मैं कौन हूँ, ये केवल एक अस्तित्ववादी प्रश्न नहीं है, इस में हमारे तुम्हारे सबके जीवन, समाज और राष्ट्र का सार तत्व छुपा है. मेरा नाम क्या है, और किसी को क्या सरोकार. एक पंछी हूँ बस जो उड़ने को आतुर है, जो मंजिल तलाश रहा है अपनी. और जीवन के पंछियों को न नाम की ज़रुरत है न पहचान की, बस एक उदीश्य और एक मंजिल, यही उसकी ज़रुरत है. पर फिर भी लोग पूछते है कौन हो तुम, पहचान क्या है तुम्हारे, भीड़ में किस से जोड़कर देखते हो खुद को. और तब मैं कहता हूँ कि मैं अश्वत्थामा हूँ, मैं ही क्यूँ आप भी अश्वत्थामा है, हम सब आने जीवन के किसी के किसी क्षण में अश्वत्थामा हो जाते है. हाँ मैं ये बात जानता हूँ कि हम में से कोई अश्वत्थामा नाम से नहीं पहचाना जाना चाहता, एक ऐसे नाम से जिससे महाभारत के युद्ध की क्रूरता और धूर्तता याद आ जाती है. अब भला हम अश्वत्थामा कैसे हुए? इस प्रश्न का सीधा उत्तर है- हाँ हम सब अश्वत्थामा है, पर अश्वत्थामा इंसान नहीं……अश्वत्थामा हाथी!!

महाभारत की कहानी तो सुनी होगी न आपने. पांडव सेना द्रोणाचार्य के नेतृत्व वाली कौरव सेना के समक्ष त्राहि त्राहि कर रही थी, विजय की केवल एक आशा थी द्रोणाचार्य की मृत्यु और उनकी एकमात्र कमजोरी उनका पुत्र अश्वत्थामा. तब पांडवो ने द्रोणाचार्य के वध हेतु अश्वत्थामा का सहारा लिया….. अश्वत्थामा हाथी का. इस महाभारत के युद्ध का सबसे दुखद क्षण था ये केवल इसलिए नहीं कि द्रोण की मृत्यु हुई अपितु उससे अधिक किसी के नाम किसी की पहचान के साथ खिलवाड़ हुआ. आज भी यही होता है. कुछ नामो में भरकर हमारी पहचान निर्धारित कर दी जाती है और जीवन भर कोई पांडव हमारी पहचान को अपने पैरो तले रौंद कर चला जाता है. मेरा नाम किसी और ने रखा, मेरी पहचान मुझे किसी और से मिली, मेरा धर्म मेरा नहीं, मेरी जाति मेरी नहीं, मेरा देश मेरा नहीं. बस मिल गया और मान लिया अपना लिया… और इसमें कोई बुराई. कमी तब हुई जब हमारी इच्छा के विरुद्ध हमपर पहचाने थोपी गयी. किसी ने किसी धर्म से जोड़कर हिंसा की, किसी ने जाति पूछकर पक्षपात, कभी रंग देख्कार भर्त्सना हुई, कभी अशिक्षा का मज़ाक. इन सभी पहचानो का भार जब भी हमारे कंधो ने लादा हा अश्वत्थामा हो गए. जब कुछ हिन्दू कुछ मुसलमानों ने अपनी हिंसा के कारण पूरी कौम का नाम बदनाम किया, तो बाकि सब हिन्दू मुस्लिम अश्वत्थामा हो गए, जब आम आदमी का नाम लेकर किसी ने गाड़ियाँ फोड़ी, आग लगायी और उन्ही आम आदमियों को कष्ट पहुंचाया, तो अपनी गाडी या दूकान के टूटे हुए अवशेषों को निहारता हर शख्स अश्वत्थामा है. जब विचारधारा के नाम पर कुछ “राष्ट्रवादियों” ने कुछ “गैर राष्ट्रवादियों” पर हिंसा को जायज़ ठहराया तो भीड़ में खड़े उन छात्रो ने जो बेवजह बेरहमी से पीटा गया, वो अश्वत्थामा है.

हम सब ही शोषक भी है हम सब ही शोषित भी है. जाने अनजाने हम कभी भीड़ का हिस्सा जब बन जाते है, जब भीड़ की एक आवाज़ से १०० करोड़ पहचाने जाते है, जब लोगो के हुजूम में अपनी अस्मिता हम खो जाते हा तब हम सब उसी क्षण अश्वत्थामा हो जाते है. जिस क्षण हम किसी को संज्ञा दे देते है  उसी दिन हम दो पहचाने गढ़ते है उनकी और अपनी.  हर पुलिस वाला जो भ्रष्ट है उसके पीछे एक आम आदमी है जिसकी आवश्यकताएं असीमित है पर संसाधन सीमित. हर इंसान के पीछे उसका इतिहास होता है. किसी को संज्ञा देना उस इतिहास का ह्रास है. वास्तव में हम जनमानस ही है जिसमे सब कुछ निहित है सब अच्छा है सब बुरा भी है. हर उस दमन में हम हिस्सा लेते है या तो शोषक के रूप में, या तो शोषित के रूप में और अंत में मूक साक्षी के रूप में. हम ही है जो आदर्शो की वकालत करते है और हम ही है जो उन आदर्शो को अपने स्वार्थ के तले कुचलकर आगे बढ़ जाते है. और ऊनि आदर्शो में कुचले जाते है असंख्य अश्वत्थामा.

मैं जानता हूँ यहाँ से जाने के बाद आप सब भूल जायेंगे, आपके जीवन में विचारो में निर्णयों में कोई परिवर्तन नहीं आएगा. मेरी बातो का शायद ही आप लोगों का कोई असर हो, और भला हो भी क्यूँ. मैं भी तो उसी जुर्म का दोषी हूँ जिसमे आप लोग संलग्न है. बस एक बार घर जाकर दो मिनट चिंतन अवश्य कीजियेगा. कि हम संसार की सबसे भ्रष्ट संस्था है….. क्यूंकि हम जनता है. अश्वत्थामा कल भी मारा जाता था, अश्वत्थामा आज भी मारा जाता है, अश्वत्थामा कल भी मारा जाएगा, फर्क बस इतना है कि आज कृष्ण कहीं नहीं है…..

और ये सब मैं इसलिए नहीं कह रहा हूँ कि मुझसे आप लोगों से कोई आशा है बल्कि इसलिए कि मैं निराश हो चूका हूँ. अपनी ख़ामोशी से भी, अश्वत्थामा की मौत से भी. अश्वत्थामा रोज़ मरते है, कभी इंसान मरते है, कभी पहचान मरती है, कभी ज़मीर मरता है कभी ज़बान मरती है. पांडव कौरव लड़ते जाते है और अश्वत्थामा मरते जाते है. आज भी किसी कॉलेज में किसी घर में किसी दफ्तर में, कहीं मंदिर मस्जिद गुरुद्वारों में, कहीं चार दीवारों में अश्वतथामा मारा जा रहा है. लोगों को पहचानो के साँचो में मत डालो तो अच्छा, इंसान को इंसान ही रहने दो तो अच्छा, मैं बस एक हाथी हूँ न पांडव हूँ न कौरव हूँ, अपनी अहं की जीत में मुझे न मारो तो अच्छा. वरना कुछ और नहीं कह पाओगे बस यही बचेगा कहने को कि ……. अश्वत्थामा मारा गया….!!

भीड़ में छितरा हुआ सा

एक तिनका मैं भी हूँ

खून के इन आंसुओं का

एक कतरा मैं भी हूँ

भीड़ आती है

कुचलती है मसलती है

किस कदर ये जान मेरी

उफ़ मचलती है

जुल्मियों के इस जहाँ में

किसकी चलती है

इज्ज़तो के रास्तो पर

रूहे जलती है

 

हाँ मैं एक छोटा सा तिनका

घुटती जिसकी सांस है

कितने जन्म बीते यहाँ

मुक्ति की फिर भी आस है

जानता हूँ इस जगत का

मैं एक हिस्सा मात्र हूँ

आज भी इंसानियत के

तलवों में मेरा वास है

 

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