जो भी बचपन में है  सीखा

उन सबको भूल जाने का

जो कुछ भी जाना हमने

उन बातो को ठुकराने का

आशाओं का उम्मीदों का

एक पल में टूट जाने का

दर्द के कडवे घूंटो को

पानी की तरह पी जाने का

ख्वाबो के सौ किले बनाकर

हकीकत में तोड़ते जाने का

जीवन का यही फलसफा है अपना

जीते जी मरते जाने का

 

रिश्ते नाते देख देखकर

जो भरोसा था भी हमको

वो सब भी उठ जाता है

तोड़ने हम रिश्ते सारे

जीने को अपने सहारे

आगे बढ़ते है एक कदम

फिर बाँध ले जाती है हमको

रिश्तो की ये बेड़ियाँ

खुद ही कूदता हूँ कुएं में

खुद ही झटपटाता हूँ

आँखे फोड़ के मन की फिरसे

मैं अँधा हो जाता हूँ.

 

घर में रेगिस्तान बसा है

मन में रेत सी भर चुकी है

जी रहा हूँ साँसे है पर

आत्मा तो मर चुकी है..

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