-कुमार प्रभात 

फिल्म व टेलीविज़न  लेखक 

दीपा’ नहीं हारी…इस देश में कोई “दीपा” कभी हार ही नहीं सकती है…वो जीत गई, बस देश हार गया…अगर इस हार की पुर्नावृति से बचना है तो सबसे पहले उस व्यक्ति का वैचारिक क़त्ल कर दीजिये जो ये कहता है- “खेलोगे कूदोगे, बनोगे खराब…” फिर देखिएगा, हर गली से दीपा निकलेगी…हर घर में दीपा होगी…बस आपके घर में कोई दीपा बनने की तैयारी करे तो दोगलापन मत कीजिये…ये हमारी शर्त है…

आपका नहीं पता लेकिन मैं जब तक जिंदा हूँ तब तक उम्मीद रखूँगा…क्यूंकि मैं बेहद आशावादी व्यक्ति हूँ…इतना आशावादी कि बीस बार के बैक तो बैक रिजेक्शन के बाद भी, मैं लगा हुआ हूँ कि किसी दिन तो उसके मस्तिष्क में भूकंप आयेगा और उसके संग देखे गए मेरे सारे ख़्वाबों का महल धरातल पे टिक जाएगा…इतना आशावादी हूँ कि कई बार तो चेक डाले बिना ही अकाउंट में पैसे क्रेडिट होने वाले मेसेज का इंतज़ार मोबाइल पर करने लगता हूँ….इसे पागलपन भी कह सकते हैं लेकिन सच मानिए, हर निर्माण की जान अम्बुजा सीमेंट नहीं होती…कुछ निर्माण आशावादी सोच से भी होती है…

मुझे तीखी सब्जी, तीखे लोग, तीखी आलोचना और बात-बात पे तीखी बातें करना कभी पसंद नहीं आता…इसलिए ज्यादातर समय नेनुआ की सब्जी खाता हूँ और नेनुए की लोचनीयता प्रवृति को आदर्श मान कर ही अपनी प्रतिक्रया देता है…७० सालों में देश बना है, कई जगहों पे बिगड़ा भी है…मॉल में गिटार बजाते 19 साल के लड़के-लड़किओं की ज़िन्दगी का कवर पेज पहले से ज्यादा रंगीन हुआ है…वहीँ किसानों का जीवन पहले से ज्यादा सफ़ेद…दाल की दाम बढ़ी है तो सैनिकों को बुलेट प्रूफ जैकेट भी मिला है…ये सब जोड़-घटाव चलता रहेगा…क्यूंकि हर स्तर पर समानता कभी संभव नहीं है…और रूखे शब्दों में कहूँ, तो असमानता ही प्रगति का ज़रिया है भी…ऐसा कभी नहीं हो सकता है कि हर व्यक्ति के पास BMW हो जाए…तोते की तरह BMW का मतलब BMW ही मत समझ लीजियेगा…लेकिन असमानता को पाटते रहना भी ज़रूरी है, इस बात से इनकार कर ही नहीं सकता हूँ…

इसलिए गौरवान्वित होने का अवसर है…गर्व कीजिये…जानता हूँ कि दूकान आज बंद रहेगी लेकिन अगर पीने की आदत है तो जुगाड़ से खूब पीजिए…पनीर-चिकेन जो पसंद है, खाईये…ज्यादा हो जाए तो मुझे भी बुला सकते हैं…अपनी दादी से कहिए कि वो टूटे हुए दांत के सहारे भी आपके पिता से हक की बात करें…अपनी बहन से कहिए कि वो भी आपकी तरह शादी से पहले बैचलर पार्टी कर सकती है…अपनी माँ से कहिए, पापा के सामने बोलते समय डरने की ज़रूरत नहीं है…अपने पापा से कहिए धर्म के उस पार जो लड़की आपको पसंद आई है, उसे अपनाने से दुनिया ख़त्म नहीं हो जायेगी…और खुद से कहिए कि अपने काम को धर्म और ईमान की तरह करना ही देश भक्ति है…जैसे मैं लिख रहा हूँ…हूँ बहुत अदना सा ही, लेखन को अपना काम समझ रहा हूँ…

स्वतंत्रता दिवस की ढेर सारी शुभकामनाएं…जलेबी खाईये, झंडा फहराइए…और कोई आ कर नकारत्मक बातें करें तो उसी झंडे की डोरी से उसकी सोच का वहीँ गला घोंट दीजिए…फिर मिल कर कहिए- ‘वन्दे मातरम्…”

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