-कुमार गौतम           

कुमार गौतम का जन्म बिहार के मुज़फ्फरपुरमें स्थित ‘मणिका’ नामक ग्राम में हुआइनकी प्रारंभिक पढाई-लिखाई वहीं से हुईइन्होने दसवीं की पढाई मुज़फ्फरपुर और बारहवीं की पढाई पटना से करने के पश्चात, उच्च शिक्षा के लिये दिल्ली का रुख कियादिल्ली विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में स्नातक की डिग्री प्राप्त कीफिर अपने व्यावसायिक करियर के लिये मुंबई के लिये प्रस्थान कियेपिछले करीब दस सालों से वो बतौर लेखक-निर्देशक फिल्म और टीवी के क्षेत्र में कार्यरत हैंपच्चीस से ज्यादा शो में बतौर लेखक-निर्देशक अपनी भूमिका निभा चुके हैं और अपनी पहली हिंदी फीचर फिल्म की तैयारी में जुटे हैंऔर इसी दिशा में इनकी कर्म यात्रा जारी है

 

‘मणिका’ से मुंबई तक के संघर्षमयी सफर के पश्चात चीज़ों को देखने का उनका नजरिया बदला, समझने का तरीका बदलाऔर जब आज अपने उसी नायाब दृष्टिकोण से उत्तर भारत की सांस्कृतिक धरोहर को ये देखते हैं तो उनकी प्रतिक्रिया कुछ यूँ होती है जिसमें यतार्थ है, मौलिकता है, संवेदना है और एक चिंता भी है

 

बृजेश को बचपन से ही नाचने का बेहद शौक था। स्कूल के सालाना जलसे में अव्वल दर्जे का नाच कर, वह कई सालों से लोगों को मंत्र-मुग्ध करता चला आ रहा था। पढाई में भी वह काफी अच्छा था, इस कारण वह अपने माँ-बाप और शिक्षकों का चहेता भी था। कई अभिवाहक उसकी इस चतुर्मुखी प्रतिभा को देखकर, अपने बच्चों को बृजेश जैसा बनने की प्रेरणा देते थे।

जब वह दसवीं पास कर गया तो उस पर पढाई का बोझ आन पड़ा। उसके माँ-बाप अपने होनहार बच्चे से अनगिनत आशायें लगाने लगे। उसके पिता उसे वैज्ञानिक के रूप में देखना चाहते थे। इसके पीछे कारण था, उनका वह अधूरा स्वप्न जो उन्होंने खुद के लिये देखा था। बृजेश के नाना उसे डॉक्टर बनाना चाहते थे क्यूंकि वही स्वप्न उन्होंने उसकी माँ के लिये देखा था। जबकि माँ अपने बेटे को कलेक्टर के लाल गाड़ी में देखना चाहती थी। क्यूंकि उनकी दिली ख्वाइश थी कि उनकी शादी एक कलेक्टर से हो।

खैर, बृजेश ने माँ-बाप की सलाह मान कर “ग्यारहवीं” में विज्ञान विषय का चुनाव किया। यद्दपि उसका मन था कि वह “कला क्षेत्र” में अध्ययन करे और नृत्य की बारिकियों को समझकर, उसे जीवन में अपना ले। ”ग्यारहवीं” में उसका दाखिला अव्वल दर्जे के कॉलेज में हुआ और बहुत जल्द ही वह उस कॉलेज में प्रचलित हो गया। कॉलेज और स्कूल में बस इतना फर्क था कि कॉलेज में उसकी गिनती “मध्यम श्रेणी” के विद्द्यार्थियों में की जाने लगी। हाँ, नृत्य के विधा में और चमक जरूर आ रही थी।

कॉलेज में बृजेश की दोस्ती ‘प्रत्यूष’ से हुई…प्रत्यूष, बृजेश के व्यक्तित्व से काफी प्रभावित था। प्रत्यूष का यह मानना था कि अगर बृजेश मन लगाकर पढ़े तो बड़ी आसानी से प्रथम श्रेणी के विद्द्यार्थियों में आ सकता है। प्रत्यूष ने बृजेश से दोस्ती बढ़ाई और बाद में उसे ये जानकर बेहद अफ़सोस हुआ कि बृजेश सिर्फ़ अपने माँ-बाप का दिल रखने के लिये “विज्ञान” पढ़ रहा है। प्रत्यूष  ने उसे प्रेरित किया कि वह किसी भी तरह दो साल की पढाई पूरी कर ले और उसके उपरान्त अपना पूरा ध्यान नृत्य में लगाये क्यूंकि उसके बाबूजी का मानना था कि इंसान को वही काम करना चाहिए जो उसे काम ना लगे।

प्रत्यूष की प्रेरणा अंततः रंग लायी। बारवीं पास करने के बाद बृजेश ने कुछ इंजीनियरिंग और मेडिकल कॉलेजों में प्रवेश हेतु परीक्षा भी दी, लेकिन विफल रहा। उसके माँ-बाप ने उसे बहुत समझाया कि वह एक साल इंतज़ार कर ले और खूब मन लगाकर पढाई करे, सफलता उसके कदम चूमेगी। लेकिन इस बार बृजेश ने एक ना मानी और उसने बहुत ही बहादुरी से ये एलान कर दिया कि वो आगे की पढाई नृत्य और संगीत में करेगा। बृजेश के इतना कहते ही घर में जैसे ज्वालामुखी फूट पड़ा। बाबूजी ने कहा- मैं अपने घर में एक भांड को नहीं रखना चाहता। इससे कहो या तो यह सजन्नों की तरह पढाई-लिखाई करे या घर छोड़ कर चला जाये। दादी ने पिताजी को बहुत समझाया, कहा- बच्चा है, धीरे-धीरे नाच का नशा उतर जाएगा। पर किसी ने एक ना सुनी, जैसे सभी ने अर्जुन की तरह धनुष तान रखी हो। आखिरकार नतीज़ा ये हुआ कि बृजेश घर छोड़ कर चला गया।

बृजेश गोरखपुर से बनारस आ पहुँचा। उसे “काशी हिंदू विश्वविद्यालय” के ‘फैकल्टी ऑफ म्यूजिक’ में दाखिला मिल गया। प्रवेश-परीक्षा में अव्वल आने के कारण छात्रवृति भी मिली।  विश्वविद्यालय के प्रांगण में स्थित होस्टल में रहने का प्रबंध भी हो गया तथा वहीं ‘मेस’ से खाना भी मिल जाया करता था। इस तरह बृजेश की ज़िंदगी सुचारू रूप से चल पड़ी। देखते ही देखते तीन साल बीत गये और बृजेश ने ‘गोल्ड मेडल’ के साथ संगीत और नृत्य में स्नाकोत्तर किया।

बृजेश यूँ तो था मर्द. मगर नृत्य के रस में डूब जाने के बाद उसकी भाव-भंगिमायें औरतों जैसी हो गई थीं। इसमें उसका कोई दोष नहीं था क्यूंकि नृत्य में ज्यादा तर मुद्रायें तो औरत की आत्मा व वेश धारण कर ही करनी पड़ती है। इसके अलावे वह देखने में खूबसूरत था और विग की झंझट से दूर रहने के लिये उसने अपने बाल भी बढ़ा लिये थे। पर इन सब उपलब्धियों का एक विपरीत असर भी पड़ा था। कई बार तो अंधेरे में मनचले लड़के उसे लड़की समझकर छेड़ देते और बाद में असलियत जानने पर शर्माते थे।

बृजेश ने कलकत्तावासियों के दिल में संगीत व कलाकारों के लिये बेपनाह इज्ज़त के बारे में बहुत सुन रखा था। सो वो पढाई खत्म करते ही कलकत्ता पहुँच गया। कुछ ही दिनों में बतौर नृत्य-शिक्षक उसे “रविन्द्र भारती विश्वविद्यालय” में नौकरी मिल गई। और जैसा कि अक्सर होता आया था, वह बहुत जल्द ही विद्द्यार्थियों के बीच प्रचलित हो गया। यह बात अन्य शिक्षकों से देखी नहीं गयी। चुकी बाकी सारे शिक्षक बंगाली थे इसलिए बहुत जल्द उनकी एक लॉबी बन गयी। इस लॉबी ने यह ठान लिया कि वो किसी भी तरह बृजेश को विश्वविद्यालय से निकाल बाहर कर दम लेंगें। शिक्षकों का समूह, प्राचार्य से मिला और कहा- बृजेश औरतों की भाव-भंगिमा अपनाकर, नाबालिक लड़कों को बहकाते हैं, उन्हें छेड़ते हैं तथा समलैंगिक संभोग करने को प्रेरित करते हैं। खैर, प्राचार्य को कुछ ना सूझा और उन्होंने इस मामले की तहकीकात के लिये शिक्षकों की एक टीम बनायी। बृजेश के विपक्षियों ने ऐसा मिर्च-मसाला लगाकर अपने स्पष्टिकरण दिये कि बृजेश की एक ना चली और आखिरकार कॉलेज कमिटी ने उन्हें निकालने का फैसला कर लिया। यह बात विद्द्यार्थियों में आग की तरह फ़ैल गयी। विद्द्यार्थियों ने बहुत बड़ा आंदोलन छेड़ दिया। विद्द्यार्थियों ने बृजेश को बहुत समझाया कि वो समझदारी से काम लें क्यूंकि उसमें, उनके कॉलेज की बदनामी थी। मगर विद्द्यार्थियों कहाँ मानने वाले थे। इन सभी बातों बातों के फलस्वरूप, कमिटी ने एक बार फिर अपना फैसला बदला और दोबारा पिछली गलतियाँ  ना दोहराने की चेतावनी के साथ, बृजेश को पुनः क्लासेज लेने का आमंत्रण दिया।

मगर बृजेश का मन अब तक टूट चुका था। उसने पिछले दिनों ही प्रत्यूष से फोन पर बातचीत की थी और उसे अपने कॉलेज छोड़ने की बात बतलायी थी। फिर भी उसके मन में बदनामी की बात खटक रही थी। वह चाहता था कि कॉलेज छोड़ने से पहले वह दामन पर लगे इस दाग को धो कर जायेगा। जब वह अगले दिन कॉलेज पहुँचा तो उसने विद्द्यार्थियों के समुख अपने कॉलेज छोड़ने की बात बताई। विद्द्यार्थियों के बीच एक निराशा की लहर दौड़ पड़ी। बृजेश ने उन्हें शांत करते हुए कहा- अगर आपलोग मेरे लिये कुछ करना चाहते हैं तो कॉलेज कमिटी को यह यकीन दिलाइये कि मेरे ऊपर लगाये गये इल्ज़ाम झूठे और बेबुनियाद हैं। इससे मेरे ज़मीर को शान्ति मिलेगी और मैं आगे की ज़िंदगी बड़े चैन से गुजार सकूँगा। खैर, विद्द्यार्थियों संघ के पहल पर ‘केस’ एक बार फिर से खोला गया और दुबारा नये सिरे से तहकीकात करने के बाद, यह स्पष्ट हो गया कि बृजेश, अन्य शिक्षकों की साज़िश का शिकार हुये थे। प्राचार्य महोदय ने कॉलेज के सभागार में कॉलेज कमिटी की ओर से क्षमा माँगी और नये सिरे से पुनः क्लासेज शुरू करने की गुजारिश की।

लेकिन बृजेश को रोक पाना अब संभव नहीं था। सारे विद्द्यार्थियों ने उसे अश्रुपूर्ण विदाई दी और तोहफे में ना जाने क्या-क्या चीज़ें दीं। जहां कई शिक्षक बृजेश के कॉलेज छोड़ने पर गुमसुम थे, तो वहीँ बहुत अपनी जीत पर मंद-मंद मुस्का रहे थे। बृजेश को यह नहीं मालूम था की आगे ज़िंदगी उसे कहाँ ले जायेगी। फिर भी वह ज़िंदगी की नयी राह तलाशने चल पड़ा था और इस नयी राह में उसे पूरा विश्वास था कि नृत्य किसी ना किसी रूप में उसकी संगीनी बनेगी।

बृजेश कुछ दिनों तक कलकत्ते के नाटक गृहों में भटकता रहा। वहीं उसकी मुलाक़ात मशहूर निर्देशक “संजीब चट्टोपाध्याय से हुई। उन्होंने उसे अपने नाटक में हिजड़े का छोटा सा किरदार दिया। बृजेश के पास कोई काम नहीं था। इसलिए उसने हाँ कर दी, मगर उस किरदार में नाच के कोई क्षण नहीं थे। इसके फलस्वरूप उसे बोरियत महसूस होने लगी। उसने “संजीब दा” को किसी भी तरह मनाकर नाटक में नृत्य का एक अंग जोड़ दिया। एक दिन नाटक के उपरांत  “सुधाकर पाण्डे” विंग्स के पीछे उससे मिलने आये और अपनी “लौंडा डांस पार्टी” में शामिल होने का आमंत्रण दिया। “लौंडा डांस” क्या है, यह तो बृजेश को नहीं मालूम था मगर हाँ यह बात सुधाकर जी ने स्पष्ट कर दी थी कि उसे नाचने का भरपूर मौका मिलेगा तथा मेहनताने के रूप में दस हज़ार रूपये महीने व खाना, रहना, कपड़ा आदि मुफ़्त मिलेगा। बस एक शर्त थी कि उसे लड़की की वेश-भूषा धारण कर नृत्य करना पड़ेगा।

बृजेश ‘डांस पार्टी’ में शामिल हो गया और बिहार के मुज़फ्फरपुर जिला पहुँचा। उसका काम बारातियों के साथ डांस करते हुये लड़की के दरवाज़े तक पहुँचाना था तथा रात में जनवासे पर ठहरे हुये बारातियों का नृत्य के द्वारा मनोरंजन करना था। यद्दपि छोटे-छोटे गाँवों में खाने और रहने की बड़ी असुविधा होती थी फिर भी बृजेश बहुत खुश था। उसे नाचने की पूरी आज़ादी थी और लोग उसके नृत्य को देख कर इस कदर झूम उठते कि तालियों, सीटियों और तारीफों से स्वागत करते। वह अपने लौंडा डांस पार्टी में इस कदर रम गया था कि जब उसे पैसे मिलते, उसे लगता की शायद वो रूपये उसे मुफ़्त के मिल रहे हैं। मिलाजुला कर बृजेश अपनी नई ज़िंदगी से बेहद खुश था। एक रात उसने आसमान के नीचे लेटकर कहा- “ईश्वर जो करता है, अच्छा ही करता है।”

बृजेश की डांस पार्टी एक बार बिहार के छपरा ज़िले पहुँची। रात भर नाचने के बाद बृजेश जब सुबह के पाँच बजे लेटने गये तो सुधाकर जी उसके कमरे में आ गये। सुधाकर जी ने बड़े प्यार से उसकी ओर देखते हुये कहा- बृजेश तुम खुश हो ना। बृजेश ने सिर हिलाकर हामी भरी और मुँह घुमाकर दूसरी ओर लेट गया। सुधाकर जी भी उसके साथ लेट गये। और कुछ ही मिनटों में सुधाकर जी उसके गुप्तांग सहलाने लगे। बृजेश को अच्छा महसूस हुआ और उसके तन में बिजली सी दौड़ गई। इसके बाद सुधाकार के गठे शरीर की क्रूरता और मर्दानगी का खेल, बृजेश को बहुत भाया। शायद उसके कोमल मन और तन के लिये, अपने तरीके का ये पहला सुखद अनुभव था।

दूसरे दिन सुधाकर ने बृजेश का परिचय, विधायक एवं पूर्व मंत्री “छगन सिंह” से करवाया। सुधाकर जी ने कहा, “छगन जी, तुम्हारे नृत्य से बहुत प्रभावित हैं और अकेले में तुमसे कुछ बात करना चाहते हैं। बृजेश बहुत खुश हुआ और बड़ी इज्ज़त से उन्हें अपने कमरे में ले गया। ”छगन” बृजेश को अकेला पाते ही आव देखा ना ताव और उस पर टूट पड़ा और उसे नंग-धडंग करने की कोशिश करने लगा। बृजेश डर के मारे सहम गया। शायद वो सुधाकर के साथ एक अपनापन महसूस करता था और सुधाकर के ढंग ने उसे उस निराले अनुभव को महसूस करने पर मजबूर कर दिया था। मगर छगन, तो शैतान दिख रहता था। बृजेश डर के मारे, अपना देह सिकुडकर एक कोने में बैठ गया। छगन ने उस पर हर तरह से वार किये। पर वह टस से मस नहीं हुआ। आखिरकर छगन माँ-बहन की गाली और बदला लेने की धमकी देता हुआ कमरे से बाहर निकल गया।

दूसरे दिन बरात के साथ डांस करते हुये बृजेश को कई तकलीफों का सामना करना पड़ा। किसी ने उसकी टाँगें फंसा दी जिससे वह गिर गया, तो किसी ने जोर से उसका अंडकोष दबा दिया जिससे उसे बहुत दर्द हुआ। कई लोगों ने जलती हुई सिगरेट से उसके बदन को कई जगहों पर जला डाला। फिर भी बृजेश अपने नृत्य की उपासना में लीन रहा रहा। जन वासे पर लौटने के बाद उसे अपने जख्मों को देख रोना तो नहीं आया, हाँ उन लोगों पर तरस ज़रूर आया जो अनजाने में उसकी नृत्य-पूजा में बाधक हो, नृत्य सरताज भगवान शिव को क्रोधित कर रहे थे।

छपरा में शादी अच्छी तरह सम्पूर्ण हो गयी थी और कल सुबह पौ फटते ही डांस पार्टी को मुजफ्फरपुर के लिये कूच करना था। बृजेश जल्द से जल्द वहाँ से चला जाना चाहता था क्यूंकि अब भी उसके दिमाग में छगन सिंह की बातें गूंज रही थीं। अगले दिन सुबह होने से पहले, बृजेश शौच के लिये जनवासे के पास वाले खुले मैदान में गया। गाँव छोटा होने के कारण शौचालय की कोई सुविधा नहीं थी। जब तक बृजेश शौच की मुद्रा में बैठता, पीछे से करीब पाँच लोगों ने बृजेश पर हमला कर दिया। फिर पाँचों ने बारी-बारी से बृजेश का सामूहिक बलात्कार किया, जिनमें से एक छगन सिंह भी था।

बृजेश ने सुधाकर की “लौंडा डांस पार्टी” छोड़ एक नयी डांस पार्टी बनाइ। उसने प्रण किया कि वह “लौंडा डांस” को लोक-नृत्य का दर्ज़ा दिलाकर इनका मंचन बड़े-बड़े सभागार में करेगा। उसका मानना था कि “लौंडा डांस” बिहार के कला-क्षेत्र का एक अनमोल धरोहर है और इसकी पहुँच, कथक और भरतनाट्यम की भांति पूरे विश्व में होनी चाहिए। अपने इस सपने को जीवंत करने के लिये बृजेश ने कला एवं संस्कृति मंत्रालय समेत कई बड़े-बड़े ऑफिसों के चक्कर काटे। मगर हर जगह उसे हताश हाथ लगी और लोगों ने उसका उपहास किया। कई नेताओं और आला दर्जे के अधिकारियों ने उसके साथ सेक्स करने की पेशकश की और एवज में फाइल आगे बढाने और पैसे देने का भी वायदा किया। आखिरकर बृजेश हार गया और अपने ग्रुप के डांसर्स को गिरती ‘माली’ हालत को देखकर उसने भी सुधाकर की ही तरह “डांस ग्रुप” बरात में ले जाने लगा।

बृजेश जब चालीस साल का हो गया तो उसके शरीर की थिरकन, उसके अंगों की फूर्ती, उसकी कोमलता और भाव-भंगिमायें जवाब देने लगीं। उनकी ताजगी मुरझाने लगी।उनकी चमक, सुबह के दीये की भांति ओझल सी दिखाई देने लगी। तभी उसकी मुलाक़ात हलदिया के ज़मींदार “सुजान सिंह” से हुई, जो उसके नृत्य का बरसों के कायल थे और उसके कोमल-लचकदार जनाना रुपी शरीर के गुलाम भी थे।

सुजान सिंह थे तो सत्तर साल के, मगर अभी एक साल पहले उन्होंने पांचवीं शादी की थी। वो एक ऐसे वफादार इंसान की तलाश में थे, जो उनकी पत्नियों पर नज़र रख सके, जिससे की वो सुजान की अनुपस्थिती में किसी गैर मर्द के साथ नाजायज़ तालुकात ना बना सके। सुजान के हिसाब से बृजेश से ज्यादा वफादार “मर्द” उन्हें कभी नहीं मिल सकता था। उन्होंने बृजेश को दस हज़ार रुपये महीना और साथ में खाना-रहना, पर्व-त्यौहार में बोनस के वायदे पर नौकरी दे दी। बृजेश की एक मात्र शर्त थी कि वो पास के एक अंग्रेजी माध्यम से चलने वाले स्कूल में जा कर बच्चों को नृत्य सीखा सके। सुजान ने खुशी-खुशी हाँ कह दी। आज, सुजान का जब भी अपनी बीवियों से मन भर जाता है, तो वह बृजेश के साथ संभोग कर अपनी कामुक तंदरुस्ती को बरकरार रखता है। और बृजेश को शायद ये भी नहीं मालूम की वह अपनी ज़िंदगी के आखिरी पड़ाव में झूल रहा है, क्यूंकि उसे ‘ऐड्स’ है।

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