-संतोष कुमार

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हे पुरुष,

 

तू मर्यादा का है ध्याता

तू आचरण का है ज्ञाता

तू पूजनीय तू महान

तू अनुकरणीय तू गुणवान

तुझमे बसता है संसार

तेरी बनायीं इस दुनिया में

मेरा क्या है

कुछ भी नहीं

 

सब तेरे नीचे बसते है

तू हँसता है सब हँसते है

ईश्वर ने छवि तुझसे है पायी

हम तो केवल सहायक बन पायी

तू पैर धरकर तारण है करता

सम्मान की खातिर निष्कासित करता

कभी बाण चलाकर ताडन भी करता

कभी प्रेम की आड़ में मसीहा बनता

आखिर में सब तेरे गुण गाते

हमारे ९ मास व्यर्थ हो जाते

तुझपर लिखे जाते काव्य पुराण

मंदिर में तेरा होता गुणगान

और मैं भूलकर तेरी प्रताड़ना

दिव्यता का स्वांग रचाती

मंदिर में तेरे साथ में भी

पत्नी बनकर शोभा पाती

तेरी बनायीं इज्ज़त भी है

तेरा बनाया अभिमान भी

तू ही सत्ता का आरम्भ

तुझसे बना परिवार भी

हम तो निमित्त साधन है तेरे

तेरे प्रतिफल की सीढ़ी है हम

बाकि तेरी इस दुनिया में

मेरा क्या है

कुछ भी नहीं

 

जंगल क्या है महल है क्या

सब बराबर क्यूंकि तू है

शोषण करने वाला तू है

उद्धरक भी मेरा तू है

वाटिका में पेड़ के नीचे

कैद करने वाला भी तू है

आग जलाकर मेरे ह्रदय में

मुझे भस्म करने वाला भी तू है

मेरी लज्जा की रेखा

जिसने खींची वो भी तू है

उस रेखा के आगे मुझको

नोचने वाला भी तू है

मुझे घर की दहलीजो पर

बाँधने वाला  भी तू है

और घर की दहलीजो से

मुझे उठा लेने वाला भी तू है

अपनी महानता के किस्से

लिखने वाला भी तू है

हमको छोटा बताकर हमारी

आवाज़ दबाने वाला भी तू है

सदियों से कोख से अर्थी तक

मेरी अस्मिता मिटाने वाला तू है

मुझे मेरी ही नजरो में

गिराने वाला भी तू भी है

मेरी “रक्षा” के लिए

धनुष उठाने वाला तू है

और अपनी वहशी नजरो से

मेरे वस्त्र गिराने वाला तू है

तू तू है मैं भी तू है

तू सर्वव्यापी तू ही तू है

मुझे जानने के साधन

बनाने वाला भी तू है

मैं क्या हूँ ये दुनिया को

बताने वाला भी तू है

 

मेरा तो बस फ़र्ज़ है इतना

तेरे बनाये जंजाल में फंसकर

उसी में जाकर ढल जाना

जीना भी तेरे लिए

और तेरे लिए ही मर जाना

तुझसे आगे तेरे पार

मेरा वजूद तूने समझा है क्या

मेरे माथे पर सिन्दूर बनके

बसने वाला भी तू है

मेरी मांग भी मेरी नहीं

किसी की जागीर है

मेरे गहने बिंदी चूड़ी

तेरी गुलामी की तस्वीर है

ये तेरा शोषण है सुन ले

न कि मेरी तक़दीर है

ढूंढ रही हूँ तेरे भीतर

सोया कहाँ ज़मीर है

तू मुझपर थोपा गया

एक भारी सा बोझ है

उस बोझ के नीचे

मैं क्या हूँ

कुछ भी नहीं…….

 

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