कल तक थे जो मोम से पिघले,

खुद को आज पत्थर बना बैठे,

किसी और में जन्नत ढून्ढने निकले,

खुद को जहन्नुम बना बैठे।

कल ही की तो थी जान पहचान,

आज फिर अजनबी हो गए,

अपने आप पर था बहुत गुमान,

क्यों किसी के लिए सदियों रो गए?

कल तक देखा भी न था जिसका चेहरा,

आज उस गली में है,

अब देंगे इसके बाहर पहरा,

कोई और न गुज़रे इस खलबली में हैं।

कल तक जो बातें सुनते थे,

आज हम भी कर रहे हैं,

कल तक जिसके कसीदे पढ़ते थे,

आज वो हमारे तंज़ में है।

कल तक था जिसका इंतज़ार,

आज वो अपने रंग में है,

हमारा भी जल्द उतरेगा खुमार,

हम भी अब मैदान ए जंग में है।

कल तक था जिस पर ऐतबार,

आज उसे परवाह ही नहीं,

फिर भी हमने किये आंसू बेकार,

जिसका कोई चश्मदीद गवाह भी नहीं।

कल तक था जो मेरा भगवान्,

आज उसका नामोंनिशान ही नहीं,

क्या छुपाएँ अब अपनी पहचान,

फिर से बन गए हैं काफिर हम वही।

कल तक था मन में अँधेरा,

रूह में कहाँ बची थी जान,

पर कल होगा फिर एक सवेरा,

नयी नज़र से देखेंगे वही पुराना जहान।

कृति त्रिपाठी

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