-संतोष कुमार

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मंच पर एक एक माननीय महोदय पधारते है, बोलना आरम्भ होते है, उनकी हर बात पर ताली बजती है, लोग खड़े होकर अभिवादन करते है, और आखिर में एक उद्घोष होता है- “भारत माता की जय” और पूरा हॉल अनुसरण करता है. उनकी हर बात में कटुता थी, पडोसी देश को जी भर के गलियाँ दी, और खूब खरी खोटी सुनाई राजनैतिक दल सिवाय सत्ताधारी दल के. समझ नहीं आता था कई बार कि एक सैन्य अधिकारी बोल रहा है या राजनीति. जितनी अधिक मुंह से नफरत उगलते थे, उतनी ही तालियाँ जोर से बजती थी और जैसे ही वो सेना का प्रशासनिक पक्ष बताने लगते थे हॉल खामोश हो जाया करता था. अट्ठारह- उन्नीस साल के लड़के युद्ध की परिकल्पना से इतना अभिभूत हो रहे थे कि एक पल को हतप्रभ रह गया कि क्या ये जानते भी है कि ये क्या मांग रहे है? खैर, इसके  पश्चात एक नामी शायर पधारे, उनको भी तालियाँ बजी और खड़े होकर अभिवादन भी मिला. सोचकर आश्चर्य होता है विलोमार्थी प्रतीत होने वाली बातें जनमानस अपने भीतर समाहित कर लेती है. या हो सकता है जो हमको विलोमार्थी लगती है, वो बातें वैसी हो ही न. पहले वाला नफरत बाँट रहा था, दूसरा वाला इश्क, और तालियाँ बजाने वाले लोग वही थे, तालियों का शोर भी इतना ही था, तो आखिर में ये लोग इतनी अलग अलग बातों पर तालियाँ कैसे बजा लेते है? क्या इसलिए कि हम शायद अपने मन में भावनाओ को विभाजित नहीं करते- ये प्रेम है, ये नफरत, ये अच्छा है ये बुरा, मन तो बस विचारो का संग्रहण करता है, इन्हें मापना तोलना, आंकना ये बुद्धि के काम है, भाषायी प्रयोग है. और हर अवसर आपको आपकी बुद्धि का इस्तेमाल करने का अवसर प्रदान नहीं करता. जब भावनाओ का प्रवाह इतना प्रबल हो तो हर भाव उसमे समाहित हो जाता है. शायद ताली बजाने वाले उन हाथों को भी आभास नहीं होगा कि वो व्यक्ति के लिए ताली बजा रहे है या विचार के लिए. ताली यदि व्यक्ति के लिए बजे तो विचार सिर्फ सुना जाता है समझा कितना जाता कहा नहीं जा सकता. क्या कोई बात केवल इसलिए महत्वपूर्ण हो जाती है कि उसको कहने वाला व्यक्ति महत्त्वपूर्ण है? या फिर व्यक्ति की पहचान हमें एक हिंट दे देती है कि क्या बात होने वाली है और उसपर किस तरह की प्रतिक्रिया दी जानी चाहिए?

खैर बात ये भी है कि हम ऐसे समाज में रहते है जहाँ प्रेम और घृणा दोनों धड़ल्ले से बिकती है. हम फूलों का बुके बनाकर उपहार में देते है, और हम ही है तो पूरे गुलशन को कुचलकर रेगिस्तान कर देते है. हम कलम पकड़कर शेर भी लिखते है  और तलवार पकड़कर खून भी करते  है. शायद हमने प्रेम को इतना बड़ा चढ़ा दिया है सर पर कि लगता है कि हमारा जीवन हमारा अस्तित्व सार्थक नहीं इसके अनुभव के बिना, पर  शायद हमने हिंसा को इतना सामान्य बना दिया है कि मौत हमें विचलित नहीं करती जब तक वो हमारी खुद की न हो, या हमारे करीबियों की न हो. हिंसा तो समान्य घटना है जो हमेशा शोक का कारण बने आवश्यक नहीं. ऐसा भी देखने में आता है कि हिंसा को महिमामंडित किया जाता है, और कैसी हिंसा को महिमामंडित किया जा सता है, इसकी परिधि में भी निरंतर विकास हो रहा है. सेना के महिमामंडन ने तो एक बहुत विशिष्ट स्थान हासिल कर ही लिया है, कई समाज और समुदाय अपने हिंसक इतिहास को बड़े गौरव से देखते है, और अपनी महानता के सबूत के तौर पर तलवारों और भालो की पूरी श्रृंखला दर्शा देते है. हिंसा लेकिन केवल किसी के द्वारा नहीं होती, किसी के विरुद्ध भी की जाती है. तो हिंसा किस पर या किन पर की जा रही है, ये भी निश्चित करेगा कि आपको नायक समझा जाएगा या खलनायक. और ऐसा भी नहीं कि प्रेम और हिंसा साथ साथ नहीं चल सकते.  हमारी कहानियां, महाकाव्य, कवितायेँ और ग्रन्थ, हिंसा को इतना काव्यात्मक, इतना सुन्दर बना देते है, कि ये जानते हुए भी कि यहाँ बात हिंसा की हो रही है, हम अनायास ही वाह वाह कर देते है. हिंसा सुन्दर हो सकती है, अगर शब्दों के सुन्दर लबादे में खून परोसा जा सके.

प्रेम का एक दूसरा पक्ष भी है, जिसके दो पहलू है. वो पक्ष तो ये है कि प्रेम को किस तरह देखा जाएगा, उसका एक सामाजिक दायरा होता है. प्रेम बोलने को तो व्यक्तिगत भावना है, परन्तु उसे सदैव एक सामाजिक वैधता की ज़रुरत होती है या यूँ कहे ये सामाजिक वैधता प्रेम पर ऊपर से थोपी जाती है. और जब कोई प्रेम हमारी सामाजिक नजरो में खटकता है, तो उसका समाधान होता है हिंसा. सच तो ये भी है कि दुनिया की सबसे नृशंस हत्यायो के पीछे प्रेम होता है. प्रेम एक आवरण होता है या एक बहाना, या प्रेम आपको व्यवधानों के हिंसक समाधान ढूँढने पर विवश कर देता है, या ये सभी बातें लागू होती है. प्रेम की अतिरेकता हिंसा का आरम्भ बन जाती है. या तो ये प्रेम आपको दूसरो के प्रति नफरत से भर सकता है, या उस प्रेम की प्राप्ति के लिए हिंसा भी एक सार्थक जरिया बन सकता है. तो हिंसा वे भी करते है जिन्हें उस प्रेम से प्रेम है और उन्हें भी जो उस प्रेम से घृणा करते है. तो प्रेमी जोड़े कई बार प्रेम में जान दे जाते है और कई बार ले भी लेते है. देश प्रेम को आधार बनाकर कई बार तथाकथित “देशद्रोही” हिंसा का शिकार होते है, किसी का अपने धर्म के प्रति प्रेम आसक्ति के उस स्तर तक पहुँच जाती है कि सिर्फ उसका विकास ज़रूर नहीं, ‘उसका ही’ विकास ज़रूरी हो जाता है. कुछ लोग वो भी है जो वैलेंटाइन डे पर गुलाबो और कार्ड से प्रेम की अभिव्यक्ति करते है और वो भी जो इसी दिन डंडे लेकर पार्को में घूमा करते है. ये लोग भी प्रेम की बात करते है, लेकिन “अपनी संस्कृति” की. तो मंच पर खड़े महोदय देश प्रेम की बात करते करते घृणा पर उतर आते है तो आश्चर्य नहीं करते, और तब भी आश्चर्य नहीं होना चाहिए जब घृणा से ओतप्रोत वातावरण शेरो- शायरी को भी उसी चाव से स्वीकार किया जाता है. प्रेम और घृणा विलोमार्थी बिलकुल नहीं है. हम प्रेम से प्रेम कर सकते है, प्रेम से घृणा कर सकते है, घृणा से प्रेम कर सकते है और घृणा से घृणा भी. परिवारों में तो ये कहावत माँ बाप अक्सर दोहराया करते है कि इंसान जिससे सबसे अधिक प्रेम करता है,जिस पर अपना अधिकार समझता है, उसी को डांटता है मारता है. इस तर्क के आधार पर तो हम जीवन की तकलीफों को सह लेते है कि “ईश्वर जिससे प्रेम करता है, उसी की सबसे कठिन परीक्षा लेता है”.

अब ये बातें सच कितनी है कह नहीं सकते, पर इतना तय है कि यदि प्रेम या हिंसा को एक विचार के रूप में समझा जाए तो दोनों एक दूसरे के पूरक है. प्रेम में जब टकराव होता है तो पैदा होती है हिंसा, परिवार का अधिकार जब प्रेमी के प्रेम से टकराने लगे तो कई बार परिणाम विप्लवकारी हो जाते है. कहीं न कहीं हमारे समाज ने न केवल इसका दायरा तय किया है कि प्रेम किसके साथ किया जाए (धर्म, जाति, रंग, रूप, वर्ग ) सबके तराजू में इसे टोला जाता है, अपितु ये भी कि प्रेम कहाँ किया जा सकता है. तो संस्कृति के ठेकेदार आपको सार्वजनिक स्थानों पर टोकेंगे, और न मानने पर ठोकेंगे भी, क्यूंकि तब प्रेम व्यक्तिगत नहीं रह जायगा, आपका प्रेम समाज की नज़र से देखा जाएगा. और हमारा समाज सार्वजनिक स्थानों में प्रेम को केवल शेर-ओ-शायरी के रूप में स्वीकृति देता है. इन सिद्धांतो का अनुभव करने के लिए अलग सामाजिक सांस्कृतिक सीमाएं है. उसी तरह घर के झगड़ो में तब तक किसी की रुचि नहीं होती जब तक  आवाज़ न आने लगे या प्रदर्शन खुले आम होने लगे. पर आश्चर्य की बात है कि जो समाज प्रेम के सार्वजनिक प्रदर्शन के प्रति इतना हिंसक हो जाता है, वो असली हिंसा को तमाशे की तरह चटकारे लेकर देखा करता है. हमारी नैतिकता का पैमाना सच में डांवाडोल है.

तो सत्य ये भी है कि प्रेम हमारी दुनिया की ज़रूरत समझी जाती है, और हर व्यक्ति के जीवन की पूर्णता भी (ये बात कितनी प्रमाणिक है इस पर संदेह है ). हिंसा भी हर इंसान की ज़रूरत है क्यूंकि हमारे भीतर उतने आदर्श नहीं जितने विकार है, उतना प्रेम नहीं जितना गुस्सा है-अपने आप से, औरो से, समाज, दुनिया से, भगवन से भी. जीवन की असमानताओ और विकटताओ का प्रतिफल है हिंसा. सब लोग हिंसा करते है, ज़रूरी नहीं दूसरो के वृद्ध, अधिकतर तो खुद को ही तबाह करते फिरते है, और ज़रूरी नहीं कि शारीरिक, सबसे सामान्य हिंसा तो मौखिक होती है जो भाषा के माध्यम से की जाती है, और मन ही मन जन्म लेने वाली हिंसा की कल्पनाओ का तो कहना ही क्या, जो कभी प्रतिफलित नहीं होती. शायर भी सच्चाई है, सेना भी. मेरे भीतर प्रेम भी है हिंसा भी, ज़रूरत पड़ने पर कौन किस रूप में अभिव्यक्त हो ये आप खुद नहीं बता सकते.

 

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