-रोहित रावत

रंग बदल लेना इंसान की फितरत हो सकती है.लेकिन किसी दीवार का रंग मानव की इच्छा के द्वारा निर्धारित होता है.एक विशेष दीवारों की बात यहां होगी. संवाद होगा उन दरख्तों से जिन्हें लाल रंग से भर दिया गया. होन्डा हीरो हो गया या सिर्फ होन्डा होन्डा हो गया या हीरो हीरो हो गया. जिन दीवारो को इन आंखो ने पत्थर के रूप मे तराशा ..आज वो रंगी है लाल रंग लेकिन ये रंग उस दीवार पर भा क्यो नही रहा है ?? सवाल वहां से गुजरने वाले हर शख्स  के दिमाग मै उमड़ता है ..पर मन के एक कोने मे सिसकी भरते ही शांत हो.जाता है.कभी दिल्ली विश्वविद्यालय का मेट्रो स्टेशन लाल नही था पर आज है …वो किसी के खून रंग भी नही है पर क्या होन्डा-होन्डा हो जाना ठीक है?? जो विश्वविद्यालय इस मोटर कम्पनी से दशकों पहले बना हो तो आज बाजार वाद के.चलते इसका  रंग नाम सब बौना सा नजर आता है. पहले.होन्डा लिखा बाद में परिसर का नाम. इतना भी क्या कि हम बाजार के चलते अपनी पहचान को भी खो दे. कितने अचम्भे की बात है न, जिस लाल रंग को मार्क्सवाद  से.जोड कर देखा जाता है, जो पूँजीवाद को तोड़कर समाजवाद की क्रांति लाने को प्रतिबद्ध है, उस क्रांति का लाल रंग यहाँ अपना वजूद खो जाती है. देखिये तो लाल रंग की क्रांति कहाँ गयी, क्रांति के मुख की वो कांटी कहाँ गयी. लाल रंग बाज़ारी शोषण का विरोधी रंग माना जाता था पर यहाँ… यहाँ तो  यह बाजार की प्रमुखता करता नजर आता है.. क्योकि रंग पर किसी का अध्पित्य नही है. हर विचार या व्यवहार अपने ढंग से इसका इस्तेमाल कर लेते है…पर एक पूरे मेट्रो स्टेशन को विज्ञापन प्रतीक बनाने से विश्वविधायलय के कितने.विद्यार्थी मोटर साईकिल.खरीद  पायेंगे ये तो होन्डा होन्डा ही बता सकती.पर डी एम आर सी को होन्डा कितना फायदा पहुंचा रही या किसी व्यक्ति विशेष का रुझान होन्डा की तरफ है ।जहन मै बहुत कुछ है क्या यह विकास का भाग है? किसी का रंग, नाम पहचान सब बदल दी जाए, क्या हम अपनी पहचान.से समझौता कर सकते है? फिर  हमारी संस्कृति ओर विरासत का दम भरने वाले चुप क्यो है? एक भी धरना नही, बडी़ शांति से विश्वविधयालय पर सब कुछ बदल गया. अब लगता है कोई बड़ा बाजार जिसे मॉल  कहते है….होन्डा 2 व्हीलर्स विश्वविधालय कहने मै कितना अलग सा लगता है..

लगता है किसी शोरूम या प्लांट  की पहचान सा. अभिशेष के लिए विश्वविधयालय  होन्डा के पीछे छुपते छुपाते रह गया है.रोड़ के इस पार या उस पार तस्वीर स्टेशन की एकरूपी  ही. ऊपर होअर्डिंग के भीतर दौड़ती मोटर साईकिल; बिल्कुल मुख्य दीवार के उपर दूधिया रौशनी मे रात को चमचमाती है. जिसमे परिसर का नाम तो नही, होन्डा होन्डा हो ता नजर आता है. शोचनीय है , बाजार अब हावी है, क्यो कि हमने एसा होने दिया? मुझे क्या मिला- लाल रंग…बस! लाल रंग अच्छा है कभी  यह.जान भी बचाता है पर यहां  यह होन्ड़ा की बानगी कर रहा है. क्रांति के रंग में उपभोग का रंग मिल गया.आवाज उठनी चाहिए, इतिहास की तारीख मे लिखा जायेगा ये लाल सत्य जो बाजार मै नीलाम तो हुआ, होन्ड़ा के नाम पर और हम आप साक्षी बन.रहे है इस लाल सत्य के. बस मन मै कुंठा लिए जिये जा रहा हूं, तब कुछ लेखनी से कह पाया हूंं.

विज्ञापन के आगे दम तोड़ते दीवारो के रंग किसी से छुपे नही है. हर माह नया उत्पाद और उसका नया विज्ञापन  अपना नया खेल इन मासूम दीवारो के साथ खेलती है.हमे भी आदत हो गयी इन दीवारो के साथ जीने की, रंग अब हम नही तय करते उत्पादक करता है.

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