“अगर हिम्मत नहीं थी तो मरने क्यूँ  आया?”

“अगर इतनी ही हिम्मत है तो मर क्यूँ रहा है”?

इन दो पंक्तियाँ गूढ़ विमर्श छुपा हुआ है. हमारे समाज में आत्मदाह को लेकर जितने विचार नहीं है उतनी भ्रांतियां है. हम लोग इस विषय पर बोलने को आतुर है पर समझने को अग्रसर नहीं. जीवन में सभी को कभी न कभी ये ख्याल आता है कि आखिर इस ज़िन्दगी का मतलब क्या है? क्यूँ जी रहा हूँ मैं? ज़िन्दगी बेज़ार लगती है और मौत आसान रास्ता. पर हम में ज़्यादातर लोग इस रास्ते को अख्तियार नहीं करते, शायद मौत का डर शायद ज़िन्दगी का मोह, शायद घरवालो की चिंता शायद दुनिया का ख़याल, बहुत से कारण होते है कि पाँव ठिठक जाते है. पर हमारे समाज में विडंबना अजीब है, हम लोगों को उनके फैसलों के लिए जज करते है. खासतौर पर उनके लिए जिनकी आत्मदाह का प्रयास विफल हो जाता है. सुसाइड किसी के मन की कमजोरी है या जुझारूपन की कमी ये निश्चित करने का अधिकार किसी को भी नहीं. “मेरे सामने भी तो आई थी ये समस्या मैंने तो आत्मदाह नहीं किया” ये वो बेहूदा वक्तव्य है जो टूटे हुए इंसान को और तोड़ने का काम करता है. जीवन की आशा जिसमे खो गयी हो उसपर सवाल उठाकर आप सिर्फ उसको और नीचे गिरा सकते हो. सुसाइड का तो आधार ही ये है कि जब इंसान को जीने का कोई रास्ता नहीं दिखता (यद्यपि रास्ते होते है). ज़रूरी नहीं कि आत्मदाह सोच समझ के किया जाए, कई बार तैश में आकर या क्षणिक असंतुलन का भी परिणाम होता है पर ऐसा भी नहीं कि आत्मदाह मूर्खता है. किसी के लिए उसका जूता खो जाना भी बहुत बड़ा दुःख है, निर्भर करता है व्यक्ति की मनोवृत्ति क्या है. समस्या तो ये भी है कि हमारे समाज में मनोरोगी को पागल और मनोचिकित्सक को पागलो का डॉक्टर मान लिया जाता है. तो अगर आपको समस्या भी है तो आप बताएँगे नहीं और बताएँगे नहीं तो आपकी कुंठा आपको अन्दर ही अन्दर खा जाएगी. और फिर जो आत्मदाह करने जायेगा वो महज एक खोखला शरीर होगा.

न दिल चाहिए न दर्द चाहिए

न आहें हमें कोई सर्द चाहिए

न रिश्तो का ढोंग न नातों का नाम

रहने दो हमें कहीं गुमनाम

गुमनाम हूँ जहां आराम है वहीँ

है नाम बड़ा जिसका नाम ही नहीं.

आत्मदाह करने वाला व्यक्ति वास्तव में अपनी अस्मिता को खो चुका होता है या अपने अस्तित्व से संघर्ष कर रहा होता है. अपनी काय को नष्ट करने का एक अभिप्राय ये भी है कि हम अपनी काया को अपना अस्तित्व मानकर बैठे है. मैं यहाँ आत्मा परमात्मा के विषय में बात नहीं कर रहा अपितु उस सत्य को इंगित कर रहा हूँ जो कई सालो पहले sartre ने कहा था- हम स्वयं को को चेतना के रूप में देखते है और दुसरे हमें काया के रूप में. आशय ये है कि जब हम आत्मदाह करने जा रहे है तो हम अपने अस्तित्व को भूला बैठे है. हम दिखती है तो बस एक काया. सुसाइड को जज करने से पहले उसे समझने की ज़रुरत है. हम सब को सहारा चाहिए अपना, दूसरो का, कम से कम भगवान् का. जब व्यक्ति आत्मदाह के लिए प्रेरित होता है तो वास्तव में वो अपना ही सहारा नहीं बन पाता. और इसलिए सुसाइड हर समय एक नया विमर्श खड़ा कर देता है- सुसाइड करना क्या वास्तव में इंसान का अपने शरीर पर हक को प्रमाणित करता है? या वास्तव में ये वो पल है जब मानव अपने आप पर ही हक खो बैठता है. प्रश्न विकट है  इसपर विमर्श चाहिए वार्तालाप चाहिए आक्षेप नहीं विवाद नहीं.

कितना आसान है रुला देना किसी को

मुश्किल है ये कितना भुला देना किसी को

हूँ अँधेरे में कब से सवेरा चाहिए

सवेरा चाहिए न अँधेरा चाहिए

न ज़िन्दगी हमें और ज़र्द चाहिए

न दिल चाहिए न दर्द चाहिए

न आहें हमें और सर्द चाहिए….A New Design (2)

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