-संतोष कुमार

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पल भर को मन को खुश कर जाती

झूठी आशाएं

कडवी हकीक़त से दूर ले जाती

झूठी आशाएं

दिल में एक मिठास जगाती

झूठी आशाएं

सच्ची सी लगती है ये

झूठी आशाएं

आँख खुलते ही टूट जाती है ये

झूठी आशाएं

आती है हँसाकर जाती है रुलाकर

झूठी आशाएं

दिल में दर्द दे जाती है

झूठी आशाएं

तारो की तरह टूट जाती है ये

झूठी आशाएं

बड़ी झूठी होती है ये

झूठी आशाएं

 

 

 

अपने होने को होना कहूँ तो न होना क्या है। जब वजूद पर न यकीन हो न उससे कोई आशा तो ऐसा वजूद हम पर बोझ नहीं तो क्या है। रिश्तों के साथ समस्या बड़ी है कुछ बने बनाए आते है कुछ हम खुद बनाते है पर एक बार बना लेने पर रिश्ते बेड़ी बन जाते है। रिश्ते निभाना क्यों जरूरी है ये तो बाद का सवाल है रिश्ता होना ही क्यों चाहिए। अगर हम अकेले खड़े हो तो क्या हमारा अस्तित्व है, अगर नहीं तो ऐसे अस्तित्व का करना ही क्या जो हमारा है ही नहीं जो दूसरों पर निर्भर है। मैं दुनिया में आया मेरा फैसला नहीं था तो इस ज़िन्दगी को निभाना हमारी ज़रुरत क्यों। अगर भगवान् ने सचमुच हमें बनाया है तो मैं पूछना चाहता हूँ कि क्यों? दुनिया बनायीं ही क्यों? हमको बनाया ही क्यों? हमको ज़बरदस्ती कुएँ में धकेल देते है और कहते हो इसी में रहो और अगर बाहर निकलना हो तो मेरा आह्वाहन करो। मुझे दया आयी तो तुम्हे बाहर निकाल दूंगा। अगर उभरना ही हमारी मंज़िल है तो हम खायी में जाए ही क्यों? पहले जहन्नुम सी ज़िन्दगी देते हो फिर कहते हो अपना अस्तित्व खोजो। अपने जीवन का उद्देश्य खोजो। परंतु क्या जीवन का उद्देश्य खोजना ही सबसे बड़ा उद्देश्य नहीं है। इसी उद्देश्य के बूते तो हम अपनी अस्तित्व की सार्थकता प्रमाणित करेंगे। कोई शास्त्र पढ़ेंगे कोई दर्शन की किताब, कुछ चिंतन करेंगे पर प्रमुखतया जो भी सामने होता है हमारे उसे आत्मसात करेंगे। जिस दिन प्रश्न पूछ लिया उस दिन हमारा अस्तित्ब संकट में पड़ जायगा इसलिए शास्त्रों में विदित है कि ईश्वर पर प्रश्नचिन्ह लगाने वाले उसके कोप के भागी होंगे। तो हम कभी कुछ नहीं पूछते मान लेते है कि हम कुछ है, क्या है नहीं पता, क्यूँ है नहीं पता.

दुनिया के रहस्य जानने निकले है खुद की हमको सुध नहीं है, चाँद तारे तोड़ने निकले है अपने दिमाग में क्या चल रहा है उस सोच तक हमारी पहुँच नहीं. हम बिना भाषा के सोचते कैसे है? क्या बिना भाषा के सोचा जा सकता है, अगर हाँ तो कैसे? अगर ना तो कौन हमें सोचना सिखाता है, कौन हमें बताता है कि मैं मैं हूँ? क्यूँ मैं आईने में देखकर खुद को पहचान लेता हूँ लेकिन लाखों करोडो सालो की साधना से भी खुद को नहीं पहचान पाता. समाज के होने से मैं हूँ या मेरे होने से समाज है, रिवाज़ मैंने बनाये है या मेरे लिए ये रिवाज़ है, ये सांस मेरे लिए बनी है या मैं लेता हूँ तो ये हवा सांस है, क्या मेरी आवाज़ से बनते है ये शब्द या मेरे शब्दों में आवाज़ है? एक भैया कहते है ये “जेहन-ए-अय्याशी” है सब, जितना सोचोगे उतना मज़ा आएगा, तृप्ति मिलेगी सुकून मिलेगा, और सोचने का जूनून मिलेगा. बस जवाब नहीं मिलेगा. क्यूंकि हमें इस सोच में ही इतना मज़ा आ रहा है कि उत्तर तो हम जानना ही नहीं चाहते, और सच तो ये भी है कि उत्तर कुछ है भी नहीं. बस नए सवाल है, बस नए विचार है.

 

कह दूँ सब पॉवर स्ट्रक्चर है, मेरी अस्मिता थोपी गयी है मुझपर मेरा अस्तित्व उसको आत्मसात करना मेरा लक्ष्य है, या मेरा जीवन एक निरर्थक परिपाटी है जिसका अर्थ निकलकर ही जीवन को जीना संभव नहीं. क्यूंकि सबमे ये क्षमता नहीं कि जीवन का अर्थ निकाल सके. तो या तो वो जीवन भर अपने अस्तित्व से अनिभिज्ञ रह जाते है या धर्म, आस्था, मिथकों में अपना अस्तित्व तलाशने लगते है. या बोल दूँ सब ईश्वर की देन है क्यूंकि ये जवाब देते ही सोचने की आवश्यकता समाप्त हो जाती है. जवाब कितना ठोस है नहीं पता, पर कम से कम जवाब तो है, जेहन-ए-अय्याशी तो नहीं. सब कुछ जो होता है उसमे हमारा योगदान सिर्फ कलाकारों का है क्यूंकि करने वाला तो कोई और है. मतलब कुछ भी हो, हमारा अस्तित्व किसी की देन है, हमारा खुद का क्या है ये सवाल फिर से जेहन में आता है, भगवान् आखिर हमारे साथ क्यूँ जुड़ा है इसका जवाब फिर नहीं मिलता. एक बार फिर गोल घेरे में ज़िन्दगी फँस जाती है.

 

और फिर कोई हमें झकझोरता है और कहता है- क्यूँ इतना सोचते हो? सोच सोचकर ज़िन्दगी को और अधिक क्लिष्ट क्या बनाना और सच भी है. जीवन को सुलझाने से बड़ी उलझन कुछ नहीं, मौत से बड़ी ज़िन्दगी की कीमत कोई नहीं. तो क्यूँ ज़िन्दगी को और उलझाया जाए. क्या फर्क पड़ता है कि हमारे होने का कोई आशय नहीं हमारे पास, बस एक एहसास है कि हम है, दूसरो के पास एक नाम है हमें बुलाने को, एक पहचान है हमें याद करने की, जिसे हम मानते है पर जो हमारी  नहीं है. तो ओढ़ लो चादर और खो जाओ अँधेरे में. अस्तित्व के मच्छर काटेंगे तो नहीं.

 

 

जब कल का डर

आज हमे सोने ना दे,

बेहतर है झूठी

उम्मीदों  के सहारे सो जाना

 

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