-santosh kumar

 

राजेश अपनी उम्र के युवको की भाँति ही निरुद्देश्य सा था. बीटेक  किया फिर एमबीए और अब यूपीएससी की तैयारी कर रहा था. पर उसको पता था की उसका मन कहीं नही लगने वाला. उसके पापा आर्मी मे मेजर थे इसलिए राजेश फौज के तौर तरीक़ो से सर्वथा परिचित था. पर फौज से उसे कोई लगाव हो ऐसा नही था. उल्टा फ़ौजियो की शराब पीने की आदत उसको उनसे  दूर ले जाती थी. जब भी कोई जय जवान के नारे लगता तो उसे अजीब सा लगता. देशभक्ति सेना की मोहताज हो, वो ऐसा नहीं मानता था. सच तो ये था कि उसने अपने आसपास के फ़ौजियो मे रत्ती भर देशभक्ति नही देखी थी. अपने पापा मे भी नही. वो सोचता था- “काश लोगों को देशभक्ति का अर्थ मालूम होता”.

दो बार यूपीएससी दिया पर दोनो बार असफल. एक तरफ उम्र निकली जा रही थी, अब अगले साल 25साल का हो जायगा और फौज मे 25 के बाद ऑफिसर्स की भर्ती नही होती. एक धुंधली सी आशा देखकर राजेश के पिता ने आग्रह किया की इस बार यूपीएससी के साथ सीडीएस  की भी परीक्षा दे दे. राजेश ने भी पिता की बात का मान रखा. उसने दोनो परीक्षाओ की तैयारी की परंतु दिल ही दिल मे ये प्रार्थना की कि उसका यूपीएससी प्रीलिम्स क्लियर हो जाए. सीडीएस  मे वो जाना  तो नही चाहता था लेकिन फिर  भी इस डर से पढ़ा कि अगर कम अंक आए तो पिता को दुख होगा. रिज़ल्ट आया और तीसरी बार  भी वो यूपीएससी मे नाकाम रहा. पर साथ ही वो सीडीएस  की परीक्षा में उत्तीर्ण हो गया.  पिता के चेहरे का रौब देखते ही बनता था. राजेश ने भी पिता की लाज रखते हुए सभी परीक्षाएं उत्तीर्ण की. सेना को ही अपना भविष्य मान कर शिरोधार्य किया.

ये राजेश के लिए नयी चीज़ थी, पर उसे ये आशा थी कि बीटेक एमबीए की तरह  वो ये भी कर लेगा. और उसने किया भी और साबित किया की वो हर स्थिति के अनुकूल खुद को ढाल  सकता है या यूँ कहे हर फील्ड मे हाथ आजमा सकता है. पर ज़िंदगी तुक्को से नही चलती ये बात भी उसको जल्दी ही  समझ में आ गयी

शुरुआती सालो मे तो उसे आसान पोस्टिंग मिली पर चेहरे पे मूँछ और वर्दी पे स्टार के साथ उसकी जिम्मेदारियां  भी बढ़ गये. एक तरफ तो शादी हुई परिवार भी हुआ. पहले पहले तो पत्नी भी राजेश के साथ जाती थी हर पोस्टिंग पर लेकिन इस बार उसकी पोस्टिंग संवेदनशील इलाको में हुई तो पत्नी और बच्चो ने राजेश के पिता के घर में ही रहने का फैसला किया. उधर बॉर्डर से लगे सेक्टर्स का नेतृत्व जब उसे दिया गया तो शायद उसे अंदाज़ा नहीं था कि उसका काम उसकी सोच से कहीं बढ़कर है. कई बार दुश्मनों से भी अधिक मुश्किलें आपके अपने लोग खड़े कर देते है.

एक  रात को अपने डायरी के पन्नो को भरते हुए उसका ध्यान गोलियों की तड़तड़ाहट से भंग होता है

हड़बड़ाकर उठता है, देखता है दोनो तरफ से गोलीबारी हो रही थी. उस वक़्त उनको रोकने का अर्थ था अपने सैनिको की जान खोना. उसने तुरंत सैनिको को दूर दूर छितर जाने का आदेश दिया पर ऑर्डर काफ़ी देर से आया. जब तक संकट हटा काफ़ी गोलियाँ चल चुकी थी. रात को गश्त लगाई गयी तो पता चला की आस पास के इलाक़ो मे दो आदमी मारे गये. कुछ घरो की दीवारे छलनी हो गयी थी. आम लोगो में दहशत का माहौल था. कुछ पड़ोसी देश को कोस रहे थे, कुछ सरकार को और कुछ अपनी किस्मत को.

“मुझे बताओ कल क्या हुआ था?” सुबह सुबह राजेश ने सबकी परेड लगाई. गरजकर पूछा “तुम्हे शूट करने का ऑर्डर किसने दिया? गिव मी एन आंसर damn it”

पड़ोसी देश ने हमला किया सर. हम तो चुपचाप खा रहे थे

और पी भी रहे थे. क्यूँ है या नही?

सबके कंधे लटक गये

सच सच बताओ पहले गोली किसने चलाई?

सर बताया तो. उन्होने चलाई. अभी तक तो प्रेस मे भी आ गयी होगी.

प्रेस में वही बात जाती है आर्मी के बारे मे जो हम बताना चाहते है. मैं सच जानना चाहता हूँ

हम अपने बयान पे कायम है सर. गोली उन्होने चलाई

अच्छा अगर पहली गोली उन्होंने चलायी तो तुमने किसकी परमिशन से गोली चलायी.  मुझसे बिना पूछे गोली कैसे चली?

सर सब इतनी जल्दी में हुआ कि रियेक्ट करने का समय नहीं था.

इस जवाब से न राजेश संतुष्ट था न बड़े अफसर. उन्हें इससे साज़िश की बू आ रही थी. इन्क्वायरी समिति बैठी. मामला गंभीर था. यद्यपि राजेश का इस प्रकरण में कोई हाथ नहीं था तथापि लापरवाही और नेतृत्व की असफलता को लेकर उसकी खूब भर्त्सना हुई और उसे भी वार्निंग दी गयी. राजेश इसे अपनी व्यतिगत पराजय मान रहा था. रह रह कर यही बात मन में आ रही थी कि वो सेना के लिए उपयुक्त नहीं है.

मीडिया में  रिपोर्ट गयी की पड़ोसी देश ने पहले गोली चलाई और इंडियन आर्मी ने जवाबी कार्यवाही की. पर इस रिपोर्ट पर खुद राजेश को विश्वास नही था. खैर बात आई गयी हो गयी.

 

कुछ महीनो बाद फिर गोलीबारी हुई. पर इस बार गोलीबारी बाहर नही अंदर हुई. एक सिपाही ने दूसरे सिपाही को गोलियो से भून दिया. सिपाही शराब के नशे मे धुत था पर गोलियों की आवाज़ से उसका नशा टूटा. सामने जो देखा तो विश्वास नही हुआ कि ये उसी का किया धरा है. हाथ से बंदूक छूट गयी. उसे पकड़ के लाया गया

राजेश ने उसे बंदूक के बट से मारा. यूँ तो सिपाही राजेश से बलिष्ठ था पर अपराध बोध के  के कारण उसने प्रतिकार नही किया

क्यूँ किया?

कोई जवाब नही

मुझे जवाब दो

पर कोई आवाज़ नही

कोई मुझे ये बताएगा  यहाँ क्या हुआ?

एक सिपाही आगे हुआ.

सर एक पुरानी बात पर  झगड़ा हो गया

कौनसी बात?

दोनो खूब पिए हुए थे. ये जो मरा है इसने नशे मे ताना मारा- “तूने ग़लत किया उस दिन बॉर्डर पे गोली चलाके”. उस दिन भी ये पिया हुआ था, दोनों तरफ से गालियाँ बाकि जा रही थी, लेकिन ये कुछ ज्यादा तैश में आ गयाऔर….. गोली चला दी

तो मैं सही था. अब समझ नही आता इसे किस बात की सज़ा दूं उस दिन की या आज की

गर्दन झुकाए सिपाही बोला- “आज जो किया है चाहो तो सर फाँसी चढ़ा दो कोई गुरेज़ नही. पर उस दिन जो हमने किया सही किया”.

सही किया?!! तुम्हारे कारण हमारे सिपाही मारे गए  दो सिविलियन मरे, हमारी बदनामी हुई…. क्या अच्छा किया?

देश का दुश्मन हमारा दुश्मन सर उनके साथ कोई हमदर्दी नही. मेरा बस चले तो एक एक को भून डालूं

तुम्हे यहाँ किस लिए रखा है सुरक्षा के लिए या हिंसा के लिए ?

आपको किनसे हमदर्दी है सर उनसे या हमसे?

क्या कहा!! गेट लॉस्ट फ्रॉम हियर. इसे हाउस अरेस्ट मे रखो. सुबह इसपर डिपार्टमेंटल एक्षन लिया जायगा

यस सर

और एक और बात…. वो बॉर्डर वाली बात…. किसी के सामने नही आनी चाहिए.  देश की बदनामी होगी.

आज राजेश को समझ नही आया की उससे क्या चूक हुई. उसको एहसास हुआ कि वो ज़िन्दगी के इम्तिहान में भी फेल हो गया. रह रह कर बातें याद आने लगी.   “मेरे होते हुए ऐसा कैसे… हाँ शायद एक बीटेक और एमबीए वाला दिमाग़ लोगो को नही संभाल सकता. तभी तो यूपीएससी में कभी निकल नही पाया. पापा के कारण मैने आर्मी ज्वाइन तो कर ली  पर शायद इस काम के लिए मैं नही बना. आई डोंट डिज़र्व दिस प्लेस. आई डोंट डिज़र्व एनीथिंग!!  अंदर से एक आवाज़ ये ज़रूर आई कि “भूल जा, ज़िन्दगी में ऐसे मौके आते रहते है, आज इतने सालो बाद ये कैसी बात लेकर बैठ गया ” पर उसपर नेगेटिविटी इतनी हावी हो गयी थी की उससे कुछ समझदारी की आशा बेकार थी.

रात के अंधेरे मे गश्त लगाने के बहाने बाहर निकला. बॉर्डर पर खड़े सिपाहियो को अचरज ज़रूर हुई पर कोई कुछ कह नही पाया. बॉर्डर के किनारे एक पहाड़ी रास्ता था. वहाँ से जाया जा सकता है. पर कहाँ. एक तरफ पड़ोसी देश का बॉर्डर  दूसरी तरफ सहमे दबे डरे लोग. कहीं भी तो जाया  नही जा सकता. जितना भी दूर जाऊ अँधेरा दूर नहीं होगा.

हां छुट्टी की दरख़्वास्त दी जा सकती है,पर अभी ऐसी घटना के बाद बहुत तनाव होगा ऐसे मे उसकी छुट्टियाँ मिलना मुश्किल है. राजेश का जी खट्टा हो गया. अब हर दिन बोझ था,  जैसे भार डाल दिया हो किसी ना और ढोने को कोई और कंधा ना बचा हो.

कई महीनो बाद आख़िर छुट्टी की अर्ज़ी मंजूर हो गयी.  दो महीने का अवकाश. लेकिन राजेश का मन घर जाने का नही था. जी तो चाहता था कहीं ऐसी जगह चली जाऊ कि लौट के यहाँ ना आना पड़े. घर का टिकट कटाया ज़रूर  पर घर पहुँचा नही. न ही वापस अपने पोस्ट पर रिपोर्ट की.  सबको लगा कही बीच मे फंस गये. उन दिन कुछ इलाक़ो मे भूस्खलन आया था वही कहीं फंसे  होगे. बहुत खोजा पर नही मिले. संपर्क का कोई साधन नहीं. फ़ोन, पर्स बैग सब बीच रास्ते छोड़ आया था. फ़ोन मिला पर्स मिला सामन मिला पर राजेश का कहीं अता पता नहीं लगा.

कई महीने बीत गये. फौज के अधिकारीयों  ने राजेश को भगोड़ा और देशद्रोही घोषित किया. उसे गुमनाम या शहीद भी माना जा सकता था बर्शते उसके होते हुए सिपाहियो का कांड ना हुआ होता. इस घटनाक्रम से उसकी बहुत किरकिरी हुई. उसकी भूमिका पर इंक्वाइरी भी बैठी थी पर कोई सबूत ना मिला. उसके भाग जाने से सबकी उँगलियाँ उसपर उठ गयी. मामले का सारा ठीकरा उसके ही सर पर फूटा.

 

*****

 कई साल बीत गये और किसी अनजाने गाँव में एकांत वास करते हुए बाबा को अब एहसास हो गया था की वो इतने सालो से ग़लत ही सोचता था. एक पल के अंधकार ने उसको कितने सालो तक अँधा कर रखा था. वो पूरे गांव को या यूँ कहे पूरे इलाके को बिना कोई हुकुम दिए बिना किसी सख्ती के संभाल  सकता है. जाने उस रात को वो नामुराद ख़याल कहाँ से आया.

“आज हमारी ख्याति कई गाँव मे फैल गयी है. पर क्या करे उस ख्याति का जब परिवार ही साथ नही. कोई अपना पास नही”. वो जानता था सरकार उसे दगाबाज़ और  देशद्रोही समझती है

तभी उनका एक अनुयायी उसका चिंतन भंग करता  है

बाबा शहर से कोई मिलने आए है आपसे

कौन है?

आपका आशीष लेने आए है

आने दो

“बाबा जी!” बाबा उठ कर देखते है और देखते ही उनकी आँखे भीग जाती है. सामने उसके पिता खड़े है. और साथ मे उसकी अपनी पत्नी!! यद्यपि घनी दाढ़ी के आवरण और साधू की वेशभूषा में उसे पहचानना बहुत मुश्किल था तथापि शर्म के मारे आधे चेहरे को चादर से ढक दिया.

“बाबा कई साल हो गये, मेरा बेटा गायब हुआ और फिर नही आया….पता नहीं जिंदा भी या नहीं”

एक पल तो बाबा को धक्का लगा . दिल तो चीख चीख कर कह रहा था कि मैं जिंदा हूँ. किसी तरह आँखों को भीगने और शब्दों को फूटने से रोका. शांतचित्त होकर बोले-“तो अपने बेटे को ढूँढ रहे हो. चिंता मत करो, तुम्हारा बेटा जिंदा है. एक पल के असंयम ने उसे अपने जीवन पथ से भटका दिया था पर जल्द ही वो लौटेगा तुम्हारे पास, धीरज रखो”

 

नही बाबा जी मैं जनता हूँ वो हमे याद करता होगा…. पर इतने साल मे इतना इंतज़ार किया की अब आशा ही खो दिया…. इसलिए…….

 

बाबा फिर बोले- “आशा कभी ना छोडना. तुम्हारा बेटा जल्द ही वापस आएगा”

 

“अब आकर भी क्या करेगा. जितना सहना था हमको सह लिया. बाबा जी  बहू की दूसरी शादी कराई. ये तो तैयार नही थी पर अब जा कर मानी है. पीछे खड़े युवक को इशारा करता है. “इनको आशीर्वाद दीजिए”.

 

बाबा देखते रहे बस देखते रहे और कोसते रहे उस दिन को मन ही मन. सोचा अभी चोगा उतार के बोलूं कि मैं आपका बेटा राजेश हूँ . पर कह नही पाया. उसने अपनी कर्मभूमि के साथ छल किया था, आज ज़िन्दगी उस छल का प्रतिकार ले रही थी.

अपनी ही पत्नी के सर पर हाथ रखके बोला “सौभाग्यवती भव:” पर आज ये आशीर्वाद उसके लिए नही था

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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