-संतोष कुमार

जब कुछ नहीं था तो क्या था

आँखें बंद कर सोचता हूँ जब

दिखाई पड़ता है घोर अँधेरा

या श्वेत आवरण में लिपटा खालीपन

या अथाह वीरानेपन से भरी ये दुनिया

पर कुछ नहीं की कल्पना में

कुछ न कुछ दिखता है ज़रूर

 

जब कुछ नहीं था तो खुदा था

कहते है लोग

वो हमेशा था हमेशा रहेगा

पर खुदा क्या था

वो श्वेत आवरण वो खालीपन?

वो अथाह सागर वो वीरानापन?

जो कुछ नहीं की कल्पना में

कुछ न कुछ दिखलाता है

कुछ न होकर भी जो हमको

कुछ होने का एहसास कराता है

 

जब कुछ नहीं था तो

कुछ तो था जिसने

कुछ नहीं से कुछ बनाया होगा

ये दुनिया खुदा से आई जाने

कुछ नहीं कहाँ से आया होगा !!

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