शिव-धनुष जिसके लिए तोड़ दिया,

उस सीता को क्यों छोड़ दिया?

खैर मैं तुम्हें क्यों करूं संबोधित,

है जो मर्यादा पुरुषोत्तम घोषित।

मैं तो प्रश्न करुँगी जनकनंदिनी से,

कि तुम इस मृगतृष्णा में फँसी कैसे?

माना तुम्हें चुनना था एक वर,

और अयोध्या-कुमार से मिले तुम्हारे स्वर।

पर क्यों तुम्हारे मन ने प्रश्न न उठाया,

तुम्हारे सामने बिछी थी प्रेम रूपी माया।

वही प्रेम जो कहलाता है अँधा,

जिससे चल रहा है फरेब का धंधा।

क्यों वो झूठ तुम जान न पायी,

क्यों तुम विवाह करके अयोध्या आई?

उस आदमी को जब मिला वनवास,

तुमने किया अपनी इच्छाओं का ह्रास,

पहली अग्निपरीक्षा तो यही थी तुम्हारी,

पर तुम्हारे पति को नहीं हुआ विश्वास।

फिर भी तुमने हार न मानी,

वर्षोँ तक वन कि धूल छानी।

फिर एक दिन एक पुरुष आया,

जो पूरी दुनिया में दुष्ट रावण कहलाया।

ले गया अपहरण करके तुम्हें लंका,

और बजा दिया अपनी जीत का डंका।

उसका मन तुम पर था आया,

फिर भी हाथ तुम्हें उसने ना लगाया।

तुम्हारा तिनका था उसकी लक्षमण-रेखा,

जिसके पार कभी ना तुम्हें देखा।

फिर तुम्हारे परमेश्वर के भक्त आए,

तुम्हारी सुरक्षा का संदेशा लाए।

जीत के बाद उस मर्द ने फिर मांगी अग्निपरीक्षा,

और तब भी न मिली तुम्हें कोई शिक्षा।

उस अग्नि को तुमने ओढ़ लिया,

फिर भी पुरुषोत्तम ने मुँह मोड़ लिया।

मैं पूछती हूँ उस अग्नि में तुम भस्म क्यों न हो गयी,

क्यों लव-कुश को जन्म दिया?

क्यों उस समाज के आदेशों में तुम बंध गयी,

जिसने तुम्हें दुत्कार दिया।

आज भी वो राम समाज के कंधों पे है,

और गर्भवती सीता तुम उस समाज के क़दमों में।

इस मर्यादित समाज से मैं बहुत दूर भागती हूँ,

हे राम! आज मैं तुम्हें त्यागती हूँ।

 

कृति त्रिपाठी

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