कृति त्रिपाठी

झूठ की खासियत है अनोखी

लगता है अपने आप में सम्पूर्ण.

धूल दूसरों की आँख में झोंकी

और मानते हो खुद को परिपूर्ण।

सच को तो कभी याद रखना ना होता

और झूठ भूलने का सवाल ही पैदा ना होता,

सच और झूठ की लड़ाई में

विजय झूठ की होती है,

क्योकि सच में साबित करने की गुंजाइश कहाँ होती है।

ये कहानी आखिर शुरू कैसे होती है?

एक सच को छुपाने पर

पहला झूठ अपने आप बन जाता है,

फिर आने वाले कई झूठ में

वो अपने आप तब्दील होता जाता है।

चेहरे पर इतने मुखौटे चढ़ा लिए जाते हैं,

कि इंसान खुद को पहचान ही नहीं पाता है,

मज़े की बात तो ये है,

कि चेहरे पर चढाए इन चेहरों से,

तुम दूसरों को नहीं,

बल्कि अपने आप को धोखा देते हो,

आवाज़ ही न सुनाई दे कभी,

इस कदर अन्तरात्मा को मार देते हो।

इंसान इतना पत्थर होता जा रहा है,

कि दूसरों के आंसू देखने में उसे आनंद आ रहा है।

झूठ के इस पैमाने को इतना भी न भरो,

कि छलक कर तुम्ही पर गिर जाए।

सब्र की इतनी इन्तेहा न लो,

कि बाँध ही टूट कर ढह जाए।

किसी की अच्छाई को उसकी कमजोरी न समझो,

कि इंसानियत से भरोसा ही उठ जाए।

तीर जैसे इन शब्दों से इतना भी न भेदो,

कि लहू का रंग ही सफ़ेद पड़ जाए।

रोने पे इतना भी मजबूर न करो ,

कि आँखें ही सूख जाए।

किसी को इतना भी मत डराओ,

कि डर ही ख़तम हो जाए।

इतने काफिर भी न बनो,

कि खुदा के दर से ही शर्म आए।

इतने झूठ भी न बुनो,

कि सच की परिभाषा ही फिर याद न आए।

खैर झूठ के बुने इस जाल में

एक दिन खुद को जकड़ा पाओगे,

क्योंकि आसमान में थूकने वाले को ये पता नहीं

कि पलट कर थूक उसी के मुँह पर आकर गिरता है,

और एक दिन ऐसा आता है

जब आईना भी तुम्हारी शिनाख्त करने से मुकरता है।

और तब अपने अस्तित्व का सच खोजने निकलना,

जो पाप किये हो उन्हें गंगा में धोने निकलना,

लेकिन ये बात याद रखना,

कि उस दिन गंगा में पानी नहीं होगा,

पर जिस रेगिस्तान से तुमने बेईमानी की है,

वहाँ कभी न मुरझाने वाला एक फूल ज़रूर खिला होगा ।

Advertisements