-संतोष कुमार

 

अनिल अपने फ्लैट पे बैठा चाय की चुस्कियों के साथ अख़बार पढ़ रहा था. अनिता तैयार होकर निकलती है कंधे पर पर्स टांगे

“अरे अभी तक चाय पी रहे हो!? और नाशता आधा छोड़कर अख़बार पढ़ने लगे”

“ सॉरी,  बस दो मिनट”

“अनिल मुझे देर हो रही है ऑफिस के लिए. वैसे ही इतना ट्रैफिक होता है, मैं लेट हो जाती हूँ”

“अरे अभी तो टाइम है. अभी 7:30 बजे है और तुम्हारा ऑफीस 9 बजे खुलता है”

“तुम भी पागल हो अनिल. भूल गये, रास्ते मे अपनी रिपोर्ट भी उठानी है”

रिपोर्ट ? कैसी रिपोर्ट?  अनिल ने पूछा

“भूल गये. हमारे बच्चे के लिए”

“अरे अनिता अब फिर से नही. मैने कितनी मर्तबा कहा है कि नही होता तो बच्चा गोद ले लेते है. पर तुम तो…. कितने टेस्ट होंगे पता नहीं”

“अपना बच्चा अपना होता है अनिल”

“डू द हेल विद चिल्ड्रेन!!” अनिल झुंझलकर बोला. फिर अनिता के चेहरे पर निराशा देखकर बोला-“ अनिता हम दोनो कितने खुश है,कितने पूरे. बच्चे का ख्याल हमारी ज़िंदगी मे क्लेश ला रहा है”

“बच्चे नही है इसलिए हमारी ज़िंदगी मे क्लेश है”

“खैर छोड़ो ये बात. मैं तो थोड़ी देर बाद निकलूंगा. तुम ऐसा करो, आज तुम ही कार लेकर चली जाओ. मैं बस से जाऊंगा”

अनिता- are u sure?

अनिल- definitely.

 

अनिल आज भी वो दिन याद करता है. उस शाम को वो बस स्टॉप पर इंतज़ार कर रहा था अनिता का. अनिता ने फ़ोन कर के बताया था की उसको कोई खुशख़बरी सुनानी है. उसने कहा था की वो अनिल को पिक उप  करेगी और फिर वो साथ डिनर करेंगे. पर वो नहीं आई. बस खबर आई.

“शी इस नो मोर. एक्सीडेंट इतनी तेज़ हुआ की उसकी मौके पर ही मौत हो गयी” पुलिस ने अफ़सोस भरे लहजे में कहा

अनिल सकते में था. काफी देर तक कुछ कह नहीं पाया. फिर कुछ हिम्मत जुटाकर बोला-“पर ये हुआ कैसे?”

“देखने वालो का कहना है की अनिता जी के रास्ते मे कुछ बच्चे आ गये थे बीच सड़क पर खेलते हुए. उन्हे बचाने के चक्कर मे उसने गाड़ी मोडनी चाही पर वो सीधा इस खंबे से टकरा गयी”

“उन बच्चो का क्या हुआ?”

“कुछ नही. वो तो खेलते खेलते निकल गये.”

ये सुनते ही अनिल का खून खौल उठा.” बच्चे, जिसकी चाह ने अनिता को जीते जी जीने नही दिया और अब…. मार दिया!! और उनको सज़ा….. कुछ भी नही”

इस पूरे समय मे अनिल के साथ सिर्फ़ उसका दोस्त मुकेश था. दोनो एक ही साथ पढ़ा करते थे और उनके संबंध बड़े अच्छे थे. सांत्वना देते हुए मुकेश बोला-

“सुन अनिल, जो   हो गया उसे ना तू बदल सकता है ना मैं.”

“छोड़ यार. मैं वो इंसान नही है जो इन बातो से अपना मन बहला ले. जाने क्यूँ बच्चो के नाम से  चिढ़ हो गयी है. मुझसे बर्दाश्त नही हो रहा है ये ख़ालीपन. मुझे ये  ख़ालीपन दूर करना है”

 

अनिल ने कोशिश की कि खुद को काम मे डुबो ले. और कुछ दिन ये काम किया भी. बस कुछ दिन… लेकिन गाड़ी बुरी तरह से टूट गयी थी. उसकी रिपेयरिंग होने तक उसे बस से ऑफिस जाना पड़ा.सच तो ये था की गाड़ी को देखते ही उसे अनिता याद आ जाती सो गाड़ी को वो घर लाना भी नही चाहता था.

बस मे खड़े हुए उसकी नज़र सामने के बच्चे पर पड़ी. उसने बहुत ही हल्के से सहारा ले रखा था. उसके हाथ मे एक कोक की बोतल थी. बच्चा बस में ही उसे खोल के पीने की कोशिश कर रहा था. सामने की सीट मे बैठी माँ उसे मना कर रही थी और अपने पास बुला रही थी पर एक  तो बच्चा ज़िद्दी था और दूसरा इतना छोटा भी नही की गोद मे बैठे.

तो वो बच्चा खड़ा होकर बोतल खोलने का यत्न कर रहा था. अनिल के मन मे अजीब सी चिढ़ मच रही थी और बच्चे की बेवकूफी उसे और गुस्सा दिला रही थी. तो उसने बच्चे के कंधे पे हाथ रखा

“सुनो बेटा, ऐसा मत करो. गाड़ी को झटका लगेगा तो  कोक गिर जायगा”. अनिल ने उसे बेटा तो कहा पर अन्दर से उसके मन में गुस्सा फूट रहा था.

पर लड़के ने बात अनसुनी कर दी. और सचमुच गाड़ी झटके से रुकी. और सारा कोक उसके पीछे खड़े अनिल पर छिटक गया.

बच्चे ने निराश स्वर से कहा “सॉरी अंकल”. सुनते ही अनिल के मन में पुरानी बाते तैर गया और बाहर छलक आई उसके अन्दर की भड़ास.

अनिल कुछ देर खामोश रहा फिर पीछे मुड़कर कुछ सोचते हुए कुछ कदम चला, लेकिन फिर तेज़ी से मुड़कर लड़के को थप्पड़ रसीद दिया और बोला- “सॉरी बेटा!!”

थोड़ी देर बाद अनिल उतर गया. कपड़े तो सूख गये पर दाग रह गया बाहर भी और अंदर भी. पूरा दिन बहुत बेचैनी मे बीता ऑफिस मे. जब भावनाओ का बोझ सहा नहीं गया तो मुकेश को फोन लगाया

“आज ऑफिस टाइम मे कैसे फोन किया?” मुकेश ने छेड़ते हुए कहा

“बस ऐसे ही यार बात करने की इच्छा हुई”. अनिल असली बात छुपा गया

“मैं समझ सकता हूँ अनिल. भाभी की याद….”

“वो बात नहीं है मुकेश. मेरे अंदर का इंसान कहीं खो गया सा लगता है. ऐसा लगता है अनिल इंसान नही है, अनिल राक्षस है.”

“क्या हुआ? क्या हो गया?”

“कुछ नहीं…” रुंधे गले से बोला..”बहुत अकेलापन लगता है यार. अब अकेलापन सहा ना जाता. तू भी घर पे आता नहीं है. कभी कभी तो अपने दोस्त का हाल आकर देख जा”

मुकेश को पता था अनिल की बात झूठ है. वो परसो ही उसके घर गया था. हाँ पर ऐसे वक़्त में इंसान को हर वक़्त साथ की ज़रूरत होती है

“ठीक है अनिल मैं आज आऊंगा घर”. मुकेश ने ये कहकर फ़ोन रखा. शाम को ऑफिस से अनिल जल्दी निकल गया. उसका मन आज काम मे नही लग रहा था. घर पहुंचकर गहरे सन्नाटे मे प्रवेश किया. ऐसा लगता था कमरे मे कोई नही है. उसे अपने होने का भी एहसास नही होता था. उसकी नज़र पड़ी खिड़कियो पर, जो बंद पड़ी थी. हवा की आशा से उसने खिड़कियों की कुण्डी खोलकर उन्हे बाहर की ओर खोल दिया. उसने सुबह खिड़कियों के पर्दे निकल दिए थे.

“तुम थी तो दुनिया मे रंग था. अब इन रंग बिरंगे पर्दो का क्या करना” ये कहा था अनिल ने सुबह.

वो खिड़कियों पर खड़ा हुआ पुरानी स्मृतियाँ याद कर मुस्कुराने का यत्न कर रहा था. अचानक से खिड़की से टकराती वस्तु सीधा उसको आकर लगी. पहले तो अनिल तिलमिलाया. उसका ध्यान भंग हो गया था. देखा तो वो बॉल थी. खिड़की के बाहर झाँका तो बच्चे टकटकी लगाए खिड़की की ओर देख रहे थे. क्रिकेट खेलते हुए बॉल अक्सर घरो मे चली जाया करती है पर आज अनिल को इसमे भी बच्चो की साज़िश नज़र आई

बच्चो ने उपर से आवाज़ लगाई- “अंकल बॉल”

अनिल सीढ़ियों से उतारकर नीचे आया. कडक कर पूछा- “क्या हुआ?”

एक लड़का सामने आया- “अंकल सॉरी. अगली बार नही आएगी. अभी दे दो.”

“सॉरी” शब्द सुनकर अनिल भड़क उठा. रह रह के बाते याद आने लगी

“सॉरी…सॉरी..” बॉल को उसके मुंह पर दे मारता है. “आई आम अल्सो सॉरी.”

टेनिस की बॉल थी. चोट तो क्या लगती पर दर्द के मारे चीख निकल पड़ी.रोने लगा. लेकिन अनिल को कोई फ़र्क नही पड़ा. तब एक दूसरा लड़का रोते हुए लड़के को उठाते हुए बोला- “अंकल आप इंसान हो या राक्षस”

“राक्षस…. हाँ मैं राक्षस हूँ. पर पता है क्यूँ. पर पता है क्यूँ.. क्योंकि साला इस दुनिया मे इंसानियत की कोई कीमत नही है.!!”

 

वो तो शुक्र हो मुकेश का जो उस समय अनिल से मिलने आ गया और अनिल उसके साथ अंदर चला गया. पर इस वाकये के बाद अनिल को नया नाम मिल गया… राक्षस. बच्चो ने उससे और उसने बच्चो से नफ़रत पाल ली.

रोज़ सुबह उसे अपने दरवाज़े पर पेन्सिल या स्केच पेन या चॉक से बनी  आकृति मिलती. एक सड़ी हुई शक्ल और उसके बीच मे लिखा- राक्षस. अनिल जब भी ये देखता तिलमिला जाता. और बच्चे हँस हँस के पागल होते रहते. यही चीज़ उसके ऑफिस से लौटने पर होती. वो रोज़ मिटाता और रोज़ नया पता

एक दिन अचानक उसने बच्चो की कारिस्तानी देख ही ली पर उसके कुछ करने से पहले ही वो भाग गये.

पर आख़िरकार एक दिन एक बच्चा दुर्भाग्यशाली रहा. भागता हुआ सीधा अनिल से जा टकराया. अनिल ने पहले उसे देखा फिर दरवाज़े पर बनी आकृति को. और फिर उसका सर दीवार पर पटक दिया. शायद यहीं उसकी इंसानियत का अंत हो गया.

लहूलुहान होकर बच्चा अस्पताल मे पड़ा था. लोग समझ नही पा रहे थे की पहले अनिल को घेरे या फिर बच्चे को देखे. फिर दोनो काम बाँट लिए गये. शायद अनिल को भी आभास हो गया था की उसने हद पार कर दी थी. वो कई बार अनिता की मौत को अपने किए के बचाव के रूप मे देखने का प्रयास कर रहा था पर हर बार अंतर्मन से यही जवाब मिल रहा था की- ‘आज तू सचमुच का राक्षस हो गया है’.

 

लोगो ने आकर उसे बहुत सुनाया. पुलिस की धमकी भी दी पर उसे वो दुख इन लोगो से नही पहुंचा. उसने लोगो से वास्ता रखना बहुत पहले ही छोड़ दिया था. पर सारी दुनिया का दर्द एक तरफ और मुकेश की वो बात एक तरफ.

ग्लानि के वातावरण से निकलने के लिए वो मुकेश के घर गया. जब मुकेश को पता चला तो उसे दुख हुआ.. बच्चे के लिए.

बोला-“ तू तो आतंकवादी के काम कर रहा है. ग़लती किसी और की, सज़ा किसी और को. और अनिता की मौत तो एक्सीडेंट थी…. इतनी नफ़रत कहाँ से लाया”

अनिल से कुछ बोलते ना बना. भले ही एक मन से वो इसे अनिता की मौत का बदला समाज रहा हो पर उसे ना सुकून मिला था ना खुशी. उसका मन तो और बैचैन हो गया.

मुकेश बोला- “मेरे दो बेटे है. चाहे तो उनका भी सर पटक दे दीवार पर. और अगर  तब भी खुशी ना मिले तो हमारा भी सर फोड़ देना क्यूंकि हम ने उनको पैदा किया है”

 

बच्चा तो बच गया पर अनिल नही. था तो वो इंसान ही. पर शायद इंसान और राक्षस की दीवार बहुत पतली होती है. पुलिस मे रिपोर्ट हुई,  पर जाँच मे उसे मेंटली अनस्टेबल पाया गया. और साल भर के लिए रिहॅबिलेशन सेंटर भेज दिया गया. वो लौटा तो नफ़रत भुलाकर,  पर शायद राक्षस  बन जाने की ग्लानि उससे बर्दाश्त नही हुई. लोगो ने उस बात को भुला दिया था, पर एक साल का ट्रीटमेंट अनिल की यादें नही मिटा पाया. उसे शर्म थी अपने किए की और उससे ज़्यादा इस बात की अब वो चाहे भी तो लोगो की नज़र मे फिर इंसान नही बन पायगा.

वो घर में आया और अंदर से दरवाज़ा बंद कर लिया. वो दरवाज़ा वापस खुला नही.

कई दिन बाद जब दरवाज़ा तोड़ा गया तो पूरे कमरे मे बदबू थी. कमरे के बीचो बीच उसकी लाश थी. ऐसा लगता था आवेश मे शरीर को चाकू से इतना घोंपा…. शायद  अंदर का दर्द मिटाने के लिए.

माँस की चिथड़ो से भरा शरीर किसी राक्षस का जान पड़ता था..

 

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