-कुमार प्रभात

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“प्रिय! खिचड़ी खाओगी ?” मेरी महिला मित्र इस प्रस्ताव पर अपनी ज़ुल्फ़ को सुलझाने लगी…ये मनोविज्ञान का एक जटिल विषय है कि महिलायें बातों को उलझाने के लिए ही अक्सर जुल्फ क्यों सुलझाती है…मगर उस वक़्त इतना तो साफ़ था, उसे खिचड़ी नहीं खानी थी ? गूगल को भी नही पता होगा कि शनिवार के दिन का खिचड़ी खाने से क्या सटीक सम्बन्ध है मगर फिर भी मैं बचपन से खाता आया हूँ…माँ-बाप और दादी ने मिलकर मेरे दिमाग में ऐसी धारणाएं कील की तरह ठोक दी है कि अगर रविवार को एक मच्छर ने भी मुझे काट लिया तो मुझे लगता है कि शनिवार के दिन खिचड़ी न खाने की सजा मुझे विधाता ने दी…यही सब सोच कर मैंने फिर से अपनी महिला मित्र से कहा- “baby. इस शेड की लिपस्टिक कहाँ से खरीदी हो…कमाल का है…” ये सुन कर वही हुआ, जिसकी उम्मीद आप पढने वालो को है…इस से पहले कि आप सोच की नैया से रोमांस की गहराई तक पहुँच जाएँ और खाली हाथ मैं लौटा दूं…मैं स्पष्ट कर ही देता हूँ…हुआ यूँ, कि मेरी उस बात को सुनते ही मेरी महबूबा खुश हो गई और कूदते हुए चिल्ला उठी- “सच…” मैंने मौके की नजाकत को समझा और फटाक से सवाल दाग दिया- “तो खिचड़ी बनाऊं…” अभी-अभी तो मैं उसका प्रशंसक बना था, वो ना कैसे कह देती…एक खिदमतगार कम कैसे होने लेती…इसलिए उसने कहा- “ठीक है बना लो, लेकिन ऐसी क्या बात है खिचड़ी में कि खाने के लिए मरे जा रहे हो?

सवाल सुनते ही मैंने जवाब देना शुरू किया…खिचड़ी! हर जगह तो खिचड़ी ही है…अब देखो तो सही, बिहार जीतने के लिए सुशासन बाबू और सड़क को अभिनेत्री के गाल की तरह बनाने का ख़्वाब देखने वाले ताऊ जी, मिल के पकाए न खिचड़ी…वो भी इतनी आंच पे पकी है कि बेचारे बिहारी एक निवाला भी टेस्ट नहीं कर पा रहे हैं…जीभिये जल जाएगा तो पांच साल के बाद न गरियाने लायक बचेंगें और न ही तारीफ़ करने लायक…बिहार से कोई ट्रेन पकड़ के यूपी आ जाईये…राम भगवान् फिर से जन्म ले लिए…वो तो बाद में तारीख देख कर लगा कि यू-पी चुनाव पास में है…हिन्दू संगठन वाले राम लल्ला का मंदिर बनवा ही डालेंगें और अगर मंदिर बन गया तो खान चाचा से ज्यादा नेता जी को टेंशन होने लगेगा…अच्छा राम लल्ला के मंदिर बनने से राम भगवान् कितने खुश होंगें और उनके भक्त को क्या मिलेगा ये तो कपिल शर्मा ही बता पायेंगें- बाबा जी का ठुल्लू…अभी तो शुरुआत है यू-पी में चुनाव् आने दो, हाथी और सायकिल साथ दौड़ेगें…कमल और हाथ पीछे-पीछे और सबसे पीछे खिचड़ी बनाने वाले हलवाई…सब पार्टी में एक-दो एक्सपर्ट हलवाई होते हैं, जिसका काम बस खिचड़ी बनाने या करने का होता है…मेरी एक दादी बहुत बढ़िया खिचड़ी बनाती थी और रोज़ कहती थी- “बाहर किसी को खिचड़ी बना के देती, तो दू गो पैसो देगा…” पहले पता होता तो अपनी दादी को किसी न किसी पार्टी में सेट कर देते…दू की जगह चार गो पैसा कमा लेती…कम से कम मेरी बहन की शादी में सेकंड हैण्ड साड़ी तो गोर-लगाईं में नहीं देती…

अरे हाँ, याद आया…फ़्रांस ने मांस नहीं परोसा तो सऊदी अरब के नेता खाना नहीं खाए और उसकी जगह दारु दी गई तो चाचा ने कहा- “धर्म के खिलाफ है…” तभी तो कहते हैं कि खिचड़ी बना दिए होते तो काहे का धर्म और काहे भोज कैंसिल होता…ऐसे वहां तो एक दिन कैंसिल हुआ, एक हमारा संसद है, मानो लोकतंत्र का मंदिर न हुआ, फ़कीर पति का पत्नी को फिल्म दिखाने का वादा हो गया, बैक तो बैक कैंसिल होता है…सरकार चाहे भगवान् ले आयें विपक्ष वाले उसे नहीं मानेंगें, ये बात अलग है कि जब सत्ता मिलेगी तो उसी भगवान् का सबसे पहले मंदिर बनवायेंगे…और अगर विपक्ष कुछ अच्छे सुझाव दे तो सत्ता धारी उसे जैविक हथियार समझ कर हाय-तौबा मचा देंगें…कुल मिलाकर सरकार का न चावल रहता है और न विपक्ष की दालल, मिलके बन जाती है खिचड़ी…

भला हो फेसबुक और ट्वीटर का…यहाँ राजनीतिक मोर्चे पर दो गुट हैं…एक चाय बेचने वाले के पक्ष में और दूसरा चाय बेचने वाले के विपक्ष में…विपक्ष को चाय की दुकान और चाय बेचने वाले में कोई अच्छाई नहीं दिखती है…और समर्थन वाले को चाय में गिरी मक्खी से लेकर बिना धुले कप तक साफ़-साफ़ दिखता है…अच्छा हंसी तो तब आती है जब लोग चाय वाले को गरिआते भी हैं और आपस में बात भी करते हैं- “जानते हो, चाय वाला तानाशाह है, खिलाफ में बोलोगे तो कुछ न कुछ उल्टा सीधा कर देगा…कुछ न सही तो गरम चाय ही देह पर फेंक देगा….” भैया हम तो कह-कह के थक गए, चाय की दुकान लग ही गई है और जब पता है कि कुछ सालों तक चलेगी ही तो कम से कम इमानदारी से चीनी वाली चाय का मज़ा लीजिये और फीकी चाय पर सुनाते रहिए..लेकिन नहीं, उम्मीद और धारणाओं को मिला कर बनाने में तत्पर रहते हैं- खिचड़ी…इसी बात पर एक घटना याद आ गई…देश के पूर्वी भाग के एक सुदूर गाँव में एक आदमी का दूध फट गया और बेचारा सुबह की चाय नहीं पी पाया…तो का हुआ जानते हैं…उस आदमी के घर कुछ आदमी पहुँच गए और चिल्लाने लगे- “उसी चाय वाले ने कुछ ऐसा किया होगा कि दूध फट गया ताकि वो चाय पीने उसकी दुकान तक आये…” मैं तो यही कहना चाहूँगा कि कि भैया काहे चाय पीते हो, डायबीटीज़ हो जायेगी तो पांच रुपए वाली गोली भी नहीं मिलेगी टाईम पर…इसलिए सुबह चाय की जगह खिचड़ी बनाओ, थोड़ी पतली बनाना और सूप समझ कर पी जाना….ऐसे सूप तो सबसे बढ़िया चैनल के एंकर बनाते हैं…सच छोड़ कर सब दिखा डालते हैं,…मिर्च मसाला बराबर डालते हैं और जब दर्शकों को तीखी लगने वाली होती है तो हिमालय वाले ठंढा पानी का ऐड चलवा देते हैं…पीओ और शांत रहो…डेढ़-डेढ़ घंटे बहस होती है और नतीजा ये मिलता है कि एंकर साहब सर को थोडा झुका कर…और महिला हुई तो आँखें चढ़ा कर कहती हैं- “फैसला आपको करना है…कौन सही, कौन गलत…” इस ब्रह्म वाक्य के साथ एंकर ऐसे-ऐसे वाक्यों का फ़ौरन श्रृंखलाबद्ध सृजन कर देते हैं कि प्रेमचंद्र होते तब भी सही मतलब समझाने में दो-चार साल खपा देते…उसके बाद एंकर साहब या एंकर साहिबा सीधे कैंटीन में प्रकट होते हैं…दाल-खिचड़ी का आर्डर देते हैं और जब पैसे भरने की बात आती है तो मोबाइल निकाल कर नेता-अभिनेता को फोन करके कह देते हैं- “साहेब…आपकी बात लोगों को उतना ही बताया जितना छुपाना नहीं था…अब खिचड़ी से पेट भर गया है..आज तो कम ही खाए हैं, तीन थरिया ही हुआ है, बिल पे कर दीजियेगा…” ऐसे एक बात और है ऐसी खिचड़ी नहीं खाने वाले लोग भी मौजूद हैं…

ऐसे सच बात है ये खिचड़ी में दाल कम हो गई है…कहाँ से दाल आएगी, बहुत महंगी हो गई है…मेक इन इंडिया और स्टार्ट अप ठीक है, मगर दाल का कुछ कीजिये नहीं तो जनता अगर भूखी रही तो आप भी अगले चुनाव के प्रसाद में खिचड़ी ही पायेंगें…हर दल की दाल मिलके गलेगी, फिर तय करने में साल गुजरते रहेंगें कि कौन सा स्वाद सही है और कौन सा नहीं…”

इतना कहने के बाद मैंने अपनी प्रेमिका को देख कर मुस्कुराया और पूछा- “बेबी…अब तो खिचड़ी खा सकती हो न…” मेरी प्रेमिका मेरे पास आई और बड़े प्यार से मेरे कंधे पर हाथ रखते हुए उसने कहा- “तुम थक गए होगे…तुम आराम करो…मैं खिचड़ी बनाती हूँ…” तब से हर शनिवार को ये कार्यक्रम चलता है…कभी वो बनाती है, कभी मैं बनाता हूँ तो कभी हम दोनों एक-दूसरे को बनाते हैं- खिचड़ी…”

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