– कृति त्रिपाठी

 

हूँ मैं अदृश्य

पर मेरी पैंठ है बहुत गहरी

कुछ भी काम करने चलोगे

उससे पहले सुध लोगे मेरी

कि मैं तुम्हें तुम्हारा

मनचाहा करने का मौका

देता हूँ या नहीं

संविधान में होंगे बहुत से मौलिक अधिकार

पर मेरे सामने तुम चींटी हो

जिसे किसी के पैरों तले आ जाने का

हर क्षण खौफ होना चाहिए

किन अधिकारों की बात करते हो

क्या तुमने अपने कर्त्तव्य निभाए

क्या हैं तुम्हारे कर्त्तव्य

सोचो अरे सोचो

ज्यादा नहीं सिर्फ एक ही

कि तुम अपनी तार्किकता को ताक पर रख दो

और मेरे दिखाए रास्ते पर चलो

मेरी दिखाई दिशा में बहो

तुम्हें कहाँ पढना है

तुम्हें क्या विषय दसवीं में लेना है

बारहवीं के बाद तुम्हें क्या बनना है

तुम्हें किससे मिलना है

तुम्हें किसके सामने क्या बोलना है

तुम्हें क्या पहनना है

तुम्हें किस धर्म को मानना है

तुम्हें क्या खाना है

तुम्हें किसके साथ जीवन बिताना है

जिसके साथ जीवन बिता रहे हो

उसे कठपुतली कैसे बनाना है

उसके हक को किस तरह निगल जाना है

उसे कैसे एक सुशील बहु बनाना है

कैसे उसके पति होने के फ़र्ज़ से

उसके जिस्म से लहू बहाना है

कैसे उससे बेसमय माँ होने का बोझ उठवाना है

कैसे उसकी हर एक आवाज़ को दबाना है

कैसे उससे एक सुपुत्र को जन्म दिलाना है

और कैसे फिर उस सुपुत्र को बताना है

की दसवीं में कौनसा विषय लो

और फिर वही सब जो ऊपर कहा गया

उसे निरंतर चलते जाना है

और फिर संस्कृति और परंपरा के नाम पर

तुम्हें आँख बंद करके इसे निभाना है

पढ़ा था बचपन की किताबों में

समाज बनता है लोगों से

पर यहाँ तो हम समाज से बन रहें हैं

अपनी इच्छाओं का ह्रास कर

अंतरात्मा को बंद कर रहें हैं

जिस दिन वो आवाज़ इस समाज को चीर देगी

और तुम उठ खड़े होगे

इन बेडियों को तोड़ने के लिए

अपनी स्वंत्रता छीनने के लिए

वो दिन होगा

हाँ वही स्वर्णिम दिन होगा

जिस दिन भूतकाल से नहीं

ये समाज बनेगा आज से

 

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