• -santosh kumar

हमारे दैनिक जीवन में निरंतर हमारा साक्षात्कार होता है तरह तरह के उत्पादों से, और उनको बेचने वाले अनगिनत विज्ञापनों से. इन विज्ञापनों के भरोसे इन उत्पादों की बिक्री होती है और कई कलाकारों का जीवन यापन होता रहता है. पर दुनिया में एक ऐसी चीज़ भी है जिसका उत्पादन धड़ल्ले से होता है, और उतनी ही धड़ल्ले से उसकी बिक्री भी होती है. जितना इसका उत्पादन होता है, उतना इसका प्रसार और इतनी इसकी मांग. इसके उत्पादन में कोई खर्चा नहीं होता पर इसके भरोसे विभिन्न लोगों की दुकाने चलती है. ये एक ऐसा बाज़ार है जिसका व्यापार कभी ठंडा नहीं पड़ता, यहाँ हर कोई उत्पादक है और हर कोई खरीददार. आईये आईये ये है नफरत का बाज़ार.

नफरत का बाज़ार लगा है

तुम भी आकर देख लो

सबके दिल में आग लगी है

हाथ तुम भी सेंक लो

जल जाने दो दुनिया को

बंद दिलो की किवाड़ो में

मौत के मंज़र खौफ का आलम

भर दो मन की किताबो में

एक बिगड़ी तस्वीर, एक झूठा तथ्य, शब्दों का मायाजाल यही सब काफी है चिंगारी भड़काने के लिए, काफी है हमारे अन्दर के पक्षपातो व दुर्भावो, हमारे अतार्किक भय को सामने लाने के लिए. हम बात मुहब्बत की करते है, पर विश्वास तो हमें नफरत पर अधिक है. ऐसा नहीं कि मुहब्बत करना बहुत खूब बात है, है तो ये भी एक सामाजिक संरचना पर जाने क्यूँ हमें नफरत करना बहुत पसंद है. पहले हम धारणाएं बनाते है, फिर उन्ही धारणाओ के आधार पर अपने व्यवहार को स्वीकृति देते है. कोई हमसे बेहतर है तो अहं से जन्मी नफरत, कोई हमसे कमजोर है तो हे दृष्टि में छुपी घृणा, कोई हमसे परिचित है तो एक तरह की घृणा (जैसी हम अपने रिश्तेदारों से करते है) कोई हमसे अपरिचित हो तो दूसरे तरह की घृणा (कभी मेट्रो या बस में किसी का हाथ छु जाए तो जो घृणा निकलती है). कोई मेरे धर्म का नहीं, कोई  मेरे वर्ण का नहीं, कोई मेरे वर्ग का नहीं, कोई मेरे जैसा नहीं इसलिए. और जिससे नफरत करने का कोई कारण न हो उससे भी नफरत करो…क्यूँ? “ऐसे ही”

हमारे विचार हमारी धारणाएं, हमारी सोच, हमारी पसंद सब एक परिपेक्ष्य में अस्तित्व में रहती है. पर जब ये विचार और धारणाएं, ये पसंद-नापसंद आपकी पहचान से जुड़ जाए, आपका अहं बन जाए तो हर विपक्षी, विरोधी विचार घृणा का आधार बनेगा. आपको अच्छे होने के लिए जाने क्यूँ किसी न किसी को बुरा होना आवशयक है. हम वास्तव में जानते ही नहीं कि हम नफरत क्यूँ करते है. क्या ये घृणा, उन लोगों के लिए भी जिनका हमसे दूर दूर तक कोई वास्ता नहीं है, और जिनको हम जानते भी नहीं, क्या वास्तव में घृणा है या हमारे अहं और कुंठा की अभिव्यक्ति है

नफरत का बाज़ार लगा है. यहाँ पर रंग बिरंगे चश्मे है. हर चश्मे से एक ख़ास रंग में रंगी दुनिया दिखाई देती है. यहाँ पर डिक्शनरी भी है. नफरत को शब्दों के जाल में डाल कर एक माला पिरो दो. नफरत की भी एक शब्दावली है, जिसको कुछ नहीं आता उसको भी ये शब्दावली बखूबी आती है. अच्छा यहाँ एक स्केल मिलेगा, मापने के औज़ार भी, पूरी दुनिया को अलग अलग टुकडो में बांटने के बहुत काम आएगी. अच्छा ये जानवर हमारा, वो जानवर तुम्हारा, ये रंग हमारा वो तुम्हारा, ये शब्द हमारा वो तुम्हारा, पूरी दुनिया को बांटकर अपने टुकडे को सच्चा टुकड़ा घोषित कर देंगे. नफरत का बाज़ार लगा है, बहुत भीड़ है पर बाज़ार भी तो बड़ा है. मैं भी सुबह उठते ही कुछ नफरत मोल लेता है और रात को आँखे बंद होते ही वो नफरत अपने दिल में सहेज लेता हूँ.

कितनी नफरत खरीदी मैंने

कितनी और अभी बाकी है

कितना अँधियारा फैला है

दीये में तेल कितना बाकी है

चलो अपनी नफरत की खुराक ले ले. फिर मेट्रो में किसी यात्री से लड़ेंगे, फिर क्लास के किसी बच्चे की चुगली करेंगे, किसी का मज़हब किसी की जात, नफरतों की सारी बात. स्टॉक ख़तम हो गया कहीं तो सोचने पर बाध्य हो जायेंगे- कि हम आखिर है क्या, नफरत के सौदागर या इस बाज़ार के एक ग्राहक. क्या पता किसी दिन किसी सड़क पर खुद ही को देख लूँ, एक नयी नफरत को नए शब्दों में, नए दूकान के नए बोर्ड लगाकर, चीख चीखकर बेचते हुए. और उस दिन हमें विश्वास हो जायगा कि  ये दुनिया कुछ और नहीं बस एक नफरत का बाज़ार है. काश ये दिन कभी न आये वरना खुद से भी नफरत हो जायगी. दूसरो से नफरत करके तो ज़िन्दगी चल जाती है, खुद से नफरत करके कैसे जियेंगे पता नहीं. तो भटकते रहो उन्ही गलियों में जब तक या तो बाज़ार ख़त्म हो जाए या खरीदने की औकात.

दिल में अपने पत्थर भरने

का अचूक औज़ार है

आओ आओ जल्दी आओ

ये नफरत का बाज़ार है.

 

 

 

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