जीवन पर कुछ लिखने का मन हुआ,

पर भिड़ते ही बहस शुरू हुई,

कुछ सच तो कुछ झूठ हुआ,

मन में कुछ अचरज सी हुई।

 

क्या है सच क्या झूठ है,

इसका फैसला करेगा कौन?

क्योंकि हमारा जो न्यायाधीश है,

वो तो सदा रहता है मौन।

 

कभी लगे ज़िन्दगी गुलज़ार है,

पर कभी इसमें खार ही खार है,

खुशियां आज बेशुमार है,

तो कल दुःख और आंसुओं का भण्डार है।

 

पर इंसान भी है बहुत होशियार,

होता जो खुद के हक में,

तो भाग्य पर आता है प्यार,

और न हो जब कुछ भी बस में,

मेरी तो किस्मत ही थी बेकार।

 

आज मेरी आँखें नम थी,

दर्द का हो रहा है अजीब एहसास।

ख़ुशी तो हमेशा मुझसे दूर थी,

फिर ये गम क्यों है दिल के पास?

 

मोह है ये मृगतृष्णा सा,

ह्रदय में चुभी है कोई फांस,

निकालने का प्रयास करूं थोड़ा सा,

तो पीड़ा से रुक जाती है सांस।

 

क्यों मैं लगी हूँ इस उधेड़बुन में,

क्यों मेरी जुबां पे है “काश”?

जिस दिन खुदा होगा मेरे ज़ेहन में,

खुद ब खुद थम जाएगी ये तलाश।

कृति त्रिपाठी

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