-संतोष कुमार

 

वो भूला हुआ अध्याय

जो कहीं सिमटा पड़ा है

वक़्त के गलियारों में,

 

जिसको न छुआ कागज़ कलम ने

न किसी ने उसे आवाज़ दी

जो किसी की याद नहीं

जिसकी किसी को फरियाद नहीं

वो भूला हुआ अध्याय

 

जिससे कोई जुड़ना नहीं चाहता

गुमनामी के जंगल से जिसे

कोई चुनना नहीं चाहता

उस भूले हुए अध्याय में

बसते है वो लोग कहीं

जो कभी न दर्ज हुए

युद्ध के व्याख्यानों में

न कवि की कल्पना मे

न गायक के तरानों में

 

वो भूला हुआ अध्याय

पुकारता है आज

भीड़ में छितरा हुआ सा

एक तिनका मैं भी हूँ

खून के इन आंसुओं का

एक कतरा मैं भी हूँ

भीड़ आती है

कुचलती है मसलती है

किस कदर ये जान मेरी

उफ़ मचलती है

जुल्मियों के इस जहाँ में

किसकी चलती है

इज्ज़तो के रास्तो पर

रूहे जलती है

 

हाँ मैं एक छोटा सा तिनका

घुटती जिसकी सांस है

कितने जन्म बीते यहाँ

मुक्ति की फिर भी आस है

जानता हूँ इस जगत का

मैं एक हिस्सा मात्र हूँ

आज भी इंसानियत के

तलवों में मेरा वास है

 

महानता ही बन चुकी है

इतिहास का जहाँ पर्याय

वक़्त के आँचल में सिमटा बैठा हूँ

मैं एक भूला हुआ अध्याय

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