-कुमार प्रभात 

दिन भर रोज़गार के सिलसिले में भागदौड़ तो करता ही हूँ…अब सोच रहा हूँ कि तुम्हारे घर में “बाई” की नौकरी शुरू कर दूँ…सुबह जब तुम ग्यारह बजे हंसती-चहकती-मुस्कुराती-खेलती मिलती हो मैं इस कल्पना में डूब जाता हूँ कि नींद के बोझ तले, आधी खुली पलकों के संग जब तुम जबरदस्ती सुबह जगती होगी तो तुम्हारे बिखरे बाल, जीवन के व्यवस्थित होने से ज्यादा खुबसूरत लगते होंगें…उस वक़्त का तुम्हारा चेहरा किसी जीवन दर्शन से कम नहीं लगता होगा…’बाई’ रहूँगा तो हर सुबह, ठीक उसी वक़्त चाय के एक कप के साथ रोज़ तुमसे मिलूँगा और तुमसे कहूँगा- “दीदी, चीनी डालना भूल गया था, आप बहुत मीठी हैं…जितनी मीठी चाय चाहिए, खुद को घोल के पी लीजिये…” फिर ये भी तो होगा, तुम्हारे घर में झाड़ू लगाते समय ऐसा लगेगा कि किसी मंदिर को साफ़ कर रहा हूँ…घर के जाले हटाते समय महसूस होगा कि जीवन के कुछ उलझे हुए गिरहों को खोल रहा हूँ…खिड़कियो के परदे खींचते समय विशेष ध्यान रखूँगा कि निगोड़ी सूरज की किरणें सीधे आपके सुर्ख गालों पे न पड़ जाए…विटामिन d अब किरणों में कम और हानिकारक तत्व ज्यादा हो गए हैं…

आपको देख कर कोई कह रहा था कि आप मोटी हो रही हैं…मैं बाई रहूँगा तो विशेष ध्यान रखूँगा कि आप क्या खाएं और क्या न खाएं…इसलिए नहीं कि मुझे आपके मोटापे से समस्या है बल्कि इसलिए कि वो साला जब आपकी तुलना किसी और से करता है तो आतंकवादी बन कर उस पर बम फोड़ देने का मन करता है…अभी इन दिनों बाई बनने का एक और फायदा है कि मैं एटीएम की पंक्ति में लग लूँगा और पैसे आपके निकाल लाया करूँगा, इस काम की मैं सैलरी नहीं लूँगा…

बाई रहूँगा तो कभी-कभी आप मुझे डांटेंगी भी…जैसे मेरी माँ मुझे डांटती है…तो एक पल के लिए ही सही, आपके बच्चे की तरह मैं बन जाऊँगा, और किसी का बच्चा होना तो न टूटने वाली जोड़ का बनना होता है…खाली समय में आप अगल-बगल के लोगों की चुगली भी करेंगीं और मैं आपकी गॉसिप पार्टनर बन जाऊँगा और एक लड़की के लिए गॉसिप पार्टनर लाईफ पार्टनर से कम थोड़ी न होता है…जब कभी लगेगा कि इस दुनिया में मेरा कुछ है ही नहीं, न दौलत, न शोहरत तो मैं आपको डांट दिया करूँगा…कुछ भी बहाना बना कर…ताकि उन कुछ लम्हों के लिए मुझे एहसास हो सके कि आप मेरी जागीर हैं…आप मेरे हैं…

बस दो चीज़ तय करनी है…इस नौकरी में मुझे छुट्टी कभी नहीं चाहिए…आप जब घर पे न रहें तब भी मुझे आने की आज्ञां हों ताकि आपको हर दिन मैं महसूस कर सकूँ…आपके बिना आपके घर की दीवारों से पूछ सकूँ कि आपके बिना उन्हें कैसे लगता है…उन दीवारों से कह सकूँ कि उनके बिना मुझे कैसे लगता है…और एक और बात. मेरी सैलरी…आप अक्सर अपना मोबाइल पटक कर तोड़ देती हैं….तो जब-जब आपके घर से आपको मोबाइल खरीदने के लिए आपकी माँ पैसे भेजें तो उसी में से कुछ पैसे मुझे दे दीजियेगा…उन पैसों को मैं खर्च नहीं करूँगा, जमा करूँगा ताकि एक दिन जब आप गुस्से में अपना मोबाइल तोड़ें तो मैं आपको नया मोबाइल ला कर दे सकूँ…थोडा महंगा वाला…अपनी हैसियत से ज्यादा वाला…!!!

Advertisements