-संतोष कुमार

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यूँ तो अपने हाथ में हमेशा पुस्तक का होना सामान्य बात है तथापि कुछ पुस्तके ऐसी भी होती है जिनके पढने की आतुरता कुछ अधिक ही होती है और ये पिपासा पुस्तक की समाप्ति पर ही समाप्त होती है. ऐसी ही एक पुस्तक से कल साक्षात्कार हुआ (क्षितिज भाई को इस सप्रेम भेंट के लिए बहुत बहुत अभिवादन). पुस्तक का नाम था “गन्दी बात” और इनके लेखक है क्षितिज रॉय. मेट्रो से घर जाने के सफ़र में ही आधी किताब पढ़ डाली, और बाकी आधी अगली सुबह कॉलेज जाते हुए. पुस्तक पढ़ते हुए इतने विरोधाभासी विचार मन में आये कि कभी कभार तो ऐसा लगा कि एक विचार पर चिंतन करने से कहीं पिछला विचार भूल न जाऊ. वास्तव में ऐसी कुछ रचनाये होती है जो साहित्य के सिद्धांत का निर्माण करती है, अधिकतर साहित्य उन सिद्धांतो का अनुकरण करती है, और अंततः कुछ रचनायें ऐसी होती है जो बनी बनायीं  परिपाटियों को तोड़ देती है और आपको साहित्य के सिद्धांतो पर पुनर्विचार करने को बाध्य करती है. कुछ ऐसी रचनायें जो आपको ये एहसास कराती है कि साहित्य को पढना भी साहित्य लेखन की तरह एक कला है. “गन्दी बात” ऐसी ही एक रचना है.

हमें आदत पड़ गयी है मौखिक व लिखित शब्दों को पृथक मानने की. हम जैसी भाषा व भाव का प्रयोग अपने दैनिक जीवन में करते है उसका उपयोग साहित्य में करने की कल्पना भी नहीं कर सकते. हमारी भाषा में एक संभ्रांतता आ जाती है और हमारी शैली में एक जटिलता. बोलचाल की भाषा को अक्सर साहित्यिक दृष्टि से हेय समझा जाता है. ऐसे में पूरा का पूरा उपन्यास ठेठ स्थानीय कलेवर में लिख जाना न केवल अनोखा व अनूप प्रयोग है अपितु ये हमारी साहित्य की समझ को भी चुनौती देता है जो अक्सर तत्सम भावी शब्दों को अच्छे शब्दों का पैमाना मान लेते है. पुस्तक की भाषा, पृष्ठभूमि, कथानक, संवाद, चरित्रों सब में एक खुलापन है, एक ऐसा खुलापन जो कई बार अखरता भी है आपकी साहित्यिक संवेदनशीलता को चुनौती देता है परन्तु जैसे जैसे आप किरदार से जुड़ते जाते है आप उनसे बनते जाते हो. शुरू शुरू में खुद को ये याद दिलाना पड़ा कि मैं “एक प्यारी सी प्रेम कहानी” नहीं अपितु “गन्दी बात” पढ़ रहा हूँ. और इसका असर कुछ ये हुआ की कुछ दूर आकर हम  “क्या हो गया ये” को “क्या हो गया बे” पढने लगे थे!

कहानी का कथानक क्या है, साफ़ साफ़ बताना मुश्किल है. सरसरी तौर पर तो ये एक युगल के बीच पत्रों के आदान प्रदान और उनके प्रेम की बदलते परिपाटी, और उनके बदलते समाजशास्त्र व मनोविज्ञान की कथा लगती है, परन्तु ये कहानी केवल गोल्डन या डेज़ी की नहीं है, गोल्डन या डेज़ी जैसे छिछले नाम वास्तव में एक प्रतीक है एक बिम्ब है उन प्रेम कहानियों की जो छोटे नगरो कस्बो में फलती फूलती है और बड़े शहरो की दमघोंटू आबो-हवा में दम तोड़ देती है. ये कथा और चरित्र अपनी भाषा, अपने लहजे और अपनी बातो से अभद्र भी लग सकते थे और कुछ हद तक लगते भी है (जो इसके शीर्षक गन्दी बात को चिर्तार्थ करती है) पर इस अभद्रता और खुलेपन में गहरा मनोविज्ञान गहरा समाजशास्त्र है. कहानी पढ़कर कई बार ऐसा भी प्रतीत हुआ कि वास्तव में, गोल्डन और डेज़ी की कहानी न होकर गोल्डन और डेज़ी खुद एक कथानक है, एक बड़ी कहानी का हिस्सा है. ये कथानक दो सतहों में चलती है- एक बदलती प्रेम कहानी और एक बदलता शहर. मुझे ये कहानी एक “meta narrative” प्रतीत हुई जहां बिहार के छोटे कसबे एक किरदार है, दिल्ली शहर एक किरदार है और सिनेमा सबसे बड़ा किरदार है. जब डेज़ी गोल्डन को “ग्रो उप” पर एक लम्बा व्याख्यान झाडती है और उसे पलटकर गोल्डन से भी जवाब मिलता है, तो ऐसा प्रतीत हुआ मानो दिल्ली जैसे आधुनिक, संभ्रांत शाहर छोटे कस्बो को हिदायत दे रहा हो- “लालायित नजरो से मेरी तरफ देखने भर से मुझे पाना न संभव है न हितकर, सो यदि आगे बढ़ना है और खुद को भीड़ में खो जाने से बचाना चाहते हो तो ग्रो उप” और कसबे झिड़ककर बड़े शहरो को कहते है- “तुम्हारा अनुकरण करने में मैंने अपनी पहचान, संस्कृति, परिवेश, मासूमियत सब गँवा दी  अब तुम चाहते हो कि तुम जैसा बनकर अपनी अस्मिता ही खो दूँ. नहीं कदापि नहीं”. प्यार में “ग्रो उप” करने से अधिक “गन्दी बात” क्या होगी, वो बढ़ना जो बेफिक्र, मनमौजी, अल्हड, बिंदास गोल्डन के मन में एक ऐसा लावा पैदा कर देता है जो कहानी के अंतिम क्षणों में फूट पड़ता है और “ये शहर नहीं सर्कस है”अध्याय में फूटे इस लावे के साथ पूरा कथानक ही दिशा बदल लेता है. गोल्डन का झूठ बोलकर शहर में आना और बेसुध शहर से भाग जाना दोनों शहर के क्रूर चेहरे को उजागर करता है. सिरसा का मुख जहां इंसान तेज़ी से घुसता है, और फिर इस कदर फँस जाता है, कि एक छोटा सा सुराख़ मिलते ही उससे तेज़ी से निकल जाना चाहता है.

सिनेमा इस पूरी रचना का एक बेहद महत्त्वपूर्ण पक्ष दिखाई पड़ता है. न केवल ये कहानी शहर का अपितु सिनेमा का भी meta narrative है. कहानी में शुरुआत में हमें फिल्म राँझना याद आ गयी, और इस फिल्म को कथानक में देखने के लिए हमें अधिक इंतज़ार नहीं करना पड़ा, और १८वे पृष्ठ पर आपको फिल्म का ज़िक्र मिल जाता है. परन्तु ये एकलौता ऐसा मौका नहीं है, कहानी में इतने फिल्मो व गीतों का ज़िक्र आया है कि यदि उनको कहानी से हटा दिया जाए तो प्रतीत होता है ये उपन्यास लघु कथा रह जायगी. प्रेम की अधिकतर प्रेरणाओ की जननी सिनेमा ही है. कुछ कुछ होता है और डीडीएलजे से प्रेम के पाठ सीखने वाली और कुमार सानू के गीतों में अपनी भावनाओ की अभिव्यक्ति तलाशने वाली हमारी पीढ़ी वास्तव में एक फिल्म में जी रहे है, एक ऐसी फिल्म जिसमें नायक हम है, और हम अपने दैनिक जीवन में उस नायकत्व की तलाश में रहते है जो सिनेमाई दुनिया में हमें बहुत प्रभावित करती है. जो हमें सामाजिक सरोकारों से विद्रोह करने की प्रेरणा देती है और हमारी मानसिकता में रच बस जाती है. गोल्डन और डेज़ी की प्रेम कहानी उस नायकत्व को वास्तविकताओ में सार्थक करने के प्रयास की भी कथा है और कथा है उस वर्ग संघर्ष को पाटने की भी, जो डेज़ी के एलएसआर (लेडी श्री राम कॉलेज) में दाखिल होने से और भी बढ़ गया था. और जिसे पाटने के लिए गोल्डन ने दिल्ली में ड्राईवर बनना स्वीकार किया परन्तु वास्तव में देखा जाए तो गोल्डन के इस फैसले ने उन दोनों के वर्ग विभेद को और अधिक बढ़ा दिया. कहानी का अंत एक सिनेमा के अंत की तरह प्रतीत होता है जहां किरदार अपना वजूद या तो तलाश लेते है या उन्हें उनकी तलाश में एकांत छोड़ दिया जाता है और उसको आत्मसात किये हुए दर्शक को ये एहसास होता है कि वो जो भी देख रहा था वो एक कल्पना थी. गोल्डन और डेज़ी अपनी कहानी के नायक नायिका है, पर वो एक और कथा के किरदार है, एक कहानी उनकी है और दूसरी कहानी के नायक शहर है. एक ऐसा शहर जिसे गोल्डन अपनी महबूबा बनाना चाहता है क्यूंकि वो कभी समाप्त नहीं होती, पर वही शहर जो उसे अंत में भागने को मजबूर कर देती है.

अंत में गोल्डन के करदार के विषय में अंतिम अध्याय में डेज़ी ने जो बाते कही जिससे मेरे ह्रदय में कुछ पंक्तियाँ उभर आई. कैसे समय और परिवेश के साथ इंसान की मासूमियत भी धूमिल  हो जाती है-

“वो लड़का मेरे भीतर का

जो खिलखिलाकर हँसता था

बेपरवाह था, मस्तमौला

आंसुओ का वक़्त नहीं था

न शिकन थी जिसकी बातों में

न दिन में कोई पर्दा था

न घुप अँधेरा रातो में

उस वक़्त में है लौटना

जहाँ रूह को सुकून मिले

वो शांति वो आरजूवो धड़कने वो जुस्तजू

वो नींद और वो ख्वाब

वो भूख का एहसास

सब बिछड़ गए जो हमसे

उन्हें फिर से पाना चाहता हूँ

ताले जड़कर शहर को मैं

घर को जाना चाहता हूँ”

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