-संतोष कुमार

 

मेरे पापा एक दिन एक पौधा लेकर  आये, कहा ये सुख शांति का पौधा है. जैसे जैसे ये बढेगा, घर में सुख शांति आएगी. कुछ कुछ मनी प्लांट जैसा जिसे लोग आर्थिक लाभ की आशा में अपने घर पर लगाते है. ये चीज़े कितनी कारगर है इसपर विवाद हो सकता है परन्तु सुख शांति के पौधे की परिकल्पना ही अपने आप में  बहुत नेक सोच है. क्या हो अगर ये पौधा सच में कारगर हो, क्या हो अगर इससे सच में घरो में, ऑफिस में, दुनिया में, सुख शांति आ जाये. हमारी दुनिया में सुख शांति की ज़रुरत बहुत ज्यादा है, आदमी सुख शांति से दो रोटी और एक जोड़ी कपडे में निर्वाह कर सकता है पर सुख शांति के आभाव में सारा वैभव, सब विलास, मिथ्या हो जाते है. सिर्फ यही नहीं, सुख शांति चाहिए, न सिर्फ हमारे लिए, हमारे पड़ोसियों रिश्तेदारों के लिए, अपने समाज के लिए, सभी देशो के लिए, सब इंसानों के लिए,  और इन सबके लिए …..एक पौधा तो चाहिए ही.

 

कई जगह अमन की निशानी के तौर पर सफ़ेद कबूतर का प्रयोग होता है. वो पंछी जो सरहद भुलाकर उन्मुक्त गगन की सैर करते रहते है. वो जो जहाँ जाते है, अमन का पैगाम फैलाते है. जिनकी उड़ान सरहद की मोहताज नहीं. एक गाना बड़ी ख़ूबसूरती से इस भाव को अभिव्यक्त करता है-

“पंछी नदिया पवन के झोंके;

कोई सरहद न इन्हें रोके,

सरहदे इंसानों के लिए है

सोचो तुमने और मैंने

क्या पाया….इन्सान होकें”

ये गीत २००० का है. उस समय गीतकार को शायद पता नहीं था की एक दशक बाद ऐसा भी समय आएगा जब एक कबूतर को सीमा पार से आये जासूस के रूप में देखा जायगा और सीमा पर पकड़ लिया जायगा. अब पंछी क्या जाने कब वो इंडिया पाकिस्तान, हिन्दू मुस्लमान हो गए. जैसे गाय क्या जाने और सूअर क्या जाने कब वो किसी धर्म के जुड़ गए न तो किसी ने उनसे परमिशन ली, उनसे किसी ने पूछा तक नहीं बस बाँट दिया. वैसे हमें बाटने से पहले भी हमसे किसने पूछा….बस पैदा हुए तो पहचान बता दी .

 

“परिंदो को पैगाम है की

अपना कोई मज़हब चुन ले

ये लोग हर कतरे को

अपना बनाने पे तुले है

कल को कहीं ऐसा ना हो

कि जिस पेड़ पे बैठी हो तुम

वो पेड़ भी बँट जाए

घोंसला तेरा, अंडे तेरे

सब कहीं बिखर जाए

इसलिए कहता हूँ

धर्म रख ले कोई

वरना मारी जयगी

दोनो तरफ से

और तेरी लाश पे झगड़ा होगा

की तू हिंदू थी या मुस्लिम

आपस मे भिड़ जाएँगे

सब तेरे नाम पे

और तब तू जवाब मे

एक लफ्ज़ ना कह पयगी

तेरी लाश हिंदू हो जयगी

और तेरे अंडे मुस्लिम

तेरी मौत के साथ

इंसानियत भी मर जयगी”

 

तो सुख शांति का पौधा बहुत काम आएगा यहाँ पर. एक पौधा देश की सरहद पर लगा दो. एक दिन उसे हम पानी दे दे दुसरे दिन पडोसी देश. आधी बेल हमारी तरफ उगेगी तो आधी बेल उनकी तरफ. जितने देशो में शांति वार्ताए करते फिरते रहते है, बस एक पौधा लागा लो सुख शांति का, निशानी के तौर पर. और कुछ नहीं तो खिलता हुआ पौधा दिल को तसल्ली तो देगा. कश्मीर से लेकर इजराइल, सीरिया तक हर जगह ये पौधा लगा दो. और एक पौधा लगा दो उन दफ्तरों में जहाँ से नफरत का सामान सप्लाई होता है, उन संगठनो में भी जो सिर्फ आग उगलना जानते है. “सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामय:…….” यही शब्द अंकुरित हो अब नफरतो की फैक्ट्री से. लगा दो एक पौधा उन घरो में जो कहने को तो परिवार पर हर कोई गैरो से भी गैर है. चाहे साथ में न आये, कम से कम एक दूसरे को झेलना सीख जाये.

और अगर कोई जगह बचे तो एक पौधा अपने दिलो में भी लगा लेना. दिल के खून से सींचा हुआ वो पौधा जब दिलो में जड़े फैलायगा, दिल की गंदगी को सोख लेगा, दिल में खुशबू लायगा. फिर न अमन के पंछी की  ज़रुरत रहेगी न घर पर पौधा रखने की, दिल ही पंछी बन जायगा. सरहदे चाहे न मिटे दिल की सरहद मिट जायगी. नयी सोच की नयी रौशनी, छनकर दिल तक आएगी. हर फासला ओझल हो जायगा, सब कुछ चला जायगा……बस एक इन्सान रह जायगा.

 

 

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