता पर हम लोग बड़े शौक से इसे बोला और सुना करते थे. कुछ दिनों पहले ये कविता मुझे फिर याद आई पर इस बार होंठों पर मुस्कान नहीं आई. उल्टा कुछ बुरा लगा. सोचने लगा की ४-५ साल की उम्र में किसने हमें सिखाया की राजा को लड़ाई में और रानी को कढ़ाई  में मरना चाहिए! हमने बचपन में क्या क्या सीखा किनसे सीखा और क्या जीवन भर उसको माना भी, ये इतिहास का वो पन्ना है जो इतना आसान है कि शायद किसी ने उसको पढने की ज़हमत नहीं उठाई.  किसने लड़कियों के हाथो में गुडिया थमाई और लडको के हाथ में गेंद या गाडी इसका भी इतिहास होगा. जिसको आपने  मान लिया और मान रहे है बिना किसी सबूत बिना तहकीकात के उस भगवान् का भी शायद कोई इतिहास होगा.

 

अपनी जिज्ञासु प्रवत्ति के कारण नित्य नया ज्ञान लेने को सदा आतुर रहता हूँ. और जितना अधिक इन्सान सीखते जाता है उसे एहसास होता जाता है कि क्यूँ हम आज भी तारीखे रट के और कुछ तथ्य जोड़कर इतिहास के ज्ञाता बनते फिरते है जबकि जानने लायक बाते तो हम वास्तव में जानते ही नहीं. मेरे कुछ दोस्त मुझसे पूछा करते है की इतिहास का जीवन में मूल्य क्या है और इस सवाल का कोई आसन उत्तर कभी मेरे पास नहीं होता. शायद इसलिए की लोग जिसे इतिहास समझते है वो इतिहास की छाया से अधिक और कुछ भी नहीं. ऐसे में बेसिरपैर का इतिहास बहुत काम आता है. शायद ये शब्द बहुत गलत और दुर्भाग्यपूर्ण है क्यूंकि इन साधारण सी बातो में हमारी पहचान छुपी हुई है. कदाचित Michel Foucault से पहले कोई पागलपन का इतिहास के बारे में सोचता भी तो उसे ही पागल समझ लिया जाता. इतिहास हमें ये बताता है कि कोई ज्ञान पूर्ण नहीं. कि विज्ञान सत्य नहीं अपितु एक प्रचलित  समय का सत्य है. ग्रीस में प्रचलित  मानव शारीर सम्बंधित ज्ञान सदियों तक प्रचलित रहा और एरिस्टोटल का सौर मंडल का ढांचा कई सदियों तक माना जाता रहा, पर आज ये बाते गलत साबित हो गयी है और अब सवाल उठता है कि पुराने ज्ञान और नए ज्ञान के बीच की कोई कड़ी है क्या. और जवाब है की उसी कड़ी को तो इतिहास कहते है. वो ज्ञान बेसिर पैर नहीं पर जिन बातो से वो ज्ञान जुड़ा  है वो हमारे जीवन में इतनी गहराई से बसी है की हमें ऐसा लगता की वो बाते सदा से ऐसी ही रही होंगी. और यहीं हम इतिहास से मात खा जाते है.

बाकि चीजों का शायद हमसे सीधा सीधा कोई वास्ता न हो परन्तु एक चीज़ है जो है हमसे जुडी पर शायद हमने कभी सोचा नहीं उसके बारे में. वो है हमारा surname. उपनाम सभी के होते है और हमारी पहचान का एक अभिन्न अंग है पर शायद हमें इसकी ऐतिहासिकता का ज्ञान नहीं. हमारा surname हमारे जीवन का इतिहास है और हमारे पूर्वजो की भी. सूक्ष्मता से अध्यन करे तो पाएंगे कि अधिकतर surname  हमारी मूल जाति, व्यवसाय या निवास स्थान से निकलते है या उनके सूचक है. पर एक प्रश्न मेरे दिमाग में कौंधा. कितने लोग अपने surname का मतलब जानते है? और कितने लोग अपने surname का अर्थ सार्थक रख पाए है. दो वेद पढने वाला द्विवेदी, तीन वेद वाला त्रिवेदी और चार वेद वाला चतुर्वेदी कहलाता था. क्या ये उपनाम धारण करने वाला कोई व्यक्ति क्या आज भी इसे चरितार्थ करता है? चोपड़ा अपना उपनाम चौपट राय के नाम पर रखते है पर आज के समय में कितने लोग खुद चोपडा उपनाम वाले लोग भी, इस सत्य से परिचित होंगे. उदाहरण कई है सवाल एक. क्या ये हमारी “ऐतिहासिक मूर्खता” नहीं कि राम और कृष्ण से अपना इतिहास खोजने वाले और युगों मन्वन्तरो की बात करने वाले शायद अपने परदादा का भी नाम नहीं जानते. ये बेसिर पैर की बाते है शायद. क्यूंकि अपना नाम का मतलब न पता होने से शायद हमारी ज़िन्दगी में कोई फर्क नहीं पड़ेगा पर फिर सवाल उठता है कि हम खुद को नहीं जानते फिर आखिर हमने जाना क्या. रात को नाख़ून क्यूँ नहीं काटते, मंगलवार और शनिवार को बाल नहीं कटवाते इन सब का इतिहास है. क्या खाते है, क्या पहनते है सबका अपना इतिहास है. फुर्सत मिले तो अपनी जड़े खोद के देखना. इससे तुम्हारी ज़िन्दगी में कोई फर्क तो नहीं पड़ेगा पर शायद तारीखों से इतर कोई नया इतिहास खोज लोगे…. दुनिया का इतिहास किताबो में पढ़ते है, आज अपनी ज़िन्दगी की किताब पढ़कर देखी जाये. बाद में न कहना, इतिहास बेसिरपैर है क्यूंकि इतिहास का असली अर्थ तो तुमने कभी जाना नहीं. बेसिरपैर है पर इतिहास है … पहचान है तुम्हारी बस तुमसे ही अनजान है.

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