-SANTOSH KUMAR

M.A. HISTORY (FINAL YEAR)

 

 प्राचीन भारत का लैंगिक इतिहास बहसों, विवादों, व परस्पर विरोधाभासी व्याख्याओ से परिपूर्ण है. इस इतिहास से कोई एक निष्कर्ष निकालना इसकी बहुतायता व विविधता को दरकिनार करना होगा. अतएव हमारा उद्देश्य स्त्रोतों का अध्ययन करते हुए, उसकी सीमओं व अन्य संभावनाओ के विषय में भी चिंतन करना आवश्यक है. प्राचीन भारत में विभिन्न प्रकार के ग्रंथो, साहित्यों, काव्यो आदि की प्रचुरता है परन्तु उसे ऐतिहासिक परिपेक्ष्य में लाने की अपनी समस्याएं है जिन्हें शिरोधार्य करना आवश्यक है. धर्मशास्त्र ऐसे ही ग्रंथो का एक विशाल समूह जो अपने भीतर कई विरोधाभास, व्याख्याएं व समस्याएं लेकर बैठा है. साथ ही हमें रचना के काल क्रम व सामाजिक आर्थिक राजनैतिक सांस्कृतिक व वैचारिक पृष्ठभूमि का भी अध्ययन करना आवश्यक है. और साथ ही मूल ग्रन्थ के साथ उनपर लिखे भाष्य, टीकाओ का अध्ययन करना भी आवश्यक है और जैसा कि कुमकुम रॉय कहती है- भाष्य व टीकाओ के माध्यम से एक सार्वभौमिक, शाश्वत व स्थायी समझे जाने वाले ग्रंथो में भी मतभेद, व्याख्याओ व परिवर्तनों की जगह बनायीं जाती है[1]. एक और बात जो हमें ध्यान में रखने की आवश्यकता है वो ये है कि कोई भी रचना या ग्रन्थ एकांत में जन्म नहीं लेता, वो कुछ गुण अपने पूर्ववर्ती रचनाओ से उद्धृत करता है, एक लेखक की रचना के कई उसकी व्यक्तिगत पृष्ठभूमि, व सामाजिक स्थितियों पर निर्भर करती है. अतएव ये आवश्यक है कि हम रचना के कालक्रमों व लेखको की सामजिक पृष्ठभूमि का संज्ञान अवश्य ले. व किसी भी ग्रन्थ का तुलनात्मक अध्ययन करके विभिन्न ग्रंथो में आये अन्तरो को समझने का प्रयास करे.

भारतीय धर्मशास्त्रो पर जो अधिकतर काम हुआ है, उसका केंद्र बिंदु “मनुस्मृति” रहा है. १९वि सदी से ही, कानूनी व धार्मिक प्रयोजनों में मनुस्मृति का अधिकाधिक प्रयोग हुआ है. ये एक लोकमान्य भ्रान्ति है कि मनुस्मृति एकमात्र प्रभुत्वशाली धर्मशास्त्र है. आज भी अन्य स्मृति ग्रंथो के अध्ययन हेतु आलोचनात्मक व समीक्षात्मक अध्ययनों के तुलनात्मक अध्ययन का अभाव है. तथापि याज्ञवालाक्यस्मृति की पारंपरिक ख्याति के अलावा इसकी टीका “मिताक्षरा” का भी समकालीन विश्व में महत्त्वपूर्ण योगदान है, विशेषकर आधुनिक भारतीय न्याय संहिता में. अतएव इन ग्रंथो का विश्लेषण करना अतीव आवश्यक बन जाता है जिससे हम न केवल प्राचीन भारतीय समाज में नारी के विषय में निहित अवधारणाओ, चिन्ताओ आदि का ज्ञान होता है, अपितु आधुनिक काल में उन चिन्ताओ की अभिव्यक्ति व  पितृसत्तात्मकता के उद्भव बिन्दुओ को पहचानने में भी सहायक होती है.

याज्ञवल्क्यस्मृति के रचना काल को लेकर विचारको में मतभेद है. यद्यपि याज्ञवल्क्य को शुक्ल यजुर्वेद के उद्घोषक के रूप में पारंपरिक मान्यता मिली है तथापि ये रचना वास्तव में कब हुई इसका प्रमाण बहुत साफ़ नहीं है. य.व.स्मृति की ख्याति का बड़ा कारण उसपर लिखी टीकाए, विशेषकर विज्ञानेश्वर रचित “मिताक्षरा” है. इसकी विभिन्न टीकाओ, सूत्रों व अन्य रचनाकारों द्वारा किये गए वर्णन के आधार पर इसका काल क्रम पहली सदी ईसा पूर्व से लेकर तीसरी सदी ईस्वी माना गया. यद्यपि इतिहासकार इसको बाद की स्मृतियों यथा नारद, कात्यायन,बृहस्पति स्मृति के समकक्ष रखते है व इसका अध्ययन इसी परिपेक्ष्य में करते है. हमने भी याज्ञवल्क्यस्मृति का काल क्रम इसी परिपेक्ष्य में रखा है[2].

इतिहासकारों ने सामान्यतः धर्मशास्त्रो पर व विशेष रूप से याज्ञवालाक्य स्मृति का अध्ययन करते हुए विभिन्न मतों का प्रतिपादन किया है. अधिकतर मतों ने नारी के हीन स्थिति को इंगित किया गया है. किस तरह नारी की कामुकता को लेकर एक पितृसत्तात्मक समाज की बेचैनी इन ग्रंथो में परिलक्षित होती है, उसका विवरण इन कार्यो में विचारको ने दिया है, यद्यपि हम देखेंगे कि कुछ विचारक ऐसी व्याख्याओं से सहमत नहीं होते व आधुनिक पश्चिम-केन्द्रित नारीवादी चिंतन को पारंपरिक भारतीय ग्रंथो के अध्ययन में उपयोग किये जाने का विरोध करते है. इन ग्रंथो के अध्ययन द्वारा हम नारीवाद के विभिन्न आयामों का विश्लेषण कर सकते है- विवाह, पारंपरिक अधिकार, सामाजिक ओहदा, आर्थिक स्थिति व अधिकार आदि. इन सभी अनुभागो का विश्लेषण आवश्यक है.

इनमें से अधिकतर लेखको ने स्त्रियों के आर्थिक अधिकारों व “स्त्रीधन” जैसे विषयो पर अपना ध्यान केन्द्रित किया है यद्यपि हम स्त्रियों की सामाजिक दशा का भी चित्रण पाते है. कुमकुम रॉय आरंभिक समाज में स्त्रियों के चित्रण से जुड़े विभिन्न अध्यांनो का विश्लेषण करती है[3]. एक तरफ जहाँ वो ए.एस.अल्टेकर द्वारा वैदिक समाज में स्त्रियों के महिमामंडन व स्त्रियों की दशा के क्रमिक अधोपतन का विवरण देते है, उसे निरस्त करती है. अल्टेकर स्रियों की क्रमिक स्थिति के आधार पर आरंभिक भारत को ४ भागो में विभाजित करते है, जिसमें तीसरा (आरम्भिक स्मृतियों, महाकाव्यों व सूत्रों का काल) व चौथा काल (परवर्ती स्मृतियों व उनपर टीकाओ का काल) हमारे अध्ययन के लिए आवश्यक है. अल्टेकर के अनुसार तीसरे काल के आरम्भ से (५०० ईसा पूर्व से ५०० ईस्वी) आर्य पुरुषो व अनार्य व शुद्र महिलाओ के साथ समागम के कारण स्त्रियों के शिक्षा, भारतीय संस्कृतियों, रीतियों से अनिभिज्ञता के कारण स्त्रियों को कर्मकांडो से अलग किया गया. इसी कारण बाद के धर्मशास्त्रो में ऐसे प्रतिलोम विवाहों पर प्रतिबन्ध लगाया गया”[4]. कुमकुम रॉय अल्टेकर के सिद्धांतो को एक जटिल स्थिति का अति सामान्यीकरण मानती है. उनके अनुसार ऐसे अध्ययनों का कालक्रमिक व स्थानिक दायरा अत्यंत सीमित है. इन अध्ययनों में स्त्री को सामाजिक परिवर्तनों के एक निष्क्रिय तत्त्व के रूप में देखा गया, साथ ही कुछ अनुकूल ऐतिहासिक तथ्यों का चुनाव करके उन्हें विभिन्न ऐतिहासिक स्थितियों में आरोपित कर दिया जाता है[5]. उमा चक्रवर्ती ने इसकी विधिवत आलोचना की है. उमा चक्रवर्ती अल्टेकर के लेख में अन्तर्निहित तीन समस्याओ का वर्णन किया है. पहला- इस लेख में ब्रह्मणिक विचारधारा को परिलक्षित करती है, दूसरा ये ब्राह्मणों द्वारा अभिव्यक्त एक आदर्श आचार संहिता को आधार बनाकर अपना अध्ययन अवस्थित कर रहे है, जो कदाचित समाज की वास्तविकता न होकर आदर्शोंमुलक था; तीसरा प्रस्तुत अध्ययन अपने को महज़ ऊपरी जातियों तक सीमित रखते है व अतएव एक आंशिक इतिहास का ही विवरण देता है[6].

 

संपत्ति वो प्रमुख आयाम है जिस परिपेक्ष्य से याज्ञवल्क्यस्मृति का अध्ययन किया गया है. विजयनाथ ने वैदिक काल से लेकर पांचवी-छठी सदी के बीच स्त्रियों व संपत्ति के बीच संबंध का अध्ययन किया है. उनके अनुसार स्मृतियों व पुरानो के काल आने तक स्त्रियों की स्थिति अधोमुखी हो चली थी व उनका सामाजिक ओहदा शुद्रो के समान था. उनके अनुसार आरंभिक धर्मशास्त्रो में तो स्त्रियों के उत्तराधिकार संबंधी विचारों को हाशिये पर रखा गया था परन्तु कालांतर में स्त्रियों के संपत्ति अधिकार, विशेषकर स्त्री धन पर उनके अधिकार को मान्यता दी गयी है[7]. विजयनाथ  मानती है कि धर्मशास्त्रो के रचना काल में दो परस्पर विरोधाभासी बदलाव आ रहे थे. एक तरफ तो स्त्रियों की चलायमानता व कामुकता पर कड़े पित्त्रसत्तात्मक अंकुश लग रहे थे व स्त्रियों के सामाजिक स्थिति में गिरावट आ रही थी, वही उनकी संपत्ति के अधिकारों में कमोबेश सुधार हो रहा था. विजयनाथ इस परिवर्तन को दो अर्थो में देखति है- एक और तो कृषि के विस्तार व लाभांश में वृद्धि के कारण भूमि की महत्ता बढ़ गयी और साथ ही उसपर पितृसत्तात्मक नियंत्रण भी जिससे स्त्रियों के सामाजिक सरोकार पीछे छूट गए. वही दूसरी तरफ हमें इस काल में ये भी देखने को मिलता है कि स्त्रियों द्वारा बौद्ध, जैन जैसे मतों को दान के सबूत अधिकाधिक मिलते है. विजयनाथ का मत है कि अपने खोये हुए दान व सरंक्षण को वापस पाने की छह में स्त्रियों को कुछ संपत्ति में अधिकार प्रदान हुए[8].

रोमिला थापर के अनुसार जब तक बाद के धर्मशास्त्र लिखे गए, तब तक स्त्री की स्थिति में एक विरोधाभास उत्पन्न हो गया था. इन ग्रंथो में नारी की एक आदर्श छवि प्रस्तुत की परन्तु वास्तव में उस छवि पर खरे उतर्ने हेतु स्त्री को दबा कर रखा गया. यद्यपि शिक्षा का सीमित अधिकार कुछ उच्च जातियों की स्त्रियों को प्राप्त था तथापि उन्हें ये ज्ञान सार्वजनिक जीवन में उपयोग करने का अवसर नहीं मिला. इस समय के धर्मशास्त्रो में, यहाँ याज्ञवल्क्य, नारद, बृहस्पति स्मृति आदि में जिन विचारो को प्रतिपादित किया गया, भूमि स्वामित्व व जमींदार वर्गों में उसकी आभ्यासिक परिणिति भी हुई.परन्तु वो ये भी कहती है कि ये धर्मशास्त्र अपने विचारों में किसी भी प्रकार से सम नहीं  थे. याज्ञवल्क्य नारद कात्यायन व बृहस्पति, यद्यपि इनमे से कोई भी स्त्री के प्रति उदारवादी रुख अख्तियार नहीं करता था तथापि इनमे निहित कट्टरता की सीमाएं भिन्न थी[9].

वेंडी डोंगिएर यद्यपि स्वीकार करती है कि धर्मशास्त्र स्त्रियों के प्रति पक्षपाती रहा है तथापि वो ये भी कहती है कि विभिन्न धर्मशास्त्र विभिन्न कालक्रम व विभिन्न स्थितियों में परस्पर विरोधाभासी बातें कहते आये है. उनके अनुसार, स्त्री सबसे बुरी लत नहीं मानी जाती थी वरन ये एक ऐसी श्रेणी  थी जो लगभग सार्वभौमिक थी. ये ग्रन्थ स्त्री विरोधी तत्वों के अग्रणी दूत थे तथापि इन ग्रंथो को अक्षरशः नहीं पढना चाहिए. डोंगिएर कहती है कि इन ग्रंथो में निहित सैधांतिक मूल्यों व वास्तविक सामाजिक स्थिति में काफी गहरे गर्त है. बौद्ध अभिलेखों के अध्ययन से हम स्त्रियों की एक अन्य छवि का प्रतिपादन कर सकते है[10].

चंद्रकला पाडिया इन सभी नकारात्मक छवियो का खंडन करती है. अपनी पुस्तक की भूमिका में ही वो अपने उद्देश्य साफ़ कर देती है. उनके अनुसार भारतीय ग्रंथो का अध्ययन पश्चिमी शिक्षा प्रणाली में अभ्यस्त नारीवादी विचारको व पश्चिम से प्रेरित उपागमो से किया जाता है जो भारतीय ग्रंथो की नैसर्गिक गुणों का नत कर देती है. उनके अनुसार भारतीय प्राचीन ग्रंथो के अध्ययन हेतु एक भारतीय उपागम की आवश्यकता है जो पश्चिमी पूर्वाग्रहों से ग्रसित न हो. दूसरी समस्या जिसकी वो आलोचना करती है वो है आधुनिक नारीवादी विचारको द्वारा स्त्री के दुर्दशा के चित्रण पर अत्यधिक बल देना व प्राचीन ग्रंथो से बिना परिपेक्ष्य जाने नारी विरोधी श्लोको आदि को अपने अध्ययन हेतु उपयोग करना. अपनी सम्पादित पुस्तक “वीमेन इन धर्मशास्त्र” की भूमिका में वो इन सभी उद्देश्यों को रेखांकित करती है- १.पश्चिमी उपागमो के नारीवादी इतिहास में पुर्वग्राहित प्रयोग की समालोचना, २. धर्मशास्त्रों में महिलाओ की बेहतर स्थिति का चित्रण आदि. इसी परिपेक्ष्य में वो याज्ञवल्क्य स्मृति के उन बिन्दुओ को उधृत करती है जिसमे नारियों को संपत्ति में प्रचुर व लगभग स्वतंत्र संपत्ति अधिकारों का वर्णन किया गया है[11]. परन्तु उनके अध्ययन में हमें विरोधाभास नज़र आता है. पहले तो जिस बिंदु की वो आलोचना करती है वही गलती खुद भी दोहराती है- अपने अध्ययन के अनुकूल श्लोको को बिना परिपेक्ष्य जाने उद्धृत करना. दूसरा, भूमिका में वे धर्मशास्त्रो को महिमामंडित करती नज़र आती है व पुस्तक के अन्य लेखो की व्याख्या भी इसी तरह करती है. परन्तु पुस्तक के कसी लेखो से ये ज्ञात होता है कि सभी विचारको का उक्त विचारो के साथ सामंजस्य नहीं है.

 

 

इतिहासकारों के विचारो को जानने के पश्चात ये आवश्यक है कि मूल ग्रन्थ के तत्वों का भी संज्ञान लिया जाए. यहाँ हम प्रयास करेंगे यज्ञवालक्य स्मृति के श्लोको को ऐतिहासिक परिपेक्ष्य में देखने की व ये जानने की कि कैसे इस ग्रन्थ को हम लैंगिक इतिहास के निर्माण हेतु प्रयोग में ला सकते है.

याज्ञ वालक्य के पहले अध्याय का तीसरा प्रकरण है “विवाह प्रकरणं”. इस अध्याय में एक स्नातक (जिसने अपनी शिक्षा पूर्ण कर ली हो) के ब्रह्मचर्य से गृहस्थ आश्रम में जाने के निर्देश निहित है. यहाँ एक बात ध्यान देने की आवश्यकता ये है कि ये प्रकरण पुरुष के परिपेक्ष्य से लिखा गया है. पुरुषो को किस तरह ब्रह्मचर्य व्रता का पालन करना चाहिए, शिक्षा पर्यंत कैसे गृहस्थ धर्म में प्रवेश करना चाहिए, किस तरह उपयुक्त कन्या का चुनाव करना चाहिए आदि आदि. यहाँ स्त्रियों की भूमिका, उनकी शिक्षा के प्रकरण आदि को नज़रंदाज़ किया गया है. इसे बड़े स्तर पर देखे तो एहसास होता है कि समस्त पुरुषार्थ, एवं भौतिक व अध्यात्मिक साधनों की प्राप्ति का अधिकार पुरुषो के निमित्त रखा गया है. स्त्रियाँ या तो इस प्रक्रिया से नज़र नही आती और यदि नज़र आती है तो “सहधर्मचारिणी” के रूप में, जहाँ उनका ध्येय “पुरुषो को मोक्ष प्राप्ति में सहयोग करना है”

य.व.स्मृति (१:५२) में कहा गया है-

“अविप्लुतब्रह्मचर्यो लक्षणयां स्त्रिय मुद्वहेत

अनन्यपूर्विकाम कान्तामसपिंडाम यवीयसिम”[12]

जिसका अर्थ है कि एक ब्रह्मचारी युवक को ऐसी स्त्री से विवाह करे जो पहले किसी और पुरुष को ‘दान’ में नहीं दी गयी हो, जो अन्य किसी अन्य पुरुष द्वारा नहीं ‘भोगी’ गयी हो, असपिंड तथा आयु एवं कद में युवक से छोटी हो आदि.

इस श्लोक से कई विचारो का स्पंदन होताहै. “अविप्लुतब्रह्मचर्य” से अभिप्राय ब्रह्मचर्य के भंग होने से है. यहाँ आपको दिखता है कि कामुकता पर नियंत्रण का दबाव न केवल स्त्रियों अपितु पुरुषो पर भी लागू होता है विशेषकर उनके ब्रह्मचर्य अवस्था में. तो याज्ञ वलक्य ब्रह्मचर्य अवस्था में ही ब्रह्मचर्य के भंग होने पर प्रायश्चित का प्रावधान रखा है. इन प्रायश्चितो का विवरण आपको प्रायश्चित अध्याय में मिलता है. यहाँ प्रयुक्त शब्दावली को देखे तो हमें स्त्री के विषय में समाज में प्रचलित मनोदशाओ का भी पता चलता है. स्त्री को दान देना शास्त्रों के उस परिपेक्ष्य का द्योतक है जिसमे स्त्री को पति की “निजी संपत्ति” समझा जाता है. धर्मशास्त्र जब विवाह के प्रकारों की चर्चा करते है जो देव विवाह को सर्वोपरि मानते है, जिसमे कन्या को यज्ञ के लिए आये ऋत्विक को दान में दिया जाये. साथ ही कन्यादान की पूरी रस्म ही इस पूर्वाग्रहों की परिचायक है. “भोग” शब्द स्त्री के रति गुण को इंगित करती है. धर्मशास्त्रों में स्त्री की मर्यादा व कौमार्यता पर अत्यधिक बल देते है. इससे दो बाते समझ में आती है- १. स्त्री भोग की वस्तु समझी जाती है, २. कौमार्यता स्त्री का सबसे विशिष्ट गुण है.

या.व. (३:२५९) कहती है कि “गुरुपत्नी के साथ सम्भोग करने वाले पुरुष को टेप हुए लोहे की शय्या पर टेप हुए लोहे से बनी स्त्री के साथ शयन करे अथवा लिंग्साहित अन्डकोशो को काटकर हाथ में लेकर दक्षिण पश्चिम दिशा में अपने प्राण त्याग देने से व्यक्ति शुद्ध हो जाता है”[13].  हम नहीं जानते कि वास्तविक जीवन में ऐसे कठोर पालन होता था अथवा नहीं. बहुत सम्भावना है कि ये ग्रन्थ एक आचार संहिता के रूप में कार्य करता था. यद्यपि इसका अक्षरशः पालन न होता हो, परन्तु इसकी सैद्धैन्तिक सत्ता व सार्वभौमिकता को काफी हद तक स्वीकारा जाता था इसमें लेश मात्र भी संदेह नहीं. इस प्रकरण से दो बाते और निकल कर आती है. पहली तो ये कि मृत्युदंड का प्रावधान दर्शाता है कि समाज व स्मृतिकारो में कामुकता एक बड़ा विकट प्रश्न था. कामुकता को नियंत्रित करना  स्मृतिकारो का प्रमुख ध्येय प्रतीत होता है, और मानव जीवन को आचार संहिताओ से पाटना इसी बेचैनी की अभिव्यक्ति है. दूसरी बात ये कि इन ग्रंथो में एक अन्तर्निहित विरोधाभास झलकता है, एक संघर्ष है सैधांतिक अवधारणाओ व व्यवहारिक वास्तविकताओ के बीच. एक तो ऐसे नियमो का बनना दर्शाता है कि ऐसे क्रियाकलाप सामाजिक जीवन का हिस्सा थे. एक ऐसी वास्तविकता जिसका दमन स्मृतिकार करना चाहते थे, परन्तु साथ ही मृत्यु दंड का प्रावधान जटिल सामाजिक वास्तविकताओ का संज्ञान नहीं लेता. अपितु इस प्रकरण का अगला ही श्लोक पिछले श्लोक से विरोधाभासी बात सुझाता है.

“प्राजापत्यम चरेत्कृछम समा वा गुरुतल्पगः

चान्द्रायणं वा त्रिन्मासानभ्यसेद्वेदसंहिताम”[14]

अर्थात  गुरुपत्नी के साथ सम्भोग करने वाले व्यक्ति को ३ वर्षो तक प्राजापत्य कृच्छ व्रत का आचरण करे अथवा तीन मॉस तक वेड संहिता का जप करते हुए चान्द्रायण व्रत का आचरण करे.

मृत्यु दंड का व्रत अनुष्ठान में परिवर्तित हो जाना कहीं न कहीं सामाजिक वास्तविकताओ से साक्षात्कार करना था विशेषकर ब्राह्मण वर्ग को पोषित करने वाले गृहस्थ को सामाजिक व आर्थिक रूप से सशक्त बनाये रखना भी उतना ही आवश्यक था.

. याज्ञवल्क्य (१:५६-५७) में कहा गया है कि

“यदुच्यते द्विजतिनाम शुद्राछारोप संग्रहः

नैतन्मम मतं यस्मात्तत्रायम जायते स्वयं

तस्त्रोवर्णानुपूव्य्रेन द्वे तथैका यथाक्रमम

ब्राह्मणक्षत्रियाविशाम भार्या स्वा शुद्रजन्मन”[15]

“पहले के स्मृतिकारो ने द्विजातियो व शुद्रो के बीच स्त्री ग्रहण की जो बात कही गयी है वो  (मुझे) मान्य नहीं है”. यहाँ ये बात स्पष्ट करनी आवश्यक है कि मनुस्मृति यद्यपि शुद्र पत्नी के साथ संबंधो की नैतिक रूप से अवहेलना करते है (३:14-१५), तथापि वो स्वीकार करते है कि ब्राह्मण शुद्र पत्नी ग्रहण कर सकते है (३:३). अतएव याज्ञवल्क्य स्मृति के इस निषेध को अन्य स्मृतियों में निहित नियम आदि से जोड़कर देखना आवश्यक है क्यूंकि कोई भी ग्रन्थ एकाकी नहीं होता है. ये अपने पूर्ववर्ती ग्रंथो से प्रेरणा लेते है और अपने परवर्ती ग्रंथो को प्रेरणा देते है. यहाँ ये बात ध्यान देने योग्य है कि जहां मनुस्मृति में स्त्री के विवाह के निषिद्ध हेतु दस परिमाण दिए है- रोगी, कम या अधिक अंग वाली, रोमहीन, अधिक रोम वाली, भूरे नेत्र वाली, अंगहीन आदि अदि परंतु याज्ञवल्क्य स्मृति तीन परिमाण देते है- रोगिणी, स्व-गोत्र व स्व-परिवार में विवाह निषेध. ये वेंडी डोंगिएर के उस विचार को सार्थक करती है कि यद्यपि ये सभी ग्रन्थ एक पित्त्रसत्तात्मक सत्ता का प्रतिनिधत्व करती है तथापि स्त्रियों के अधिकारों व नियंत्रण के परिपेक्ष्य में सबकी सीमाएं व परिमाण भिन्न है, व कई बार विरोधाभासी भी.

उसके अगले ही श्लोक में वो व्यक्त करते है कि ऐसी कन्या से विवाह करे जिनके कुल में पुरुष दस पीढ़ियों तक वेदाध्ययन में प्रवीण हो[16]. न केवल ये श्लोक एक बेहद आदर्शोंन्मुलक विचार प्रस्तुत करते है, साथ ही ये बात भी साबित करते है कि वेदाध्ययन पुरुषो का ध्येय समझा जाता है. प्रस्तुत नियमो में सदैव किसी तार्किकता की अपेक्षा नहीं की जा सकती व कई बार ऐसा प्रतीत होता है कि कुछ सूत्रों की प्रेरणा सामाजिक परिपेक्ष्य न होकर व्यक्तिगत पूर्वाग्रह थे. साथ ही इन श्लोको से ये भी ज्ञात होता है कि विवाह के प्रसंग में कन्या ही नहीं, अपितु उसके परिवार के लिए मापदंड तय थे. फलस्वरूप स्त्री को कामुकता पर और अधिक बंधन लगते होंगे. एक तरफ विवाह से पूर्व स्त्री की कामुकता व आचार व्यवहार पर नियंत्रण रखा जाता था ताकि स्त्री की कामुकता के कारण उसके विवाह में कोई संकट न आये. फलस्वरूप आरम्भ से ही स्त्री को एक ख़ास तरीके से पली बढ़ी जाती है जो वास्तव में उसके विवाहोत्तर व्यवहार की तैयारी की तरह देखा जाता है. स्त्री का पहनावा, आचरण, भाषा, श्रृंगार सभी एक पितृसत्तात्मक समाज की आवश्यकता की पूर्ति का ही व्यवस्थित  ढांचा है. ये आवश्यकता पिता पक्ष की नहीं पति पक्ष की है, और गौर करने वाली बात ये भी है कि ये भूमिकाये स्थायी नहीं है. एक वधू पक्ष का व्यक्ति जब किसी दूसरे  समय में वर पक्ष का भाग होता है तो उसकी आवश्यकताएं भी अपने पितृसत्तात्मक वंश की तृप्ति हेतु कुछ वैसी ही होती है, जैसी वधू पक्ष के समय उसने पूरी की थी. तो स्त्रियों पर दोनों पक्षों से दबाव होता है, अपनी कामुकता को नियंत्रित करने का. वो शक्ति व सत्ता के टकराव की भुक्तभोगी दिखती है.

पिता पितामहो भ्राता सकुल्यो जननी तथा

कन्याप्रदः पूर्वनाशे प्रकृतिस्थः परः परः

अप्रयच्छन्समाप्नोति भ्रूणहत्यामृतावृत्तो

गम्यम त्वभावे दात्रणाम कन्या कुर्यात्स्वयम वरं[17]

प्रस्तुत श्लोक को यद्यपि स्त्री के अनुकूल बताकर व्याख्या का प्रयास किया गया है परन्तु ध्यान से देखने पर प्रतीत होता है कि वास्तव में स्त्री के अधिकार जैसी समझ में आने वाले तथ्य, स्त्री को मिलने वाली छूट भी एक पितृसत्तात्मक आवश्यकता की पूर्ति का निमित्त मात्र है. पिता पितामह, भाई के आभाव में कुल का कोई व्यक्ति अथवा माँ भी कन्यादान की अधिकारी है. उचित समय पर कन्या का विवाह न करने वालो को भ्रूण हत्या का पाप लगता है.  व यदि पिता पक्ष विवाह योग्य आयु में योग्य वर ढूँढने में असमर्थ हो तो कन्या अपने लिए वर स्वयं खोज सकती है.

यदि ध्यान से देखे तो कुछ बाते समझ में आती है. यद्यपि उक्त श्लोक स्त्री को विषम परिस्थिति में अपना पति चुनने का अधिकार देता है अथवा उसे कन्यादान का अधिकारी बनाता है. पहले तो, कन्यादान के अधिकार की भी एक अवरोही क्रम देखते है. जहाँ पिता, दादा व भाई (सभी पुरुष )सबसे पहले आते है और यहाँ तक कि विषम परिस्थितियों  मे भी कुल के किसी व्यक्ति (सामान्यतः पुरुष) को कन्या की माँ  से पहले वरीयता दी गयी है. ऐसे ही, यद्यपि कन्या को अपना वर चुनने का अधिकार प्रदान किया गया है परन्तु इस अधिकार का उद्देश्य भी इसी श्लोक में निहित है- स्त्री की प्रजनन शक्ति का उचित इस्तेमाल. एक पितृसत्तात्मक समाज स्त्री की प्रजनन क्षमता एक वंश की वृद्धि का आधार है. अतएव कन्या द्वारा सही समय पर विवाह न करना अपनी प्रजनन शक्तियों को व्यर्थ करना है, जिसको भ्रूण हत्या के सामान बताया गया है. तो कन्या द्वारा अपने वर का चुनाव करना वास्तव में पितृसत्तात्मक समाज की आवश्यकताओ का निमित्त बनना है. इससे एक बात और पता चलती है, वो ये कि कन्यादान व प्रजनन का महिमामंडन, दोनों अपनी प्रकृति से ही पुरुष प्रधान समाज का द्योतक है. जब स्त्री को इन मूल्यों की परिधि में लाया गया है तो आप स्त्री के माध्यम से पितृसत्तात्मक विचारो की परिणिति करते हो. इस तरह आप एक तरफ तो स्त्रियों को पितृ सत्ता में कुछ अधिकार प्रदान करते हो वही दूसरी तरफ स्त्रियाँ धीरे धीरे इन पितृ सत्तात्मक मूल्यों को आत्मसात भी करती है.

आगामी श्लोको में स्त्रियों के आचरण सम्बन्धी कुछ नियमो का ज्ञान होता है. याज्ञवल्क्य स्मृति कहती है कि यदि स्त्री पर पुरुष समागम की अपराधी हो तो उसे गंदे वस्त्र दिए जाए, भोजन में केवल एक कौर दिया जाए, एवं भूमि पर सोने को बाध्य किया जाए. साथ ही विषम परिस्थितियों के अलावा स्त्री द्वारा गर्भपात करने पर स्त्री को महापाप लगेगा भ्रूण की हत्या का भी व पति हत्या के समकक्ष पाप भी[18]. यद्यपि ये सूत्र कदाचित किसी भी प्रकार के अनिष्ट से बचने के लिया था, न केवल अनिष्ट की पूरी परिभाषा पुरुष प्रधान समाज की देन है, अपितु पर पुरुष समागम होने व गर्भपात होने, दोनों ही अवसरों में पाप का सारा ठीकरा स्त्री के हिस्से आता है. इससे एक बड़ा प्रश्न खड़ा होता है. क्या गर्भपात का निर्णय स्त्री की इच्छा से तय होता है, या इसमें पुरुष वर्ग एक अहम भूमिका अदा करते है (कई मामलो में पुरुष ही गर्भ पात का निर्णय लेते है एवं उस निर्णय को स्त्रियों पर थोपा जाता है). ऐसे में इसका श्रेय स्त्रियों को देकर उनके लिए दंड का विधान करना कहाँ तक सार्थक है? एक और बात प्रस्तुत ग्रन्थ गर्भपात के दो कारणों को स्वीकार करती है (वास्तव में दोनों कारण जुड़े हुए प्रतीत होते है). ये दो कारण है- पर पुरुष से हुए गर्भ धारण की स्थिति में एवं प्रायश्चित की स्थिति में. यहाँ हमें ये समझ में आता है कि चूँकि आरंभिक समाज में (वास्तव में किसी भी समाज में) ये तय करना अत्यंत कठिन है कि बच्चे का पिता कौन है (मातृत्व एक सत्य है, पितृत्व महज़ एक सम्भावना). अतएव वंश की शुद्धता तय करने हेतु स्त्री के कामुक आचरण व पुरुषो के साथ उनके सम्बन्ध को नियंत्रित करना अत्यंत आवश्यक बन जाता है. फलस्वरूप हमें धर्मशास्त्रो में ऐसे विधान देखने को मिलते है. साथ ही गर्भ पात को पति की हत्या के समकक्ष मानना संतान पर पिता के वर्चस्व व अधिकार के स्तर को दर्शाती है. याज्ञवल्क्य प्रायश्चित प्रकरण में गर्भ पात के लिए स्त्री को त्यागने का विधान तय किया गया है.

यहाँ से हम दूसरे प्रकरण के एक बेहद उपयोगी प्रकरण “दायभाग” की और चलते है जो स्त्री के संपत्ति अधिकारों पर चर्चा करता है. इस पर याज्ञ वल्क्य पर विज्नेश्वर की टीका “मिताक्षर” ने विस्तार से चर्चा की है व हमारे आधुनिक हिन्दू संपत्ति कानूनों का आधार मिताक्षर ही है जिससे इसकी उपयोगिता और अधिक बढ़ जाती है. यहाँ आपको स्त्री के संपत्ति के कुछ अनुकूल व तुलनात्मक रूप से उदारवादी नियम देखने को मिलते है.

यदि कुर्यत्समनम्शान पत्नयः कार्यः समान्शिकः

न दत्तं स्त्रीधनं यासां भत्रा व श्वशुरेण वा [19]

उक्त श्लोक में उन पत्नियों हेतु संपत्ति में हिस्से का प्रावधान किया गया है जिन्हें अपने पति अथवा ससुर से स्त्रीधन प्राप्त नहीं हुआ है. यहाँ एक बात देखने योग्य ये है कि इससे पिछले श्लोक में संपत्ति के बंटवारे के प्रश्न पर सभी पुत्रो के बीच संपत्ति के बंटवारे की बात की गयी है. इस प्रकरण में कहीं भी पुत्री के संपत्ति में हिस्से की बात नहीं गयी है, परन्तु स्त्रीधन के विवरण से ये लगता है कि स्मृतिकार कदाचित स्त्रीधन को ही पुत्री के संपत्ति का अंश मानते थे अतएव हमें इसके लिए अलग प्रावधान देखने को नहीं मिलते. यद्यपि हमें जिक्र मिलता है कि संपत्ति के बंटवारे के बाद प्रमुख भाई का कर्त्तव्य है भाइयो के उपनयन आदि का प्रबंध व बहनों के विवाह का प्रबंध करना. इस कार्य हेतु सभी भाइयो के हिस्से से एक चौथाई धन के व्यय का प्रावधान है. इसीलिए बार बार स्त्रीधन से वंचित स्त्रियों के संपत्ति अधिकारों की बात की गयी है. यहाँ तक कि पिता की मृत्यु के पश्चात यदि पुत्रो में संपत्ति का बंटवारा हो तो स्त्रीधन वंचित माँ भी संपत्ति में पुत्र सदृश अंश की अधिकारी है[20]. साथ ही विवाह के प्रकार, संतान उत्पत्ति का आधार व पत्नी के वर्ण को आधार रखकर भी स्मृति में संपत्ति का बंटवारा किया गया है. तो ब्राह्मण पत्नी से उत्पन्न अपेक्षाकृत अधिक भाग का अधिकारी है, तत्पश्चात क्षत्रिय, फिर वैश्य व फिर शुद्र. नियोग से उत्पन्न पुत्र को दोनों जनको की संपत्ति में अधिकार मिलता है, साथ ही जिस व्यक्ति की केवल कन्या हो उस स्थिति में पुत्री के पुत्र को औरस पुत्र के रूप में संपत्ति में अधिकार मिलता है. साथ ही दासी से उत्पन्न पुत्र भी संपत्ति में अंश्ग्रही होता है. वो संपत्ति का आधा हिस्सेदार अथवा अन्य पुत्रो के अभाव में सम्पति का पूर्ण अधिकारी होता है[21].

यहाँ हमें ज्ञात होता है कि वस्तुतः संपत्ति अधिकारों का मुख्या ध्येय पुरुषो के लिए नियत है परन्तु स्त्रियों को पुरुष प्रधान समाज के भीतर प्रतिनिधत्व प्राप्त हुआ है जो कि अन्य धर्मशास्त्रो व धर्मशास्त्रो के अन्य नियमो की तुलना में अपेक्षाकृत उदार है. प्रकरण के अंत में जाकर यद्य्यापी संपत्ति में भी नैतिकता का प्रश्न आता है. जहां पुत्र रहित सदाचारिणी स्त्रियों के भरण पोषण व व्यभिचारिणी स्त्री के निष्कासन का प्रावधान है[22]. यहाँ प्रश्न ये उठता है यदि इन नियमो के पालन करने की कोई व्यवस्था होती तो इस बात को कौन तय करता कि कौनसी स्त्री का चरित्र कैसा है और कैसे इन नियमो के दुरूपयोग को नियंत्रित किया जाता. ऐसे नैतिक प्रश्न इन नियमो की वास्तविक उपयोगिता पर प्रश्न चिन्ह लगाते है.

श्लोक १४३-१४८ स्त्री धन की चर्चा करते है. स्त्रीधन में माता पिता, बंधू बंधवो व पति से अर्जित आधिवेदनिक (दूसरी शादी के समय की क्षतिपूर्ति आदि सम्मिलित है. इससे ये भी पता चलता है कि स्मृतिकारो की नज़र में स्त्रियाँ सामान्यतः धन स्वयं अर्जित नहीं करती थी अपितु उन्हें उपहार स्वरुप प्राप्त करती थी. अतएव इसमें स्त्री द्वारा अर्जित धन का कोई जिक्र नहीं है. तथापि पहली बार प्रकरण मेये उल्लेख आता है कि सभी आठो प्रकार के विवाहों में यदी स्त्री की कन्या हो तो स्त्रीधन की उत्तराधिकारी वो होंगी. अन्य अवसर पर पति अथवा पिता (असुर, राक्षस, गन्धर्व विवाहों के परिपेक्ष्य में). साथ ही दूसरे विवाह से पूर्व विवाह के व्यय के बराबर का धन पहलिपत्नी को प्रदान करे. स्त्रीधन प्राप्त पहली पत्नी को व्यय का आधा हिस्सा प्रदान करने का विधान है[23]. यहाँ इन विधानों से ये तो ज्ञात होता है कि स्त्रियों को संपत्ति में प्रतिनिधत्व मिला है, पर साथ ही ये भी प्रतीत होता है कि इसमें स्त्रियों की प्रत्यक्षा भूमिका सीमित है. अधिकतर मामलो में स्त्री केवल प्राप्तकर्ता है. हमारे पास ये जानने का कदाचित साधन नहीं है कि स्त्रियाँ स्वयं इन नियमो में कितना हस्तक्षेप करती थी अथवा इन नियमो के आभ्यासिक प्रतिपादन में स्त्रियों की क्या भूमिका थी.

अपने निष्कर्ष में हम कुछ बिन्दुओ पर चर्चा करना चाहेंगे जिनमे से कुछ शायद हमारे अध्ययन की सीमओं का विस्तार करे. हमारी चर्चा से कई बाते परिलक्षित होती है. पहली ये कि  धर्मशास्त्रो में समाज को एक विशेष नियम आचरण से बाँधने का प्रयास किया गया जिसमे स्त्री की कामुकता को एक विनाशकारी तत्त्व अथवा स्थिरता में व्यवधान के रूप में देखा जाता रहा. अतएव स्मृतिकारो का प्रमुख ध्येय स्त्रियों को निमित्त बनाकर उन्हें आचारणबद्ध करने का प्रयास किया जो कि पित्त्रसत्तात्मक मूल्यों के अनुकूल हो.परन्तु हमें ये बात भी ध्यान में रखनी चाहिए कि याज्ञवल्क्य के गृहस्थधर्म व स्नातक धर्म प्रकरण आदिमे पुरुषो के लिए कड़े नियमो व आदर्शोंन्मुलक व अविश्वसनीय का विधान है. कहने का अभिप्राय ये कि यद्यपि हमारा अध्ययन लैंगिक असमानता का विश्लेषण करता  हो तथापि इसके समग्र अध्ययन हेतु हमें स्त्री पुरुष की परिपाटी से हटकर शक्ति विभाजन की प्रक्र्रिया व सरंचना का अध्ययन आवश्यक है. और इसका विश्लेषण करने पर हमें ज्ञात होता है कि कहीं न कहीं पितृसत्तात्मकता एक ढांचा है, एक ऐसा ढांचा जो इतने गहरे से हमारे अवचेतन में घर कर गया है कि जाने अनजाने हम सब उस सरंचना के अनुसार खुद को ढाल रहे है और अपना आचरण निर्धारित कर रहे है. ये एक ऐसी सरंचना जिसने समस्त समाज को एक विशिष्ट पहचान और आचार व्यवहार प्रदान किया है. हमारी पूरी अस्मिता, हमारी पहचान, हमारे आचरण कहीं न कहीं उस पितृ सत्तात्मक सरंचना को सार्थक करने का काम कर रहे है, हम सब उस सरंचना के दास है. इस सरंचना में हम ही शोषक भी है और हम ही शोषित भी. इन ग्रंथो को केवल पढना आवश्यक है, इनके पीछे की मनोदशा को समझना भी आवश्यक है. विभिन्न समूहों में इस पितृ सत्तात्मक सरंचना में वर्चस्व की लड़ाई व स्त्रियों की इस सरंचना में अपने अस्मिता की लड़ाई, इन सभी बातो के अध्ययन से विभिन्न धर्मशास्त्रो के बीच व एक धर्मशास्त्रों के बीच भी विरोधाभास उत्पन्न होता है. इस विरोधाभास का भी लैंगिक संबंधो की जटिलता को समझने में बहुत महत्व है. इन ग्रंथो को अक्षरशः लेने के स्थान पर इनके सामाजिक आधार व उपयोगिता व इन विरोधाभासो का एक साथ अध्ययन करना आवश्यक है.

 

Bibliography

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[10] वेंडी डोंगिएर- “हिन्दू: एन अल्टरनेटिव हिस्ट्री”

[11] चंद्रकला पाडिया- “इंट्रोडक्शन “ इन “वीमेन इन धर्मशास्त्र”

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[13] याज्ञवल्क्यस्मृति (३:२५९)

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[16] याज्ञवल्क्यस्मृति  (१:५४)

[17] ibid (१:६४)

[18] याज्ञवल्क्य (१:६८-७०)

[19] ibid (२:११५)

[20] याज्ञवल्क्य स्मृति (२:१२३-२४)

[21] ibid (२:१२६-१३६)

[22] ibid (२:१४२)

[23] ibid (२:१४३-१४८)

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