-संतोष कुमार

 

कुत्ते बड़े विलक्षण जीव होते  है, और मनुष्य के साथ उनके सम्बन्ध भी उतने ही विलक्षण है. देखिये न, हम ही वो जीव है जो कुत्तो को अपना सबसे अच्छा दोस्त, सबसे वफादार सेवक मानते है और हम ही वो जीव भी है जो कुत्ता शब्द अपशब्द या गाली के रूप में भी प्रयोग करते है. हमारे धर्मग्रंथो में कुत्ते को शमशान व यमराज व भैरव से जोड़ कर देखा गया है.  पर इन कुत्तो को देखो तो कई बार जीवन के ऐसे कटु सत्य की अनुभूति हो जाती है जो बड़े बड़े दार्शनिको को पढने के बाद भी विरले ही होती है. जीवन के पग पग पर इस जीव ने मुझे ऐसे अनुभव कराये है जो जीवन भर एक खट्टी मीठी याद की तरह जेहन में दर्ज है. यद्यपि अधिकतर मामलो में मैं महज एक मूकदर्शक था और यही कारण है कि वो यादें मेरा निजी अनुभव न होकर एक जीवन दर्शन की तरह प्रतीत होती है. ये एक सवाल छोड़ जाते है मेरे लिए और मैं अपने अन्तः कारण में उन प्रश्नों को दोहराता रहता हूँ.

5-6 साल पहले की बात है जब मैं ग्यारहवी कक्षा में पढता था. एक दिन दुकान से लौटते हुए अचानक एक मनोरम दृश्य देखने को मिला. एक मिठाई की दुकान के सामने एक कुत्ता बैठा था. दुकान के मालिक ने एक समोसा उठाकर कुत्ते के सामने फ़ेंक दिया. कुत्ता समोसा मुंह में दबाये सीढियों में जाकर बैठ गया और समोसा खाने लगा. आज सुनने पढने में शायद ये बेहद साधारण बात लगे पर मुझे ये दृश्य देखकर कुछ हैरानी भी हुई और मज़ा भी आया. घर जाकर इस पूरे  प्रकरण पर खूब सोचा और इस चिंतन के फलस्वरूप उसी शाम मैंने एक कविता लिखी- “कुत्ते का समोसा”. इसके इतने अजीबोगरीब शीर्षक के कारण और कुछ मुझे ये कविता शिल्प हीन और कुछ अपरिपक्व प्रतीत होती है इसलिए मैंने कभी ये कविता किसी को पूरी न सुनाई न पढाई है. पर वास्तव में इस कविता के ज़रिये मैंने एक सवाल उठाया था जिसका दूसरा पहलू मुझे कुछ साल बाद जानने को मिला.

“राह चलते देखा मैंने

दृश्य अद्वितीय अनोखा

अपने मुंह में पकड़ा हुआ था

एक कुत्ते ने समोसा

 

चकित हुआ कुछ व्यथित हुआ

एक पल को हुआ मौन

अगर खाने लगे पशु भी पकवान

तो रोटी दाल खायेगा कौन!!

 

एक पल को सोचा वाह क्या किस्मत

इन कुत्तो ने पायी है

इधर स्वान का स्वर्णिम काल

उधर मानव की शामत आई है

 

पर फिर सोचा कैसा वैभव

ये तो महज़ छलावा है

बेड़ियों में जकड़ा सुख

सुख नहीं महज़ दिखावा है

 

गले में बाँध के बेड़ियाँ

बनकर स्वामी दास बनाकर

तूने पाला है इनको

जीवन दिया जीवन चुराकर

 

तेरा वैभव तेरा शौक

तेरी निज संपत्ति बने

खुद पे न इनका हक़ रहा

पराधीन हुए बंदी बने

 

पराधीन होकर भोग करना

क्या गौरव का प्रमाण है

भूल गए शायद हम ये

इस काया में भी बसते प्राण है

 

और ये सब सोचते ही

वो दृश्य सजीव हो जाता है

जहाँ बैठा सीढ़ियों में

एक कुत्ता समोसा खाता है”

 

ये कविता मुझे बहुत बढ़िया रचना नहीं लगती परन्तु इसका प्रश्न बहुत जायज़ है. हम ये तो देखते है कि कुत्तो की सेवा हो रही है, उन्हें अच्छा अच्छा खाना मिलता है आदि आदि, पर उनके गले में लगा पट्टा पूरी कहानी बदल देता है. क्या दुनिया के किसी भी सुख की कीमत आपकी आज़ादी हो सकती है? इंसान के टुकडो का मोहताज कुत्ता कितना सुखी है और कब तक? क्या इंसान वास्तव में उसे एक जीव समझता है या एक वस्तु, एक कमोडिटी. चेयर, टेबल की तरह घर की शोभा बढ़ने के लिए एक शोपीस, बच्चो के साथ खेलने के लिए एक खिलौना और इंसान की रखवाली का एक हथियार. इन सबके बीच कुत्ते का वजूद कहाँ है? क्या बेहतर है- ढूंढकर कचरा खाना या इंसान की दया और भीख का समोसा? उस समय तो यही लगा कि उत्तर बिलकुल स्पष्ट है- मानव शासन करता है, दमन करता है पशु मानव की इस दुनिया में दबाया जाता है. वो रोता बिलखता होगा ज़रूर, पर इंसान उसकी आवाज़ समझ नहीं सकता, समझ सके भी तो समझना नहीं चाहेगा.

पर ३ साल बाद मुझे एक दूसरा अनुभव हुआ. उसमे भी एक कुत्ता था, एक इन्सान, बीच में खाना, और मूक दर्शक मैं. मंगलापुरी बस टर्मिनल के पास ट्रैफिक के कारण गाडी कुछ देर रुकी पड़ी थी. इस दौरान गाडी की खिड़की से मैंने देखा कि एक कुत्ता कचरे की तरह फेंके गए पके हुए आलू पर मुंह डाले बैठा था, जो कई दिन के बासी थे और शायद किसी ने कुत्तो और पक्षियों के लिए सड़क किनारे फेंके थे. उसके जाते ही एक फटे पुराने कपड़ो में, बहुत दीन हीन हालत में एक व्यक्ति सामने आया. उसने वो आलू उठाये, कुछ खाए और कुछ अपने हाथों में दबाये चला गया. मैं कुछ पल के लिए अवाक रह गया. एक पल को अपनी नज़रों पे यकीन नहीं हुआ. पर तभी गाडी चलने लगी. उस दृश्य ने मुझे हिला कर रख दिया. इंसान कितना मजबूर हो सकता है इसकी बानगी आज देखने को मिली. पिछली बार इंसान देने वाला था और कुत्ता लेने वाला, पर इस बार? तो कौन अधिक त्रस्त है, कौन अधिक बेबस और लाचार. इस वाकये ने जवाब देने के बजाये सवाल पर ही प्रश्नचिन्ह लगा दिया. जवाब मिला- सबका दुःख एक सामान. आप दुःख देख सकते हो, महसूस कर सकते हो लेकिन तुलना नहीं कर सकते. कुत्ते का समोसा भी उतना ही सच है, जितना इंसान के हाथ में रखे बासी आलू. पर इस अनुभव से कोई कविता नहीं निकली, ऐसा नहीं कि मैंने कोशिश नहीं की मगर ये मंज़र इतना खौफनाक था कि  शब्दों ने भी धोखा दे दिया. पर जाते जाते ये सीख दे गया कि इंसान और पशु दोनों ही बेबस है अपने प्रारब्ध के सामने. कभी कुत्ते को समोसा मिल जाता है कभी इंसान को अन्न का दाना भी नहीं मिलता.

कुत्तो ने एक बार फिर मुझसे जो  प्रश्न किया वो हमारी धार्मिक आस्था को लेकर था. 7 साल पहले मैं और मेरा परिवार जब किराये के घर में रहते थे, हमारे घर के पास एक छोटा सा मंदिर था, मंदिर भी क्या एक कमरे में सिमटा उपासना स्थल था. शाम को वहां एक बार आरती होती थी. मंदिर में इतनी जगह नहीं थी की ज्यादा लोग समा सके और सच कहूँ तो मैंने वहां कभी भीड़ देखी भी नहीं. लेकिन एक भक्त निरंतर समय पर आकर मंदिर के बाहर बैठ जाता था. कई बार अपने आगे के पैरो को आपस में मिलाकर प्रणाम भी करता था. शायद ही कभी हो कि  वो जीव अपनी इस नित्य क्रिया से चूका हो. उस काले रंग के कुत्ते को देखकर अचरज भी होता था और ख़ुशी भी मिलती थी.

“देखो क्या असीम भक्ति है. भाव विह्वल कर देनी वाला दृश्य है ये!” कभी कभार मन ने ऐसा भी सोचा. पर तुरंत तार्किक बुद्धि ने इसका काट भी खोज लिया- “भक्ति वगेरह कुछ नहीं, सब प्रसाद का लोभ है. मिष्ठान की खुशबू से लालायित होकर आ गया”. फिर तो मन में एक लहर सी बह निकली- तर्क, उसका काट और चिंतन. एक बार तो ये सोचा- हाँ भले ही ये लोभ हो पर क्या हम सबकी भक्ति का एक आधार लोभ नहीं. सबको कुछ न कुछ चाहिए- लोग मन्नते मांगते है, मनोकामनाएं  करते है, आशीर्वाद लेते है, सब किस लिए? किसी को धन चाहिए किसी को वैभव, नौकरी, संतान, मन की शांति आदि आदि. और जिसको कुछ नहीं चाहिए उसे मोक्ष चाहिए भगवान् चाहिए, शांति चाहिए, एकांत चाहिए . एक सवाल उठता है मन में कि अगर सबके पास सब कुछ होता तो क्या फिर भी हमें भगवान् की ज़रूरत होती? या फिर भगवान् की ज़रूरत ही इसलिए  है क्यूंकि हम अधूरे है? कहीं ऐसा तो नहीं कि  इंसान ने भगवान् बनाया अपने अधूरेपन के पूरक की तरह? भगवान् है या नहीं कोई नहीं जानता. पर अधिकतर लोगों के लिए भगवान् ज़रूरी है क्यूंकि हमें कुछ न कुछ चाहिए.  तो क्या बुनियादी फर्क है प्रसाद के लोभी कुत्ते और इच्छाओ के दास मनुष्य में? शायद फर्क है या शायद नहीं भी.

“जाने कितने धर्म कितने पंथ

कितने साधू कितने संत पड़े है

जाने तेरे नाम पे

कितने आपस में लडें है

‘ये लोग तुझको नहीं

तुझसे पाने को खड़े है’

ऐ खुदा तेरे नाम पे

आज भी पाखंड बड़े है”.

 

मेरी बुद्धि ने मुझे फटकारा-“तुम पागल हो. भला सोचो, अगर कुत्ता वास्तव में भक्त होता तो वो मनुष्यों के ईश्वर की उपासना क्यूँ करता, और वो भी मनुष्यों के तौर तरीको से?”

“मनुष्यों का भगवान?”

“क्यूँ क्या हमारे ईश्वर की छवि वास्तव में हमारी छवि नहीं है? क्यूँ हमारा भगवान् इंसानों जैसा दिखता है, उसने सभ्य मनुष्य की भांति कपडे गहने लादे है तन पर. अगर सोचो कुत्तो का भी भगवान् होगा तो क्या वो इंसानों जैसा दिखेगा…. नहीं न. कौन जाने जानवर भी अपने ईश्वर को याद करते होंगे. इस कुत्ते ने बस इंसान की नक़ल मारनी सीख ली है बाकि ये भक्ति थोड़ी है. जैसे घर के लोग श्लोक का मतलब बिना जाने भी पंडित के पीछे पीछे श्लोक दोहराते रहते है न, वैसे ही ये कुत्ता वही दोहरा रहा है जो इन्सान ने इसको सिखाया है. और क्यूँ न सीखे, बचा हुआ प्रसाद उसके हिस्से जो आता है”.

ये बाते कुछ दिनो पहले फिर याद आ गयी जब रमजान के महीने में कुत्तो का बर्ताव बदल गया. जैसे ही अज़ान की आवाज़ आती मेरे गली के सारे कुत्ते समवेत स्वर में आवाज़ का अनुसरण करते है. ये देखकर सबको बड़ी हैरानी होती थी. और ये महज़ संयोग नहीं था क्यूंकि ये तकरीबन हर रोज़ हुआ. लोगों ने तरह तरह की बाते बनायीं- किसी ने बोला बड़े धार्मिक है, किसी न कहा पिछले जन्म के संस्कार है आदि आदि. मुझे दो कारण समझ में आये- या तो कुत्ते उस आवाज़ से आकर्षित हो रहे थे अथवा सोते हुए कुत्ते अज़ान की आवाज़ से जग जा रहे थे और अपनी नींद में विघ्न पड़ता देख आवेश में गुर्रा रहे थे. क्या पता क्या सच है, पर यहाँ एक और बात पता चली. इंसान को हर चीज़ अपने नज़रिए से देखने की आदत है. मंदिर जाने वाला कुत्ता और मस्जिद की अज़ान की पुनरावृत्ति करने वाले कुत्ते, दोनों पहली नज़र में सबको धार्मिक और पिछली जन्म के सतसंगी मनुष्य समझ में आये. पर क्यूँ हम जानवरों के व्यवहार को भी अपने व्यवहार से तोलते है. कुत्ते ने हाथ जोड़े तो वो धार्मिक है. कुत्ते ने अज़ान की आवाज़ से आवाज़ मिलायी तो वो धार्मिक है. लेकिन ये तो इंसान की सोच है. इंसान का धर्म, इंसान की पूजा, इंसान के कर्मकांड. और हमें ये साबित करने में बहुत ख़ुशी मिलती है कि सभी जीव हमारा अनुसरण करते है. हम पशुओ के व्यवहार को भी अपने व्यवहार से आंकते है. हम जानवरों की बोली नहीं समझ सकते और जानवरों को बेजुबान कहते है!! तभी मंदिर में खड़ा कुत्ता इंसानी नज़रो में भक्त बन जाता है!!

पर लिखते लिखते मुझे ख़याल आता है कि मैं खुद यहाँ क्या कर रहा हूँ. पूरी व्याख्या तो मैंने इंसानी दृष्टिकोण से कह डाली. कुत्तो के परिपेक्ष्य में जज़्बात तो इंसानी है, कुत्तो को देखा भी तो कैसे- इंसानी आँखों से. माफ़ करना क्या करूँ, इंसान हूँ न, आदत से मजबूर हूँ!

 

 

 

 

 

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