Existentialist Paradise….

existentialist crisis

1.Existentialist paradise….

A chimera an illusion
A diversion from the
Misery of your existence
A place to be imagined
Based on your perceived
Sense of pleasure

You try to free yourself
From the clutches of life
You try to break away
The walls that restricts you
Where relations kinsmen
Are no longer required
Where you can massage
Your body and your egos

Where you move from
One dull, listless, meaningless life
To a happening, fascinating
And a meaningless life
Where no other can gaze you
And make you feel small
For Paradise is a place
Where you fetishize on your own
Where you are full of, fed with
Different versions of commodities
And you end up being
Another version of commodity

Where you finally stop making
Sense of the world and realize
That the whole world
Is a place very futile
And you no longer care
Because you are fetishized
By the fetish itself.

 

2. Life is what life does

life is a mirage
a labyrinth an illusion
the whole purpose of existence
is to find a purpose of existence
to live with an identity
that is not mine
life is a ring
and you are thrown into it
you run, you slip
you growl and you kick
you cry and you shout
and learn all this while
how actually to fight
life is the dew the mist
and the fog
that blurs your vision
so that you can’t see
that everything is futile
life is a trap of a better tomorrow
or nostalgic remembrance of the dead-decayed past
life is the false hope
that you are alive
life is the fear of death
that keeps you awake
life is the creepy realization
of your mundane existence
life is what life does
nothing at all
nothing at all!!
3. Oppressed by  me….
I am oppressed
In every nook and corner
Through my very nature
Through my very existence
And I can’t cry alas
For I have internalized my oppression
I can’t complain oh god
For it is part of my being
I am not what I think I am
And I can’t complain
For I am my own oppressor
I am harassed
Whenever I try to exist
Beyond the shadows of
The existence bestowed on me
I am harassed
When I refuse
To condition according to
The need of society
When I gaze the
Gaze of patriarchy
When I revolt against the
Visible vestiges of my privilege
When I try to stop being
Fetish for someone else
Then I am devoid of
My own identity
The cloak of my perceived self
Masquerading the real me
Is snatched away from me
And I can’t do anything
For I am no longer me….
4. Slave of mine, master of mine….
the dialectic of consciousness
the labyrinth of existence
the crisis that unfolds
the mystery never resolves
my name- oh its not mine
someone named me and i am fine
why was i born- oh i don’t know
my parents took the decision
and i am the byproduct
now i want an identity
oh the society gave me many
my name, religion, caste, class, creed
language to articulate all emotions
a brigade of kinsmen and relations
i never knew who am i really
a reality, a consciousness
a dream, chimera, fantasy
a robot with a heart and mind
an animal with an erected spine
a phantom, a particle, an atom, a mole
a sperm, a cell, plasma, none of all
not energy, nor ray, nor wave or quantum
many identities i have
but none of my owni am not the stone that you can throw at will
nor am i the chestnut fruit
that falls now and then
i am the slave of mine
and the master of perceived
identity of mine
in between these two extremes
somewhere lies my existence

i asked, asked, asked and asked
i asked my present
and look into the past
my life is mess and i don’t know why
may be because i don’t know who am i

5. I am dead but I can’t die…..
death is the realization
that something in you
was alive till now
death comes with an assumption
that your existence was real
and not a mere facade
thousand deaths i die
in my heart every day
my wisdom is in comatose
my emotions paralyzed
my senses seem to be mere illusion
i am dead but i can’t die
to bear the brunt of my existence
i am still alive
to live not once
and die innumerable times
i am still alive
no hope no reason to live
but i am still alive
i am dead for me
but for the world
i am still alivei have the obligation to live
but not the right to die
my senses seem to be mere illusion
i am dead but i can’t die

मेरी आँख का काँटा….

मेरी आँख का काँटा मेरी आँखों को चुभता तो है पर दूसरो के आँखों में ज़रा सी धूल मुझे अधिक बेचैन कर देती है. वो धूल इसलिए अधिक दिखती है क्यूंकि दूसरो को परखना खुद को परखने से बहुत सरल होता है. और हो भी क्यूँ न, ये हमारे अहं की तृप्ति जो करता है. अपने स्वयं को जिस सांचे में ढाल लिया है हम चाहते है दुसरे भी उसिसांचे में ढल जाए. एक आस्तिक एक नास्तिक को हेय दृष्टि से देखता है और नास्तिक व्यक्ति सामने वाले को मुर्खाधिराज की उपाधि देने में देर नहीं लगाता. हेगेल ने कहा था कि “हर विचारक के अनुयायी यही समझते है कि उन्ही को एकमात्र सत्य व सर्वगुण संपन्न दर्शन की प्राप्ति हुई है, और यही कारण है कि वो अन्य सभी दर्शनों को हीन व अधूरा मानते है. ये अनुयायी इस विचार से प्रेरित है कि इनका दर्शन अपरिवर्तनीय, संपूर्ण व अंतिम सत्य है, इससे आगे कुछ और नहीं जानने को और इसके अलावा कोई और मार्ग नहीं है जानने का. अतएव ये सत्य प्रश्न व शंकाओ से परे है और किसी भी  आलोचना से इस ज्ञान की रक्षा आवश्यक है. ये दार्शनिक कदाचित ये नहीं समझ पाते कि सत्य की अनेकानेक परिभाषाएं वास्तव में सत्य का विस्तार करता है”.

मेरी आँख में लगी धूल  तुम्हे दुखी नहीं करती है ये तो तुम्हारा तरीका है अपनी शक्ति और सामर्थ्य के प्रदर्शन का. पावर हर जगह है बस हम कैसे उसका इस्तेमाल कर सकते है इसके बहुत से तरीके है. मेरी आँख में धूल के कण हम ढूंढें न ढूंढें लोगों के दिलो में कांटे ज़रूर बो देते है. और इस कटुता को छुपाने के बहुत से बहाने है हमारे पास- “मैं तो सच बोलने में यकीन रखता हूँ. सच तो हमेशा कड़वा होता है”. जी नहीं बंधु सत्य हमेशा कड़वा हो ये आवश्यक नहीं, काफी कुछ बोलने वाली की नीयत पर निर्भर करता है. जो दिल दुखाकर पूछते है कि “मैंने कुछ गलत बोला क्या?” जी हाँ बंधु. कई बार दोस्त हंसी मज़ाक में दूसरो को गालियाँ भी दे देते है और कोई बुरा नहीं मानता और कई बार हलकी फुलकी कोई छोटी सी बात बहुत गहरी चुभ जाती है. बोलने वाले की नीयत और सुनने वाले की सहनशीलता दोनों की परीक्षा है ये.

हाँ ये बात सत्य है कि ये बताना सम्भव नहीं कि कोई व्यक्ति आपकी किस बात पर बुरा मान ले. ये बताना कदापि संभव नहीं कि सामने वाला व्यक्ति आपकी बात को किस तरह ग्रहण करता है. “बुरा मान जाना” या “आपत्ति होना” अपने आप में एक मनोविज्ञान है जिसमे विस्तृत विमर्श की आवश्यकता है, और इसलिए इस विषय को अगले लेख के लिए छोड़ देना बेहतर है. फिलहाल प्रश्न ये उठता है कि तेरी आँखों का मैल मेरी आँखों के कांटे से अधिक क्यूँ चुभता है. क्या इसलिए कि मेरी आँखों के कांटे ने मुझे इस कदर अँधा कर दिया कि अपनी आत्मा का अस्तित्व हमें नज़र नहीं आती. हम एक ऐसी ज़िन्दगी जी रहे है जो हम अपने आप के लिए नहीं बल्कि दूसरो के लिए जीते है, हर ख़ुशी को हर गम को तोलकर देखते है दूसरो के साथ. तो अगर मेरी एक आँख फूटी है तो मेरे पडोसी की दो फूट जाए. मेरे ६० नंबर बुरी बात है, मेरी दोस्त के ५५ आये दिल को थोडा सुकून मिला, खुद की आशाओ से हार गया लेकिन सामने वाले से तो जीत गया. मेरा अस्तित्व अस्तित्व कम अहं अधिक है. और शायद इसलिए हम दूसरो की आँखों का धूल  देखते है कि अपनी आँखों के कांटे से अपना ध्यान हटा सके.

हम सब नेता बनना चाहते है हमारे एक भैया कहते है. सच भी है, हम अपना ज्ञान तब तक अधूरा मानते है जब तक १० लोगों के सामने उसका पांडित्य प्रदर्शन न कर ले. ऐसे में ज्ञान का उद्देश्य हमारे अहं की तृप्ति हो जाती है. दूसरो के समक्ष खुद को ज्ञानी साबित करना, बेहतर साबित करना अपने आप में अलग अनुभूति है. वास्तव में हम पूरे संसार को या तो अपने प्रतिरूप के रूप में देखना चाहते है अथवा अपने अनुयायी के रूप में. मैं भी क्यूँ लिख रहा हूँ शायद इसलिए कि आप मेरी वाहवाही करे. आलोचना करेंगे तो मैं उसका प्रतिकार करूँगा क्यूंकि आपने मेरे लेख में मेरी आँख की धूल देख ली अब आपके कमेंट्स में आपके आँखों की धूल देखूंगा.

बाइबिल के न्यू टेस्टामेंट के गोस्पेल ऑफ़ मैथ्यू के सातवे अध्याय में लिखा है बहुत खूब-

१.Judge not, that ye be not judged.
२ .For with what judgment ye judge, ye shall be judged: and with what measure ye mete, it shall be measured to you again.
३.And why beholdest thou the mote that is in thy brother’s eye, but considerest not the beam that is in thine own eye?
४.Or how wilt thou say to thy brother, Let me pull out the mote out of thine eye; and, behold, a beam [is] in thine own eye?
५.Thou hypocrite, first cast out the beam out of thine own eye; and then shalt thou see clearly to cast out the mote out of thy brother’s eye.

मुझे नहीं लगता इन पंक्तियों को समझाने की आवश्यकता है. हाँ भले ही लोगों को जज करना एक सामान्य मानवीय क्रिया भी हो सकती है, और इसमें कोई गुरेज़ भी नहीं, बर्शते नीयत सही हो. हर इन्सान अन्दर ही अन्दर इस बात से वाकिफ होता है कि उसने कोई बात क्यूँ कही है. तो कृपया-“तुम नाराज़ क्यूँ हो गए, मैंने ऐसा क्या कह दिया” वाली भोली शक्ल वाला दिखावा न ही करे तो बेहतर है. क्यूंकि फिराक गोरखपुरी जी बहुत सही कह गए है-

“जो मुझको बदनाम करे है काश वो इतना सोच सके;

मेरा पर्दा खोले है या अपना पर्दा खोले है”

इन सब बातों ने मेरी आदत छूटेगी न आपकी, बस इतना तो कर ही सकते है कि दूसरो की आँखों की धूल को देखते देखते कभी कभी अपनी आँखों से काँटा निकले का भी प्रयास कीजियेगा.क्या पता आँखों के मैल से अधिक भी कुछ दिखने लगे. और वो नहीं गाहे बगाहे कभी कभी अपने गिरेबान में भी झाँक कर देख लेना, क्या पता दूसरो के मीन मेख खोजते हुए अपने मन में कितनी कालिख पोत दी हो हमने. और ख़ास तौर पर उन लोगों के लिए जो दूसरो में कमियाँ खोजते है, किसी के व्यवहार में, किसी के विचार में, किसी के आचार में, और जिनको कुछ नहीं मिलता वो शक्ल-सूरत में कमियाँ खोजते है. विचार की कमी खोजने को आलोचना समझ सकते है लेकिन जो आपके शरीर का आपके रूप का मखौल उदय वो तो निरीह वैमनस्यता ही है.

बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय,

जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय।

सुसाइड……

“अगर हिम्मत नहीं थी तो मरने क्यूँ  आया?”

“अगर इतनी ही हिम्मत है तो मर क्यूँ रहा है”?

इन दो पंक्तियाँ गूढ़ विमर्श छुपा हुआ है. हमारे समाज में आत्मदाह को लेकर जितने विचार नहीं है उतनी भ्रांतियां है. हम लोग इस विषय पर बोलने को आतुर है पर समझने को अग्रसर नहीं. जीवन में सभी को कभी न कभी ये ख्याल आता है कि आखिर इस ज़िन्दगी का मतलब क्या है? क्यूँ जी रहा हूँ मैं? ज़िन्दगी बेज़ार लगती है और मौत आसान रास्ता. पर हम में ज़्यादातर लोग इस रास्ते को अख्तियार नहीं करते, शायद मौत का डर शायद ज़िन्दगी का मोह, शायद घरवालो की चिंता शायद दुनिया का ख़याल, बहुत से कारण होते है कि पाँव ठिठक जाते है. पर हमारे समाज में विडंबना अजीब है, हम लोगों को उनके फैसलों के लिए जज करते है. खासतौर पर उनके लिए जिनकी आत्मदाह का प्रयास विफल हो जाता है. सुसाइड किसी के मन की कमजोरी है या जुझारूपन की कमी ये निश्चित करने का अधिकार किसी को भी नहीं. “मेरे सामने भी तो आई थी ये समस्या मैंने तो आत्मदाह नहीं किया” ये वो बेहूदा वक्तव्य है जो टूटे हुए इंसान को और तोड़ने का काम करता है. जीवन की आशा जिसमे खो गयी हो उसपर सवाल उठाकर आप सिर्फ उसको और नीचे गिरा सकते हो. सुसाइड का तो आधार ही ये है कि जब इंसान को जीने का कोई रास्ता नहीं दिखता (यद्यपि रास्ते होते है). ज़रूरी नहीं कि आत्मदाह सोच समझ के किया जाए, कई बार तैश में आकर या क्षणिक असंतुलन का भी परिणाम होता है पर ऐसा भी नहीं कि आत्मदाह मूर्खता है. किसी के लिए उसका जूता खो जाना भी बहुत बड़ा दुःख है, निर्भर करता है व्यक्ति की मनोवृत्ति क्या है. समस्या तो ये भी है कि हमारे समाज में मनोरोगी को पागल और मनोचिकित्सक को पागलो का डॉक्टर मान लिया जाता है. तो अगर आपको समस्या भी है तो आप बताएँगे नहीं और बताएँगे नहीं तो आपकी कुंठा आपको अन्दर ही अन्दर खा जाएगी. और फिर जो आत्मदाह करने जायेगा वो महज एक खोखला शरीर होगा.

न दिल चाहिए न दर्द चाहिए

न आहें हमें कोई सर्द चाहिए

न रिश्तो का ढोंग न नातों का नाम

रहने दो हमें कहीं गुमनाम

गुमनाम हूँ जहां आराम है वहीँ

है नाम बड़ा जिसका नाम ही नहीं.

आत्मदाह करने वाला व्यक्ति वास्तव में अपनी अस्मिता को खो चुका होता है या अपने अस्तित्व से संघर्ष कर रहा होता है. अपनी काय को नष्ट करने का एक अभिप्राय ये भी है कि हम अपनी काया को अपना अस्तित्व मानकर बैठे है. मैं यहाँ आत्मा परमात्मा के विषय में बात नहीं कर रहा अपितु उस सत्य को इंगित कर रहा हूँ जो कई सालो पहले sartre ने कहा था- हम स्वयं को को चेतना के रूप में देखते है और दुसरे हमें काया के रूप में. आशय ये है कि जब हम आत्मदाह करने जा रहे है तो हम अपने अस्तित्व को भूला बैठे है. हम दिखती है तो बस एक काया. सुसाइड को जज करने से पहले उसे समझने की ज़रुरत है. हम सब को सहारा चाहिए अपना, दूसरो का, कम से कम भगवान् का. जब व्यक्ति आत्मदाह के लिए प्रेरित होता है तो वास्तव में वो अपना ही सहारा नहीं बन पाता. और इसलिए सुसाइड हर समय एक नया विमर्श खड़ा कर देता है- सुसाइड करना क्या वास्तव में इंसान का अपने शरीर पर हक को प्रमाणित करता है? या वास्तव में ये वो पल है जब मानव अपने आप पर ही हक खो बैठता है. प्रश्न विकट है  इसपर विमर्श चाहिए वार्तालाप चाहिए आक्षेप नहीं विवाद नहीं.

कितना आसान है रुला देना किसी को

मुश्किल है ये कितना भुला देना किसी को

हूँ अँधेरे में कब से सवेरा चाहिए

सवेरा चाहिए न अँधेरा चाहिए

न ज़िन्दगी हमें और ज़र्द चाहिए

न दिल चाहिए न दर्द चाहिए

न आहें हमें और सर्द चाहिए….A New Design (2)

मेरा होना…..

-संतोष कुमार

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पल भर को मन को खुश कर जाती

झूठी आशाएं

कडवी हकीक़त से दूर ले जाती

झूठी आशाएं

दिल में एक मिठास जगाती

झूठी आशाएं

सच्ची सी लगती है ये

झूठी आशाएं

आँख खुलते ही टूट जाती है ये

झूठी आशाएं

आती है हँसाकर जाती है रुलाकर

झूठी आशाएं

दिल में दर्द दे जाती है

झूठी आशाएं

तारो की तरह टूट जाती है ये

झूठी आशाएं

बड़ी झूठी होती है ये

झूठी आशाएं

 

 

 

अपने होने को होना कहूँ तो न होना क्या है। जब वजूद पर न यकीन हो न उससे कोई आशा तो ऐसा वजूद हम पर बोझ नहीं तो क्या है। रिश्तों के साथ समस्या बड़ी है कुछ बने बनाए आते है कुछ हम खुद बनाते है पर एक बार बना लेने पर रिश्ते बेड़ी बन जाते है। रिश्ते निभाना क्यों जरूरी है ये तो बाद का सवाल है रिश्ता होना ही क्यों चाहिए। अगर हम अकेले खड़े हो तो क्या हमारा अस्तित्व है, अगर नहीं तो ऐसे अस्तित्व का करना ही क्या जो हमारा है ही नहीं जो दूसरों पर निर्भर है। मैं दुनिया में आया मेरा फैसला नहीं था तो इस ज़िन्दगी को निभाना हमारी ज़रुरत क्यों। अगर भगवान् ने सचमुच हमें बनाया है तो मैं पूछना चाहता हूँ कि क्यों? दुनिया बनायीं ही क्यों? हमको बनाया ही क्यों? हमको ज़बरदस्ती कुएँ में धकेल देते है और कहते हो इसी में रहो और अगर बाहर निकलना हो तो मेरा आह्वाहन करो। मुझे दया आयी तो तुम्हे बाहर निकाल दूंगा। अगर उभरना ही हमारी मंज़िल है तो हम खायी में जाए ही क्यों? पहले जहन्नुम सी ज़िन्दगी देते हो फिर कहते हो अपना अस्तित्व खोजो। अपने जीवन का उद्देश्य खोजो। परंतु क्या जीवन का उद्देश्य खोजना ही सबसे बड़ा उद्देश्य नहीं है। इसी उद्देश्य के बूते तो हम अपनी अस्तित्व की सार्थकता प्रमाणित करेंगे। कोई शास्त्र पढ़ेंगे कोई दर्शन की किताब, कुछ चिंतन करेंगे पर प्रमुखतया जो भी सामने होता है हमारे उसे आत्मसात करेंगे। जिस दिन प्रश्न पूछ लिया उस दिन हमारा अस्तित्ब संकट में पड़ जायगा इसलिए शास्त्रों में विदित है कि ईश्वर पर प्रश्नचिन्ह लगाने वाले उसके कोप के भागी होंगे। तो हम कभी कुछ नहीं पूछते मान लेते है कि हम कुछ है, क्या है नहीं पता, क्यूँ है नहीं पता.

दुनिया के रहस्य जानने निकले है खुद की हमको सुध नहीं है, चाँद तारे तोड़ने निकले है अपने दिमाग में क्या चल रहा है उस सोच तक हमारी पहुँच नहीं. हम बिना भाषा के सोचते कैसे है? क्या बिना भाषा के सोचा जा सकता है, अगर हाँ तो कैसे? अगर ना तो कौन हमें सोचना सिखाता है, कौन हमें बताता है कि मैं मैं हूँ? क्यूँ मैं आईने में देखकर खुद को पहचान लेता हूँ लेकिन लाखों करोडो सालो की साधना से भी खुद को नहीं पहचान पाता. समाज के होने से मैं हूँ या मेरे होने से समाज है, रिवाज़ मैंने बनाये है या मेरे लिए ये रिवाज़ है, ये सांस मेरे लिए बनी है या मैं लेता हूँ तो ये हवा सांस है, क्या मेरी आवाज़ से बनते है ये शब्द या मेरे शब्दों में आवाज़ है? एक भैया कहते है ये “जेहन-ए-अय्याशी” है सब, जितना सोचोगे उतना मज़ा आएगा, तृप्ति मिलेगी सुकून मिलेगा, और सोचने का जूनून मिलेगा. बस जवाब नहीं मिलेगा. क्यूंकि हमें इस सोच में ही इतना मज़ा आ रहा है कि उत्तर तो हम जानना ही नहीं चाहते, और सच तो ये भी है कि उत्तर कुछ है भी नहीं. बस नए सवाल है, बस नए विचार है.

 

कह दूँ सब पॉवर स्ट्रक्चर है, मेरी अस्मिता थोपी गयी है मुझपर मेरा अस्तित्व उसको आत्मसात करना मेरा लक्ष्य है, या मेरा जीवन एक निरर्थक परिपाटी है जिसका अर्थ निकलकर ही जीवन को जीना संभव नहीं. क्यूंकि सबमे ये क्षमता नहीं कि जीवन का अर्थ निकाल सके. तो या तो वो जीवन भर अपने अस्तित्व से अनिभिज्ञ रह जाते है या धर्म, आस्था, मिथकों में अपना अस्तित्व तलाशने लगते है. या बोल दूँ सब ईश्वर की देन है क्यूंकि ये जवाब देते ही सोचने की आवश्यकता समाप्त हो जाती है. जवाब कितना ठोस है नहीं पता, पर कम से कम जवाब तो है, जेहन-ए-अय्याशी तो नहीं. सब कुछ जो होता है उसमे हमारा योगदान सिर्फ कलाकारों का है क्यूंकि करने वाला तो कोई और है. मतलब कुछ भी हो, हमारा अस्तित्व किसी की देन है, हमारा खुद का क्या है ये सवाल फिर से जेहन में आता है, भगवान् आखिर हमारे साथ क्यूँ जुड़ा है इसका जवाब फिर नहीं मिलता. एक बार फिर गोल घेरे में ज़िन्दगी फँस जाती है.

 

और फिर कोई हमें झकझोरता है और कहता है- क्यूँ इतना सोचते हो? सोच सोचकर ज़िन्दगी को और अधिक क्लिष्ट क्या बनाना और सच भी है. जीवन को सुलझाने से बड़ी उलझन कुछ नहीं, मौत से बड़ी ज़िन्दगी की कीमत कोई नहीं. तो क्यूँ ज़िन्दगी को और उलझाया जाए. क्या फर्क पड़ता है कि हमारे होने का कोई आशय नहीं हमारे पास, बस एक एहसास है कि हम है, दूसरो के पास एक नाम है हमें बुलाने को, एक पहचान है हमें याद करने की, जिसे हम मानते है पर जो हमारी  नहीं है. तो ओढ़ लो चादर और खो जाओ अँधेरे में. अस्तित्व के मच्छर काटेंगे तो नहीं.

 

 

जब कल का डर

आज हमे सोने ना दे,

बेहतर है झूठी

उम्मीदों  के सहारे सो जाना

 

बुजुर्ग

बुजुर्ग

-संतोष कुमार

 

घर में पार्टी जैसा माहौल. काफी चहल पहल. बच्चे आपस में शोरगुल और मौज मस्ती करते हुए. बड़े भी आपस में गपशप करते हुए. इसी शोरगुल के बीच एक बुजुर्ग व्यक्ति कमरे में दाखिल होता है. कुछ पल में कमरे में शोर थोडा कम हो जाता है. बुजुर्ग चुपचाप एक कोने में जाकर बैठ जाता है.

बेटा : पापा आप बेकार में आ गए यहाँ. अब बच्चो और हम जवानो के बीच बोर हो जायेंगे.

बुजुर्ग: अकेले कमरे में मन नहीं लग रहा था.

बेटा(कुछ उखड़कर): आ ही गए है तो बैठ जाईये

एक परिचित: सच बताईये अंकल जी, अकेले में डर तो नहीं लग रहा था न. जस्ट जोकिंग!!

बुजुर्ग एक पल उसे देखता है, फिर अपने बेटे को देखता है.

बुजुर्ग: खाली कमरे में डर नहीं लगता अब, भरी महफ़िल में दम घुटने लगा है…… बेटा इन्सान तब अकेला होता है जब अपने भी गैर लगने लग जाते है. जस्ट जोकिंग!!

(दोनों के मुंह बन जाते है)

बेटा: (आहिस्ता से दोस्त को कहता है)जब से माँ गयी है तब से उनका बर्ताव कुछ बदल सा गया है. उनको हम पर विश्वास नहीं रहा शायद. उनको लगता है हमने माँ का ठीक से ख्याल नहीं रखा.

(ये सुनते ही बुजुर्ग को पुरानी बाते याद आने लगती है)

बुजुर्ग और उसकी पत्नी कई सालो पहले टकटकी लगाये दरवाज़े पर बैठे है. पत्नी व्याकुल होकर इधर उधर फिर रही है जबकि बुजुर्ग थक कर सोफे पर बैठ जाता है.

पत्नी: कोई खबर आई? कोई फ़ोन, मेसेज?

बुजुर्ग: कुछ भी नहीं.

पत्नी: लगता है भूल गया है हमें. समझते है काम करता है, बिजी रहता है इसलिए खुद नहीं आ सकता पर कम से कम एक फ़ोन तो कर सकता है.

बुजुर्ग: इतनी टेंशन रहती है, भूल गया होगा.

पत्नी: कल को अपने माँ बाप को तो नहीं भूल जायेगा न?

बुजुर्ग: क्यूँ इतना नेगेटिव सोचती हो?

पत्नी: जब पढने के लिए बाहर गया तो हमने कभी शिकायत नहीं की. सोचा पढ़ रहा होगा भूल गया होगा. छुट्टियों में घर नहीं आया बोला पढ़ रहा हूँ. पढाई ख़त्म हुई तो शहर में नौकरी ले ली वापस नहीं आया. न खुद आता है न हमें आने देता है, कहता है अपना घर नहीं बनाया. अरे घर तो लोगों से बनता है, वरना तो ईंटो का ढेर है, उससे ज्यादा कुछ नहीं (बुरी तरह खांसने लगती है)

बुजुर्ग: तुम क्यूँ अपनी तबियत ख़राब करती हो? क्यूँ उसके लिए अपना दिल जलाती हो?

पत्नी: सोचती हूँ अगर जिंदा नहीं तो कम से कम मेरी लाश को देखने तो ज़रूर आएगा! (आंसू आ जाते है)

(वापस वर्तमान में)

बुजुर्ग(आहिस्ता से): तुम आये भी तो किसलिए….. जब मैंने अपना सब कुछ खो दिया!! तू जब नहीं था तो तेरी माँ तिल तिल करके मरी, अब तू है तो भी तिल तिल करके मर रहा हूँ.

(इससे पहले कि बात और गंभीर हो जाये. बुजर्ग को बच्चे बुजुर्ग को घेर लेते है. बुजुर्ग का ध्यान भंग होता है)

बच्चे: दादा जी कहानी सुनाइए न. पापा ने बोला आप अच्छी कहानी सुनाते हो.

बेटा: अरे मैं तो मज़ाक कर रहा था. चलो बच्चो सोने जाओ.

बच्चे: नहीं अब तो कहानी सुन के रहेंगे. दादा जी सुनाइए न

बुजुर्ग: मुझे सचमुच कोई कहानी नहीं आती.

बेटा: अब सुना भी दीजिये बच्चो का मन रखने के लिए. बस अपने गाँव की कहानी मत सुनाने लगना.

बुजुर्ग: ठीक है सुनाता हूँ.  ध्यान से सुनो. (कहानी को मजाकिया लहजे में कहने का प्रयास करता है लेकिन कई चेहरे और आवाज़ में असली भाव दिख जाते है और पता चल जाता है की कहानी वो नहीं जो बच्चे सुन रहे है कहानी वो है जो वो छुपाने का प्रयास का कर रहा है पर उसकी आँखें उसको धोखा दिए जा रहा है. उसकी आँखों में वो कहानी दिख जाती है जो शब्दों से पता नहीं चलती)

बहुत पहले की बात है. एक जोकर था. उसका काम था लोगों को हँसाना. वो उलटे पुल्टे करतब करता, उलटे सीधे मुंह बनाता, उछलता कूदता और सब खूब हँसते. सब उसे बहुत पसंद करते थे, जहाँ जाता महफ़िल जमा देता था, लोग उससे मिलने, उससे बात करने को आतुर रहते. पर धीरे धीरे वो जोकर बुड्ढा होने लगा. उछलना कूदना कम हो गया, चेहरे पर झुर्रियां पड़ने लगी, शरीर कमज़ोर हो गया. एक बार  उछलने कूदने लगा तो कमर लचक गयी, फिर तो वो जो रोया जो रोया कि लोगों की हंसी छूट गयी. जोकर रोता रहा लोग हँसते रहे.जब वो जोकर अपनी  कमर पकड़कर चल रहा था तो लोगों को बहुत हंसी आई. उस दिन उस जोकर को एहसास हुआ कि लोग उसके मज़ाक पर नहीं, उसपर हँस रहे थे. वो रोयेगा लोग हंसेगे, उसे चोट लगेगी तो लोगों को लगेगा मज़ाक कर रहा है. तो पता है उसने क्या किया?

बच्चे: क्या? (हैरत से)

उसने एक गुब्बारा बनाया. बहुत बड़ा जादुई गुब्बारा. सो भी दर्द जो भी दुःख, सारे आंसू, उस गुब्बारे में भरते जाता था और बदले में उस गुब्बारे से झूठी हंसी और दुसरो के लिए खुशियाँ ले जाता था. तो वो रोज़ सुबह शाम लोगों को खूब हंसाता खूब खुश करता और रात को गुब्बारे के सामने खूब रोता. गुब्बारा फूल फूल के बहुत बड़ा हो गया, और एक दिन…. फट गया. जोकर मरने लगा.  लेकिन जब लोगों ने मरते हुए जोकर को देखा तो उनकी हंसी छूट गयी…. चेहरे पे रंग पुता हुआ, दर्द से कराहता हुआ जोकर बड़ा फनी लग रहा था. कुछ लोगों को ये भी लगा कि मरने का नाटक कर रहा है अभी उठ खड़ा होगा. सब हँसते रहे, हँसते रहे और जोकर…. मर गया! पता है मरने से पहले जोकर के आखिरी शब्द क्या थे- “मुझे गुदगुदी करो, गाना गाओ, कोई जोक सुनाओ, मुझे हंसाओ कोई. मैं हँसना चाहता हूँ, रोना नहीं चाहता…रोना नहीं चाहता”. अरे कोई तो गुदगुदी करो, गुदगुदी करो!!

बच्चो ने गुदगुदी शब्द सुना तो हंसने लगे. “जोकर को गुदगुदी करो, जोकर को हँसना था. जाते जाते भी जोकर ने जोक ही  सुनाया. मुझे हंसाओ, मैं मर रहा हूँ!!” फिर बच्चे और जोर से हंसने लगे. एक बच्चा जोर जोर से बोलता और हँसता- “दादाजी ने आज क्या जोक सुनाया- जोकर कह रहा है लोगों से कि मुझे हंसाओ! मरता आदमी भी ऐसा बोलता है क्या, ये जोकर सचमुच जोकर था!!” बच्चे जोर से हँस रहे थे और बड़े भी मुस्कुराने लगे. लेकिन बुजुर्ग के आँखों से झर झर आंसू बहने लगे. अपने आंसू छुपाने के लिए वो कमरे से बाहर जाने लगा.

“वो रो रहे थे क्या?

“लेकिन मजाकिया कहानी में कोई रो कैसे सकता है?”

बुजुर्ग अपने आंसुओ पे काबू करते हुए अपने कमरे में पहुँचता है लेकिन कमरे में जाते ही वो फूट फूट कर रोने लगता है. काफी देर तक रोता रहता है. फिर दरवाज़े पर एक हलकी सी आहट होती है. बुजुर्ग जल्दी से अपने आंसू पोंछता है. उसे आशा थी कि शायद कोई उसकी कहानी का असली मतलब समझकर उसे सांत्वना देने आया है. पर दरवाज़ा खोला तो एक बच्चा खड़ा था.

बच्चे ने पूछा- “गुब्बारा फटने से जोकर मरा कैसे?”

“वो गुब्बारा उसका सहारा था, वो जरिया था अपनी बात कहने का. बिना सहारे कैसे जीता?”

“बड़ा पागल था जोकर. जब पता था कि गुब्बारा फट जायगा तो उतना भरा ही क्यूँ”

“दुःख बहुत अजीब चीज़ होती है बेटा. ये जीने का सहारा भी बनती है और मरने की वजह भी”

“ऐसा गुब्बारा असल में होत्ता है क्या दादाजी ?

“हाँ सब के पास होता है. कई लोग उसको दिल भी कहते है”. फिर अपने आप से –“जाने कब से इंतज़ार में हूँ. बस भरता जा रहा है, जाने कब फटेगा”. धीमे धीमे गाने लगता है-

“न दिल चाहिए न दर्द चाहिए

न आहे हमें कोई सर्द चाहिए

न रिश्तो का ढोंग

न नातो का नाम

रहने दो हमें कहीं गुमनाम

गुमनाम हूँ जहाँ आराम है वहीँ

है नाम बड़ा जिसका नाम ही नहीं”

कितना आसान है रुला देना किसी को;

मुश्किल है ये कितना भुला देना किसी को

हूँ अँधेरे में कब से- सवेरा चाहिए

सवेरा चाहिए, न अँधेरा चाहिए

न ज़िन्दगी हमें कोई ज़र्द चाहिए

न दिल चाहिए न दर्द चाहिए

न आहे हमें कोई सर्द चाहिए”

 

बुजुर्ग खाने की मेज़ पर आता है तो बच्चे फिर उसे घेर लेते है.

“एक सवाल तो पूछना भूल ही गया दादाजी?

“पूछो?”

“जोकर की मौत के बाद उसके परिवार का क्या हुआ?

“बड़े होकर उसका बेटा भी जोकर बन गया. वो भी बुड्ढा हुआ, उसे भी गुब्बारा मिला और वो भी रोते हुए मर गया और लोग हमेशा की तरह हँसते रहे. और ये दास्तान चलती रही”. ये कहकर बुजुर्ग ने अपने बेटे की ओर देखा. उसके बेटे के हाथ से चम्मच छूट गयी, और वो आवाक होकर अपने पिता को देखता रहा. आखिर में बस यही बोल पाया-

“न ये मजाकिया है, और न ये कहानी है”

“जानते हो वो गुब्बारा क्या है बेटा”

बेटा इसका जवाब नहीं सुनना चाहता था, वो जानता था उसे बर्दाश्त करने की हिम्मत उस में नहीं है.

“कुछ बहता हुआ सा मन मे है

जो बाहर आना चाहता है

है लावा या तूफान कोई

अंदर ही घुटता जाता है

सीने मे जलन करता है कभी

सपने या भ्रम बनता है कभी

ना रोता है ना हंसता है

अंदर ही अंदर डसता है

है लावा या तूफान कोई ये

जो मेरे अंदर बसता है

चिल्लाने को जी चाहता है

फट जाने को जी चाहता है

इतना बेचैन फिर रहा हूँ अब

थम जाने को जी चाहता है

उसे बाहर निकालू तो कैसे

वो कौनसा रास्ता जाता है

जो बाहर निकाले इसको मन से

दलदल मे फँसता जाता है

है लावा या तूफान कोई ये

बिन पूछे घुसता जाता है

ये हर दिन बढ़ता जाता है

मैं हर दिन झुकता जाता हूँ

मेरे अंदर का तूफान मेरा

अक्स बनते जाता है”

 

Duvidha: the dilemma inside and out

-Santosh kumar

The juxtaposition of narrative and visual give new dimensions to the narrative and open up new vistas of interpretations and possibilities. Reading and watching Duvidha, a story by Vijaydan Detha immortalized on the celluloid by Mani Kaul in 1973 familiarizes us with these feelings. There are various others precedents as well as successors to the story. Reading A.K.Ramanujan’s translation of the Kannada story “the serpent lover” makes you realize the broad similarities between the two. There was a film made on the Kannada folk tale called Nagamandalam and Detha’s story was made into paheli in 2005.

If we try to analyze the narrative, it offers you very contrasting possibilities. Firstly if seen from the perspective of gender and society the story seems to be placed in a feudal patriarchal setup where women’s voice appears in hushes and silences because the norms of propriety are to be decided by her husband and more importantly by her father in law. Property and material prosperity is counterpoised with sentiments and feelings and at this conjecture we feel the need to go beyond the confines of patriarchy to view it in structural and psychoanalytical terms. And I will try here to juxtapose Ramanujan and Freud together. This story is a good representation of what he calls women’s tale, but we must be cautioned against the use of term “counter tales” because nowhere in the text is there any attempt to counter the patriarchal domain but it merely opens up avenues for women’s desires and her voice to creep in a subtle manner. Even psychoanalytically this text can be interpreted in contrasting ways. In a more conservative interpretation the text may point out the pitfalls of transgressing the norms of propriety. The act of unveiling by the women makes her vulnerable to the gaze of the ghost, which sets off the chain of events. Thus this interpretation makes the story similar to the “little red riding hood” where the girl makes herself vulnerable to the gaze of the jackal and using tropes of material pleasure (here the flower in Duvidha the fruit) and was able to encroach her space as well as her sexuality. But if the same story is seen from the perspective of the woman, then the story is very much similar to the serpent’s lover wherein the woman finds avenue for the satiation of her desires through the impostor which is exactly the case with Duvidha. In both the cases the impostor is met with a tragic end but curiously the women is not ridiculed or shunned off but rather accepted in the patriarchal domain easily.thus the text challenges, as according to Ramanujan, the norms of chastity and propriety by inverting symbols and their signification as well as the punitive measures of these transgressions. For example an impostor or a man other than her legitimate husband is seen as a potential threat to the sexuality of women and thus to the patriarchal household. But the woman accepted the ghost as her partner despite being conscious of his identity thus challenging the regulations set up by the patriarchal household

There are couple of other ways to situate and analyse the narrative. For example two hypothetical possibilities can be discerned through a careful reading of the text and the film. One, seen through the lenses of pragmatic Freudian terms, the whole story can be mere pigment of imagination of the woman. The husband never went outside his house, but his indifference was equal to his absence. The woman was easily accepted in the family because the child belonged to the same man and the not the ghost. The ghost represents the unconscious desire of the women of seeing a more loving empathetic and caring husband. Secondly seen from the perspective of the husband the story can actually deal with the existential crisis of the husband who is in dilemma regarding his two conflicting duties- that of a money minded person meant to please his overtly money minded father, and playing a more loving and empathetic companion for her wife. In that sense we can interpret that perhaps the ghost was an alter ego of the husband. Either he went for trade but came back realizing his misgivings to his wife and by giving coins to his father he earned the concessions to live his conjugal life thus balancing his material and sentimental existence. The problem arise when the wife become pregnant and that bring the sentimental facet of husband more clearly and which seems to disrupt and overshadow his material existence. This action created anxiety in the materialist patriarchal domain and the man fell into an existential crisis where one of the identities needs to be purged to maintain the hegemony of the material world. Of course these interpretation are way too abstract and we can’t cite evidence for the interpretation except for the subtle subjective clues that could be interpreted in different ways.

Coming to the film, we also need to consider the way a movie is made and the representations of the film. The very abstract film making style and monotonous dialogue delivery of the actors makes us realize that the film doesn’t make you root for actors or characters but the rich visual spectacle through its spellbinding cinematography makes the film focus on the cultural context and tries to use these visuals as a text in itself. The still photographs are meant to be gazed and interpreted, the excessive use of contrasting lights and shades may be symbolical of different shades of human existence. The movie apart from a narrative is also a visual archive, the most visible example of which is the scene where the whole cycle of time when ghost and woman were together, was represented through a panorama of visual imagery without uttering a single word in those 5-10 minutes. But even then the film is more honest to the original story as compared to Paheli. Now we can see a change in attitude in those 30-40 years between the two. Paheli’s climax gives a subtle hint that the woman is met with the ghost again and not her husband which actually points out women’s choice winning over the patriarchal confines but in Duvidha the victory of the women lie in her ability to re assimilate in the patriarchal family even after her relation to the impostor. Duvidha raise question but as most of the parallel cinema of this time leaves the answer for viewer’s discretion. Paheli in answering the question creates an anachronism by juxtaposing traditionalism and modernity. Also Paheli gives in some detail the mention of the family of the man, which is completely absent from Duvidha, so while the only subtext offered in Duvidha is that of the character of father whose intentions, nature and morality can be gauged through the patriarchal and materialist gaze. Paheli on the other hand gives a narrative to the family and reconciliation of the family become a subplot of the film thus giving a post facto rationalization to the presence of the ghost while the moral compass of Duvidha is very ambiguous and none of the figures appear to be the epitome of morality

Hence what we see here is that Duvidha though rooted in a particular cultural context offers wide range of themes to ponder about. Duvidha is an important text not only of his literary brilliance or its adaptions to film but because it offers templates for discourses on wide social cultural gender issues and questions the moral axis that so dominates our narratives.

अश्वत्थामा मारा गया…..

मैं कौन हूँ, ये केवल एक अस्तित्ववादी प्रश्न नहीं है, इस में हमारे तुम्हारे सबके जीवन, समाज और राष्ट्र का सार तत्व छुपा है. मेरा नाम क्या है, और किसी को क्या सरोकार. एक पंछी हूँ बस जो उड़ने को आतुर है, जो मंजिल तलाश रहा है अपनी. और जीवन के पंछियों को न नाम की ज़रुरत है न पहचान की, बस एक उदीश्य और एक मंजिल, यही उसकी ज़रुरत है. पर फिर भी लोग पूछते है कौन हो तुम, पहचान क्या है तुम्हारे, भीड़ में किस से जोड़कर देखते हो खुद को. और तब मैं कहता हूँ कि मैं अश्वत्थामा हूँ, मैं ही क्यूँ आप भी अश्वत्थामा है, हम सब आने जीवन के किसी के किसी क्षण में अश्वत्थामा हो जाते है. हाँ मैं ये बात जानता हूँ कि हम में से कोई अश्वत्थामा नाम से नहीं पहचाना जाना चाहता, एक ऐसे नाम से जिससे महाभारत के युद्ध की क्रूरता और धूर्तता याद आ जाती है. अब भला हम अश्वत्थामा कैसे हुए? इस प्रश्न का सीधा उत्तर है- हाँ हम सब अश्वत्थामा है, पर अश्वत्थामा इंसान नहीं……अश्वत्थामा हाथी!!

महाभारत की कहानी तो सुनी होगी न आपने. पांडव सेना द्रोणाचार्य के नेतृत्व वाली कौरव सेना के समक्ष त्राहि त्राहि कर रही थी, विजय की केवल एक आशा थी द्रोणाचार्य की मृत्यु और उनकी एकमात्र कमजोरी उनका पुत्र अश्वत्थामा. तब पांडवो ने द्रोणाचार्य के वध हेतु अश्वत्थामा का सहारा लिया….. अश्वत्थामा हाथी का. इस महाभारत के युद्ध का सबसे दुखद क्षण था ये केवल इसलिए नहीं कि द्रोण की मृत्यु हुई अपितु उससे अधिक किसी के नाम किसी की पहचान के साथ खिलवाड़ हुआ. आज भी यही होता है. कुछ नामो में भरकर हमारी पहचान निर्धारित कर दी जाती है और जीवन भर कोई पांडव हमारी पहचान को अपने पैरो तले रौंद कर चला जाता है. मेरा नाम किसी और ने रखा, मेरी पहचान मुझे किसी और से मिली, मेरा धर्म मेरा नहीं, मेरी जाति मेरी नहीं, मेरा देश मेरा नहीं. बस मिल गया और मान लिया अपना लिया… और इसमें कोई बुराई. कमी तब हुई जब हमारी इच्छा के विरुद्ध हमपर पहचाने थोपी गयी. किसी ने किसी धर्म से जोड़कर हिंसा की, किसी ने जाति पूछकर पक्षपात, कभी रंग देख्कार भर्त्सना हुई, कभी अशिक्षा का मज़ाक. इन सभी पहचानो का भार जब भी हमारे कंधो ने लादा हा अश्वत्थामा हो गए. जब कुछ हिन्दू कुछ मुसलमानों ने अपनी हिंसा के कारण पूरी कौम का नाम बदनाम किया, तो बाकि सब हिन्दू मुस्लिम अश्वत्थामा हो गए, जब आम आदमी का नाम लेकर किसी ने गाड़ियाँ फोड़ी, आग लगायी और उन्ही आम आदमियों को कष्ट पहुंचाया, तो अपनी गाडी या दूकान के टूटे हुए अवशेषों को निहारता हर शख्स अश्वत्थामा है. जब विचारधारा के नाम पर कुछ “राष्ट्रवादियों” ने कुछ “गैर राष्ट्रवादियों” पर हिंसा को जायज़ ठहराया तो भीड़ में खड़े उन छात्रो ने जो बेवजह बेरहमी से पीटा गया, वो अश्वत्थामा है.

हम सब ही शोषक भी है हम सब ही शोषित भी है. जाने अनजाने हम कभी भीड़ का हिस्सा जब बन जाते है, जब भीड़ की एक आवाज़ से १०० करोड़ पहचाने जाते है, जब लोगो के हुजूम में अपनी अस्मिता हम खो जाते हा तब हम सब उसी क्षण अश्वत्थामा हो जाते है. जिस क्षण हम किसी को संज्ञा दे देते है  उसी दिन हम दो पहचाने गढ़ते है उनकी और अपनी.  हर पुलिस वाला जो भ्रष्ट है उसके पीछे एक आम आदमी है जिसकी आवश्यकताएं असीमित है पर संसाधन सीमित. हर इंसान के पीछे उसका इतिहास होता है. किसी को संज्ञा देना उस इतिहास का ह्रास है. वास्तव में हम जनमानस ही है जिसमे सब कुछ निहित है सब अच्छा है सब बुरा भी है. हर उस दमन में हम हिस्सा लेते है या तो शोषक के रूप में, या तो शोषित के रूप में और अंत में मूक साक्षी के रूप में. हम ही है जो आदर्शो की वकालत करते है और हम ही है जो उन आदर्शो को अपने स्वार्थ के तले कुचलकर आगे बढ़ जाते है. और ऊनि आदर्शो में कुचले जाते है असंख्य अश्वत्थामा.

मैं जानता हूँ यहाँ से जाने के बाद आप सब भूल जायेंगे, आपके जीवन में विचारो में निर्णयों में कोई परिवर्तन नहीं आएगा. मेरी बातो का शायद ही आप लोगों का कोई असर हो, और भला हो भी क्यूँ. मैं भी तो उसी जुर्म का दोषी हूँ जिसमे आप लोग संलग्न है. बस एक बार घर जाकर दो मिनट चिंतन अवश्य कीजियेगा. कि हम संसार की सबसे भ्रष्ट संस्था है….. क्यूंकि हम जनता है. अश्वत्थामा कल भी मारा जाता था, अश्वत्थामा आज भी मारा जाता है, अश्वत्थामा कल भी मारा जाएगा, फर्क बस इतना है कि आज कृष्ण कहीं नहीं है…..

और ये सब मैं इसलिए नहीं कह रहा हूँ कि मुझसे आप लोगों से कोई आशा है बल्कि इसलिए कि मैं निराश हो चूका हूँ. अपनी ख़ामोशी से भी, अश्वत्थामा की मौत से भी. अश्वत्थामा रोज़ मरते है, कभी इंसान मरते है, कभी पहचान मरती है, कभी ज़मीर मरता है कभी ज़बान मरती है. पांडव कौरव लड़ते जाते है और अश्वत्थामा मरते जाते है. आज भी किसी कॉलेज में किसी घर में किसी दफ्तर में, कहीं मंदिर मस्जिद गुरुद्वारों में, कहीं चार दीवारों में अश्वतथामा मारा जा रहा है. लोगों को पहचानो के साँचो में मत डालो तो अच्छा, इंसान को इंसान ही रहने दो तो अच्छा, मैं बस एक हाथी हूँ न पांडव हूँ न कौरव हूँ, अपनी अहं की जीत में मुझे न मारो तो अच्छा. वरना कुछ और नहीं कह पाओगे बस यही बचेगा कहने को कि ……. अश्वत्थामा मारा गया….!!

भीड़ में छितरा हुआ सा

एक तिनका मैं भी हूँ

खून के इन आंसुओं का

एक कतरा मैं भी हूँ

भीड़ आती है

कुचलती है मसलती है

किस कदर ये जान मेरी

उफ़ मचलती है

जुल्मियों के इस जहाँ में

किसकी चलती है

इज्ज़तो के रास्तो पर

रूहे जलती है

 

हाँ मैं एक छोटा सा तिनका

घुटती जिसकी सांस है

कितने जन्म बीते यहाँ

मुक्ति की फिर भी आस है

जानता हूँ इस जगत का

मैं एक हिस्सा मात्र हूँ

आज भी इंसानियत के

तलवों में मेरा वास है