-संतोष कुमार

 

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कभी कभी ऐसा  है कि ये गाना मेरे लिए लिखा गया है, मानो ये मेरी कहानी कह रहा है. कुछ गीत दिल को छु जाते है तो कुछ दिल को चीर जाते है. कुछ गीत ऐसे भी होते है जिनका अर्थ पहले पहल समझ नहीं आता पर जब आता है तो लगता है जैसे ५ मिनट में सारे जीवन का दर्शन उड़ेल दिया हो किसी ने. गुलज़ार जी के गीत इसी श्रेणी में आते है. “किस मोड़ से जाते है, कुछ सुस्त कदम रस्ते, कुछ तेज़ कदम राहें;  पत्थर कि हवेली हो, शीशे के घरोंदो में, तिनको के नशेमन तक, इस मोड़ से जाते है”. ये गीत सुनने में बहुत अच्छा जान पड़ता है पर इसका अर्थ समझने में मुझे १-२ साल लग गए. गुलज़ार के गीत वो नहीं जिन्हें आप सुनकर भूल जाए. ये आपको सतायेंगे जीवन भर, इनका अर्थ आपको अर्थो कि गहरायी में ले जाता है. अमूमन फिल्मो में गाने अच्छे होते है पर कई बार उनका फिल्म की कहानी से कोई सरोकार नहीं होता पर गुलज़ार के गीत ऐसे है जो आपको बेहतर तरीके से तभी समझ में आयेंगे यदि आपने वो फिल्म देखी हो. गुलज़ार के गीत कहानी को न केवल आगे बढाते है वो उन्हें ऐसी गहरायी दे जाते है जिसे साधना संभव नहीं होता. मसलन हैदर फिल्म के एक गीत के बोल है- “अरे आओ न कि जान गयी जहाँ गया सो जाओ, अरे आओ न कि थक गयी है ज़िन्दगी, सो जाओ. न शाम न सवेरा, अँधेरा ही अँधेरा, हैं रूहों का बसेरा सो जाओ”. अब इस गीत का अर्थ केवल जीवन के अँधेरे से नहीं है (इस गीत की कल्पना ही रोंगटे खड़े करने वाली है क्यूंकि ये गीत कब्र खोदने वाले गा रहे है. कब्र में सोने के क्या मायने होते है उसकी अभिव्यक्ति इस गीत को खौफनाक बना देती है. साथ ही अगर आप इसमें कश्मीर कि दशा का चित्रण भी मिला दो तो ये गीत एक तरफ तो मानव जीवन के खोखलेपन कि गिरहें खोल देता है और दूसरी ओर राजनैतिक-सामाजिक चित्रण भी जीवंत ढंग से करता है (कश्मीर की हिंसा के मानवीय मूल्य पर कटाक्ष). इसी तरह उनकी स्वयं की निर्देशित फिल्म “माचिस”(१९९६) का एक गीत है- “पानी पानी रे, खारे पानी रे, नैनो में भर जा, नींदे खाली कर जा”. गौर से सोचा जाए तो ये गाना भी एक साथ कई कटाक्ष करता है, और ये गाना बिना कथानक को जाने अधूरा सा जान पड़ता है. इस गीत का एक तात्कालिक अर्थ है जो बहुत सतही है- नायिका को अपने चेक पोस्ट की निगरानी करनी है और इसलिए उसे रात भर जगे रहना है, और इसीलिए वो आँखों और चेहरे पर पानी डालते हुए गा रही है. परन्तु, यहाँ जो शब्द प्रयुक्त हुआ है वो है खारा पानी, जिसका एक आशय आंसू से भी है. और यही इस गीत का गूढ़ अर्थ है. ये गीत व्यक्तिगत त्रासदियों कि अभिव्यक्ति तो है ही साथ ही साथ ये सिख दंगो के फल्स्वरूप उपजे अनिश्चितताओ, हताशा, क्लेश व अपनी मिट्टी से उखड चुके लोगों के दर्द को समेटे हुए है. पर ऐसा नहीं कि हर गीत का छुपा अर्थ राजनैतिक ही हो. मसलन, गुलज़ार की निर्देशित फिल्म “लेकिन” (१९९१) का एक गीत है- “यारा सीली सीली, विरह की रात का ढलना”, जिसकी कुछ पंक्तियाँ यूँ है- “पैरो में न साया कोई, सर पे न साईं रे, मेरे साथ जाए न मेरी परछाई रे”. ये गीत एक दार्शनिक अर्थ देता है शब्दों का तो इसमें बहुत सुन्दर खेला गया है पर गौर से सोचे तो ये गीत वास्तव में कहानी को सार्थक करने का काम करता है. ये गीत कोई सामान्य व्यक्ति नही महल की चारदीवारियो में कैद एक भूत गा रही है, और इसलिए ये गीत न केवल दार्शनिक रूप से अपितु शाब्दिक रूप से भी सटीक है.  आत्मा का न तो कोई साया होता है (आत्मा खुद एक साया है) न साईं या ईश्वर, और न ही आत्मा की कोई परछाई होती है.

ऐसी ही अभिव्यक्ति जब तक है जान (२०१२) के गीत “हीर हीर न अखो अडियो” में भी दिखती है. इस गीत का असली भाव समझने के लिए आपको हीर-राँझा और मिर्ज़ा-साहिबान की प्रेम कथाओ के विषय में थोडा ज्ञान आवश्यक है. हीर राँझा की कहानी का दुखांत हुआ जहाँ  दोनों की अंत में मृत्यु हो जाती है. परन्तु मिर्ज़ा साहिबान कि कथा में मिर्ज़ा साहिबान को घोड़े पर ले जाता है (यद्यपि इस कथा का अंत भी दुखद है, इस गीत में घोड़े पर ले जाने का ज़िक्र है). यही कारण है कि नायिका स्वयं को हीर राँझा से ज्यादा मिर्ज़ा साहिबान से जोड़कर देखती है. हीर उन दुखद प्रेम कथाओ की परिपाटी में शामिल है जहाँ प्रेमी जीवन भर प्रेम में दुःख भोगते है और अपनी नियति को स्वीकार कर लेते है (हीर का विवाह किसी और पुरुष से कर दिया गया था) वहीँ मिर्ज़ा साहिबान प्रेम में बागी हो गए और उनका प्रेम मरते दम तक झुका नहीं. हीर गीत के बोल अपने प्रेम को इसी रंग में रंगते है. वास्तव में गुलज़ार के गीतों में जैसा सौंदर्यशास्त्र दिखता है उससे भी अधिक भाव है, अर्थ की गहरायी है और मानव संवेदनाओ की समझ है. मानो वर्षो का दर्शनशास्त्र किसी ने दो  घूँट में पिला दिया हो, जो न सिर्फ दिल को छुआ पर आत्मा के आर पार उतर गया. गुलज़ार के गीत आत्मा की दवाई है. हर रोज़ थोडा थोडा पीयेंगे तो लगेगा कि ज़िन्दगी के सारे अनुभव चाँद मिनटों में मिल गए है.

समय गुलज़ार का प्रिय विषय है. वक़्त का यूँ ही बदल जाना और कभी कभी सालो तक वक़्त न बदलना दोनों ही स्थिति बड़ी कष्टदायक होती है. कभी समय के थपेड़े अपने साथ इंसान को भी बहा ले जाते है कभी कभी इंसान लम्हों में यादो में रहकर युगों युगों तक एक जगह रह जाते है. वक़्त और रिश्तो की इस कशमकश को गुलज़ार से बेहतर कौन समझे. वो कहते है- “वक़्त के सितम कम हसीं नहीं, आज है यहाँ कल कहीं नहीं, वक़्त के परे अगर मिल गए कहीं”. शब्दों की कीमत वो भी समझते है, जानते है कलम और आवाज़ समय की मोहताज़ नहीं है. गुलज़ार के शब्द वक़्त के थपेड़ो के आगे नहीं झुके. और उनके शब्दों पर उन्ही के गीत वाजिब लगते है- “नाम गुम जायगा, चेहरा ये बदल जायगा, मेरी आवाज़ ही पहचान है, गर याद रहे”. पर वो इस बात से भी वाकिफ है कि वक़्त कभी घड़ी की मात्र एक टिक टिक नहीं होती. वो अपने भीतर समेटे चलती है लाखों यादें, संवेदनाएं, आकांक्षाएं, भावनाएं और जाने क्या क्या. कभी उनके गीतों में इन लम्हों की याद दिखती है कभी अधूरी आकांक्षाओ की टीस, तो कभी बदलते वक़्त की बदलती तस्वीर और कभी ठहरे वक़्त में फंसे राही की व्यथा. “एक बार वक़्त से, लम्हा गिरा कहीं, वहाँ दास्तान मिली, लम्हा कहीं नहीं…” इसी बात की अभिव्यक्ति करता है कि वक़्त कभी सिर्फ वक़्त नहीं रहता, एक कहानी बनकर लाखों तक पहुँच जाता है या याद बनकर दिल के किसी कोने में बस जाता है. “जो गुज़र गयी, कल की बात थी, उम्र तो नहीं, एक रात थी” एक आशा है कि बुरा वक़्त कितना भी लम्बा लगे, भविष्य कितना भी अँधेरा लगे, बस उस लम्हे के गुजरने की देर है. और हम कैसे भूल सकते है उनके कालजयी गीत को जो पुराने वक़्त की यादो की चाशनी को अपने वर्तमान के दर्द में घोल देना चाहती है ताकि जुदाई थोड़ी कम दर्दनाक लगे, तभी तो वो लम्हों के दामन में छुपा अपना सामान मांगती है- “मेरा कुछ सामान तुम्हारे पास पड़ा है. सावन के कुछ भीगे भीगे दिन रखे है, और मेरे इस ख़त में लिपटी रात पड़ी है, वो रात बुझा दो, मेरा वो सामान लौटा दो”. और एक गीत ऐसा भी यहाँ वो दर्द को सालो साल बीते वक़्त के लौट आने की उम्मीद में दबाने की टीस को जगजाहिर करते है- “हज़ार राहें मुड़ के देखी, कहीं से कोई सदा न आई”. इस गीत की कुछ पंक्तियाँ रिश्तो के टूटने की तस्वीर को किस खूबसूरती से पेश करते है जहाँ वक़्त बस दो लोगों के अहं का मूक दर्शक बनकर रह जाता है- “तुम्हे ये जिद थी कि हम बुलाते, हमें ये उम्मीद वो पुकारे, है नाम होंठों पर अब भी लेकिन, आवाज़ में पड़ गयी दरारे”. और अंततः वक़्त के पथिक या तो वक़्त के झोंको के साथ मस्तमौला उड़ते जाते है या वक़्त के इंतज़ार में कहीं रुक जाते है. तभी कभी “मुसाफिर हूँ यारो, न घर है न ठिकाना” की स्वछंदता देखने को मिलती है तो कभी “मैं एक सदी से बैठी हूँ, इस राह से कोई गुज़रा नहीं” का दर्द शब्दों से छलक पड़ता है तो कभी वक़्त और ज़मीन से लड़ने की जद्दोजहद जिसमे जीतेगा कौन पता नहीं- “छोड़ आये हम वो गलियाँ”. गुलज़ार को कलाकार से अधिक दार्शनिक माना जाए तो कुछ गलत नहीं होगा.

गुलज़ार कोई नाम नहीं एक विचार है जो कुछ लफ्जों में ऐसा ताना बाना बुन जाते है कि फिल्म भूल जाओ चाहे ये शब्द नहीं भूले जायेंगे. वो गीतकार के साथ संवाद लेखक भी बेजोड़ थे. आनंद फिल्म में एक संवाद है- “आनंद मरा नहीं, आनंद मरते नहीं”. गुलज़ार आज है, प्रत्यक्ष है तो भी जीवित है, कल नहीं रहेंगे तो भी जीवित रहेंगे क्यूंकि “नाम गुम जायगा चेहरा ये बदल जायगा, पर गुलज़ार के शब्द अमर थे अमर है अमर रहेंगे”.

 

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