माँ
तुम्हारे किचन में
हींग की डिबिया  वैसी ही महकती होगी न
जैसे मेरे बचपन में महकती थी
कढ़ी बनाते -बनाते
बेसन की पीली  बिंदिया
माथे पर लग ही जाती होगी

सब्जी काटते वक़्त
तुम्हारे अँगूठे पर लगे
चाकू के सैकड़ो  निशान
तुम्हारे दर्द की कथा कहते  तो होंगे

सिलबट्टे पर पीसती हुई
पुदीने और अमिया की चटनी
चटकारे भरती  तो होगी
जुबान के किसी कोने में

आटा  गूँथते -गूँथते
तुम्हारी कमर पिराती तो होगी
और ममता की लोई
गोल रोटी के आकर में ढल जाती होगी
और तुम्हारे  स्वाभिमान की भाप से
फूलती भी होगी

अच्छा एक बात बताओ
अरहर की दाल में लगाये हुए
छौंके की लहर
आँगन में बैठी गौरैया की साँसों में
चुपचाप घुलती तो होगी
और तुम  आज भी कभी – कभी
दाल में नमक डालना
भूलती तो होगी

और वो बासमती चावल
भगोने में बुदबुदाते तो होंगे
और उनके पकने का किस्सा
खुशबु की शक्ल लेकर
पड़ोस वाली आंटी का दरवाजा
खटखटाता तो होगा

तुम्हारी डलिया में
गोभी ,गाजर , मूली, मैथी
लौकी , बैगन ,पालक
अपने -अपने खेतों से
बिछड़ने का दुःख
दिहाती  बोली में
गाते तो होंगे
बार -बार दोहराते तो होंगे

माँ ,तुम्हे पता है
वो कोने में रखा हुआ
धनिये का खिलखिलाता हुआ  गठ्ठर
आज भी तुमसे बहुत डरता होगा
कहीं तुम उसकी पत्ती -पत्ती
तोड़कर अलग न कर दो
यार ! परिवार से बिछड़ने का दुःख  तो
सबको होता है
वो फूल – पत्ती हो या फिर कोई इंसान

माँ ये मेरे और तुम्हारे बीच का
वो अतीत में डूबा हुआ संवाद है
जिसे दुनिया का कोई भी
इतिहासकार  शब्द नहीं दे सकता

इस अहसास को
तीन ही लोग बुन  सकते है
माँ
संतान
या फिर इन दोनों को
मिलाने वाला एक पुल
जिसे दुनिया
कवि कहती है

मुंबई में ये सब
याद आता है
फोन करना चाहता हूँ
पर कर नहीं पाता
कहता था न
निकल गया तो हाथ
नहीं आऊंगा
मैं परिंदा हूँ  परिंदा
आज डरता हूँ
अपने आँसुओ से
या शायद निर्मोही हूँ

देवेश तनय

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