विभाजन, हिंसा और साहित्य

  • सुकृति गुप्ता
  • एम.ए. हिस्ट्री

साहित्य ऐसे झूठ होते है जिनमें सच्चाई होती है और जब ये झूठ ऐतिहासिक पात्र बोलते है तो इन्हें पढना और भी ज़रूरी हो जाता है क्यूंकि कोई भी साहित्य शून्य में जन्म नहीं लेता. वह अपने इतिहास से प्रभावित होता है और अपने वर्तमान से भी, जो हमारा इतिहास बन चुका  है.

इतिहास अब राजाओ, शासनकालो और युद्धों का इतिहास नहीं रह गया है बल्कि ये मानवीय भावनाओ, उनके द्वारा झेली गयी त्रासदियों और अनुभवों का भी इतिहास है. इस सन्दर्भ में जब हम विभाजन और विभाजन के दौरान हुई त्रासदी की बात करते है तो इसके कई जवाब है- भारतीय जवाब, पाकिस्तानी जवाब, ब्रिटिश जवाब आदि. हर जवाब अपनी ही अलग विचारधारा से दिया गया है पर यदि हम उस दौर की त्रासदी को समझना चाहते है तो हमें उस दौर के साहित्य को देखना होगा क्यूंकि इतिहास जब अमानवीयता, द्वेष और हिंसा की बात करता है तो पीडितो की आवाज़ को सुनना ज़रूरी हो जाता है. हालाँकि यदि स्मृति के रूप में देखा जाए तो शायद वह आदर्श प्रतीत न हो पर हिंसा का अध्ययन किया जाता है तो सटीक स्मृति के बजाय कराहटें अधिक महत्त्वपूर्ण हो जाती है, जिनकी अभिव्यक्ति हमें साहित्य में  मिलती है.

इस सन्दर्भ में जब हम लोकप्रिय साहित्य पर गौर करते है उनमे उपमहाद्वीप के नेताओ के प्रति आक्रोश नज़र आता है तथा वे उनपर आरोप लगते है कि वे शक्ति के संतुलन संबंधी विवाद को सुलझा नहीं सके. वरिष्ठ पत्रकार अजीत भट्टाचार्यजी भी इसका उल्लेख करते है कि किस प्रकार विभाजन कठोरता से और जल्दबाजी से किया गया था कि ठीक से सीमा रेखा भी तय नहीं की जा सकी थी और न ही इसके लिए ठीक तरह से व्यवस्था की जा सकी थी. वे इस बात का उल्लेख करते है कि किस प्रकार तत्कालीन प्रधानमंत्री “वास्तविकता की गहराईयों” को छु नहीं सके थे और उनके इस भ्रम (self delusion) के सन्दर्भ में उन उक्तियों का उल्लेख करते है जो उन्होंने लियोनार्ड मोस्ले से १९६० में कही थी- “हम थके हुए आदमी है और हम में से बहुत कम ही है जो जेल जाना चाहते है और अगर हम  भारत की एकता के लिए खड़े होते है- तो हमें जेल जाना ही होगा. हमने पंजाब में लगी आग को देखा है, लोगों को मरते देखा है. विभाजन इससे बाहर निकलने का रास्ता था इसलिए हमने उसे अपनाया. हम उम्मीद करते है कि विभाजन अस्थायी होगा तथा पाकिस्तान को हमारे पास आने को बाध्य होना पड़ेगा.

विभाजन का इतिहास लोगों की जिंदगियों तथा उनके अनुभवों का इतिहास है. १९४० की घटनाओ को किस प्रकार उनकी पहचान से जोड़ दिया गया, उसका इतिहास है और अनिश्चितताओ जिन्होंने विभाजन को जन्म दिया या उसे थोपा, का इतिहास है. इस सन्दर्भ में मंटो प्रासंगिक प्रतीत होते है. वे अपने लेखन में विभाजन के दौरान हुए महाध्वंस की कहानियां कहते है. आलोक भल्ला विभाजन पर लिखी कहानियों को “सांप्रदायिक कहनियों” की संज्ञा देते है जिसके सन्दर्भ में वे कहते है कि इनमे पक्षपात है तथा ये दोनों और कि कहानियों को ठीक तरह से बयाँ नहीं करती.

वीना दास तथा आशीष नंदी का कहना है कि “विभाजन पर लिखा गया ज़्यादातर साहित्य अप्रमाणिक है क्यूंकि एक तरफ की हिंसा को दूसरी ओर से संतुलित करने का प्रयास किया गया है. और इसीलिए हिंसात्मक और अमानवीय  व्यवहारों के वर्णन में हमें समानता नज़र आती है, और फिर चाहे कोई ट्रेन लाहौर से आ रही हो या अमृतसर से, यदि एक वेश्या दो औरतो को पनाह देती है तो उनमे से एक हिन्दू और दूसरी मुस्लिम होगी.

पर मंटो इस सन्दर्भ में भिन्न प्रतीत होते है. उन्होंने खुद विभाजन का दर्द अनुभव किया था. वे कोई राजनीतिज्ञ नहीं थे तथा उन पर कोई विचारधारा हावी नहीं थी. उनकी मानवीयता किसी भी तरीके से धार्मिक लेबल को स्वीकार नही करती तथा क्रूरता तथा हिंसा को बर्दाश्त करने का विरोध करती है, जो उन्हें उनके समकालीनो से भिन्न बनाती है. जहाँ बाकि मर्द मार पीट कर रहे थे, औरतो की बेइज्ज़ती कर रहे थे, लोगों का खून कर रहे थे वहीँ मंटो अपने तंगी के दिनों में सस्ती वाली दारू पी रहे थे तथा इतनी दारु पीने के बाद भी  होश संभाले हुए थे.

वे एक स्वतंत्र विचारक थे जो उनके कथन से ज्ञात होता है- “ज़िन्दगी को वैसे ही दिखाना चाहिये जैसी वह है, न कि वो कैसी थी, कैसी होगी या कैसा होना चाहिए.” (Life ought to be presented as it is, not as it was or as it will be or should be) बम्बई शहर, जो उन्हें बेहद प्रिय था तथा जिससे वे बेहद प्यार करते थे, उन्हें छोड़ना पड़ा. वे मरते दम तक उसके लिए तरसते रहे. उन्हें विभाजन के बीज सिनेमा जैसे अधार्मिक क्षेत्र में भी नज़र आने लागे थे. उन्हें जब पता चलता है कि अशोक कुमार, जिनके साथ वो बॉम्बे टॉकीज में काम करते थे, को धमकी भरे पत्र (हेट मेल) मिल रहे है तथा उन पर आरोप लगाया जा रहा है कि वे कंपनी में मुस्लिमो को शामिल करने के लिए ज़िम्मेदार है, तो वे बहुत द्रवित होते है. उनका दिल टूट जाता है कि जो लोग उन्हें सआदत हसन मंटो की नज़र से देखते थे, उन्हें अब मुस्लिम की नज़र से देख रहे है. और इन सबसे तंग आकर वो पाकिस्तान चले जाते है जिसे वे जानते भी नहीं थे. उनकी इस टीस की अभिव्यक्ति हमें “टोबा  टेक सिंह” में मिलती है जिसमे अस्पतालों के अलावा बाकि बाहर की दुनिया पागल हुए जा रही है. उपमहाद्वीप के नेता इतने पागल हुए  जा रहे है कि वो पागलो की भी अदला बदली कर रहे है. ये पागल वो मुस्लिम है जिन्हें पाकिस्तान वापस लाया जा रहा है और जो गैर मुस्लिम है उन्हें भारत भेजा जा रहा है. इनमे अकेला बिशन सिंह जाने से इनकार कर देता है क्यूंकि वो पंजाब के एक छोटे से शहर टोबा  टेक सिंह में, जहां उसका जन्म हुआ था और उसके परिवार ने अपनी ज़िन्दगी जी थी, रहना चाहता था. वह न तो पाकिस्तान में और न ही भारत में बल्कि टोबा  टेक सिंह में रहना चाहता था. उनकी कहानी “मोज़ील ” धर्म के प्रभाव को उजागर करती है, साथ ही उसपर व्यंग्य भी करती है. मोज़ील का निर्वस्त्र बिना वजह मर जाना धार्मिकता को बिना वजह धारण करना है जो कि त्रिलोचन की पगंडी में निहित है. मोज़ील के इस कथन से इस बात की पुष्टि होती है जब वो कहती है “अपने इस धर्म को ले जाओ”.

टिटवाल का कुत्ता (The dog of Titwal) में भी लोगों को पागलपन तथा शक्ति और अधिकारीयों पर व्यंग्य करते है. ये बता पाना कठिन है कि कुत्ता एक देशभक्त की तरह मारा गया या उन्होंने अपने देश के कठोर, धार्मिक बेवकूफी को मारा है. ऐसा प्रतीत होता है कि वे हिंसा में मनोरंजन का आभास करने लगे है.

उनकी कहानी “खोल दो” हिंसा की सारी सीमाएं तोड़ देती है. वे बुरे या  दुष्टता के सन्दर्भ में धार्मिक समुदाय की विचारधारा का विरोध करते है तथा ये दिखाते है कि दुष्ट लोग किस प्रकार अपनी लालसाओ को पूरा करने के लिए ऐसी स्थितियों का फायदा उठाते है तथा आपके मज़हब के लोग ही आपको धोखा दे सकते है. वे दिखाते है कि हिंसा का कोई धर्म नहीं होता तथा ये अमानवीयता का परिणाम है. “आखिरी सलाम” (the last salute) बिना वजह लड़ने की कहानी है. सैनिक खुद नहीं जानते कि वे क्यूँ ऐसे देश के लिए लड़ रहे है जो उनके लिए अनजान है. वो खुद नहीं जानते ई उन्हें सच में कश्मीर चाहिए या नहीं.

मंटो को कश्मीर बेहद प्रिय था जिसका उल्लेख वो पंडित नेहरु को लिखे अपने पत्र में करते है. उनकी बहुत सी कहानियां जैसे “आखिरी सलाम” और “टिटवाल का कुत्ता” का कश्मीर पर केन्द्रित है. वे छोटी छोटी खुशियों के लिए तरसते जान पड़ते  है. उदाहरण के लिए वे पत्र में शिकायत करते है कि शायद यह बब्बुगोशा का मौसम है. मैंने यहाँ बहुत से गोश खाएं  है पर बब्बुगोशा खाए मुझे बहुत अरसा हो गया”. वे पत्र में  स्पष्ट तौर पर नेहरु जी से नाराजगी जताते है, कश्मीर और विभाजन के मुद्दे को लेकर पर साथ ही ये भी ज़ाहिर करते है कि वे कितने असहाय है. उदाहरण के लिए वे खुद को “डेढ़ सेर का पत्थर” (किसी ने उन्हें बताया था कि मंटो का अर्थ डेढ़ सेर का पत्थर होता है) तथा उन्हें “नदी” (नेहरु अर्थात नहर/नदी) कहकर संबोधित करते है. पर साथ ही वे यह भी कहते है कि यदि मैं डेढ़ सेर के पत्थर की जगह एक बड़ा पत्थर होता तो उस नदी में खुद को गिरा देता जिसे अपने बहने से रोक रहे है ताकि आप अपने इंजीनियरो की टीम के साथ इस पत्थर को हटाने के लिए बातचीत करने पर मजबूर हो जाए. वे उनके  कश्मीरी होने की दुहाई देते है. वे शिकायत करते है कि आप बड़े आदमी है, भारत जो कभी मेरा देश था, के शासक है आप पर आप ने कभी इस आदमी की फ़िक्र नहीं की. वे शिकायत करते है कि किस प्रकार भारत में प्रकाशक उनकी कहानियां बगैर उनकी मंज़ूरी के छाप रहे है वो भी अजीबो-गरीब नामो के साथ. किस प्रकार उनका मज़ाक उड़ाया रहा है. वे कहते है कि वे उन्हें अपने किताब की एक प्रति भेजेंगे जिससे कि नेहरु उनकी कहानियाँ पढ़े (जिन्होंने कभी उनकी कहानियाँ नहीं पढ़ी थी) तथा कहते है कि मुझे पूरा  विश्वास है कि आपको मेरी कहानियाँ पसंद नहीं आएँगी.

मंटो की प्रिय मित्र इस्मत चुगताई  कहती है कि ‘सियाह हाशिये’ की व्याख्या करते हुए मुहम्मद हसन अस्करी ने कहा है कि मंटो अन्यायी को अन्यायी की तरह नहीं देखते तथा उनकी कहानियों से प्रतीत होता है कि हिंसा करने  वाले पात्र ईश्वर द्वारा बनाये गए है. इस्मत चुगताई ये स्पष्ट करती है कि वे ऐसा नहीं सोचते. वो अन्याय को अन्याय कहने से डरेंगे क्यूँ? वे अन्याय करने वालों का विरोध करते है. वे कहती है कि मैं जानती हूँ कि मंटो ‘सियाह हाशिये’ लिखते वक़्त हँस नहीं रहे होंगे और न ही उन्होंने ये कहानियाँ हमें हँसाने के लिए लिखी है.

मंटो स्वयं अपने लेखन के सन्दर्भ में कहते है- “लम्बे अरसे से मैं देश के बंटवारे से उपजी उथल पुथल के नतीजो को स्वीकार करने से इनकार करता रहा. महसूस तो मैं अब भी वही करता हूँ पर मुझे लगता है कि आख़िरकार मैंने अपने आप पर तरस खाए या हताश हुए बगैर उस खौफनाक सच्चाई को मंज़ूर कर लिया. इस प्रक्रिया में मैंने इंसान के बनाये हुए लहू के इस समंदर से अनोखी आब वाले मोतियों को निकलने की  कोशिश की. मैंने इंसानों को मारने वाले इंसानों की एकचित धुन के बारे में लिखा, उनमे से कुछ के पछतावे के बारे में लिखा जो समझ नहीं पा रहे थे कि उनमे अब तक कुछ इंसानी जज्बे बाकि कैसे रह गए. इन तमाम और इनके अलावा और भी बहुत सी बाते मैंने अपनी किताब सियाह हाशिये में लिखी है’.

आलोक भल्ला मंटो के काल के बारे में बताते हुए मंटो की कहानियों के सन्दर्भ में कहते है- “ये कहानियां उस आदमी के द्वारा लिखी गयी है जो ये जानता था कि इस प्रकार की तबाही के बाद किसी भी तरह से माफ़ी तथा उसे भुलाया जाना जाना सम्भव नहीं है. जिन्होंने इस हत्याकांड को देखा था वे महज़ खड़े रहकर अपने मरने का इंतज़ार कर सकते थे. विभाजन ने नैतिकता को इस प्रकार मिटा दिया था कि कुछ भी वापस पाना तथा किसी भी प्रकार की उम्मीद करना संभव नहीं था. भाषा ने बहकाने का काम किया, और आम लोग क्रूर तथा खूनी बन गए, दहशत को दृढ़तापूर्वक देखा गया जिससे कि हम ये समझ सके कि किस प्रकार हम सभी इस बर्बर विश्व के निर्माण में भागीदार थे और अब हमें कुछ भी नहीं बचा सकता.

१९१५ में जन्मे भीष्म साहनी भी विभाजन की इस त्रासदी के गवाह थे. उन्होंने अपना बचपन ‘रावलपिंडी’ में बिताया था तथा इंटरमीडिएट तक की पढाई भी वहीँ से की थी. यह वो क्षेत्र था जो १८५७ के विद्रोह का गवाह भी रह चुका था, जहाँ अंग्रेजो का दबदबा था तथा पाश्चात्य संस्कृति की अच्छी झलक मिलती थी. उन्हें इन सबका अनुभव था जिसका प्रमाण उनके उपन्यास ‘तमस’ में भी स्पष्ट तौर पर देखने को मिलता है. कांग्रेस के स्थानीय अफसर यहाँ आते रहते थे तथा समाज सुधारक भी जिसका उल्लेख वो अपनी आत्मकथा में भी कारते है- “यहाँ पर कांग्रेस की जुलूस भी निकलते, गुरुद्वारे और आर्य समाज के के भी, मुहर्रम के ताजिये भी निकलते. गाहे बगाहे सांप्रदायिक तनाव भी होता, मगर लोग आम तौर पर बड़े स्नेह भाव से एक दूसरे के धर्म की मर्यादाओ की कद्र करते हुए रहते थे.

वे कांग्रेस की रिलीफ समिति में भी काम कर चुके थे, जैसा कि वे खुद इसका उल्लेख करते है- “देश के बंटवारे के समय जब सांप्रदायिक दंगे हुए तो मैं कांग्रेस की रिलीफ समिति में काम किया करता था और आंकड़े इकठ्ठा करता था कि वहाँ कितने मरे कितने घायल हुए, कितने घर जले आदि. तभी गाँव-गाँव घूमने और सांप्रदायिक दंगो के वीभत्स दृश्य देखने का अवसर मिला. “तमस” इस अनुभव पर आधारित है.

“तमस” साम्प्रदायिकता पर की जाने वाली राजनीति की कहानी है. यह दिखाती है कि किस प्रकार राजनितिज्ञ खुद ही इसके बीज बोते है और फिर खुद ही इसकी निंदा करने का स्वांग रचते है.

तमस की कहानी बस इतनी सी है कि एक म्युनिसिपल कमिटी का कारिन्दा और अंग्रेज़ सरकार का चमचा मुराद अली अंग्रेज़ सरकार के इशारे पर एक सीधे सादे चमार नाथू को ५ रूपए देकर उससे एक सूअर मरवाती है और उसे मस्जिद की सीढ़ियों पर फेंकवा देता है. इसकी प्रतिक्रिया में दूसरा वर्ग एक गाय की हत्या करवा देता है. इन दोनों घटनाओ की खबर ज्यों ज्यों फैलती है, विद्वेष की आग भड़कने लगती है और पूरे शहर में तनाव फ़ैल जाता है. नागरिको का शिष्टमंडल शांति स्थापित करने के उद्देश्य से अंग्रेज़ जिला कलेक्टर रिचर्ड से मिलता है और बिना किसी ठोस आश्वासन के लौट जाता है. जिला कांग्रेस समिति के सेक्रेटरी श्री बक्षी जी तथा कम्युनिस्ट नेता कामरेड शांति स्थापित करने में नाकामयाब रहते है तथा आसपास के गांवो में भी दंगे फ़ैल जाते है. इलाहिबक्ष, खानपुर, सैयदपुर आदि गांवों में लूट पाट और हत्याएं होती है. सिख और मुस्लिम दोनों मोर्चाबंदी करते है तथा इस मोर्चाबंदी में २०० वर्ष  पूमध्यकालीन जहनियत काम कर रही थी. तुर्कों के ज़ेहन में यहीं था कि अपने पुराने दुश्मन सिखो पर हमला बोल रहे है और सिखों के ज़ेहन में यही था कि वे भी अपने पुराने दुश्मन तुर्कों पर हमला बोल रहे है. पांचवे दिन अंग्रेज़ शांति कायम करने का प्रयास करते है. नगर में कर्फ्युं लगाया जाता है और एक ही दिन में पूरा माहौल बदल जाता है. जिसके इशारे पर ये तूफ़ान आया था, उसी इशारे पर सब तबाह करके गायब हो जाता है. इस तूफ़ान के बाद दृश्य बड़ा ही कारुणिक है तथा लोग जो शिकार हुए थे उनसे शरणार्थी कैंप भरे पड़े है. शांति कायम करने के लिए अंग्रेज़ कलेक्टर रिचर्ड की प्रेरणा से पंद्रह सदस्यों की अमन समिति बनायीं जाती है जिसमे ७ मुस्लमान, ५ हिन्दू और ३ सिख है. इस प्रकार जिसकी प्रेरणा से और जिसके द्वारा दंगे की शुरुआत हुई उसी की प्रेरणा से और उसके द्वारा ही दंगे का अंत भी हुआ. उनके उपन्यास को यदि ऐतिहासिक और सामाजिक सन्दर्भ में देखा जाए तो निम्न निष्कर्ष निकाले जा सकते है-

1- देश का विभाजन जिस सांप्रदायिक विद्वेष का परिणाम था उसके बीज ब्रिटिश कूटनीति ने बोये थे.

2- विभाजन के दौरान कांग्रेस के भीतर राष्ट्रीय एकता के प्रति गहरी निष्ठा का आभाव था. कांग्रेस स्वयं अनेक स्वार्थो की मिलन भूमि थी.

3- सांप्रदायिक दंगो में भाग लेने वालो की ज़हनियत मध्यकाल से जुडी हुई थी.

4- सदियों से साथ रहते गुए नगर और गाँव दोनों ही स्वरों पर हिन्दू और मुसलमानों की जीवन रेखा कुछ इस प्रकार घुल मिल गयी थी कि उनका चाहे कैसे भी विभाजन किया जाता वह कृत्रिम ही होता.

5- दंगो में हमेशा गरीब ही मारे जाते है. अमीर और प्रभावशाली लोग गरीबो के मूल्य पर अपना राजनीतिक खेल खेलते है और परस्पर एक दूसरे के हितो की रक्षा करते है.

6- शक्ति और पैसा बड़ी चीज़े है, वो मूल्यों को दबा सकते है, संस्कारो को तोड़ सकते है किन्तु मनुष्य की  जिजीविषा और भी बड़ी है. वो बड़ी से बड़ी विपत्ति झेलकर भी जीवित रहना चाहता है.

इस उपन्यास की एक महत्त्वपूर्ण बात ये है कि इस पूरे उपन्यास में वे प्रादेशिक कांग्रेस के सदस्यों पर व्यंग्य कसते रहते है तथा देशभक्ति और राष्ट्रीयता के संकीर्ण मापदंडो पर भी व्यंग्य करते है. उदाहरण के लिए कांग्रेस के शंकर जब दूसरे कांग्रेस सदस्य कोहली को अपना आजारबंद दिखाने को कहता है तथा उसके बारे में कहता है- “देख लीजिये साहिबान, नाडा रेशमी है. हाथ के कटे सूत का नहीं है. कांग्रेस रेशमी नाडा पहने? और आप उसे  प्रादेशिक सदस्य का उम्मीदवार बनाकर भेजेंगे? कांग्रेस का कोई उसूल है या नहीं?

जहां विभाजन पर ज़्यादातर साहित्य त्रासदी को बयाँ करता है वहीँ भीष्म साहनी द्वारा रचित “अमृतसर आ गया है” ये दर्शाता है कि कुछ क्षेत्रो में दंगे के बावजूद भी ज़िन्दगी में कोई अधिक परिवर्तन नहीं आया तथा लोग पहले की तरह हंसी मज़ाक करते है. उन्होंने ये दुनिया लाहौर से आने वाली ट्रेन में दिखाई है. पर ये भी रूढ़ छवियों से मुक्त नहीं है- (1) बाबू से पठान कहता है कि तुम दुबले पतले हो क्यूंकि तुम हमारी तरह मीट नहीं खाते. तुम हमारी तरह मीट खाकर तंदरुस्त हो जाओ या फिर महिलाओ के डब्बे में सफ़र करो, (2) सरदार पठान को समझाता है कि बाबू पठानों का भोजन नहीं लेता क्यूंकि वो अपने हाथ नहीं धोते अर्थात वे गंदे लोग है, (३) जब ट्रेन में ज़बरदस्ती लोग अन्दर घुसने की कोशिश करते है तो ट्रेन में बैठे लोग उन पर चिल्लाते है और पठान बदहवासी में एक महिला के पेट में लात मार देता है, (4) जब ट्रेन आग में झुलसते शहरो से होते हुए गुज़रती है तो लोग भयभीत हो जाते है, पर जैसे ही उन्हें ज्ञात होता है कि ये ‘वजीराबाद’ नामक मुस्लिम बहुल क्षेत्र था तो पठान का भय मर जाता है वहीँ सिखो और हिन्दुओ की चुप्पी गहरी हो जाती है, (5) वहीँ जब ट्रेन हरबंसपुरा और अमृतसर (हिन्दू-सिख बहुल क्षेत्र) पहुँचती है तो बाबू जो अब तक पठान की हर बेइज़्ज़ती झेल रहा था, चौड़ा हो जाता है तथा पठान पर धावा बोलता है- “ओ पठान के बच्चे! हिन्दू औरत को लात मारता है. हरामजादे

कमलेश्वर जो मंटो के प्रशंसक भी रहे है, उनकी कहानी “और कितने पाकिस्तान” पाकिस्तान बनने के असर को बयाँ करती है. वे पाकिस्तान को एक मुल्क नहीं बल्कि एक दुखद सच्चाई मानते है तथा इसलिए लेखक जहाँ कहीं जाता है उसे दृश्य दिखाई देते है, जिन्हें वह पाकिस्तान कहता है क्यूंकि वह उसे विध्वंस का कारण मानता है क्यूंकि ये “एहसास की रुकी हुई हवा है”. विध्वंस के चित्र इतने भयानक है कि वो अनुभव करता है कि वो मुस्लमान पर टूट पड़ना चाहता है और अपनी प्रेमिका को छीन लेना चाहता है जैसे कि वो कहता है- “उसी दिन से एक पाकिस्तान मेरे सीने में  शमशीर की तरह उतर गया था”

पाकिस्तान बनने का दर्द वह अपनी प्रेमिका सलीमा (जिसे वो प्यार से बन्नो कहता है क्यूंकि उसे सलीमा कहते डर लगता है) में भी महसूस करता है. उसके अन्दर का पाकिस्तान तब नज़र आता है जब वह अपने पति मुनीर को कोसती है “मुझे मालूम नहीं है क्या? जितनी बार बम्बई जाता है, खून बेचकर आता है. फिर रात भर पड़ा काँपता रहता है.

जब लेखक को ज्ञात होता है कि उसकी प्रेमिका वेश्या बन गयी है तो उसे समझ नहीं आता कि उसके साथ ऐसा क्यूँ होता है. बन्नो उसे टेढ़ी मुस्कराहट के साथ देखती है ख़ामोशी से व्यंग्य करती है तो उसके मुख से निकलता है- “पता नहीं ये बदला तुम मुझसे ले रही थी, मुनीर से या पाकिस्तान से?”

वह पाकिस्तान को और उसकी सच्चाई को हकीक़त मान चूका है- “अब तो फटा फटा आदमी ही सच लगता है. पूरे शरीर का आदमी देखकर दहशत होते है. विध्वंस के चिन्ह हर जगह दिखाई देते है जो आहत करते है- “अब कौन सा शहर है जिसे मैं छोड़कर भाग जाऊ. कहाँ कहाँ भागता फिरूँ जहां पकिस्तान न हो.

पाकिस्तान की यदि सच्चाई की बात की जाए तो वह अब भी नज़र आती है. नेहरु जिन्होंने विभाजन को अस्थायी बताया था वो स्थायी हो चूका है. इस सन्दर्भ में असगर वजाहत ने नाटक “जिस लाहौर जई देख्या ओ जम्याई नइ” का पाकिस्तान में मंचन न होने देना ये कहकर कि उसमे मौलवी की हत्या इस्लाम के विरुद्ध है तथा नाटककार भारतीय है, इसी का सूचक है. पर आख़िरकार जब नाटक होता है तो हाउसफुल रहता है वो भी कराची में वो भी इस तरह से  कि लोग पेड़ पर चढ़कर नाटक देख रहे थे. यह इस बात को इंगित करता है कि मानवीयता बड़ी बड़ी विपत्ति को झेलकर भी जीवित रहती है.

लगभग सभी विभाजन की कहानियों में महिलाओ को एक निश्चित रूप दे दिया गया है. दोनों ओर महिलाओ की स्थिति एक समान रूप से स्थिर कर दी गयी है. उसकी अपनी महत्वपूर्णता उस आदमी पर निर्भर करती है जिसकी वो औरत है या जिसने उसका उल्लंघन किया है या उन्हें प्रताड़ित किया है. और इस प्रकार इस सांप्रदायिक अस्पष्टता में वे प्रभावहीन सी जान पड़ती है. महिलाओ को शोषित करना, पुरुषो के लिए अपने विरोधी समुदाय को नीचा दिखने का माध्यम था, वहीँ कई पुरुषो के लिए ये स्थिति अपनी लालसाओ को पूरा करने का अच्छा अवसर था. इस सन्दर्भ में मंटो की कहानी “खोल दो” जिसमे ‘सकीना’ का दोनों ही समुदायों के पुरुषो द्वारा शोषण किया जाता है., इस बात को इंगित करता है कि हिंसा यहाँ महज़ सांप्रदायिक मुद्दा नहीं था बल्कि हिंसक पुरुषो के लिए एक अच्छा अवसर था तथा सम्प्रदायिकता ओढा आवरण मात्र था. महिलाएं उनके लिए इस लड़ाई में सुकून पाने का माध्यम थी. कहीं ये सुकून ‘अच्छा’ था तो कहीं ‘बुरा’ था. इस सन्दर्भ में तमस में भीष्म साहनी कहते है- “दुःख से छुटकारा पाने के लिए आदमी सबसे पहले औरत की तरफ मुड़ता है”. नाथू को जब अपनी गलती का एहसास होता है तो उसे अपनी पत्नी के पास जाने की इच्छा होती है. इस प्रकार की कहानियों में महिलाओ को निष्क्रिय दिखाया गया है तथा पुरुष ही उनकी नियति तय  करते है. पर “मोज़ील ” तथा “ठंडा गोश्त” में “कलवंत कौर” इस सन्दर्भ में कुछ अपवाद है.

मंटो अपनी कहानियों में प्रत्यक्ष तौर पर बोलते है और इसीलिए उनमे नाटकीयता नहीं है तथा उनकी नायिकाएं बिना अश्रु बहे सिसकियाँ लेती है. वो घृणा और द्वेष को झेलते-झेलते अपने दर्द के शून्य पद गयी है तथा अपनी हीन स्थिति का प्रदर्शन करते हुए समाज के पुरुषो पर व्यंग्य करती प्रतीत होती है. कमलेश्वर की कहानी “और कितने पाकिस्तान” की बन्नो भी ऐसी ही है. उसका अपने प्रेमी की ओर टेढ़ी मुस्कराहट के साथ देखना और पूछना “और कोई है” इसी का सूचक है. नायक अपनी ज़िन्दगी के तीन पडावो की बात करता है- “पहला, जब मुझे बन्नो मेहँदी की हवा लग गयी थी, दूसरा, जब मैंने तुम्हे पहली बार नंगा देखा था और तीसरा, जब तुमने कहा था “और कोई है”. चाहे मंटो की कहानियां हो या कमलेश्वर की कहनियाँ दोनों की कहानियों के पुरुष महज़ खूनी और बलात्कारी नहीं है. उनमे अब भी मानवीयता बाकी है. पर ये मानवीयता असहाय और कमज़ोर सी जान पड़ती है, जो स्त्रियों के शोषण और पतन का कारण जान पड़ती है. यह कमलेश्वर के “और कितने पाकिस्तान” और मंटो की कई कहानियों जैसे कि  The Woman in the Red Raincoat में स्पष्ट जाहिर होता है- “तुम दो औरतो के खूनी हो. एक मशहूर कलाकार थी और दूसरी वो जिसका जन्म तुम्हारे लिविंग रूम में मौजूद पहली औरत के शरीर से हुआ था जिसे तुमने उस रात अकेला छोड़ दिया था. (You are the murderer of two women. One who is known as a great artist & the other who was born from the body of the first woman in your living room that night & whom you alone know).

ज्ञानेंद्र पाण्डेय कहते है आलोचकों ने कि तीन प्रकार की हिंसा की बात की है-  (1) जो राज्य द्वारा की जाती है जैसे कि रूस, जर्मनी, साइबेरिया में हुआ, (2) एक दूसरे तरीके की हिंसा जहाँ राज्य पहले से भक्षक नहीं होता पर वो उसे रोक सकता था पर ऐसा नहीं करता. जैसे कि १९९२-९३ में विश्व हिन्दू परिषद् द्वारा बाबरी मस्जिद के विवाद पर की गयी हिंसा, (3)एक तीसरे तरह की हिंसा वह है जहाँ लोग खुद हिंसा से पीड़ित होते है और अपना मानसिक स्वास्थ्य खो देने के कारण एक दूसरे का खून करने लगते है. विभाजन को इसी प्रकार की हिंसा माना जाता है.

वे कहते है कि जावीद आलम का कहना है कि “इस तरह की हिंसा को हमें याद नहीं करना चाहिए जिससे कि लोग सामाजिक, राजनैतिक और व्यक्तिगत तौर पर सामान्य जिंदगी जी सके, शांतिपूर्ण तरीके से.

पण्डे इस तरह की धारणा को इतिहास के लिए हानिकारक बताते है तथा कहते है कि ऐसा प्रतीत होता है कि राष्ट्रवादी धारणा है जो ये तय करने की कोशिश करती है कि भारतीय इतिहास के लिए क्या उचित है और क्या अनुचित. पर वे हमें ये भी बताते है कि हाल ही मैं कई महत्त्वपूर्ण कार्य हुए है हिंसा पर जिनमे मुख्यतः ये समझने का प्रयास किया गया है कि हिंसा का दायरा कितना बड़ा है. वो समझने का प्रयास करते है-

१. क्रोधित पुरुषो की पीड़ा को,  २. १९४७ तथा उसके बाद महिलाओ तथा बच्चो की स्थिति को, ३. महिलाओ और बच्चो की सामुदायिक और राष्ट्रीय बानगियों को, ४. धर्म से अलगाव को किस प्रकार एक मात्र नागरिक पहचान के रूप में देखा जा सकता है, ५. राज्य के बेहया पितृसत्तावाद को. वे कहते है कि सभी रोज मर्रा की ज़िन्दगी का इतिहास पेश करती है- एक ऐसा इतिहास जिसमे राज्य और समाज दोनों फंसे है. इस सन्दर्भ में जब हम विभाजन पर लिखे साहित्य की बात करते है तो निष्कर्ष के तौर पर कहा जा सकता है कि “काल्पनिक लेखन की सबसे अच्छी बात यह है कि ये महज़ हिंसा की कहानियाँ ही बयान नहीं करती पर इस बात की भी जांच करती है कि क्या दहशत के बीच भी हममें कुछ नैतिकता बची थी”. (The best of the fiction writers about the partition are not concerned with merely telling stories of violence, but with making profoundly troubled inquiry about the survival of our moral being in the midst of horror). इसका उल्लेख आलोक भल्ला भी करते है और कई दफा उनकी अभिव्यक्तियाँ निजी प्रतीत होती है. उदाहरण के लिए “सहाय” (A tale of 1947) में  मुमताज़ का चरित्र तथा उसके द्वारा बॉम्बे छोड़कर पाकिस्तान का चरित्र तथा उसके द्वारा बॉम्बे छोड़कर पाकिस्तान जाना तथा उसके द्वारा अपने मित्र जुगल से प्रश्न करना कि क्या वो उसे मार सकता है? ये सब उनकी निजी जिंदगियों की पेश करते है. मंटो ने खुद ये सवाल अपने मित्र तथा अभिनेता  श्याम से किया था. इन कहानियों की एक महत्त्वपूर्ण बात ये है कि विभाजन के बाद भी लोग क्षेत्रीय सीमओं की फ़िक्र नहीं करते क्यूंकि वे सामजिक और सांस्कृतिक रूप से जुड़ चुके थे तथा क्षेत्रीय सीमओं के आधार पर यहाँ राष्ट्र-राज्य की कल्पना को विफल दिखाया गया है. उदाहरण के लिए “अमृतसर आ गया है” में ट्रेन के मुसाफिर क्षेत्रीय-सीमओं के बजाय सबसे पहले नेताओ की बात करते है. ये प्रश्न किया जाता है कि ‘पाकिस्तान’ बनने के बाद जिन्ना बॉम्बे में ही रहते रहेंगे या पाकिस्तान में रहेंगे? इस प्रकार मंटो की कहानियाँ तथा भीष्म साहनी का तमस दोनों ही इस बात को इंगित करते है कि हिन्दू और मुस्लिम, दोनों ही सांस्कृतिक रूप से इस प्रकार घुलमिल गए थे कि सीमओं के बल पर किसी के बल पर किसी भी प्रकार का कृत्रिम था तथा “माउंटबेटन प्लेन” के द्वारा जब इस प्रकार का असंवेदनशील निर्णय लिया जाता है तो वहां किसी भी प्रकार का  राष्ट्रवाद नज़र आता है. भारत के सन्दर्भ में तो बिलकुल नहीं! वे भारतीय स्थिति को समझे नहीं क्यूंकि उनके विश्व में सीमा रेखा के आधार पर राष्ट्रवाद की कल्पना की जा सकती है.

सन्दर्भ सूची

Manto, Saadat hasan, mottled Dawn: Fifty Sketches & Stories of Partition, Delhi, 2000, Introduction pp. 1-95 & 157-164

Monto, Saadat Hasan, Pandit Manto’s First letter to Pandit Nehru.

Joshi, Shashi, the world of saadat Hasan manto, The Annual of Urdu Studies

Chughtai, Ismat, Communal Violence & literature

Hasan, Mushirul, Memories of Fragmented Nation: Rewriting the Histories of India’s Partion.

Panday, Gyanendra Remambering partition: Violence, Nationalism & History in India, By way of Introduction & ch-3, Cambridge University Press, 2001

Kumar, Sukrita Paul, Surfacing from Within Fallen Women in manto’s Fiction, The Annual of Urdu Studies

साहनी, भीष्म, राजकमल प्रकाशन

साहनी, भीष्म, अमृतसर  आ गया है

कमलेश्वर, और कितने पाकिस्तान, मुंबई, 1969

rekhta. Org

shodhganga. Inflibnet.ac.in

Who was saadat Hasan Monto: A biography

वजाहत, असगर, जिस लाहौर नइ देख्या ओ जम्याई नइ, वाणी  प्रकाशन] 2006

http://www.columbia.edu/itc/mealac/pritchett/00urdu/tobateksingh/

Thinking Beyond Their Age: An Introspective Analysis

bihar

-Kshitiz Roy

When I was a kid, I found myself in Bihar. And all I was told since class six was aise padho, waise padho. Words like career, inter ka exam, IIT, medical filled the air. You go to Patna and you will feel as if education is always on the top of its mind. So many falana sir, dhimkana sir coaching institutes dot the place; almost on the lines of age old dawa khana which promise masculinity and all, the tall hoardings of coaching institutes promising to turn Patna into Kota tower around the city.

You mount any passenger train in the morning and you are bound to bump into students chanting square roots and the genealogy of Samrat Ashok. And I am not even bringing the Banking SSC scene into the picture. Now in a state, which has always been so much into the awe of sarkari naukri and hence education, in a state, which has produced some of the finest technocrats and bureaucrats coming through the same examination procedure of Bihar education council or as we fondly say Bihar board- what went wrong. I took a stroll down the news feed and found various shades of people, mostly from Bihar indulged in self admonishing, some of them expectedly brought a political angle to it and were eager to guillotine Nitish Kumar and co.

All of that is farce. All of that is bullshit. Biharis don’t need to prove the nation about their educational prowess; because in a state which has historically been devoid of industrial and enterprising ecosystem, education has been our only way out into the mainstream, and this goes beyond those caste borderlines which we are quick to associate with Bihar. Scores of friends and seniors have found themselves in the corridors of the old Patna science college or a nondescript begusarai college to pass out in flying colors in engineering entrance examinations. You see, senior secondary has never been an issue in Bihar. They are taught to think beyond their age- socially and mentally. And therein lies the problem.

About the senior secondary examinations,we fondly call it inter ka exam and don’t give a rat’s ass about it. There were kids who would hate to prepare for 12th physics paper because yaar, IIT-JEE ka paper ki taiyari mein likhne ki aadat choot gayi thi and english toh boss likhe jamana ho gaya. The entire public consensus is heavily skewed in favor of attending those coaching institutes and solving high power books like Resnik Haliday and Irodov. In Bihar, for a large number of inter ke students, read 11th and 12th class wale, there is just no idea of schooling. They find themselves in dingy classrooms situated near a passing sewer, and are thrown into an abyss of formulas. Why? Because cracking a competition ensures a job, and a job ensures the upward mobility- in a state reeling between the twin malaise of class and caste discrimination, a job is the only thing which ensures you freedom. And therefore the coaching, therefore the complete denial of a senior secondary structure which has brought the rot. The teachers in the state sponsored colleges make merry, the kids in the coaching strut around on their bicycle on the streets of Patna without questioning and the parents keep dreaming about that job and the mukti. And for that, the whole senior secondary structure has been re shaped in an industry where questions are sneaked out-churning prodigal science toppers. This is because it simply doesn’t matter.

You see in Bihar, we are taught to think mechanically and practically. And while we think we are always so rational in all our deeds, biharis often forget that times around them changes. And this happens softly. But soft is a word which they don’t understand in Bihar. And till that happens, results like that are only a tip of the iceberg, which should never amaze a true bihari for our state is like that classic brewery where the educational system has been left rotting in order to create fine single malt human resource. To all those comparing the failed students with lalloo k laal, I urge you all to try a ninth class BTC maths test once. Boss fat k 74 ho jaega, kassam se.

“आत्महत्या”आखिर क्यों ?

-अक्षय कुमार डाबी

suicide

 

जिसने तुमको जन्म दिया,

उनको छोड़ जाओगे।
आएगी तुम्हारी याद,
तड़पता उनको छोड़ जाओगे।
क्या हक़ था तुम्हरा जो तुमन छीन ली जिंदगी अपनी,

क्या उनके अहसानो को योंही बोल जाओगे।
सजाये है जो सपने उन्होंने तुमसे ,
क्या हक़ नही उन्हें उनपर जीने का।
जो कि थी जिद तुमने सब कुछ पाने की ,
क्या अब हक़ नही तुम्हरा कुछ उन्हें देने का।
माना कि तुम्हारी मुश्किल बहुत होगी ,
पर यो मरने से तो मुश्किल कम नही होगी।
कुछ कर ऐसा की दुनिया देखे तुम्हे ,
यो खुदारी की जिंदगी जीने का हक़ नही तुम्हें।

 

A Letter From Mahatma

-Kshitiz Roy

 

 

modi-gandhi
Gandhi to Modi

Dear Mr Modi,

Of late, the angles of heaven have been telling me interesting stories about my beloved India. The politics had never been so political, I am told. In a classically hysterical way, much like the mass media of our times, I have been warned about the fact that another lad from the holy land of Gujarat is hell bent upon rendering my ideals redundant. The other day, during our daily evening walk with Mr. Nehru in the alleys of Indra Palace, I found him deeply distressed about the current political undertones of his beloved India, something which he feels he had invented in 1947, I was told that you have unleashed another wave of communal hatred in the country. Let alone the planet earth, your political gimmicks have caused enough ripples to unsettle the settled political souls of the departed. Mr Modi, I am not too sure whether you are still into reading this letter or have just gone about tweeting me on social media, but let’s get this clear at the outset that despite the venomous anti- Modi campaign, those sikulars( I have also been told that the new wave social media pundits schooled by you have re phrased the word secular) have unleashed worldwide and here in the heaven, I am pleasantly appalled by you. You see, just like you, I could never come to terms with these heavy, west imported slang like Secularism and democracy. Just like you, I wish we could never have to be a secular democracy. This is India, and we have got the right to imagine our polity on the ancient Hindu lines, a polity which is dictated by our reverend mothers – Bharat and Cow; a polity based on the great Hindu idea of purity and caste hierarchies; a polity based not on the foreign idea of constitutionalism but on the very Indian idea of Sanskaar – the ancient Hindu culture. What if the whole potpourri would have been a slightly confused one, at least that way we could have been more Indian as a nation. You see, this is all I had fought for throughout my life; but blame it on the Oxford educated, scotch gurgling brigade of anti-national intellectuals disguised as Nehru and Co, our country was soon made captive to the colonial construct of polity. Independent India, my friend, was nothing but the biggest colonial mirage of 20th century, whose world view and imagination were kept captive at the doors of Mountbatten, errr, Edvina. I could have resisted, I should have done another satyagrah, but kid, by the time 1947 happened I was too old and jaded to take on the blabbering Nehru.
You sir, you have bewitched me for quite some time. It is now when I look at you, I feel that the dawn has come. You have single handedly taken upon your shoulders– the responsibility to rip this nation out of the colonial hangover. A look at you and I can’t help myself marvel over the divine similarities we both share. A look at you, and I feel that you are the one who will one day realize my long smoldering dream of creating a Bharat in an India. Sometimes, I see my redemption in you. I had long harbored similar dreams in my head and heart; but I could never articulate it in front of Nehru. For he was close with Mr. Ghanshyam Birla, and they together fashioned the myth of Mahatma I enjoy today. You my friend Modi, have gone a step beyond and have the tamed all the Birlas and Adanis of the nation. And this is one achievement I wish I could ever do in my lifetime. It is one thing to be revered, it is just another to rule. And for the latter, you need to enjoy financial autonomy. This is where we differ, and oh how!

Kid, when I look at you, I can’t help but marvel about all these similar political vision we share. It feels that we are two prodigies from the same school of politics, just that I am your old guy who is selectively and conveniently remembered. First of all, let’s get the Gujarat connection out of the way. By now, the nation must have realized that Gujarat is the official kinder-garden of Indian politics. While the other provinces of the nation produce political leaders, Gujarat is from where legends come. Let’s count LK Advani as an aberration. See kid, you always had in you. You have mastered the art of being a news maker long ago, since way back in 2002, if my memory serves me right. While there are many who go berserk about this, but I find nothing wrong with it – that’s what all great leaders do. They learn how to be the news. Look at me; this is something what I did so brilliantly throughout the national movement. I am not easily impressed by the smear campaign they have unleashed against you. I know what it takes to be the king of the pack. Ask me, I have been dealing with all kinds of verbal pleasantries throughout my life; even when I am dead. That’s the side effect of being great. That’s the side effect of being political. You see when you are there in this game for a long haul; there are choices you have to make, there are silences you have to choose. They would criticize you heavily for your selective diatribe and convenient silences against poverty, unemployment and so and so on. Poverty, my friend, as you might have known by now, is a historic construct just like communal ism. No sane political power ever interferes to do anything with it. I have seen many bright European minds dealing about it and trust me, maintaining status quo is the ultimate political success. Those who succeed in this race of power don not provide a solution to these social ils, they learn how to play along. Political criticism, my friend is a funny business. It is often taken up by those who don’t know an inch about politics. And trust me; this country would ever be brimming with such people, often found wanting in historical sensibilities and replete with a myopic sense of social commentary.

By the time India was free, I had lost my appetite for politics, and thanks to Mr Godse, who in his uniquely Hindu way, ensured that I attain ‘Moksha’ at the most suitable juncture of time, I find myself unable to comment about post independent India. Now, because I have practiced enough of politics in my sojourn through Indian political struggle, I know very well that you need to be selfish in order to rule. Those who haven’t and will never taste the political waters of this nation will never know about the art of ruling. And going by the limited knack of legality and political acumen I possess, I feel there is nothing wrong with you. If at all anywhere, this is where you seemed to have excelled. My heart fills with pleasure unbound when I find you taking cues from my book. People have tried hard enough to tear us apart ideologically – but let me clear the air once and for all. I have never seen a PM going back in time and taking cues from my book. It is when I see you approaching the historical social malaise of cleanliness through my lenses in your brilliantly designed Swacch Bharat campaign; it is when I see your satyagrah against the black money hoarders; it is when I see you clashing swords with an entire army of intellectuals beating around the bushes of JNU, my heart resonates with tour vision. Those who don’t know me have tried to pitch us together as enemies, as two antithetical political characters sitting on the opposite fences of ideology. And this is where; I would have loved to share a loud laughter with you for both of us, being the foxy Gujju bhai we are, and very well know that ideology is just another cloak to enjoy brute power. And talking about ideology, no matter how many PHDs, they would keep distributing across the length and breadth of the nation, they would never get hold of my idea of India. For they Dear Mr Modi, don’t know that just like you I harbored a deep distrust towards things and ideas imported from the west. West is waste. In the last few years, people on the other side of the fence, have ridiculed you with the epithets of dictator, communal, divisive, pompous and what not. You have been accused of trying to belittle the constitutional institutions. Mr Nehru sends his deepest anguishes in the strongest of anglicized words, for dismantling his baby – the planning commission. No matter how many times I told him that Neeti sounds more Bhartiya, he won’t budge but let’s not get into his petty childishness. You see, the NEHRUS have always been childish. You have Rahul to vouch for this, right? Back to your intelligent fondling with the so called idea of constitutionalism, I think it’s quite prudent of you to take such decisions. Legally speaking, you have always been around the best of judges. And ideally, I would have wanted to dislodge the entire constitution itself to make way for a more suitable version of Ram Rajya based on the teachings of Tulsi and Geeta. Those who don’t know me personally are bound to make mistake us as political enemies. You, Mr Modi, are a numb version of my prime. Those who wish to project me as an epitome of tolerance, and you as one destructive fellow, fail to realize that Gandhi would have ideally wanted to get rid of the police, the judiciary and ideally even the constitution. For they are nothing but figments of western imagery, coming straight out of the womb of a western enlightenment, suited to their colonial apparatus with little but no significance to the poor Indians. I am glad that you have taken the onus upon yourself to scratch their underbellies.

The queer thing with legends is that they stick in the public imagery, for reasons weird enough to be known even to them. Take me for example, 100 years after the Champaran revolt, for which people have kindly held me responsible, I am yet to fathom my role in it. All I remember doing there was making those poor filthy Biharis dig latrines and ensure that they don’t die of malaria. Trace the legal status of the Champaran case, and you would be in for the surprise of your life. Law, it takes its own strides. But the thing with India is people here are more interested in lapping up the legends and myths more than the minutes of law. And this is precisely what you are enjoying today. My eyes fill with the purest of tears, when I see Indians rallying behind another Mota Bhai from my mother land. And till the time, you are making the news; they are going to love you.

I can see the spark in your eyes; the hunger to be the shepherd of the herd called Indians, something which I had long tried my hands at. And it is where I would like to shake you out of the political orgasm you are enjoying of late. Power, just like the body, is mundane. And given how spiritual we all are, I know that you know that all of this is Maya. The traditional schools of philosophy confirm this that every flower that blossoms one day has to become mere dust. And such is the case with legends too. We are all bound to be forgotten. We are all bound to be tucked into neat museums and statues and streets named after us. Nobody remembers the legacy, nobody remembers the deeds, – everything about a legend – his ideas, his ideology, his vision, his dreams – all of that is bound to be flushed through the annals of history and history, my friend, is a very cruel and unforgiving dungeon. It treats you the way you just can’t imagine in your lifetime. Ask Nehru, he would swear by what I say. Therefore there is this unsolicited piece of advice, which I would like to give you. I know you have got another Mota bhai from Gujarat, Mr Shah for your daily dose of advises and you don’t quite believe in being advised, but take it as a token of appreciation from this grand old man. Kid, the road to power might be a political journey, but clutching on to it is quite a lonesome one. And it is where you need to listen to your soul. As and when your schedule permits it, please do listen to that voice of the soul. It never lies and once in a while it is better to hear the truth, however unpleasant it might be. Life often appears to be one long orgasmic session when you are in your prime, and once that happens, it is when in a democracy the people fuck you. I pray that this doesn’t happen with you for Bharat, more than India needs you to steer its way out of the abyss of colonial hangover towards an independent imagination of itself. I wish you all the luck in your mission. I would be following you closely around, not on twitter though but in those oft repeated bouts of political comparisons.

Signing off from heaven,
Bapu.

  THE DILEMMA OF IDEOLOGIES

-Kshitiz Roy

Forget the term ‘long run’, for in the long run we are all dead. Forget the fact that the demonetization drive, a colossal policy failure that it has been in the short run, has left the nation’s economy battering. Forget everything and chug along the oft quoted nationalistic ideals, ideals which have been conveniently re-calibrated according to the political whims and fancies of a regime which seems to have taken a pledge to do the most ‘schizophrenic brand of politics’ in the political history of the nation. It seems as if forgetting is the new art which the current regime wants us to learn. Let alone our history and the hazy contours of a future often promised and never delivered in politics, it seems that we are even expected to forget the immediate present – a present which for now, seems to be marred by the serpentine queues stretching for miles and a blitzkrieg of changing rules. Nothing seems certain. At no point in time, in our political history, has there been a phase of unannounced yet widely evident financial emergency. This is where the subversion of electoral majority appears so well evident. That the charismatic persona of one leader who has helmed our political echelons after 2014 has so well been used to deny us of our own money, all in the name of realizing some well meaning yet ‘ vague’, yet ambitious ideals of rooting out corruption, sounds nothing but fantastic.

Now that the colossal failure of this ‘well meaning’ economical experiment appears well evident and the criticisms have been pouring down from all quarters, the vanguards of this bizarre move seem to be at a sea while countering the issue. First they began with the trial and tested magical potion called nationalism. The sacrifices and the pains are for the betterment of the nation, so we were told. But ‘whose’ nation it was going to be? For ‘whose’ betterment all this hullabaloo was being created? That was for us to find out in the next few days. Needless to say it fizzled out like a hot balloon running out of air. Let’s hope that they realize that a nation is an imagination realized to reality by the people who habitat the geographical region where it is being imagined. The imagination is immediately soured when you start picking and choosing and branding some ‘people’ being national and the others, anti-national. The imagination called nation crumbles when you deny a large section of its people the space and the voice to realize their right to life, something which is provided by the constitution; the holy book all political parties swear by. You tell the banks to deny them their own hard earned money and no matter how rosy a picture you paint, of a future rinsed of the blemishes of black money and corruption, nobody is going to buy that argument. For you don’t go on betting on the immediate realities of an entire generation. While politics might allow this game of betting on the present and romanticizing around an idea of the future, governance in a welfare state knows nothing but the immediate reality. And that is too pathetic a picture to even talk about.

No matter how shrewdly one goes around shifting the goalposts, churning out lies after lies, excuses after excuses – the reality is there, sprayed in front of all of us who are divided across parties and ideologies. It is not so soothing, neither it is comforting. No matter how much intellectual fodder you use, you cannot give back life to those who have dies because of this move; the crippled state of affairs can’t be corrected by a serious of hyperboles and a series of misplaced logical fallacies which debaters use to win a harmless debate in schools.

Speaking of logical fallacies, one section of the current regime, which has long aspired to become the ‘intellectual vanguard’ of right wing politics led by an army of shrill university professors, has now taken upon itself the burden to rationalize the irrational. They are here to tell us all about this being an ‘economic satyagrah’; they are here to make us realize that the exercise in effect is basically a war against the nepotism ushered in by rampant neo-liberal policies. They will tell you that the current right wing regime is here to cure the ills that the neo-liberal policies of the earlier governments have brought about. Playing with the standard logical fallacies which include Red herring and appeal to emotion, where the argument is peppered with misplaced priorities, they are trying to make us realize that the current regime is up against the crony capitalist empire of the trans-nationals; that their ideology has always been rooted in an essentially ‘socialist’ conception of capital. After a nerve wracking session within their think tank, they are here to topple history upside down and capture the centrist political space, well mostly because nobody else is there to articulate it. So because the voice from the opposition has been muted and none seems to be competent enough to articulate the idea of a ‘nationalist brand of capitalism’, these neo-intellectuals, tutored and trained under the tutelage of the Sangh Parivar, are ready to use the age old tools of ‘socialism’ to defend an essentially capitalist political bulwark of which they are a part of.

One can only laugh at this misplaced adventure. Scratch their arguments bit by bit and the sheer hypocrisy of it will be there for all to see on the surface. A regime which enjoys the unbridled political support of a primarily upper and middle class, a regime whose current leader has championed the cause of aspiration politics among the great Indian middle class – both of them are the necessary by products of an India which was ushering in the same age of neo-liberal politics. If at all, the political landscape of the nation has skewed in favor of the right wing forces, these self proclaimed intellectuals should thank Manmohan Singh and Co for opening the doors of Indian market. It was precisely that section of the society, riding on the MNC bred job offers and the thrust of opportunity brought about by the very same neo-liberal interests, which has now become the most important puppet in the game of televised politics. It is here that one needs to bring in renowned sociologist Partha Chatterjee’s brilliant assessment of the nature of the successive governments under the leadership of BJP and Congress. One just needs to look beyond their manifesto based macro discourse to find that both of them have been steadily pushing forth the neo-liberal interest in order to chalk out the ‘development story’ of the nation. The march of Trans national companies and capital has never been questioned; the distancing of populist politics from the so called ‘rational economical brand of polity’ is there for all to see. Talk about neo liberal regimes and BJP is nothing but Team B of Congress. That is not to say that the state has been absent from the growth story of the nation or the economic evolution of the nation has always been subservient to the neo-liberal agenda imagined at Bretton Woods institutions. The state has been always there, carefully balancing between the goals and aspirations of a welfare state, and promoting the idea of laissez faire.

This brouhaha coming from the right wing think tank, against the neo-liberal scheme of things and the politics of laissez faire is dramatic example of barking around the wrong pole. It’s a classic case of deflecting the issue towards another vague ideological proposition, something which they have always been against.  In an age when the talk of neo-liberal march sounds archaic, when on the one hand you are clamoring to make us go Cashless using mobile wallets funded by Chinese corporate houses, this demonizing of neo-liberalism as something which is alien borders idiocy. It is as misplaced as the Swadeshi movement in which the Bengali revolutionaries were thinking of taking on the entire British economic framework by boycotting foreign goods. No matter how enchanting the tune of Swadeshi might sound to the ears, hardcore economics is an unforgiving game, even more when you bring in your shallow political motivations into it. You kick on the belly of a common man and he will drag you out of your intellectual slumber in the next election. There have been instances of it, many so in our won nation where people have mastered the art of surprising themselves too when it comes to politics. While this newfound hatred against neo-liberalism and the crusade for a Swadeshi socialism might be the new intellectual invention from the stables of Sangh, put it through a test to time, person, place and history, it is bound to crumble down under the heat of hunger and poverty. Till that happens, let’s wish those neo-intellectuals a happy time on the TV screens with their newfound line of political bullshit.

Was it A Sudden Decision?

-By Sanya  Singhal and  Kushwaha Ranu Prasad

M.A.(P) History

Talks of surgical strike on occupied Kashmir were still round the corner when on November 8th 2016, PM Modi announced the demonetization of INR 500 and 1000 notes. The news spread like wildfire. The aim of this bold step was manifold like to deal with Parallel Economy, Counterfeit Currency in circulation and terror financing, to get rid of black money and corruption, etc. This step had changed the scenario of the Indian economy as it moved towards Digital Economy. The decision affected every strand of the economy – from a farmer to the Corporate CEO.

Demonetization is an established practice in monetary policy to tackle black money. The idea of demonetization is good but it has to be taken into consideration that the most of the black money is kept in the form of land, buildings or gold or kept abroad. Demonetization does not tackle corruption per se or the Government does not say that 100% corruption would be tackled.

India is not alone when it comes to demonetization of currency. Various other countries have also successfully carried out demonetization like The European Union which switched to Euro in 2002. The United States of America stopped printing $1000 and larger denominations of currency by 1946, but these bills continued circulating until The Federal Reserve decided to recall them in 1969. Zimbabwe, in 2015, demonetized the Zimbabwean dollar as a way to combat the country’s hyperinflation.

Prior to PM Modi’s announcement of demonetization of higher denominations, there were two similar instances in India.  The first instance was in 1946 and the second in 1978 when an ordinance was promulgated to phase out notes with denomination of Rs. 1,000; 5,000; 10,000. The media in terms of numbers was limited in 1946 and 1978 when compared to 2016. But given the importance of the decisions, it did trigger coverage.

The Demonetization step taken by PM Modi led BJP government was much needed for a very long time to remove the tumor of corruption which was killing the society. But one cannot ignore the dark face as well because it makes the situation even more difficult. BUT was it really a sudden decision or was a planned one? In the succeeding paragraphs, an attempt will be made to locate this historical action under the ruling government.

The answer is simple to the above question. It was not at all a sudden action. The period to be accounted for should have been some months prior to demonetization. Mr. Modi has appropriately taken all the safeguards and warned the people about his decision and its pros and cons.

In 2014, when National Democratic Alliance came into being, the Union Cabinet at its first meeting formed a team named SPECIAL INVESTIGATION TEAM headed by former Supreme Court Judge, M.B. Shah to investigate black money. He said that it is a “surgical Strike” on black money because there is a tendency among people not to pay income tax and that is why it was a major evil which paved the way to the birth of other monsters in society.

Similarly, at G20 Summit 2014, with other global leaders, PM Narendra Modi gave a strong push to government agenda on black money and he said unaccounted money was also linked to security challenges and added that there is a high need for positive political and economical environment to achieve all goals. He also forced in his speech that it is our priority to bring back all black money stacked in foreign banks which shows that he was concerned to eradicate corruption and issue of black money because that had reached at its highest point and were day by day moving upwards..

Another watershed act came into being on 1st July, 2015 called the Black Money (Undisclosed Foreign Income and Assets) and Imposition of Tax Act, 2015 to deal with the problem of the black money (within three months by paying 60 percent tax) that is undisclosed foreign income and assets, the procedure for dealing with such income and assets.

Major steps also include the formation of a Multi- Agency Group (MAG) on the Panama Paper Leaks listed some 500 Indians who have allegedly stashed money in offshore entities. Another move was the introduction of Benami Transactions (Prohibition) Amendment Bill, 2015 was introduced in Lok Sabha on May 13, 2015. This Act prohibits Benami transactions and provides for confiscating Benami properties.

To track assets nationals of either country hold in the other nation without reporting them to their respective home-country tax authorities, India and US in July 2016 struck a bilateral deal. The information sharing agreement between India’s income tax department and the US’ Internal Revenue Service (IRS) under the US Foreign Account Tax Compliance Act (FACTA) became operational from September 30, 2016.

India has Double Taxation Avoidance Agreement (DTAA) with 88 countries, but presently 85 has been in force. The DTAA treaty has been signed in order to avoid double taxation on the same declared asset in two different countries. The recent in the list is the revised Agreement between India and Cyprus and India and Mauritius. It will replace the existing DTAA that was signed by two countries in June 1994. The provisions of new DTAA will enter into force after completion of necessary internal procedures in both countries.

India joined the Multilateral Competent Authority Agreement on Automatic Exchange of Financial Account Information (AEOI) to reduce the possibility for tax evasion and unearth black money. Another major step was the Income Declaration Scheme (IDS) to unearth black money and bring it back into the system and Black Money worth Rs.65,250 crore disclosed under IDS. PM warned during his “Mann Ki Baat” address to the nation that the time is up for black money hoarders.

 

This was all about political and documental strategy that the government had adopted prior to the demonetization. Now let us see the “Notes Replacement Strategy” of the government i.e. Had the RBI and the government actually printed the amount of notes required for demonetization?

Demonetization has sucked out massive amounts of liquidity from the system in terms of old currency notes of Rs. 500 and Rs. 1000 demonetization. RBI data reveals that before demonetization, a little over 9000 crore pieces of currency notes were in circulation. Around 86 per cent of that value of currency was sucked out in the form of Rs. 500 and Rs. 1000 notes.

The government insisted that adequate amount of notes were printed in advance to ensure the liquidity sucked out of the system is restored with the new currency quickly. The RBI and the government said that the printing Rs. 2000 notes started much in advance. The infusion of Rs. 500 was somewhat late, but the preference still seemed to for Rs. 2,000 notes both in ATMs and banks. The trouble with the Rs. 2,000 notes is that citizens are not easily able to find shopkeepers, vegetable sellers and other vendors willing to part with precious change of smaller denominations as balance for payments made with the high-value notes.

The currency after printing has to travel from the press to currency chests maintained by the RBI across several locations in the country. The money then travels from these chests to banks and ATMs. Manpower is an issue and logistics is another hurdle given the secrecy and high security needed.

Three weeks after Prime Minister Narendra Modi’s stunning announcement, the printing of the new Rs. 500 note has been grounded to a near-halt at the Nashik and Dewas printing presses. RBI sources revealed that a series of glaring errors on the mew Rs. 500 notes. The exercise was shifted to the Mysuru press. And in order to cause no more chaos, the government announced that the “printing-defective” notes would still be a legal tender.

In conclusion, November 8,2016 will be hailed as the day when the Indian Economy resonated with cashless exuberance. BUT as well said by Max De Pree that “Change without continuity is chaos. Continuity without change is sloth- and very risky.” So, this change in economy was a need of a time as continuity without any changes is not good and to change anything, sudden decisions are not appropriate. It was this decision which is not an overnight step but a long process. Demonetization is a positive step, one can’t ignore its dark face especially in the rural areas. Although India faced many problems earlier so for this one, India will definitely tackle it.

 

 

 

बदलती कहानी : बदलते किरदार !!!

-कुमार प्रभात 

दिन भर रोज़गार के सिलसिले में भागदौड़ तो करता ही हूँ…अब सोच रहा हूँ कि तुम्हारे घर में “बाई” की नौकरी शुरू कर दूँ…सुबह जब तुम ग्यारह बजे हंसती-चहकती-मुस्कुराती-खेलती मिलती हो मैं इस कल्पना में डूब जाता हूँ कि नींद के बोझ तले, आधी खुली पलकों के संग जब तुम जबरदस्ती सुबह जगती होगी तो तुम्हारे बिखरे बाल, जीवन के व्यवस्थित होने से ज्यादा खुबसूरत लगते होंगें…उस वक़्त का तुम्हारा चेहरा किसी जीवन दर्शन से कम नहीं लगता होगा…’बाई’ रहूँगा तो हर सुबह, ठीक उसी वक़्त चाय के एक कप के साथ रोज़ तुमसे मिलूँगा और तुमसे कहूँगा- “दीदी, चीनी डालना भूल गया था, आप बहुत मीठी हैं…जितनी मीठी चाय चाहिए, खुद को घोल के पी लीजिये…” फिर ये भी तो होगा, तुम्हारे घर में झाड़ू लगाते समय ऐसा लगेगा कि किसी मंदिर को साफ़ कर रहा हूँ…घर के जाले हटाते समय महसूस होगा कि जीवन के कुछ उलझे हुए गिरहों को खोल रहा हूँ…खिड़कियो के परदे खींचते समय विशेष ध्यान रखूँगा कि निगोड़ी सूरज की किरणें सीधे आपके सुर्ख गालों पे न पड़ जाए…विटामिन d अब किरणों में कम और हानिकारक तत्व ज्यादा हो गए हैं…

आपको देख कर कोई कह रहा था कि आप मोटी हो रही हैं…मैं बाई रहूँगा तो विशेष ध्यान रखूँगा कि आप क्या खाएं और क्या न खाएं…इसलिए नहीं कि मुझे आपके मोटापे से समस्या है बल्कि इसलिए कि वो साला जब आपकी तुलना किसी और से करता है तो आतंकवादी बन कर उस पर बम फोड़ देने का मन करता है…अभी इन दिनों बाई बनने का एक और फायदा है कि मैं एटीएम की पंक्ति में लग लूँगा और पैसे आपके निकाल लाया करूँगा, इस काम की मैं सैलरी नहीं लूँगा…

बाई रहूँगा तो कभी-कभी आप मुझे डांटेंगी भी…जैसे मेरी माँ मुझे डांटती है…तो एक पल के लिए ही सही, आपके बच्चे की तरह मैं बन जाऊँगा, और किसी का बच्चा होना तो न टूटने वाली जोड़ का बनना होता है…खाली समय में आप अगल-बगल के लोगों की चुगली भी करेंगीं और मैं आपकी गॉसिप पार्टनर बन जाऊँगा और एक लड़की के लिए गॉसिप पार्टनर लाईफ पार्टनर से कम थोड़ी न होता है…जब कभी लगेगा कि इस दुनिया में मेरा कुछ है ही नहीं, न दौलत, न शोहरत तो मैं आपको डांट दिया करूँगा…कुछ भी बहाना बना कर…ताकि उन कुछ लम्हों के लिए मुझे एहसास हो सके कि आप मेरी जागीर हैं…आप मेरे हैं…

बस दो चीज़ तय करनी है…इस नौकरी में मुझे छुट्टी कभी नहीं चाहिए…आप जब घर पे न रहें तब भी मुझे आने की आज्ञां हों ताकि आपको हर दिन मैं महसूस कर सकूँ…आपके बिना आपके घर की दीवारों से पूछ सकूँ कि आपके बिना उन्हें कैसे लगता है…उन दीवारों से कह सकूँ कि उनके बिना मुझे कैसे लगता है…और एक और बात. मेरी सैलरी…आप अक्सर अपना मोबाइल पटक कर तोड़ देती हैं….तो जब-जब आपके घर से आपको मोबाइल खरीदने के लिए आपकी माँ पैसे भेजें तो उसी में से कुछ पैसे मुझे दे दीजियेगा…उन पैसों को मैं खर्च नहीं करूँगा, जमा करूँगा ताकि एक दिन जब आप गुस्से में अपना मोबाइल तोड़ें तो मैं आपको नया मोबाइल ला कर दे सकूँ…थोडा महंगा वाला…अपनी हैसियत से ज्यादा वाला…!!!