समझ नहीं आता हम कैसी नींव रख रहे है. रोज़ देखता हूँ अनगिनत पोस्टर दीवारों पर अपने फटे उधडे अस्तित्व में से चीख चीख कर स्वयं को सार्थक करने का प्रयास करते हुए. चुनाव से मेरा कोई सरोकार नहीं है सीधे तौर पर, लेकिन विश्विद्यालय मेट्रो स्टेशन से लेकर पूरे कैंपस तक हर कतरा शोर कर रहा है, और ये शोर कान फाडू हो न हो बुद्धि को विचलित अवश्य कर देता है. ऐसा प्रतीत होता है कि हम अराजकता में जी रहे है, चुनाव न हुआ युद्ध हो गया. एक दल ने तो ये साक्षात् कह दिया- “खून बहायेंगे पर इस बार खून का रंग….” आगे आप खुद समझदार है. हिंसा के आरोपी जब चुनाव में खड़े होकर अहिंसा की बात करते है तो उनकी मुर्खता पर हंसी आती है और देश के भविष्य की चिंता होने लगती है. अचरज की बात तो ये है कि हमाम में सब बराबर निर्वस्त्र खड़े है और समझते है कि वे ही तारणहार है. और जो लोग वास्तव में जीतने योग्य है, अँधेरे में एक हलकी सी चिंगारी है उनसे हम सर्वथा अपरिचित है. जब भी दलगत राजनीति से साक्षात्कार होता है तो मन ही मन ये आशा करने लगता हूँ कि नोटा का बटन दबाकर इन लोगों को एहसास कराया जाए कि तुम लोग जीतने के क्या इस मंच पर खड़े होने के भी लायक नहीं हो, अगर सच में छात्रों के हित से इत्तेफाक रखते हो तो तुरंत मंच छोड़ दो क्यूंकि छात्र का हित नेता कर सकते है गुंडे नहीं. कभी मन करता है कि राजा चौधरी जैसे तर्कशील और संवेदनशील युवाओ को बढ़ावा दे जो निर्दलीय है और इसलिए दलगत राजनीति की नौटंकी से परे है,पर मैं किसी का प्रचार नहीं करूँगा. इसलिए नहीं कि मुझे राजा चौधरी पर विश्वास नहीं वास्तव में मुझे उन मतदाताओ पर भी विश्वास नहीं जो बियर की बोतल, एम्यूजमेंट पार्क और फिल्म स्क्रीनिंग की घूस की कीमत पर बिक जाते है. हमें वही मिलेगा जैसे हम स्वयं है.

पोस्टर के चीथड़े चिल्लायेंगे, बड़े बड़े सायरन शोर मचाएंगे और हम और आप चुनाव के उद्देश्य को भूल जायेंगे. और फिर हर साल यही इतिहास दोहराया जायेगा. क्यूंकि हम लोग बिकाऊ है….. ये किसी दल पर कटाक्ष नहीं है ये ताना है हम सब पर, जो दूसरो का मुंह दबाती है और फिर जोर से चिल्लाती है- “बोल के लब आज़ाद है”, जो भारत माता और वन्दे मातरम को अपनी जागीर समझते है और वो भी जो इस तमाशे को हर साल देखती है और बस देखती रहती है….. पोस्टर बनते रहेंगे फटते रहेंगे और नए बंटते रहेंगे, देखते है हमारे ज़मीर कब तक बिकते रहेंगे.

कह दे हमसे आज कोई ये

कि मैदान की घास अब भी हरी है

कह दे हमसे आज कोई ये

दुनिया रंगो से भरी है

कह दे हमसे आज कोई ये

है उजाला अब भी जग मे

कह दे कोई आज हमे ये

की खून ही बहता है इस रग मे

ऐसा ना हो की हरी घास को

पैरो तले रौंदा गया हो

रंगो को बेरंग किया हो

अमावस ही रोशन हुआ हो

ऐसा ना हो की

देख के दुनिया का ये रूप

खून मेरा जम गया हो

आँख मेरी बंद है मुझे

कोई बताओ की इस दुनिया

मे कोई आज़ाद परिंदा है

कोई आज हमसे ये कह दे

की इंसान अभी भी ज़िंदा है

 

 

 

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