– कुमार प्रभात

 परदे के गिरने और उठने के बीच, एक पृथक दुनिया बसती है…उसकी एक पृष्ठभूमि होती है, एक कहानी होती है, कुछ किरदार  होते है , कुछ संवाद होते है , कुछ अभिव्यक्तियाँ होती है , और ये हर बार जीवन का एक सार प्रस्तुत  करते हैं …कभी भागती, हांफती और थकती ज़िन्दगी में हास्य पैदा  करती है…कभी ज़िन्दगी  की सबसे निचली परत की मार्मिक कहानियां  बयां करती…कभी जिज्ञासा भरी कहानी तो कभी कहानी में रोमांच और रोमांस की चरम सीमा तक पहुंचा देती है…कभी एक किरदार जीवन भर के लिए अपना हो जाता है तो कभी एक कलाकार से आप बेइंतहा मुहब्बत करने लगते ह…कभी कोई दर्शक  ‘देवदास’ के गम में  दुखी हो जाता है तो कभी कोई जिंदादिल  इंसान की आँख ‘मोहनदास’ के किरदार  से नम हो जाती है…ये करिश्मा ही तो है की  एक ही पंच पर, एक ही कलाकार जीवन में  कितने रंग भर जाते है  और शायद इसी लिए  इसे “रंगमचं” का नाम दिया गया है…  रंगमचं का अपना एक इतिहास है और रंगमचं खुद इतिहास को बयां भी करता है…छोटे से कस्बे से लेकर माया नगरी तक में इसकी अपनी अलग दुनिया है, अपना अलग अस्तित्व है…हर दौर में रंगमचं की दुनिया समकालीन दुनिया  का प्रतिबिम्ब  होती है…लेकिन इस प्रतिबिम्ब  का हर बिंदु  बिम्ब से मेल खाती हो, इसकी कोई विश्वसनीयता नहीं है…लेकिन इस अधूरेपन और सटीकता के साथ समाज को आइना दिखाता रंगमचं का दौर बढ़ता गया…कला-साधक इससे जुड़ते गये और लोग का प्यार  इसके प्रति और प्रगाढ़ होता गया…वो कहते ह ना की कला आप सीख नहीं सकते बल्कि  उसके लिए आपको साधना करनी पड़ती है…खुद को तपाना पड़ता है…जीवन रूपी  जाल के हर धागे के लचीलेपन को ना सिर्फ समझना बल्कि उसकी गांठ को सुलझाना भी पड़ता है…और रंगमचं के कलाकार को भी उस प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है…जो जितना तपता है, वो उतना निखरता  है…  ज़िन्दगी की एक तस्वीर  दिखाने के लिए रंगमचं के कलाकार महीनो मेहनत करते है …लेखक अपनी सोच से तस्वीर  की रूप रेखा तय करता है और उसम सही रंग का चुनाव कर उस तस्वीर को संवारता है…अभिनेता अपने किरदार  की गहराई में  बार-बार लगाते है ताकि उनके अभिनय कला में वास्तविकता  का समावेश ज्यादा से ज्यादा  हो सके… निर्देशक अपनी कहानी के सुर की जाँच बार-बार करता है….म्यूजिक वाला सही समय पर सही धुन से भावो  को और प्रभावी बनाता है, सेट डिज़ाइनर आपको यकीन दिलाता है कि कहानी कहाँ और किस पृठभूिम पर बनायी गयी है…costume वाले आपको किरदार को उनके काल-जन्म और व्यक्तित्व के हिसाब से प्रदर्शित करते है और इसके आलावा कई और परदे के पीछे कड़ी मेहनत करते है ताकि आप परदे के समक्ष प्रस्तुतीकरण का लुत्फ़ उठा सके…और दर्शको की तालियों की आवाज़ भर से ये सब अपनी मेहनत भूल जाते है …और इसी समर्पण के कारण रंगमंच  से जुड़े सदस्य अपने जीवन से ज्यादा प्यार  अपने प्रोफेशन से करते है…  मगर बदलते वक्त के साथ रंगमचं कला प्रदर्शन के बजाय अर्थ-ग्रहण का मार्ग बन चुका है…अभिनय सिखाने के नाम पर कला का व्यापर शुरू  हो गया है…ग्लमैर की बढती सत्ता  के बीच रंगमचं की चमक फींकी पड़ती जा रही है…अभिनय की माँ हमेशा से ही रंगमचं रही है लेिकन आज के समय में रंगमचं पर पैदा हुए कलाकार खुद रंगमचं के प्रति बेरुखी करने लगते है…लोग रंगमचं के सीने पर कला सीखते है और सीखने के बाद ग्लमैर की गोद में बैठ कर उसमे  इतना रम जाते है कि वही रंगमचं उन्हें  पिछड़ा सा लगने लगता है…इसके पीछे लोग की बेरुखी भी है…विकास करता समाज रंगमचं से दूर भाग रहा है…उसकी रूचि फिल्मो में ज्यादा  होती है और इस कारण बड़े-बड़े शहर के ऑडिटोरियम  खाली रह जाते है …  अब ज़रुरत है रंगमंच की दुनिया को फिर से गुलज़ार करने की क्यूंकि रंगमचं अभिनय का प्राथिमक स्कूल  है और बिना प्राथिमक स्कूल पढ़े कोई बच्चा उच्च  शिक्षा  की प्राप्ति नहीं कर सकता है…रंगमच के कलाकार को ना सिर्फ इज्ज़त की दरकार है बल्कि इस तरह से ढांचागत रंगमंच  का क्रियांवाहन  होना चाहिए ताकि उसे जिविकौपर्जन  के लिए सोचना ना पड़े…कभी मौका मिले तो रंगमचं के सच्चे शागिर्द से मिलिए …मिलने के पश्चात आपको एहसास होगा कि वो लोग कितनी मेहनत करते है…वो आपकी आँख में चमक भर देखने के लिए अपनी ज़िन्दगी को प्रैक्टिस की भठ्ठी में  झोक देते हैं…नतीज़ा चाहे जो भी हो, अपने काम को बखूबी निभाते  है …इसिलए हमारा भी फ़र्ज़  है कि  हम सब मिलकर उनके बारे में सोचे  क्यूंकि एक वही तो है जो की  हमारी तस्वीर  बेबाक और हिम्मत से दिखाते है…वो भी अगर नहीं रहे तो फिर  सोचिये की  हम खुद से कितनी दूर हो जायेंगे…  लेकिन इन सब के बीच एक बात तय है कि  रंगमचं की यात्रा ऐसे ही चलती रहेगी…लोग जुड़ते रहेंगे…कुछ की बेरुखी से ये रंगमचं झुलसता रहेगा लेिकन समाज को हर दौर में हिम्मत और आत्मबल  के साथ उसका चेहरा दिखता रहेगा…अब हमें न सिर्फ सोचना है बल्कि अवलोकन करना है कि हमारे कल में आज के रंगमचं की क्या भागीदारी होनी चाहिए …और एक बड़े शायर की इन दो पंक्तियों के साथ मैं आप लोगो को छोड़े जा रहा हूँ…

कल शहर म एक बुढा भूखा मर गया

सुना है   कि हर दौर में

उसकी हर-एक अदा पर

तालियाँ  बहुत बजती थी …

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