मेहता साहब चाय की चुस्कियां लेते हुए अख़बार पढ़ रहे थे. “क्या समय आ गया है….” अख़बार रखते हुए वो बोले. पत्नी ने किचन से ही पूछा- “अरे क्या हुआ?” मेहता साहब थोड़े गुस्से में थे, बोले- “अरे और क्या….एक और खून, बीच सड़क पर… हज़ारो की भीड़ थी पर किसी एक की भी हिम्मत नहीं हुई की उसे अस्पताल पहुंचाए और उन मारने वालो को पकडे. रोड रेज तो रोज़ की बात हो गयी है. मैं होता तो दो थप्पड़ तो उन मारने वालो को लगाता और चार थप्पड़ उन लोगो को जो भीड़ लगाकर वहां तमाशा देख रहे थे”

“हाँ हाँ मार लेना, सबको मार लेना” पत्नी किचन से बाहर निकलते हुए बोली- “पर पहले नाशता कर लो वरना ऑफिस जाने को देर हो जायगी”. मेहता साहब अभी भी तिलमिला रहा था- “नहीं, मैं सच बोल रहा हूँ. ये हमारी सरकार और हमारी जनता तो सब आँख कान बंद कर बैठे है, पर मुझे ऐसी बातो पर बहुत गुस्सा आता है”. पत्नी शांत करते हुए कहती है- “हाँ, ठीक है, पर पहले नाशता कर लो”. पति टेबल पर मुक्का मारता है, एक गहरी सांस लेता है और फिर शांत हो जाता है.

 

शाम हो चुकी थी. मेहता साहब कंधे पर बैग लटकाए घर को वापस जा रहे थे. रास्ते में कुछ भीड़ दिखाई पड़ती है. कौतुहलवश वो भी भीड़ का हिस्सा बन गए. एक स्कूटर वाले ने हलके से एक कार को टक्कर मार दी थी. बात मामूली कहासुनी से गाली गलौच और फिर हाथापाई तक पहुँच चुकी थी. अब इस लड़ाई ने वीभत्स रूप ले लिया था. दोनों पक्षों ने अपने साथियो को बुला लिया. कार वाले के साथी लड़ने की पूरी तयारी करके आये थे, तो तीन बहुत तगड़े लोग. एक ने कार की डिक्की में से हॉकी स्टिक निकाल ली. वही स्कूटर वाले का साथी उसकी चिंता करते हुए वहां पहुँच गया था और उसके ही जितना डरा हुआ था.

अब भला हथियारबंद और निहत्थो के बीच क्या मुकाबला! दो चार बाते सुनाने के बाद दोनों गुट आपस में भिड गए. स्कूटर वाले का साथी दो चार खाने के बाद सड़क के एक कोने में पड़ा रहा, पर स्कूटर वाले को घेरकर उसे बेरहमी से पीटा गया. मेहता साहब कुछ समझ नहीं पा रहे थे की वो क्या करे. “मुंह से महाभारत” लड़ने वाले मेहता साहब किसी बर्फ के टुकड़े की तरह जमे हुए थे. काफी सोचने के बाद उन्होंने फ़ोन किया- पुलिस को नहीं, न ही हॉस्पिटल बल्कि अपनी पत्नी को-

“सुनो, मुझे देर हो जायगी, यहाँ…………..यहाँ एक्सीडेंट हो गया है!”

यहाँ पर फ़ोन पे बात खत्म हुई और उधर लड़ाई भी. स्कूटर वाला लहूलुहान पड़ा था, अपने स्कूटर के बगल में. उसका साथी चोट से कम और सदमे से ज्यादा, चित्त पड़ा था. भीड़ तितर बितर होने लगी. पीछे बड़ा ट्रैफिक जाम हो गया था. लोग हॉर्न बजाकर सबको हटने को कह रहे थे. झुंझलाहट साफ़ दिख रही थी- “एक तो वैसे ही देर हो रही है और ऊपर से ये……”

मेहता साहब भी जाने लगे. उन्होंने दूर से ही बेसुध पड़े व्यक्ति को देखा. दबे पाँव आगे भी बढे. लेकिन फिर कुछ सोच विचारकर पाँव वापस खींच लिए. इसके बाद मेहता जी चलते चलते भीड़ में गम हो गए.

सुबह का अख़बार पढ़ते पढ़ते चाय की चुस्कियां लेते हुए मेहता जी उठ खड़े होते है. खबर थी- “कल शाम रोड रेज में एक व्यक्ति की निर्मम हत्या”. आगे विवरण में लिखा था- “भीड़ तमाशा देखती रही, कोई मदद के लिये नहीं”.

मेहता जी गुस्से से बोले- “ये कैसा ज़माना आ गया है, अगर मैं होता तो……………..!!!.”

 

 

 

 

 

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