-संतोष कुमार

 

वो 22-23 साल का युवक था,ज़्यादा नही बोलता था. अपना काम करता और आइस्क्रीम वैगन पर ताला जड़ कर कहीं  निकल जाता. उसके आसपास के दुकानदार भी नही जानते थे उसका नाम पता कुछ, ना उसने कभी कुछ बताया. शायद बताने को कुछ नही था… या शायद बहुत कुछ.

टेंट की चिथड़ो मे अपना बसेरा बनाए हुए वो युवक खा पी के बैठ जाता था रोज़ और अपनी ज़िन्दगी के बारे में सोचा करता था या रात के आसमान में मानो अपने किस्मत के सितारे खोजता था. पर आज उसे कुछ याद आ रहा है. कई साल हो गये आइस्क्रीम बेचते हुए, पर आज तक खुद आइस्क्रीम चख के नही देखी. जाने ऐसा क्या स्वाद है इसका, दिन ख़त्म होने से पहले ही सारी आइस्क्रीम बिक जाती है. ऐसा क्या है इस आइस्क्रीम मे. बर्फ मे रंगीन पानी या दूध और चीनी. ऐसा क्या है इसमे कि उसने अपनी आख़िरी इच्छा मे आइस्क्रीम माँगी!!

और एकाएक उसे अपनी बहन याद आ गयी.

दस साल पहले टेंट भी वैसा ही था ग़रीबी भी कुछ वैसी ही थी, हाँ पहले हालत ज़रा और बदतर थी. माँ बाप नहीं थे  पर हां बहन थी और उसके लिए जीना जीने का मक़सद था. हर तरह के काम किए- सड़क पर भीख माँगी, फूल, कॉपी, किताब बेचीं. उन्ही दिन बहन ने पहली बार आइस्क्रीम देखी और बाकियों को खाते देख के दिल ललचा गया उसका. पर पैसे नही थे. जहाँ खाने को रोटी नसीब ना हो वहाँ आइस्क्रीम किसी लक्ज़री से कम तो नही. ऐसा नहीं था कि  वो आइसक्रीम खिला नहीं सकता था. पर पैसा ऐसी चीज़ पर खर्च करना कहाँ की होशियारी है जिससे पेट ही नहीं भरता, वो भी तब जब कई कई दिन भूखे सोना पड़ता हो. दिल के एक कोने में शायद अभी भी ये विश्वास जिंदा था कि पैसे बचाकर ज़िन्दगी संवारी जा सकती है. आइसक्रीम खाकर एक पल की ख़ुशी तो मिलेगी पर पाई पाई जोड़ जोड़ के जो गुजर बसर हो रहा है उस पर आंच नहीं आनी  चाहिए.

बहन ने बहुत ज़िद की कि भैया ये खिलाओ ना. एक दो बार दुकानदार से पूछा भी, पर उनकी सूरत देखकर कुछ तो  दुकानदारो ने भाव नही दिया और कभी- कभी तो हाथ जेब मे जाते जाते रुक गये. अगर ये पैसे भी दे दिए तो रात को खाएँगे क्या. बोला करता था- “एक दिन आइसक्रीम की दुकान खोलूँगा, फिर पूरे दिन आइसक्रीम खाना”. आज आइसक्रीम तो है, पर बहन नहीं है.

उसे याद आता है वो दिन जब उसे  रास्ते मे पर्स गिरा हुआ मिला. देखा पैसो से भरा पड़ा है. एक पल को लगा- अब तो जीवन भर खुशी से काट सकते है, अब भूखे नही सोना पड़ेगा और हां- “बहन को आइस्क्रीम खिलाऊंगा”

तभी एक शोर से उसका ध्यान भंग हुआ. जिसका पर्स खोया था शायद उसे देर से एहसास हुआ था की उसकी जेब में उसका पर्स नहीं  है. फैमिली के साथ आइस्क्रीम खा रहे थे शायद, पर जब एहसास हुआ कि जेब में पर्स नहीं है तो आइसक्रीम का सारा मज़ा किरकिरा हो गया.

एक अजीब सी स्थिति थी- पर्स दे या नही. पर इतने उदास चेहरे उससे देखे नही गये. जाकर बोला- “आपका पर्स”. पहले तो उन्हे लगा कि  चोर है, कुछ देर शक भरी निगाहों से उसे घूरते रहे. फिर सोचा कि अगर चोर होता तो इतनी विनम्रता से पर्स वापस क्यूँ करता और वो भी पूरे पैसो के साथ!!  उन्होने पूछा- “कहाँ मिला?”

“यहाँ सड़क के किनारे गिरा पड़ा था”.

पर्स के मालिक ने कुछ पैसे लड़के को देने चाहे पर लड़के ने विनम्रता से मना कर दिया. परिवार वाले तो चले गए. हाँ पर्स का मालिक जाते जाते आइस्क्रीम वाले  को एक्सट्रा पैसे देते हुए बोला- “इस लड़के को भी एक आइस्क्रीम दे देना”.

लड़के के चेहरे मे चमक आ गयी. उसकी बहन का सपना पूरा हो जायगा आज! आज वो आइस्क्रीम खाएगी!

दुकानदार ने नारंगी पानी चढ़ी हुई बर्फ की डंडी दी. आज उसने पहली बार आइस्क्रीम हाथ में पकड़कर देखी थी. और उसका दुर्भाग्य तो देखो, बहन की तबीयत कई दिन से नासाज़ थी. वो घर पर ही थी. लड़के ने मन ही मन सोचा- “तो क्या हुआ  आइस्क्रीम घर लेकर जाऊंगा अपनी बहन के पास”.

कड़ी धूप थी पर वो दौड़ता हुआ गया. गर्मी थी, थकान थी, ट्रैफिक ने भी रास्ता रोका पर वो रुका नही. पर आइस्क्रीम के बारे मे शायद एक बात उसे पता नही थी- ‘ये पिघल जाती है’. वो घर पहुँचा पर तब तक हाथ मे सिर्फ़ डंडी थी और पूरे हाथ मे टपकता चिपचिपा रस. उसे आज भी याद है उसकी बहन कितना रोई थी. उस दिन उसने ज़िंदगी की नयी बात सीखी थी जो उसकी आइस्क्रीम के डब्बे मे रंगीन अक्षरो मे आज भी लिखी हुई थी.

“ज़िंदगी आइस्क्रीम की तरह है, जल्दी से खा लो वरना पिघल जायेगी !!”

बहन का बुखार जाने क्यूँ उतार नही रहा था. जाने क्या रोग था जो ठीक ही नही होता था. शरीर कमजोर होता जा रहा था. पहले  भूख से बिलबिलाया करती थी, पर  अब भूख  मर सी गयी थी उसकी. पर वो क्या कर सकता था. डॉक्टर छोड़ो हकीम को देने के भी पैसे नही थे. सरकारी अस्पताल में जाते, पर भिखारी समझ के चौकीदार गेट से खदेड़ देता. अब हाल कुछ ऐसा था कि बोलने चलने में भी असहाय हो गयी थी उसकी बहन. पहली उसकी आवाज़ गूंजा करती थी, अब तो रोने कराहने की भी आवाज़ नहीं आती. शायद वो भी अपनी ज़िन्दगी से हार मान चुकी थी.

 

पर आख़िर उसके शहद से लगते शब्द सुनाई दिए. इतने दिनों का सन्नाटा टूटा था. बहन ने हां हूँ के अलावा कुछ और बोला था. धीमे से कहा- “भैया आइस्क्रीम खानी है”

और किसी दिन वो उसकी फरमाइश को हँसी में टाल देता, पर आज नही. “मैं ज़रूर लाऊंगा”- इतना कहा अपनी बहन से. और मन ही मन बोला- “चाहे अब कुछ दिन भूखा क्यूँ ना रहना पड़े”

बहन फिर थोड़ा बोली-  “पर अगर वो फिर से पिघल गयी तो?”

ये तो उसने सोचा ही नही. पर बहन को हौसला देते हुए कहा- “नही पिघलेगी, देखना तू”

उसके पास जितने बचे कुचे पैसे थे सब लेकर चला. दुकानदार से आइस्क्रीम ली, पैसे दिए और फिर सवाल पूछा- “पिघलेगी तो नही न. दूर ले जानी है”

“दूर ले जानी है तो ये नही चलेगी. ये तो पिघल जाएगी.देख धूप कितनी कड़ी है”

लड़का मायूस हो गया. आइस्क्रीम लौटते हुए कहता है- “तो रहने दो फिर”

दुकानदार को दया आई. “दुखी होने की ज़रूरत नही. मैं तुझे दूसरी आइस्क्रीम देता हूँ. ये नही पिघलेगी”.

ये कहकर उसने अंदर से कप आइस्क्रीम निकली

“ये ले, ये नही पिघलेगी. पैसे उतने ही है”.

लड़के का दिल बाग बाग हो गया- “आज मेरी बहन को आइस्क्रीम मिलेगी”. दौड़ा दौड़ा वापस घर आया.

लेकिन अब उसकी बहन को आइस्क्रीम की कोई ज़रूरत नही रही.

आइस्क्रीम तो नही पिघली पर ज़िंदगी की आइस्क्रीम पिघल गयी.

निष्प्राण शरीर के सामने लड़का धप से बैठ गया. आइस्क्रीम को हाथ भी नही लगाया. बाद में  आइस्क्रीम को भी बहन के साथ गाड़ आया.

****

युवक स्कूल के बाहर आइस्क्रीम बेच रहा था और आते जाते बच्चो को गौर से देख रहा था. फिर उसे याद आया, बहन को गये तो 10-11 साल हो गये. अगर पुनर्जनम की बातों  में ज़रा सी भी सच्चाई होती है तो अब तक तो उसका दूसरा जन्म भी हो गया होगा ना. और शायद अब तक वो स्कूल भी जाने लगी होगी. पर पता नही, लड़का होगी या लड़की

“बस भगवान इतना करना कि इस जन्म मे उसके पास आइस्क्रीम खाने के पैसे हो…..”

 

मन ही मन ये अरदास करके वो फिर से काम मे जुट गया. एक छोटी सी लड़की अपने भाई से कहती है “भैया आइस्क्रीम खिलाओ ना….”

ये सुनते ही आइस्क्रीम वाले को फिर से अपनी बहन याद आ गयी

 

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