एक सवाल मैं रोज़ खुद से करती

कि आखिर जीवन क्या है।

शायद कोई अथाह समुद्र है

और हम तट की मिट्टी,

क्या पता कब कोई तेज़ लहर आकर अस्तित्व ही मिटा जाए।

शायद मंझधार में फँसी कोई नौका है

और हम मांझी की इंतज़ार में बैठे,

क्या पता कब कोई तूफ़ान आकर नाव ही डूबा जाए।

शायद कोई पिघलता हुआ मोम है

और हम जलती हुई लौ,

क्या पता कब कोई तेज हवा का झोंका यूँ ही बुझा जाए।

शायद कोई गहरी काली रात

और हम रास्ते की तलाश मे राहगीर,

क्या पता ये तारे भी साथ छोड़ जाए।

 

क्यों ना नज़र को थोडा बदला जाए,

हो सकता है कोई नया पहलू सामने आए

तो क्यों ना यूँ सोचें कि,

शायद कोई अथाह समुद्र है

और हम तट की मिट्टी,

क्या पता कब कोई सुनहरा मोती हम पर आ जाए।

शायद मंझधार में फँसी कोई नौका है

और हम मांझी की इंतज़ार में बैठे,

क्या पता आसमां में चमकता तारा दिशा दिखा जाए।

शायद कोई पिघलता हुआ मोम है

और हम जलती हुई लौ,

क्या पता ये रोशनी कितनों का अन्धकार मिटा जाय।

शायद कोई गहरी काली रात

और हम रास्ते की तलाश मे राहगीर,

क्या पता कब ये बादल चाँद से छट जाए।

इस शायद का तो कोई अंत नहीं,

निश्चित ही एक पहेली है

जितना हल करो उतनी ही सुलझती जाए।

 

कृति त्रिपाठी

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