-संतोष कुमार

 

४ दोस्त एक कमरे में बैठे हुए.  सब अलग अलग पृष्ठभूमि के. अपने पांचवे दोस्त का इंतज़ार कर रहे है. एक बड़ा खुशमिजाज़ और खाने का शौक़ीन, एक मुंहफट और कुतर्की, एक थोडा सा दार्शनिक, एक शायर और पांचवा शर्मीला, झुके कंधो वाला एक मध्य वर्गीय परिवार का लड़का.

इन दिलो में आग है जो;
बारिशो से उन्हें बुझा दे,
ज़िन्दगी में मायूसी की
जो हवा है वो उड़ा दे
ज़िन्दगी में जो नशा है
जो मज़ा है कहीं नहीं है
क्या सोचता है खोजता है
सब यहीं है
ज़िन्दगी में जो जलन है
जो चुभन है सब हटा दे
टूटे दिल का जाम है ये
आजा तू भी लब मिला ले

 

 

खुशमिजाज़: बंदा आज भी लेट है. इस गाने को चार बार गा चुके है. ४ बार ये टूटा हुआ गिटार बजा चुका. वो आएगा भी या नहीं

कुतर्की: बोल तो ऐसे रहे हो जैसे वो बाकि टाइम जल्दी आता है

खुशमिजाज़ : तुम्हारा “एक्सपर्ट कमेंट” ज़रूरी था?

कुतर्की: था तो नहीं, पर बोलने में क्या जाता है.

खुशमिजाज़ : बिलकुल जाता है. देख भाई ठंडी चाय और बिन मांगी राय दोनों मुझे पसंद नहीं

कुतर्की: शायर की और इशारा करके. शायर वो है उसी को रहने दे. मेरा बोलना ज़रूरी नहीं था तो तुम्हारा टोकना कौनसा ज़रूरी था

(इससे पहले की खुशमिजाज़  कुछ कहता दार्शनिक धीमे धीमे बोलने लगा)

दार्शनिक: ज़रूरी तो ज़िन्दगी में कुछ भी नहीं. न तुम्हारी बात ज़रूरी, न मेरी बात ज़रूरी, न तुम ज़रूरी न मैं ज़रूरी.

कुतर्की: ठीक है भाई तुझे छत से नीचे फ़ेंक देते है ठीक है न.

(शायर थोडा झल्लाकर उन्हें टोकता है)

कवि: शट अप गाइस तेरे इस अ लिमिट तो एवरीथिंग!!

(सब शायर को देखने लगते है )

कुतर्की: ओ भाई इतनी अंग्रेजी! क्या बात है, आज तो सबके मिजाज़ बदल गए. हमारा हिंदी विशारद कवि महाराज अंग्रेजी में बतियाने लगे, हमारे चिल्ल आउट खुशमिजाज़  जी कहते है (नक़ल उतारते हुए ) ठंडी चाय और बिन मांगी राय दोनों मुझे पसंद नहीं!

खुशमिजाज़ : छोडो यार, अभी तो खाना ठंडा हो रहा है और बियर गरम.

दार्शनिक: (आह भरते हुए) देखो भाई क्या दिन आ गए इंसानियत के.  एक दोस्त का अता पता नहीं और इनको शराब की चिंता है

कुतर्की: तू फिर शुरू हो गया है.

शायर: भाई वो अपने घर से आ रहा है बॉर्डर से नहीं

दार्शनिक: बॉर्डर से आता तो उसकी चिंता न होती . एक सीधा सादा दोस्त है हमारा…. और ज़माना बड़ा ख़राब है

 

कुतर्की:  हमारे सोचने से वो आ जायेगा क्या.

दार्शनिक:  भाई एक एहसान करोगे. अपने दिल में थोड़े जज़्बात ले आ. तेरे और पत्थर में कोई फर्क नहीं है.

कुतर्की:  भाई तुम हम पर एक एहसान करोगे. इस बियर की बोतल से चुल्लू भर बियर लेकर उसमे डूब मर प्लीज

खुशमिजाज़ : ओये मेरी बियर को हाथ न लगाना.

शायर: तेरी बियर कहाँ से भाई. कविता मेरी पब्लिश हुई है, पार्टी मेरी, पैसे मैंने खर्चे, बुलाया मैंने, खाना पीना मेरा. तो बियर तेरी कैसे हुई

खुशमिजाज़ : पार्टी किसी की भी हो, बियर तो साड्डी है. और अगर ये बंदा मेरे दस गिनने तक नहीं आया न तो मैं चला जाऊंगा

शायर: बिना खाए पिए?

खुशमिजाज़ : पागल है क्या. ये सारा खाना पीना साथ ले जाऊंगा.

दार्शनिक : उसकी ज़रुरत नहीं पड़ेगी. वो देखो हमारा यार आ गया

खुशमिजाज़ : आख़िरकार….. वाहे गुरु दि कृपा

कुतर्की: धन्य भाग हमारे जो आप यहाँ पधारे

दोस्त: सॉरी गाइस, किसी काम में फँस गया था. आई ऍम रियली सॉरी

शायर: इस कदर वो हमारे दर्द को दवा देते है

सॉरी कहकर वो ज़ख्म को हवा देते है

दोस्त: इस शेर से याद आया…….कोंगो तुम्हारी कविता छपी है मैगज़ीन में तुम्हारी फोटो के साथ. चमक रहे हो.

शायर: चमक नहीं लुट रहा हूँ. ऐसे दोस्त मिले है की साला हेयर स्टाइल भी चेंज  कराओ तो उसकी भी पार्टी मांगते है

खुशमिजाज़ : बाते ही करोगे या मैं खाना पीना उठा कर ले जाऊ घर

दार्शनिक: ठहर जा भाई. सब्र का फल मीठा होता है.

खुशमिजाज़ : जब पेट में चूहे कूदते है न तब ये लतीफे किसी काम नहीं आते

कुतर्की : ठीक है……… लेकिन पहले जिस कारण ये पार्टी आयोजित हुई है उस कविता को हमारे कवि महाशय अपने सुमधुर कंठ से स्वयं सुनायेंगे

(सब तालियाँ बजाते है. शायर अभिवादन स्वीकार करता है)

हमने जगह दी उनको अपने

दिल के आशियाने में

ठहर गए पाँव उनके

उस घर के महखाने में

मुहब्बत का नशा कुछ

उनको चढ़ा कुछ हमको भी

हमको इश्क के सागर से

बस जाम ही मिला नज़राने में

(सब वाह वाह करते है )

शायर : आगे सुनो

आँखों से कुछ जाम हमारा

छलक गया उनके नाम का

इश्क के दरिया में कुछ यूँ डूबे

न रहा किसी भी काम का

न खुदा मिला न सनम मिली

न मिला हमें कुछ ज़माने में

हमको इश्क के सागर में

बस जाम ही मिला नजराने में

(सब तालियाँ बजाते है वाह वाह करते है)

खुशमिजाज़ : हो गया न,अब खाया पीया जाये

कुतर्की: हाँ भाई इसकी मनोरथ की पूर्ती करो. कब से मरा जा रहा है

खुशमिजाज़ : लेकिन भाई इतनी बियर तो कम पड़ेगी

शायर: अबे तू चिंता मत कर. पूरा स्टॉक बचा के रखा हुआ है. देसी से लेकर विदेशी तक. वो उस कार्टन में (इशारा करता है. खुशमिजाज़  उठा कर ले आता है )

शायर: तो शुरू करो सब ( सब एक एक बियर उठा लेते है सिवाय पांचवे दोस्त के )

शायर: क्या हुआ ? तू भी उठा एक.

दोस्त: (थोड़ी हिचक के साथ.) नहीं…वो मैं.. पीता नहीं हूँ.

कुतर्की : ये क्या बात हुई भाई. उठा चुपचाप एक

दोस्त: नहीं भाई मैं सचमुच नहीं पीता

दार्शनिक: नहीं पीता था तो अब पी ले. There is always a first time

दोस्त: नहीं… मैं ऐसे ही ठीक हूँ. आई डोन्ट ड्रिंक . तुम लोग शुरू करो

खुशमिजाज़ : ऐसे अच्छा थोड़े ही लगता है…. थोडा तो पी

दोस्त: नहीं यार मुझे पीना अच्छा नहीं लगता

कुतर्की: जब तुमने कभी पी नहीं तो क्या पता की अच्छा लगता है या बुरा. पी कर के तो देख.

दोस्त: देख भाई सीधी बात है न मैं पीता हूँ न मेरी पीने की कोई इच्छा है. I just hate alcohol.

दार्शनिक: तुमने दुनिया को उनकी नजरो से देखा अब अपनी नजरो से देखो. दुनिया से जो बाते सुनी उन्हें खुद महसूस कर के देखो. वरना ज़िन्दगी निकल जायगी और जिज्ञासा सही गलत के फेर में रह जायगी

दोस्त: जिज्ञासा होती है मगर उनपर वश करना आता है मुझे

खुशमिजाज़ : मुंडे तूने तो ज़िन्दगी जी ही नहीं. लिव लाइफ किंग साइज़. हर पल यहाँ जी भर जियो जो है समां कल हो न हो

कुतर्की: बस गाना गाना ही शेष रह गया था.

खुशमिजाज़ : तू  फिर बोला बीच में

दोस्त: अच्छा सुनो. अगर मेरे सामने ज़हर की बोतल रखी हो तो केवल जिज्ञासा के लिए मैं उसे पी थोड़े ही जाऊंगा वो भी जानते हुए की ये ज़हर है

कुतर्की: शराब ज़हर तो नहीं होती

दोस्त: उससे कम भी नहीं होती

कुतर्की: उस हिसाब से तो तुझे चाय कॉफ़ी भी नहीं पीनी चाहिए. वो क्यूँ पीता है.

दोस्त: मेरे चाय कॉफ़ी पीने से मेरा शराब पीना जस्टिफाई तो नहीं होता

खुशमिजाज़ : भाई तुम लोग लड़ो. मैं तो स्टार्ट कर रहा हूँ.

(सब उसे देखते है और फिर बात करने लगते है)

शायर: अभी मैं जब जाम और महखाने पर कविता सुना रहा था तब तो बड़ा वाह वाह कर रहा था. बड़े हिप्पोक्रेट  निकले तुम तो

दोस्त: कविता तो लड़ाई को भी फूलो सा कोमल और खून को पानी सा निर्मल बना सकती है. मेरी वाह वाह तेरी कविता के लिए थी शराब के लिए नहीं

दार्शनिक: बहाने बना लो चाहे जितने भी लेकिन तुम्हारे अन्दर पीने की तमन्ना है ज़रूर. दबाये जाओ बस अपने दिल को

दोस्त: दिल के अलावा हर इन्सान का अपना दिमाग होता है सोचने के लिए और मेरा दिमाग मुझे कह रहा है की मत पी

खुशमिजाज़ : अरे भाई प्यार और शराब दिमाग की नहीं दिल की चीज़ है. हम लोगों  के दिल बड़े होते है. मैं तो भाई अपनी बंदी की बहन की शादी में गया. वहां जो खातिरदारी हुई न क्या बताओ. ६ पेग अकेले मारे मैंने

कुतर्की: लड़की के बाप ने तुझे शादी में घुसने कैसे दिया?

खुशमिजाज़ : उसका बाप मुझे पहले सा जानता था. और कौनसा मैं उसके हाथों में हाथ डाले घूम रहा था जो कोई ऑब्जेक्ट करता. लेकिन मुद्दे की बात ये प्यार और दर्द का एहसास सबसे ज्यादा पीने के बाद ही होता है

कुतर्की: तूने तो कभी किसी से प्यार किया नहीं होगा?

दोस्त: नहीं

कुतर्की: तभी तो पीता नहीं. एक बार तेरा दिल टूटना चाहिए ज़रूर. जब प्यार मे दिल हारकर मर रहा होगा न तब बोतल का ही सहारा मिलेगा.

शायर: और कितना मरेगा. ऐसी ज़िन्दगी जी रहा है पहले से ही …

ऐसे घुट घुट के जीना क्या है

अगर यही जीना है तो फिर मरना क्या है

कुतर्की: ये तो सुनी सुनी लाइन है तूने तो नहीं लिखी.

शायर: शब्दों पर मत जाओ. भावनाओ को समझो.

दोस्त: तुम सब की बाते मैं समझता हूँ पर मुझे एक बात बताओ. अगर मैंने एक बार शराब पी तो क्या मुझे दूसरी बार तलब नहीं लगेगी फिर मन करेगा एक और बार……. ऐसे ही तो लत लगती है.

खुशमिजाज़ : तो लगने दे. वैसे तो एक बार पीने से लत लगती है नहीं….

दोस्त: कोई भी ये सोचकर तो नहीं पीता  होगा की मैं ज़िन्दगी भर पियूँगा. पहले तुम नशे को आजमाते हो और फिर ज़िन्दगी भर नशा तुम्हे आजमाता है.

दार्शनिक: मैंने कहा था न इसको समाज के खिलाफ जाने से डर लगता है.

दोस्त: मुझे डर किसी से नहीं लगता पर मुझे शराब का कोई फायदा नज़र नहीं आता.  पैसो का नुकसान, सेहत का नुकसान, पीकर हुडदंग करो तो इज्ज़त गयी, एक्सीडेंट होने के ज्यादा चांस, मरने के ज्यादा चांस.

कुतर्क: अरे यार तूने तो कितने आगे की सोच ली. देख न तुझे पैसे देने है शराब के अभी, न कोई हुडदंग होगा क्यूंकि आसपास के फ्लैट्स खाली पड़े है. एक बार तरी करने में क्या हर्ज़ है. ज़िन्दगी में जो भी गम है घुट मार और भूल जा

 

दोस्त: मैं ऐसी चीज़ क्यूँ अपनाऊ जो एक पल की ख़ुशी दे और जीवन भर का गम. और क्या गारंटी तुम अगली बार मुझे पीने को नहीं कहोगे.

शायर: वो समझते नहीं हम समझा नहीं सकते

दुनिया के आगे आंसू बहा नहीं सकते

इसलिए बहाते है जामों के सागर

की गमो को सागर में बहा नहीं सकते

दोस्त: अब बोल भाई क्या ये समाज की देन नहीं है की गमो को भुलाने के लिए पीना ज़रूरी है. क्यूंकि आदमियों को आंसू बहाना शोभा नहीं देता.

दार्शनिक: भाई हम गारंटी लेते है इसके बाद कभी नहीं बोलेंगे तुझे पीने को. आज पी ले बस.

दोस्त बहुत भावुक  हो जाता है और तिलमिलाकर बोलता है)  क्या मेरी ज़िन्दगी भर की गारंटी लोगे. दोस्त तो आदत लगा के चले जाते है. कभी सोचा है उस बेटे के बारे में जिसका बाप रोज़ पीकर घर आता है. जिसे देखकर ही घिन आती है, वो पत्नी जिसकी तनख्वाह का ज़्यादातर हिस्सा शराब में उड़ जाता है. जब घर में रोज़ लड़ाई झगडे होंगे तब क्या ये दोस्त आयेंगे…… ये दोस्त सिर्फ आपकी ज़िन्दगी तबाह करने की गारंटी ले सकते है. बीस साल बाद मेरा बेटा भी वही करेगा जो बाप करता है.. दिन में पढता है फिर जॉब ढूंढता है ताकि वो उस ज़िन्दगी से दूर जा सके और फिर उसके दोस्त उसे फिर उस अंधे कुए में धकेल देते है… यही होगा कल अगर आज मैं संभला नहीं तो.

I hate alcohol……..i just hate alcohol.

(ख़ामोशी छा जाती है. सबके चेहरे पर ग्लानि का भाव)

तिनका तिनका ज़िन्दगी है
तिनका तिनका मौत भी है
है नशा ही दरमियाँ क्यूँ
आँख में जब भी नमी है
हूँ परेशान है उदासी
दिल में कोई तो कमी है
सोचता हूँ खोजता हूँ
जाम ही क्या ज़िन्दगी है
है नशा क्या क्यूँ ज़रूरी
क्या है रिश्ता ज़िन्दगी से
ज़िन्दगी मेरी अमानत
है नशा किसकी ज़रूरत

 

 

शायर: सॉरी यार, तू तो सीरियस हो गया. हम तो मज़ाक कर रहे थे.

दोस्त: इट्स ओके. पर मैं पियूँगा नहीं.

शायर: as u wish…..(फिर माहौल बदलने की कोशिश करता है ) लेकिन हम तो पियेंगे….  क्यूँ भाइयों.

(सबके चेहरे पर मुस्कान छा जाती है)

दार्शनिक:

शुभस्य  शीघ्रम!

कुतर्की: वैसे भी वैसे अच्छा कर रहा है तू नहीं पी रहा है… हमें थोडा और पीने को मिल जायेगा…….. अगर खुशमिजाज़  जी कुछ बचायेंगे हमारे लिए तो

खुशमिजाज़ : ख़बरदार जो इधर नज़र मारी..

दार्शनिक: इसे कहते है.. राम राम जपना पराया माल अपना!

(सब हँसते है ज़ोर ज़ोर से.)

 

 

शायर:इस बात पे कुछ पंक्तियाँ याद आई

सब मिलकर: इरशाद! इरशाद!

शायर (वौइस् ओवर)

मुझे नशा है जीने का

तंगहाली में बदहाली में

हरियाली में खुशहाली में

हर रस को पीने का

हर रंग में जीने का

मेरा प्याला जीवन

मेरा जाम वो पल है

कभी तड़पता आज

कभी उभरता कल है

मुझको नशे में रहने दो

हर घूँट को पीना है मुझे

जीवन के कुछ पल चुराकर

उन्हें फिर से जीना है मुझे

 

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