-santosh kumar

 

मान लो ये ज़िन्दगी भी एक फिल्म होती या कोई उपन्यास या कोई कहानी. कहानी का एक मुख्य किरदार होता जो अपनी ज़िन्दगी में आप होते, तमाम बाधाये आती आपके समक्ष, आप लड़ते, गिरते- पड़ते लेकिन आखिर में जीत जाते. और फिर ज़िन्दगी में सब सुखद हो जाता. आप बन जाते इस कहानी के नायक. पर काश ज़िन्दगी एक फिल्म होती, तो आपको गिरकर उठने का मौका देती, काश ज़िन्दगी एक फिल्म होती जहाँ नायक महानता की मूरत होता या फिर उसकी गलतियों को भी महिमा मंडित किया जा सकता. पर ज़िन्दगी फिल्म नहीं और हम नायक नहीं. क्यूंकि न हम महान है, न सशक्त. हम गिरते है तो घडी दो घडी बैठकर रोते है, कोसते है उस रास्ते को जिसपर हम गिरे, कोसते है उस पत्थर को जिससे हम गिरे, और फिर जब फुर्सत होती है तो उठने की कोशिश करते है.

हमारे मंदिर में जाने से तूफ़ान नहीं आता, न मंदिर की घंटियाँ जोर जोर से बजती है, न हमारा भाग्य बदलता है न कोई चमत्कार होता है तुरंत. हम भगवान् से ये नहीं कहते कि- “भगवान् मैंने आज तक तुमसे कुछ नहीं माँगा आज मांगती/मांगता हूँ”. हम तो ये प्रार्थना करते है कि- “भगवान् बस आखिरी बार मदद कर दे, प्रॉमिस इसके बाद कुछ नहीं मांगूंगा” (भीतर से हम भली भांति जानते है कि हम झूठ बोल रहे है!). हम हारे हुए नायक है और हम फिल्मों में अपना प्रतिबिम्ब देखना शायद अधिक पसंद नहीं करते.

फिल्मो में नायक गुंडों से अकेले लड़ जाते है, लड़की की “इज्ज़त” बचाते है, टूटे हुए परिवार को फिर से एक करते है, वो सब करते है जो हम लोग केवल कल्पना में ही करते है. पुलिस इंस्पेक्टर नायक जब बदमाशो को बेरहमी से पीटता है तो हॉल में बैठा हर व्यक्ति ताली बजाता है सीटी मारता है, पर जब असली ज़िन्दगी में कोई पुलिस वाला सरेआम किसी बदमाश को पीट दे तो अगले दिन न्यूज़ हेडलाइंस होती है- “पुलिस की दरिंदगी”, “पुलिस का बेरहम चेहरा”, “हैवानियत की इन्तहा” आदि आदि. हम सब नायक है अपनी कल्पनाओ में. ये हमारी कुंठा नहीं तो और क्या है! हमें समाज ने “मर्दानगी” की ऐसी परिभाषा बताई है कि जब इंसान अपनी कल्पनाओ में किसी पर बल प्रयोग न करे उसे अपने “पौरुषत्व” पर विश्वास नहीं होता. इसी समाज ने हमें ये भी सिखाया है की औरते मर्दों के मुकाबले कमज़ोर होती है इसलिए हम अक्सर अपनी कल्पनाओ में और कई बार वास्तविकता में भी या तो स्त्रियों के भक्षक होते है या रक्षक. और दोनों ही सूरतों में ही हमारा भाव एक ही होता है….अपनी “पौरुष- शक्ति “ का प्रदर्शन.

 

हमारी फिल्मों में विरले ही ऐसे नायक मिलते है जो अपने जीवन में कुछ असाधारण नहीं करते. ऐसे नायक जो 10 क्या एक को भी पीटने का सामर्थ्य नहीं रखते, ऐसे जिनके लिए लड़कियां अपना शादी का मंडप छोड़कर नहीं आती, ऐसे नायक जिनके कारण घर का माहौल सुधरने की जगह बिगड़ता है. ये हमारा आइना है जो हम देखना नहीं चाहते. हमारा नायक बेबस नहीं हो सकता, वो मर नहीं सकता और अगर मर भी गया तो लोगों के दिलों में छाप छोड़कर जायेगा (जैसे आनंद. फिल्म का आखिरी संवाद इसकी बानगी है- “आनंद मरा नहीं आनंद मरता नहीं”) फिल्मे हमारा आइना तो है, पर वो आइना बहुत चमकदार है. इस चमक में चेहरे और मन की धूल नहीं दिखती. हमारी फिल्मों में हम नहीं दिखते, हमारी आशाएं दिखती है, अभिलाषाएं दिखती है, कुंठाएं दिखती है, सब दिखता है बस हम नहीं दिखते. क्यूंकि हम हार जाते है लेकिन नायक तो नायक इसलिए है क्यूंकि “वो हार के भी जीत” जाता है.

हम फिल्मो के नायक नहीं क्यूंकि ये हमसे महान बनने की उम्मीद करते है, काश कोई हमसे सिर्फ इंसान बने रहने की उम्मीद करे. आदमी ही क्या औरत भी, सब से उम्मीद की जाती है. नायिका सहनशील हो, आधुनिक होकर भी पारंपरिक हो, हमेशा अच्छा सोचे अच्छा बोले और अच्छा क्या है इसका पैमाना हमारा समाज तय करेगा!! नायक कानून को हाथ में लेकर अन्याय से लडेगा, अत्यचारी का नाश करेगा, अधर्म को खत्म कर धर्म की स्थापना करेगा, पर अन्याय क्या है, अत्याचार क्या, धर्म क्या और अधर्म क्या ये बात हमारा समाज तय करेगा!! और ये केवल हमारे फिल्मे नायक नहीं है हमारे धर्मग्रंथों में भी नायक कुछ इसी तरह बनते है. अगर आप समाज की आवश्यकताओ, उनकी कल्पनाओ पर खरे उतरते है तो नायक है आप. राम ने शम्भुक का सर कटवाया, सीता का त्याग किया फिर भी वो नायक है. कभी कभी तो ऐसा लगता है कि हमारे नायको की परिभाषा इतनी संकीर्ण है कि लगता है कि हारे हुए नायक ही सच्चे नायक है.

मैंने किसी आतंकवादी से मुकाबला नहीं किया, न किसी स्त्री का “रक्षक” बना, न किसी लड़की को प्रेम पाश में बाँध सका, न समाज के “मूल्यों”, परिवार की “इज्ज़त” के लिए कुर्बानी दी या ली. जीवन में कुछ असाधारण शायद की किया हो. पर ऐसे कोरे “नायकत्व” से तो हम कब के हार चुके है. हम हारे हुए नायक…. वास्तव में हम ही नायक है क्यूंकि हमारा “नायकत्व” हमारी कल्पना से नहीं उपजता.

बस हाथ में कलम और कागज़ है, हम हारे हुए नायक एक नया नायक बना रहे है!!

 

 

 

 

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