-आभाष कुमार सौरव

 

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आखिरकार तुम लौट ही आए न,
देखों ये चहल-पहल,
ये शोरगुल,ये धड़कनें,
जो अब इतनी
हरकतें कर रहीं हैं न,
तेरे आने का जश्न है जो ये दिल मना रहा है,
जहाँ पहले सन्नाटा था, कयू की सब कुछ इस जिस्म के
अंदर खामोश था…

आओ और करीब आओ, देखों अपने घर को,
झांक के मेरे सीने के अंदर,
जहाँ कुछ ख़ुवाब बिखड़े पड़े हैं, कुछ रंग उदास हो चलें हैं,
कुछ फूल जो खिलाए थे, तुमने इस दरीचे में,
वो अब मुरझाने को चले हैं,
लेकिन है सब कुछ सलामत, मैं खुद टूट गया लेकिन
तेरे घर के किसी भी समान को टूटने न दिया,
देखों, कितना सब कुछ सलामत पड़ा है,
एक सच्चाई है तो तुम्हें चौखट पे ही कह देना चाहता हूँ,
बड़ी नजाकत से देखना पूरे माजरा को,
तेरे जाने के बाद बहुत मुश्क़िल से,संभाला था इसको,
जैसे कोई बाप अपने बच्चे को माँ के गुजर जाने के बाद पालता हो,
उस दुलार से, प्यार से देखना ये सब कुछ,
आओ और मेरे करीब आओं न,
देखों अपने घर को झांक के मेरे सीने के अंदर,

रुकों ये खिड़कियों के सीसे अभी बंद न करों,
मेरे पलकों पे हाथ रखकर,
देखों अभी इन खिड़कियों से की
कितनी बारिश हो रही है आजकल…

ओह !! रुकों इन सिलवटों को अभी मत निहारों,
अपना चेहरा चाँद की तरफ करो,
मुझे यकीं तो हो कि तुम ही आए हो,
खुद के साथ चलकर,खुद के पास,

अभी मेरे हाथ में अपना हाथ मत डालों,
फेंकों न छीन के इस क़लम को अभी मेरे हाथों से,
तेरे जाने के बाद बहुत यही एक इश्क़ थी मेरे हाथों से लिपटे , सीने से सटे हुए,
सुनों !! अभी फेकों न छीन के इस कलम को अभी मेरे हाथों से,
कि, दास्तां आगे और भी है…

ख़ैर, छोड़ो, ये उलझने, ये उलाहना, ये सब बातें,
आओं करीब इश्क़ करें अब और भी
फिर कही दिल न टुटे, फिर वो आवाज टूटने की कही न आएं,
उस आवाज से कोई जाग जाए,
उससे पहले आओं क़रीब,
कुछ इश्क़ करें……..

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