मैं सिर्फ एक शरीर नहीं

ये बात जान लो,

मुझमें बसी है एक रूह

उसे पहचान लो।

 

तुम्हारी गन्दी नज़र ने है ऐसा जकड़ा,

की बस देखा और जला गए।

नहीं हूँ मैं मांस का कोई टुकडा,

जिसे तुमने नोचा और खा गए।

 

मेरे जिस्म पर लिपटी साड़ी को

मेरी कमज़ोरी ना समझना,

मेरे मुलायम शरीर को

मेरी बदकिस्मती ना समझना।

तुम जब आते हो अपने दोस्तों के साथ

और हटा देते हो मेरी लाज के कपड़े,

तो तुम्हें क्या लगा,

तुमने मेरी आत्मा को नंगा कर दिया?

तुमने मेरे बदन पर जो किये वार,

तो तुम्हें क्या लगा,

उस लहू ने मेरे अंतर्मन को मैला कर दिया?

 

हां तुम्हारे समाज ने मुझे उस नज़र से देखा,

मैं बनी रही दोषी और तुम्हें एक बेचारा नौजवान बताया,

पर ये समाज मेरी ठोकर में है।

 

मैं नहीं सीता जो देगी अग्निपरीक्षा,

ना ही द्रौपदी जो बनेगी पांच पांडवों की भिक्षा,

हूँ मैं एक सशक्त नारी,

जिसने कभी ना हिम्मत हारी,

जिसकी एक नज़र अब तुम पर पड़ेगी भारी।

 

तुम मुझ पर अत्याचार बड़े करते हो,

गालियाँ भी मेरे नाम पे गढते हो,

लेकिन एक बात तो तुम भूल ही गए,

की इस संसार में आने से पहले,

नौ महीने तुम मेरे ही पेट में बढ़ते हो।

 

अगर मालूम होता

तो खुद से तुम्हें अलग कर लिया होता,

अगर मालूम होता

तो खुद से खुद ही को जन्म दिया होता,

अगर मालूम होता

तो इस संसार में मेरा भाग्य निर्भया सा न होता,

पर मालूम होता तब ना।

-कृति त्रिपाठी

Advertisements