विभाजन, हिंसा और साहित्य

  • सुकृति गुप्ता
  • एम.ए. हिस्ट्री

साहित्य ऐसे झूठ होते है जिनमें सच्चाई होती है और जब ये झूठ ऐतिहासिक पात्र बोलते है तो इन्हें पढना और भी ज़रूरी हो जाता है क्यूंकि कोई भी साहित्य शून्य में जन्म नहीं लेता. वह अपने इतिहास से प्रभावित होता है और अपने वर्तमान से भी, जो हमारा इतिहास बन चुका  है.

इतिहास अब राजाओ, शासनकालो और युद्धों का इतिहास नहीं रह गया है बल्कि ये मानवीय भावनाओ, उनके द्वारा झेली गयी त्रासदियों और अनुभवों का भी इतिहास है. इस सन्दर्भ में जब हम विभाजन और विभाजन के दौरान हुई त्रासदी की बात करते है तो इसके कई जवाब है- भारतीय जवाब, पाकिस्तानी जवाब, ब्रिटिश जवाब आदि. हर जवाब अपनी ही अलग विचारधारा से दिया गया है पर यदि हम उस दौर की त्रासदी को समझना चाहते है तो हमें उस दौर के साहित्य को देखना होगा क्यूंकि इतिहास जब अमानवीयता, द्वेष और हिंसा की बात करता है तो पीडितो की आवाज़ को सुनना ज़रूरी हो जाता है. हालाँकि यदि स्मृति के रूप में देखा जाए तो शायद वह आदर्श प्रतीत न हो पर हिंसा का अध्ययन किया जाता है तो सटीक स्मृति के बजाय कराहटें अधिक महत्त्वपूर्ण हो जाती है, जिनकी अभिव्यक्ति हमें साहित्य में  मिलती है.

इस सन्दर्भ में जब हम लोकप्रिय साहित्य पर गौर करते है उनमे उपमहाद्वीप के नेताओ के प्रति आक्रोश नज़र आता है तथा वे उनपर आरोप लगते है कि वे शक्ति के संतुलन संबंधी विवाद को सुलझा नहीं सके. वरिष्ठ पत्रकार अजीत भट्टाचार्यजी भी इसका उल्लेख करते है कि किस प्रकार विभाजन कठोरता से और जल्दबाजी से किया गया था कि ठीक से सीमा रेखा भी तय नहीं की जा सकी थी और न ही इसके लिए ठीक तरह से व्यवस्था की जा सकी थी. वे इस बात का उल्लेख करते है कि किस प्रकार तत्कालीन प्रधानमंत्री “वास्तविकता की गहराईयों” को छु नहीं सके थे और उनके इस भ्रम (self delusion) के सन्दर्भ में उन उक्तियों का उल्लेख करते है जो उन्होंने लियोनार्ड मोस्ले से १९६० में कही थी- “हम थके हुए आदमी है और हम में से बहुत कम ही है जो जेल जाना चाहते है और अगर हम  भारत की एकता के लिए खड़े होते है- तो हमें जेल जाना ही होगा. हमने पंजाब में लगी आग को देखा है, लोगों को मरते देखा है. विभाजन इससे बाहर निकलने का रास्ता था इसलिए हमने उसे अपनाया. हम उम्मीद करते है कि विभाजन अस्थायी होगा तथा पाकिस्तान को हमारे पास आने को बाध्य होना पड़ेगा.

विभाजन का इतिहास लोगों की जिंदगियों तथा उनके अनुभवों का इतिहास है. १९४० की घटनाओ को किस प्रकार उनकी पहचान से जोड़ दिया गया, उसका इतिहास है और अनिश्चितताओ जिन्होंने विभाजन को जन्म दिया या उसे थोपा, का इतिहास है. इस सन्दर्भ में मंटो प्रासंगिक प्रतीत होते है. वे अपने लेखन में विभाजन के दौरान हुए महाध्वंस की कहानियां कहते है. आलोक भल्ला विभाजन पर लिखी कहानियों को “सांप्रदायिक कहनियों” की संज्ञा देते है जिसके सन्दर्भ में वे कहते है कि इनमे पक्षपात है तथा ये दोनों और कि कहानियों को ठीक तरह से बयाँ नहीं करती.

वीना दास तथा आशीष नंदी का कहना है कि “विभाजन पर लिखा गया ज़्यादातर साहित्य अप्रमाणिक है क्यूंकि एक तरफ की हिंसा को दूसरी ओर से संतुलित करने का प्रयास किया गया है. और इसीलिए हिंसात्मक और अमानवीय  व्यवहारों के वर्णन में हमें समानता नज़र आती है, और फिर चाहे कोई ट्रेन लाहौर से आ रही हो या अमृतसर से, यदि एक वेश्या दो औरतो को पनाह देती है तो उनमे से एक हिन्दू और दूसरी मुस्लिम होगी.

पर मंटो इस सन्दर्भ में भिन्न प्रतीत होते है. उन्होंने खुद विभाजन का दर्द अनुभव किया था. वे कोई राजनीतिज्ञ नहीं थे तथा उन पर कोई विचारधारा हावी नहीं थी. उनकी मानवीयता किसी भी तरीके से धार्मिक लेबल को स्वीकार नही करती तथा क्रूरता तथा हिंसा को बर्दाश्त करने का विरोध करती है, जो उन्हें उनके समकालीनो से भिन्न बनाती है. जहाँ बाकि मर्द मार पीट कर रहे थे, औरतो की बेइज्ज़ती कर रहे थे, लोगों का खून कर रहे थे वहीँ मंटो अपने तंगी के दिनों में सस्ती वाली दारू पी रहे थे तथा इतनी दारु पीने के बाद भी  होश संभाले हुए थे.

वे एक स्वतंत्र विचारक थे जो उनके कथन से ज्ञात होता है- “ज़िन्दगी को वैसे ही दिखाना चाहिये जैसी वह है, न कि वो कैसी थी, कैसी होगी या कैसा होना चाहिए.” (Life ought to be presented as it is, not as it was or as it will be or should be) बम्बई शहर, जो उन्हें बेहद प्रिय था तथा जिससे वे बेहद प्यार करते थे, उन्हें छोड़ना पड़ा. वे मरते दम तक उसके लिए तरसते रहे. उन्हें विभाजन के बीज सिनेमा जैसे अधार्मिक क्षेत्र में भी नज़र आने लागे थे. उन्हें जब पता चलता है कि अशोक कुमार, जिनके साथ वो बॉम्बे टॉकीज में काम करते थे, को धमकी भरे पत्र (हेट मेल) मिल रहे है तथा उन पर आरोप लगाया जा रहा है कि वे कंपनी में मुस्लिमो को शामिल करने के लिए ज़िम्मेदार है, तो वे बहुत द्रवित होते है. उनका दिल टूट जाता है कि जो लोग उन्हें सआदत हसन मंटो की नज़र से देखते थे, उन्हें अब मुस्लिम की नज़र से देख रहे है. और इन सबसे तंग आकर वो पाकिस्तान चले जाते है जिसे वे जानते भी नहीं थे. उनकी इस टीस की अभिव्यक्ति हमें “टोबा  टेक सिंह” में मिलती है जिसमे अस्पतालों के अलावा बाकि बाहर की दुनिया पागल हुए जा रही है. उपमहाद्वीप के नेता इतने पागल हुए  जा रहे है कि वो पागलो की भी अदला बदली कर रहे है. ये पागल वो मुस्लिम है जिन्हें पाकिस्तान वापस लाया जा रहा है और जो गैर मुस्लिम है उन्हें भारत भेजा जा रहा है. इनमे अकेला बिशन सिंह जाने से इनकार कर देता है क्यूंकि वो पंजाब के एक छोटे से शहर टोबा  टेक सिंह में, जहां उसका जन्म हुआ था और उसके परिवार ने अपनी ज़िन्दगी जी थी, रहना चाहता था. वह न तो पाकिस्तान में और न ही भारत में बल्कि टोबा  टेक सिंह में रहना चाहता था. उनकी कहानी “मोज़ील ” धर्म के प्रभाव को उजागर करती है, साथ ही उसपर व्यंग्य भी करती है. मोज़ील का निर्वस्त्र बिना वजह मर जाना धार्मिकता को बिना वजह धारण करना है जो कि त्रिलोचन की पगंडी में निहित है. मोज़ील के इस कथन से इस बात की पुष्टि होती है जब वो कहती है “अपने इस धर्म को ले जाओ”.

टिटवाल का कुत्ता (The dog of Titwal) में भी लोगों को पागलपन तथा शक्ति और अधिकारीयों पर व्यंग्य करते है. ये बता पाना कठिन है कि कुत्ता एक देशभक्त की तरह मारा गया या उन्होंने अपने देश के कठोर, धार्मिक बेवकूफी को मारा है. ऐसा प्रतीत होता है कि वे हिंसा में मनोरंजन का आभास करने लगे है.

उनकी कहानी “खोल दो” हिंसा की सारी सीमाएं तोड़ देती है. वे बुरे या  दुष्टता के सन्दर्भ में धार्मिक समुदाय की विचारधारा का विरोध करते है तथा ये दिखाते है कि दुष्ट लोग किस प्रकार अपनी लालसाओ को पूरा करने के लिए ऐसी स्थितियों का फायदा उठाते है तथा आपके मज़हब के लोग ही आपको धोखा दे सकते है. वे दिखाते है कि हिंसा का कोई धर्म नहीं होता तथा ये अमानवीयता का परिणाम है. “आखिरी सलाम” (the last salute) बिना वजह लड़ने की कहानी है. सैनिक खुद नहीं जानते कि वे क्यूँ ऐसे देश के लिए लड़ रहे है जो उनके लिए अनजान है. वो खुद नहीं जानते ई उन्हें सच में कश्मीर चाहिए या नहीं.

मंटो को कश्मीर बेहद प्रिय था जिसका उल्लेख वो पंडित नेहरु को लिखे अपने पत्र में करते है. उनकी बहुत सी कहानियां जैसे “आखिरी सलाम” और “टिटवाल का कुत्ता” का कश्मीर पर केन्द्रित है. वे छोटी छोटी खुशियों के लिए तरसते जान पड़ते  है. उदाहरण के लिए वे पत्र में शिकायत करते है कि शायद यह बब्बुगोशा का मौसम है. मैंने यहाँ बहुत से गोश खाएं  है पर बब्बुगोशा खाए मुझे बहुत अरसा हो गया”. वे पत्र में  स्पष्ट तौर पर नेहरु जी से नाराजगी जताते है, कश्मीर और विभाजन के मुद्दे को लेकर पर साथ ही ये भी ज़ाहिर करते है कि वे कितने असहाय है. उदाहरण के लिए वे खुद को “डेढ़ सेर का पत्थर” (किसी ने उन्हें बताया था कि मंटो का अर्थ डेढ़ सेर का पत्थर होता है) तथा उन्हें “नदी” (नेहरु अर्थात नहर/नदी) कहकर संबोधित करते है. पर साथ ही वे यह भी कहते है कि यदि मैं डेढ़ सेर के पत्थर की जगह एक बड़ा पत्थर होता तो उस नदी में खुद को गिरा देता जिसे अपने बहने से रोक रहे है ताकि आप अपने इंजीनियरो की टीम के साथ इस पत्थर को हटाने के लिए बातचीत करने पर मजबूर हो जाए. वे उनके  कश्मीरी होने की दुहाई देते है. वे शिकायत करते है कि आप बड़े आदमी है, भारत जो कभी मेरा देश था, के शासक है आप पर आप ने कभी इस आदमी की फ़िक्र नहीं की. वे शिकायत करते है कि किस प्रकार भारत में प्रकाशक उनकी कहानियां बगैर उनकी मंज़ूरी के छाप रहे है वो भी अजीबो-गरीब नामो के साथ. किस प्रकार उनका मज़ाक उड़ाया रहा है. वे कहते है कि वे उन्हें अपने किताब की एक प्रति भेजेंगे जिससे कि नेहरु उनकी कहानियाँ पढ़े (जिन्होंने कभी उनकी कहानियाँ नहीं पढ़ी थी) तथा कहते है कि मुझे पूरा  विश्वास है कि आपको मेरी कहानियाँ पसंद नहीं आएँगी.

मंटो की प्रिय मित्र इस्मत चुगताई  कहती है कि ‘सियाह हाशिये’ की व्याख्या करते हुए मुहम्मद हसन अस्करी ने कहा है कि मंटो अन्यायी को अन्यायी की तरह नहीं देखते तथा उनकी कहानियों से प्रतीत होता है कि हिंसा करने  वाले पात्र ईश्वर द्वारा बनाये गए है. इस्मत चुगताई ये स्पष्ट करती है कि वे ऐसा नहीं सोचते. वो अन्याय को अन्याय कहने से डरेंगे क्यूँ? वे अन्याय करने वालों का विरोध करते है. वे कहती है कि मैं जानती हूँ कि मंटो ‘सियाह हाशिये’ लिखते वक़्त हँस नहीं रहे होंगे और न ही उन्होंने ये कहानियाँ हमें हँसाने के लिए लिखी है.

मंटो स्वयं अपने लेखन के सन्दर्भ में कहते है- “लम्बे अरसे से मैं देश के बंटवारे से उपजी उथल पुथल के नतीजो को स्वीकार करने से इनकार करता रहा. महसूस तो मैं अब भी वही करता हूँ पर मुझे लगता है कि आख़िरकार मैंने अपने आप पर तरस खाए या हताश हुए बगैर उस खौफनाक सच्चाई को मंज़ूर कर लिया. इस प्रक्रिया में मैंने इंसान के बनाये हुए लहू के इस समंदर से अनोखी आब वाले मोतियों को निकलने की  कोशिश की. मैंने इंसानों को मारने वाले इंसानों की एकचित धुन के बारे में लिखा, उनमे से कुछ के पछतावे के बारे में लिखा जो समझ नहीं पा रहे थे कि उनमे अब तक कुछ इंसानी जज्बे बाकि कैसे रह गए. इन तमाम और इनके अलावा और भी बहुत सी बाते मैंने अपनी किताब सियाह हाशिये में लिखी है’.

आलोक भल्ला मंटो के काल के बारे में बताते हुए मंटो की कहानियों के सन्दर्भ में कहते है- “ये कहानियां उस आदमी के द्वारा लिखी गयी है जो ये जानता था कि इस प्रकार की तबाही के बाद किसी भी तरह से माफ़ी तथा उसे भुलाया जाना जाना सम्भव नहीं है. जिन्होंने इस हत्याकांड को देखा था वे महज़ खड़े रहकर अपने मरने का इंतज़ार कर सकते थे. विभाजन ने नैतिकता को इस प्रकार मिटा दिया था कि कुछ भी वापस पाना तथा किसी भी प्रकार की उम्मीद करना संभव नहीं था. भाषा ने बहकाने का काम किया, और आम लोग क्रूर तथा खूनी बन गए, दहशत को दृढ़तापूर्वक देखा गया जिससे कि हम ये समझ सके कि किस प्रकार हम सभी इस बर्बर विश्व के निर्माण में भागीदार थे और अब हमें कुछ भी नहीं बचा सकता.

१९१५ में जन्मे भीष्म साहनी भी विभाजन की इस त्रासदी के गवाह थे. उन्होंने अपना बचपन ‘रावलपिंडी’ में बिताया था तथा इंटरमीडिएट तक की पढाई भी वहीँ से की थी. यह वो क्षेत्र था जो १८५७ के विद्रोह का गवाह भी रह चुका था, जहाँ अंग्रेजो का दबदबा था तथा पाश्चात्य संस्कृति की अच्छी झलक मिलती थी. उन्हें इन सबका अनुभव था जिसका प्रमाण उनके उपन्यास ‘तमस’ में भी स्पष्ट तौर पर देखने को मिलता है. कांग्रेस के स्थानीय अफसर यहाँ आते रहते थे तथा समाज सुधारक भी जिसका उल्लेख वो अपनी आत्मकथा में भी कारते है- “यहाँ पर कांग्रेस की जुलूस भी निकलते, गुरुद्वारे और आर्य समाज के के भी, मुहर्रम के ताजिये भी निकलते. गाहे बगाहे सांप्रदायिक तनाव भी होता, मगर लोग आम तौर पर बड़े स्नेह भाव से एक दूसरे के धर्म की मर्यादाओ की कद्र करते हुए रहते थे.

वे कांग्रेस की रिलीफ समिति में भी काम कर चुके थे, जैसा कि वे खुद इसका उल्लेख करते है- “देश के बंटवारे के समय जब सांप्रदायिक दंगे हुए तो मैं कांग्रेस की रिलीफ समिति में काम किया करता था और आंकड़े इकठ्ठा करता था कि वहाँ कितने मरे कितने घायल हुए, कितने घर जले आदि. तभी गाँव-गाँव घूमने और सांप्रदायिक दंगो के वीभत्स दृश्य देखने का अवसर मिला. “तमस” इस अनुभव पर आधारित है.

“तमस” साम्प्रदायिकता पर की जाने वाली राजनीति की कहानी है. यह दिखाती है कि किस प्रकार राजनितिज्ञ खुद ही इसके बीज बोते है और फिर खुद ही इसकी निंदा करने का स्वांग रचते है.

तमस की कहानी बस इतनी सी है कि एक म्युनिसिपल कमिटी का कारिन्दा और अंग्रेज़ सरकार का चमचा मुराद अली अंग्रेज़ सरकार के इशारे पर एक सीधे सादे चमार नाथू को ५ रूपए देकर उससे एक सूअर मरवाती है और उसे मस्जिद की सीढ़ियों पर फेंकवा देता है. इसकी प्रतिक्रिया में दूसरा वर्ग एक गाय की हत्या करवा देता है. इन दोनों घटनाओ की खबर ज्यों ज्यों फैलती है, विद्वेष की आग भड़कने लगती है और पूरे शहर में तनाव फ़ैल जाता है. नागरिको का शिष्टमंडल शांति स्थापित करने के उद्देश्य से अंग्रेज़ जिला कलेक्टर रिचर्ड से मिलता है और बिना किसी ठोस आश्वासन के लौट जाता है. जिला कांग्रेस समिति के सेक्रेटरी श्री बक्षी जी तथा कम्युनिस्ट नेता कामरेड शांति स्थापित करने में नाकामयाब रहते है तथा आसपास के गांवो में भी दंगे फ़ैल जाते है. इलाहिबक्ष, खानपुर, सैयदपुर आदि गांवों में लूट पाट और हत्याएं होती है. सिख और मुस्लिम दोनों मोर्चाबंदी करते है तथा इस मोर्चाबंदी में २०० वर्ष  पूमध्यकालीन जहनियत काम कर रही थी. तुर्कों के ज़ेहन में यहीं था कि अपने पुराने दुश्मन सिखो पर हमला बोल रहे है और सिखों के ज़ेहन में यही था कि वे भी अपने पुराने दुश्मन तुर्कों पर हमला बोल रहे है. पांचवे दिन अंग्रेज़ शांति कायम करने का प्रयास करते है. नगर में कर्फ्युं लगाया जाता है और एक ही दिन में पूरा माहौल बदल जाता है. जिसके इशारे पर ये तूफ़ान आया था, उसी इशारे पर सब तबाह करके गायब हो जाता है. इस तूफ़ान के बाद दृश्य बड़ा ही कारुणिक है तथा लोग जो शिकार हुए थे उनसे शरणार्थी कैंप भरे पड़े है. शांति कायम करने के लिए अंग्रेज़ कलेक्टर रिचर्ड की प्रेरणा से पंद्रह सदस्यों की अमन समिति बनायीं जाती है जिसमे ७ मुस्लमान, ५ हिन्दू और ३ सिख है. इस प्रकार जिसकी प्रेरणा से और जिसके द्वारा दंगे की शुरुआत हुई उसी की प्रेरणा से और उसके द्वारा ही दंगे का अंत भी हुआ. उनके उपन्यास को यदि ऐतिहासिक और सामाजिक सन्दर्भ में देखा जाए तो निम्न निष्कर्ष निकाले जा सकते है-

1- देश का विभाजन जिस सांप्रदायिक विद्वेष का परिणाम था उसके बीज ब्रिटिश कूटनीति ने बोये थे.

2- विभाजन के दौरान कांग्रेस के भीतर राष्ट्रीय एकता के प्रति गहरी निष्ठा का आभाव था. कांग्रेस स्वयं अनेक स्वार्थो की मिलन भूमि थी.

3- सांप्रदायिक दंगो में भाग लेने वालो की ज़हनियत मध्यकाल से जुडी हुई थी.

4- सदियों से साथ रहते गुए नगर और गाँव दोनों ही स्वरों पर हिन्दू और मुसलमानों की जीवन रेखा कुछ इस प्रकार घुल मिल गयी थी कि उनका चाहे कैसे भी विभाजन किया जाता वह कृत्रिम ही होता.

5- दंगो में हमेशा गरीब ही मारे जाते है. अमीर और प्रभावशाली लोग गरीबो के मूल्य पर अपना राजनीतिक खेल खेलते है और परस्पर एक दूसरे के हितो की रक्षा करते है.

6- शक्ति और पैसा बड़ी चीज़े है, वो मूल्यों को दबा सकते है, संस्कारो को तोड़ सकते है किन्तु मनुष्य की  जिजीविषा और भी बड़ी है. वो बड़ी से बड़ी विपत्ति झेलकर भी जीवित रहना चाहता है.

इस उपन्यास की एक महत्त्वपूर्ण बात ये है कि इस पूरे उपन्यास में वे प्रादेशिक कांग्रेस के सदस्यों पर व्यंग्य कसते रहते है तथा देशभक्ति और राष्ट्रीयता के संकीर्ण मापदंडो पर भी व्यंग्य करते है. उदाहरण के लिए कांग्रेस के शंकर जब दूसरे कांग्रेस सदस्य कोहली को अपना आजारबंद दिखाने को कहता है तथा उसके बारे में कहता है- “देख लीजिये साहिबान, नाडा रेशमी है. हाथ के कटे सूत का नहीं है. कांग्रेस रेशमी नाडा पहने? और आप उसे  प्रादेशिक सदस्य का उम्मीदवार बनाकर भेजेंगे? कांग्रेस का कोई उसूल है या नहीं?

जहां विभाजन पर ज़्यादातर साहित्य त्रासदी को बयाँ करता है वहीँ भीष्म साहनी द्वारा रचित “अमृतसर आ गया है” ये दर्शाता है कि कुछ क्षेत्रो में दंगे के बावजूद भी ज़िन्दगी में कोई अधिक परिवर्तन नहीं आया तथा लोग पहले की तरह हंसी मज़ाक करते है. उन्होंने ये दुनिया लाहौर से आने वाली ट्रेन में दिखाई है. पर ये भी रूढ़ छवियों से मुक्त नहीं है- (1) बाबू से पठान कहता है कि तुम दुबले पतले हो क्यूंकि तुम हमारी तरह मीट नहीं खाते. तुम हमारी तरह मीट खाकर तंदरुस्त हो जाओ या फिर महिलाओ के डब्बे में सफ़र करो, (2) सरदार पठान को समझाता है कि बाबू पठानों का भोजन नहीं लेता क्यूंकि वो अपने हाथ नहीं धोते अर्थात वे गंदे लोग है, (३) जब ट्रेन में ज़बरदस्ती लोग अन्दर घुसने की कोशिश करते है तो ट्रेन में बैठे लोग उन पर चिल्लाते है और पठान बदहवासी में एक महिला के पेट में लात मार देता है, (4) जब ट्रेन आग में झुलसते शहरो से होते हुए गुज़रती है तो लोग भयभीत हो जाते है, पर जैसे ही उन्हें ज्ञात होता है कि ये ‘वजीराबाद’ नामक मुस्लिम बहुल क्षेत्र था तो पठान का भय मर जाता है वहीँ सिखो और हिन्दुओ की चुप्पी गहरी हो जाती है, (5) वहीँ जब ट्रेन हरबंसपुरा और अमृतसर (हिन्दू-सिख बहुल क्षेत्र) पहुँचती है तो बाबू जो अब तक पठान की हर बेइज़्ज़ती झेल रहा था, चौड़ा हो जाता है तथा पठान पर धावा बोलता है- “ओ पठान के बच्चे! हिन्दू औरत को लात मारता है. हरामजादे

कमलेश्वर जो मंटो के प्रशंसक भी रहे है, उनकी कहानी “और कितने पाकिस्तान” पाकिस्तान बनने के असर को बयाँ करती है. वे पाकिस्तान को एक मुल्क नहीं बल्कि एक दुखद सच्चाई मानते है तथा इसलिए लेखक जहाँ कहीं जाता है उसे दृश्य दिखाई देते है, जिन्हें वह पाकिस्तान कहता है क्यूंकि वह उसे विध्वंस का कारण मानता है क्यूंकि ये “एहसास की रुकी हुई हवा है”. विध्वंस के चित्र इतने भयानक है कि वो अनुभव करता है कि वो मुस्लमान पर टूट पड़ना चाहता है और अपनी प्रेमिका को छीन लेना चाहता है जैसे कि वो कहता है- “उसी दिन से एक पाकिस्तान मेरे सीने में  शमशीर की तरह उतर गया था”

पाकिस्तान बनने का दर्द वह अपनी प्रेमिका सलीमा (जिसे वो प्यार से बन्नो कहता है क्यूंकि उसे सलीमा कहते डर लगता है) में भी महसूस करता है. उसके अन्दर का पाकिस्तान तब नज़र आता है जब वह अपने पति मुनीर को कोसती है “मुझे मालूम नहीं है क्या? जितनी बार बम्बई जाता है, खून बेचकर आता है. फिर रात भर पड़ा काँपता रहता है.

जब लेखक को ज्ञात होता है कि उसकी प्रेमिका वेश्या बन गयी है तो उसे समझ नहीं आता कि उसके साथ ऐसा क्यूँ होता है. बन्नो उसे टेढ़ी मुस्कराहट के साथ देखती है ख़ामोशी से व्यंग्य करती है तो उसके मुख से निकलता है- “पता नहीं ये बदला तुम मुझसे ले रही थी, मुनीर से या पाकिस्तान से?”

वह पाकिस्तान को और उसकी सच्चाई को हकीक़त मान चूका है- “अब तो फटा फटा आदमी ही सच लगता है. पूरे शरीर का आदमी देखकर दहशत होते है. विध्वंस के चिन्ह हर जगह दिखाई देते है जो आहत करते है- “अब कौन सा शहर है जिसे मैं छोड़कर भाग जाऊ. कहाँ कहाँ भागता फिरूँ जहां पकिस्तान न हो.

पाकिस्तान की यदि सच्चाई की बात की जाए तो वह अब भी नज़र आती है. नेहरु जिन्होंने विभाजन को अस्थायी बताया था वो स्थायी हो चूका है. इस सन्दर्भ में असगर वजाहत ने नाटक “जिस लाहौर जई देख्या ओ जम्याई नइ” का पाकिस्तान में मंचन न होने देना ये कहकर कि उसमे मौलवी की हत्या इस्लाम के विरुद्ध है तथा नाटककार भारतीय है, इसी का सूचक है. पर आख़िरकार जब नाटक होता है तो हाउसफुल रहता है वो भी कराची में वो भी इस तरह से  कि लोग पेड़ पर चढ़कर नाटक देख रहे थे. यह इस बात को इंगित करता है कि मानवीयता बड़ी बड़ी विपत्ति को झेलकर भी जीवित रहती है.

लगभग सभी विभाजन की कहानियों में महिलाओ को एक निश्चित रूप दे दिया गया है. दोनों ओर महिलाओ की स्थिति एक समान रूप से स्थिर कर दी गयी है. उसकी अपनी महत्वपूर्णता उस आदमी पर निर्भर करती है जिसकी वो औरत है या जिसने उसका उल्लंघन किया है या उन्हें प्रताड़ित किया है. और इस प्रकार इस सांप्रदायिक अस्पष्टता में वे प्रभावहीन सी जान पड़ती है. महिलाओ को शोषित करना, पुरुषो के लिए अपने विरोधी समुदाय को नीचा दिखने का माध्यम था, वहीँ कई पुरुषो के लिए ये स्थिति अपनी लालसाओ को पूरा करने का अच्छा अवसर था. इस सन्दर्भ में मंटो की कहानी “खोल दो” जिसमे ‘सकीना’ का दोनों ही समुदायों के पुरुषो द्वारा शोषण किया जाता है., इस बात को इंगित करता है कि हिंसा यहाँ महज़ सांप्रदायिक मुद्दा नहीं था बल्कि हिंसक पुरुषो के लिए एक अच्छा अवसर था तथा सम्प्रदायिकता ओढा आवरण मात्र था. महिलाएं उनके लिए इस लड़ाई में सुकून पाने का माध्यम थी. कहीं ये सुकून ‘अच्छा’ था तो कहीं ‘बुरा’ था. इस सन्दर्भ में तमस में भीष्म साहनी कहते है- “दुःख से छुटकारा पाने के लिए आदमी सबसे पहले औरत की तरफ मुड़ता है”. नाथू को जब अपनी गलती का एहसास होता है तो उसे अपनी पत्नी के पास जाने की इच्छा होती है. इस प्रकार की कहानियों में महिलाओ को निष्क्रिय दिखाया गया है तथा पुरुष ही उनकी नियति तय  करते है. पर “मोज़ील ” तथा “ठंडा गोश्त” में “कलवंत कौर” इस सन्दर्भ में कुछ अपवाद है.

मंटो अपनी कहानियों में प्रत्यक्ष तौर पर बोलते है और इसीलिए उनमे नाटकीयता नहीं है तथा उनकी नायिकाएं बिना अश्रु बहे सिसकियाँ लेती है. वो घृणा और द्वेष को झेलते-झेलते अपने दर्द के शून्य पद गयी है तथा अपनी हीन स्थिति का प्रदर्शन करते हुए समाज के पुरुषो पर व्यंग्य करती प्रतीत होती है. कमलेश्वर की कहानी “और कितने पाकिस्तान” की बन्नो भी ऐसी ही है. उसका अपने प्रेमी की ओर टेढ़ी मुस्कराहट के साथ देखना और पूछना “और कोई है” इसी का सूचक है. नायक अपनी ज़िन्दगी के तीन पडावो की बात करता है- “पहला, जब मुझे बन्नो मेहँदी की हवा लग गयी थी, दूसरा, जब मैंने तुम्हे पहली बार नंगा देखा था और तीसरा, जब तुमने कहा था “और कोई है”. चाहे मंटो की कहानियां हो या कमलेश्वर की कहनियाँ दोनों की कहानियों के पुरुष महज़ खूनी और बलात्कारी नहीं है. उनमे अब भी मानवीयता बाकी है. पर ये मानवीयता असहाय और कमज़ोर सी जान पड़ती है, जो स्त्रियों के शोषण और पतन का कारण जान पड़ती है. यह कमलेश्वर के “और कितने पाकिस्तान” और मंटो की कई कहानियों जैसे कि  The Woman in the Red Raincoat में स्पष्ट जाहिर होता है- “तुम दो औरतो के खूनी हो. एक मशहूर कलाकार थी और दूसरी वो जिसका जन्म तुम्हारे लिविंग रूम में मौजूद पहली औरत के शरीर से हुआ था जिसे तुमने उस रात अकेला छोड़ दिया था. (You are the murderer of two women. One who is known as a great artist & the other who was born from the body of the first woman in your living room that night & whom you alone know).

ज्ञानेंद्र पाण्डेय कहते है आलोचकों ने कि तीन प्रकार की हिंसा की बात की है-  (1) जो राज्य द्वारा की जाती है जैसे कि रूस, जर्मनी, साइबेरिया में हुआ, (2) एक दूसरे तरीके की हिंसा जहाँ राज्य पहले से भक्षक नहीं होता पर वो उसे रोक सकता था पर ऐसा नहीं करता. जैसे कि १९९२-९३ में विश्व हिन्दू परिषद् द्वारा बाबरी मस्जिद के विवाद पर की गयी हिंसा, (3)एक तीसरे तरह की हिंसा वह है जहाँ लोग खुद हिंसा से पीड़ित होते है और अपना मानसिक स्वास्थ्य खो देने के कारण एक दूसरे का खून करने लगते है. विभाजन को इसी प्रकार की हिंसा माना जाता है.

वे कहते है कि जावीद आलम का कहना है कि “इस तरह की हिंसा को हमें याद नहीं करना चाहिए जिससे कि लोग सामाजिक, राजनैतिक और व्यक्तिगत तौर पर सामान्य जिंदगी जी सके, शांतिपूर्ण तरीके से.

पण्डे इस तरह की धारणा को इतिहास के लिए हानिकारक बताते है तथा कहते है कि ऐसा प्रतीत होता है कि राष्ट्रवादी धारणा है जो ये तय करने की कोशिश करती है कि भारतीय इतिहास के लिए क्या उचित है और क्या अनुचित. पर वे हमें ये भी बताते है कि हाल ही मैं कई महत्त्वपूर्ण कार्य हुए है हिंसा पर जिनमे मुख्यतः ये समझने का प्रयास किया गया है कि हिंसा का दायरा कितना बड़ा है. वो समझने का प्रयास करते है-

१. क्रोधित पुरुषो की पीड़ा को,  २. १९४७ तथा उसके बाद महिलाओ तथा बच्चो की स्थिति को, ३. महिलाओ और बच्चो की सामुदायिक और राष्ट्रीय बानगियों को, ४. धर्म से अलगाव को किस प्रकार एक मात्र नागरिक पहचान के रूप में देखा जा सकता है, ५. राज्य के बेहया पितृसत्तावाद को. वे कहते है कि सभी रोज मर्रा की ज़िन्दगी का इतिहास पेश करती है- एक ऐसा इतिहास जिसमे राज्य और समाज दोनों फंसे है. इस सन्दर्भ में जब हम विभाजन पर लिखे साहित्य की बात करते है तो निष्कर्ष के तौर पर कहा जा सकता है कि “काल्पनिक लेखन की सबसे अच्छी बात यह है कि ये महज़ हिंसा की कहानियाँ ही बयान नहीं करती पर इस बात की भी जांच करती है कि क्या दहशत के बीच भी हममें कुछ नैतिकता बची थी”. (The best of the fiction writers about the partition are not concerned with merely telling stories of violence, but with making profoundly troubled inquiry about the survival of our moral being in the midst of horror). इसका उल्लेख आलोक भल्ला भी करते है और कई दफा उनकी अभिव्यक्तियाँ निजी प्रतीत होती है. उदाहरण के लिए “सहाय” (A tale of 1947) में  मुमताज़ का चरित्र तथा उसके द्वारा बॉम्बे छोड़कर पाकिस्तान का चरित्र तथा उसके द्वारा बॉम्बे छोड़कर पाकिस्तान जाना तथा उसके द्वारा अपने मित्र जुगल से प्रश्न करना कि क्या वो उसे मार सकता है? ये सब उनकी निजी जिंदगियों की पेश करते है. मंटो ने खुद ये सवाल अपने मित्र तथा अभिनेता  श्याम से किया था. इन कहानियों की एक महत्त्वपूर्ण बात ये है कि विभाजन के बाद भी लोग क्षेत्रीय सीमओं की फ़िक्र नहीं करते क्यूंकि वे सामजिक और सांस्कृतिक रूप से जुड़ चुके थे तथा क्षेत्रीय सीमओं के आधार पर यहाँ राष्ट्र-राज्य की कल्पना को विफल दिखाया गया है. उदाहरण के लिए “अमृतसर आ गया है” में ट्रेन के मुसाफिर क्षेत्रीय-सीमओं के बजाय सबसे पहले नेताओ की बात करते है. ये प्रश्न किया जाता है कि ‘पाकिस्तान’ बनने के बाद जिन्ना बॉम्बे में ही रहते रहेंगे या पाकिस्तान में रहेंगे? इस प्रकार मंटो की कहानियाँ तथा भीष्म साहनी का तमस दोनों ही इस बात को इंगित करते है कि हिन्दू और मुस्लिम, दोनों ही सांस्कृतिक रूप से इस प्रकार घुलमिल गए थे कि सीमओं के बल पर किसी के बल पर किसी भी प्रकार का कृत्रिम था तथा “माउंटबेटन प्लेन” के द्वारा जब इस प्रकार का असंवेदनशील निर्णय लिया जाता है तो वहां किसी भी प्रकार का  राष्ट्रवाद नज़र आता है. भारत के सन्दर्भ में तो बिलकुल नहीं! वे भारतीय स्थिति को समझे नहीं क्यूंकि उनके विश्व में सीमा रेखा के आधार पर राष्ट्रवाद की कल्पना की जा सकती है.

सन्दर्भ सूची

Manto, Saadat hasan, mottled Dawn: Fifty Sketches & Stories of Partition, Delhi, 2000, Introduction pp. 1-95 & 157-164

Monto, Saadat Hasan, Pandit Manto’s First letter to Pandit Nehru.

Joshi, Shashi, the world of saadat Hasan manto, The Annual of Urdu Studies

Chughtai, Ismat, Communal Violence & literature

Hasan, Mushirul, Memories of Fragmented Nation: Rewriting the Histories of India’s Partion.

Panday, Gyanendra Remambering partition: Violence, Nationalism & History in India, By way of Introduction & ch-3, Cambridge University Press, 2001

Kumar, Sukrita Paul, Surfacing from Within Fallen Women in manto’s Fiction, The Annual of Urdu Studies

साहनी, भीष्म, राजकमल प्रकाशन

साहनी, भीष्म, अमृतसर  आ गया है

कमलेश्वर, और कितने पाकिस्तान, मुंबई, 1969

rekhta. Org

shodhganga. Inflibnet.ac.in

Who was saadat Hasan Monto: A biography

वजाहत, असगर, जिस लाहौर नइ देख्या ओ जम्याई नइ, वाणी  प्रकाशन] 2006

http://www.columbia.edu/itc/mealac/pritchett/00urdu/tobateksingh/

अब मैं वो औरत नहीं

कृति त्रिपाठी

 

जिस शरीर से निकले

उसी पर गालियाँ बना दी,

ज़ेवर का स्वांग रचकर

मेरे हाथों में बेडियां पहना दी।

सर से लेकर पैर तक

लगती हूँ तुम्हारी जायदाद,

मांग में सिन्दूर,

गले में मंगलसूत्र,

हाथ में चूड़ियां,

आँखों का काजल,

साडी का आँचल,

सब सुनाते हैं तुम्हारे दास होने की दास्तान।

और तुम तो वैसे ही हो जैसे आए थे,

क्यों नहीं तुम पहनते पैरों में पायल?

क्यों नहीं तुम माथे पर बिंदी लगाते?

क्यों अपने शादीशुदा होने का अस्तित्व छुपाते?

कैसे डालोगे पैरों में घुंघरू

तुम मालिक जो ठहरे,

जो सोचता है कि औरत उसके पैर कि जूती है,

तो लो ये जूती अब तुम्हारे पैरों को नकारती है।

डाल कर तो देखो

पैर कस जाएंगे,

अब तुम्हारी गुलामी का नाच हम नहीं दिखलायेंगे।

जिस जिस्म पर तुम वार करते हो,

वो कभी तुम्हारा घर था।

जिस घर की दीवारों की कैद से,

मैंने तुम्हें इस संसार में पहुँचाया,

तुम्हें लगा कि तुम मुझे उनमे कैद कर डालोगे?

मानते हो कि औरत के भगवान् हो,

जन्म तो मैंने वैसे इन्सान को दिया था,

लेकिन फिलहाल तुम हैवान हो।

अब मैं वो औरत नहीं,

जो निकाह के नाम पर तुम्हारी गुलाम बन जाएगी।

अब मैं वो औरत नहीं,

जो शाम को तुम्हारे लिए रोटी पकाएगी।

अब मैं वो औरत नहीं,

जो रात को तुम्हारे पैर दबाएगी।

अब मैं वो औरत नहीं,

जो तुम्हारे फरेब को सच मान जाएगी।

अब मैं वो औरत नहीं,

जो तुम्हारी भद्दी गालियाँ सुन जाएगी।

अब मैं वो औरत नहीं,

जो वंश के नाम पर बेटी गिराएगी।

अब मैं वो औरत नहीं,

जो दहेज़ के नाम पर खुद को जलवाएगी।

अब मैं वो औरत नहीं,

जो पति परमेश्वर की चिता पर जिंदा लेट जाएगी।

अब मैं वो औरत नहीं,

जो तुम्हारी घिनौनी तानाशाही के तले दब जाएगी।

मैं वो औरत हूँ

जो पित्र सत्ता के इस भरे बाज़ार में,

हैवानों को नीलाम कर जाएगी।

Women through the prism of Religion part-2

-Priyanka Kaushik

Gender is undeniably one of the most important factors of any society. Not only gender molds socio-cultural relations, dictates terms of interaction of the sexes and exposes the underlying structures of patriarchy, it also provides an epistemology to understand different processes in different temporal-spatial zones and understand and help understand aspects of colonialism, nationalism, caste, religion etc with a new lens. Over the time, different scholars have worked on different aspects of gender and have tried to understand various phenomenon and challenge the existing notions through its gender analysis.

The question of gender is one of the most debatable concepts of our times. With the coming of gender consciousness gender constructs are no longer seen as inevitable ones and those are studies like one by “Kate millet” to suggest the relation between sex relations and power, as she says-“personal is political”. So we need to see these processes and layers of the gendered structures intertwined in such a way that a superficial imposed structure after a time looks inevitable and natural to us.

Gender is a field of huge contestation as this is a field where there is a lack of consensus among scholars over the meaning, nature and extent of gender distinctions. Thus the historiography of gender analysis is a complex and subjective discourse and need to be analyzed within a set of socio-economic context.

John W. Scott in her work “Gender: a useful category of historical analysis” analyzes the concepts of gender and proposing how a new understanding of gender influences our understanding of history.

but Scott’s understanding of gender also cast its effect on the discipline of history altogether. her theory revolves around knowledge, meanings and truths as constructive discourse, a structure, a way of “ordering the world” which is not strictly predecessor  to social organization. that’s why according to John Scott, the discipline of history produces knowledge generally about the past. feminist history, in that context, is not restricted to just an attempt to correct or supplement an incomplete record of the past but rather a critical understanding of history as a “site of production of knowledge of gender in general and knowledge in general”.

she also points out that as soon as historians will acknowledge the multivalent and constructed nature of society and knowledge, they will be forced to abandon single cause explanations for historical change. Power is central to Scott’s analysis, for she is interested in the notion of equality, and she argues that by studying gender relations, one can gain an understanding of (in)equality in general.

for this, she calls for us to alter our understanding of power: “we need to replace the notion that social power is unified, coherent and centralized with something like Michel Foucault’s concept of unequal relationships, discursively constituted in social “field of force”. so, power is not something that exists outside the social organization and is then wielded by persons. “The point of new historical investigation”,  Scott writes, is to disrupt the notion of fixity, to discover the nature of the debate or repression that leads to the appearance of timeless permanence. in this view, attention should not be given solely to people’s actions, but instead to the meaning that people (and their actions) acquire through social interaction. lastly Scott believes that the process of constructing gender relations can also be used to discuss class, race, ethnicity or any social process. so, it is indeed a “useful category of historical analysis”.

the question of gender is one of the most debatable concept of our times. with the coming of gender consciousness “gender constructs are no longer seen as inevitable ones” and there are studies, like by Kate Millet  to suggest the relation between sex relations and power, as she says- “personal is political”. in the context of India, religion is one of that dominant aspect through which gender relations are defined as well as justified. Most of the times, the nature of these religious texts are prescriptive and normative, but still as religion and religious texts enter into popular consciousness, they try to form crystallized categories. religious  symbols, iconography etc support the texts in building these difference. we are concerned here not just with religion per say but the gendered relations over the years and how religion plays a dominant role in the proceedings.

though the sati-pratha was abolished in the 19th century through legislation in 1829, there was a resurgence of the sati movement in 1980’s in Rajasthan. the basis of this movement was harking back to the glorious tradition of the “sati-mata” which was an antithesis to the wave of feminist movement in India at the same time.

Nevertheless, religious symbols are put to use in a very different way to justify a movement. another irony  lies in the fact that the most staunch supporters of the movement were women themselves. thus, it actually reveals the process of legitimizing and “sacralizing” the institution and the rhetoric to create an illusion of a glorious tradition. thus, religious tradition could themselves then be used as a text to study the dynamics of gender and the process of legitimization through religion.

As Michel Foucault points out- church, educational institutions and hospitals were three spheres of “discursive discourse” of sexuality through which the domain of sexuality which was repressed in the sphere and locus of “legitimate sexuality” was able to manifest itself without harking to the “illegitimate” sphere of sexuality. power structure has an indelible presence in the realm of gender relations but whether the relations are always hierarchical or sometimes the relation is rhizomatic as well,, whether the power structure is has an overarching presence or it emanated from different nodes of interaction. in that sense, religion may prove very useful in not only studying these interactions of power structures of  gender, but how the process of signification in the rhetoric of gender, becomes an enigma that creates an illusion of a hidden meaning that have to be prized out through a commentary (as in different interpretations of religious texts) and which sometimes create meanings which doesn’t exist in the first place. through deconstructing the structure we have to analyze the women’s sphere through the prism of religion, and similarly through the prism of history.

.  WOMEN THROUGH THE PRISM OF RELIGION

Different shades of exploitation: the class dynamics in Lihaaf by Ismat Chugtai

-Santosh Kumar

Ismat chugtai was one of the most prominent Urdu writers of her times and still sways considerable influence in the literary world, so much so, that Tahira Naqvi considers her one of the four pillars of Urdu short story along with likes of Manto, Krishnchander and Rajinder Singh Bedi. But a part of her popularity (and almost all of her controversies) lie in the kind of choices he made in her literary journey. She expressed and explored those themes which were either tabooed (and some are tabooed even now) or were not considered the domain of women writers. Her exploration of homo-eroticism, unabashed sexuality, middle class women sphere etc. were way ahead of the times she was writing in. as a history student, these texts offers a very different vision of the society and offer a perspective which is not possible in traditional Indian literature which mostly fails to consider the underlying patriarchal and class structure inherent to the society rather than as external imposition. Thus we are urged to look at the social milieu of the text as well as the social milieu in which the text itself came to be composed

There are various underlying themes in the text but it is not possible to elaborate all these themes in the limited space. Thus I identified one common thread that is running throughout the text and which could help us to bind all these diverse themes together. And that methodological unit is Class. We will consider Lihaaf as our cornerstone of study to give an effective and compact analysis of the class issue. In Lihaaf,  the first thing that comes to our mind is the bond shared by the begum and her maid Rabbu. I suspect a exploitative class relation in this bond. Begum, in search of companion with a sexual urge and cravings, chose Rabbu for the purpose, which invited a great deal of envy from other maids. Now through the lens of class, we can identify two stratum of class dynamics. First layer consist of  the sexual favors that Begum can afford to ask from her inner circle of maids and confidantes (Rabbu and the narrator). One should ask this question- what was the motivation of Rabbu in this relation? Was it her free will (which is highly improbable) or a deep class inferiority that makes it much easier for the Begums to exercise extra economic coercion on them (similar to what Nawab exercised on the young boys). But there is another side to this class relation- the reason for the envy of maids lie in her closeness with the Begum which allows Rabbu to enjoy certain economic privileges and a temporary sense of upward social mobility. Here we are reminded of Gerda Lerner who points out in a different context, how royal women and concubines in ancient Mesopotamia enjoyed an exalted status as long as they are in favorable position in their relation with the king and lose their position as soon as either she falls out of favor or the king decides to take another one. Similar condition is seen with Rabbu, who gets a shop for her son and a better standing economically in respect to her other counterparts, but her rift with Begum and Begum trying to woo the narrator with material benefits (like dolls etc.) ignites envy in Rabbu which may also signify her insecurity of losing a privileged though exploitative relation with her master to a young girl. It is also worth seeing that the bait for persuasion and coercion is much less for the girl (dolls, toys etc) compared to Rabbu (shop etc.), which show us the internal dynamics within the subjected class. Though the narrator seems better economically and socially (her mother is the sister of the Begum though we don’t see any reference to their material affluence). So even the exalted position of Begum has a lot to do with her marriage with the Nawab, who though absent from the narrative, glances a patriarchal gaze on the characters of the text. So I suspect an attempt on the part of narrator’s  mother to send her frequently to Begum’s house, perhaps in a bid to exalt their own status through their association with a royal family and derive certain material benefits if possible. But the narrator is shown here as a naïve (or innocence has an element of pretension to it, as she is trying to project herself as naïve and indifferent) and doesn’t realize the nature of her behavior with begum. She confess to like begum and is very curious to know what is happening beneath the quilt but there is a huge difference between a unconscious curiosity and conscious experience of such relation at an age when she can’t feel that stimulation. Thus the text reflects a deep seated class dominance and the sense of authoritative, feudal extra economic coercion on the part of Begum (and ironically, an imitation of a patriarchal feudal aristocratic behavior that the Nawab represent and the Begum tends to imitate) and the varied reactions of the have-nots in the relation. One is the realization of the nature of relation and its exploitative structure and trying to derive temporary privileges from that exploitation (Rabbu) or the innocence and inability to grasp the structure and its exploitative nature (narrator).

Though there are various limitations to this analysis with its myopic field of study and its inability to deal with all the elements within the text, it provides a framework to study the text in diverse ways. Lihaaf offers a polemical discourse as well as a window to understand the dynamical class and gender relations and the hierarchy of relations with its structural and teleological validity in the feudal elitist order. It, at the same time, contrasts the chimeras of the child with the actual experiences of the adult, the realization of which came as a rude shock for the child.  A much wider analysis of other elements of this story is beyond the scope of the story but needless to say, the story can be read with its different layers of meanings which exist as an  independent entity as a signifier of social dynamics and at same time act as a site of similitude where these different significations create a larger picture of the space and time it represents.

अग्निपरीक्षा

शिव-धनुष जिसके लिए तोड़ दिया,

उस सीता को क्यों छोड़ दिया?

खैर मैं तुम्हें क्यों करूं संबोधित,

है जो मर्यादा पुरुषोत्तम घोषित।

मैं तो प्रश्न करुँगी जनकनंदिनी से,

कि तुम इस मृगतृष्णा में फँसी कैसे?

माना तुम्हें चुनना था एक वर,

और अयोध्या-कुमार से मिले तुम्हारे स्वर।

पर क्यों तुम्हारे मन ने प्रश्न न उठाया,

तुम्हारे सामने बिछी थी प्रेम रूपी माया।

वही प्रेम जो कहलाता है अँधा,

जिससे चल रहा है फरेब का धंधा।

क्यों वो झूठ तुम जान न पायी,

क्यों तुम विवाह करके अयोध्या आई?

उस आदमी को जब मिला वनवास,

तुमने किया अपनी इच्छाओं का ह्रास,

पहली अग्निपरीक्षा तो यही थी तुम्हारी,

पर तुम्हारे पति को नहीं हुआ विश्वास।

फिर भी तुमने हार न मानी,

वर्षोँ तक वन कि धूल छानी।

फिर एक दिन एक पुरुष आया,

जो पूरी दुनिया में दुष्ट रावण कहलाया।

ले गया अपहरण करके तुम्हें लंका,

और बजा दिया अपनी जीत का डंका।

उसका मन तुम पर था आया,

फिर भी हाथ तुम्हें उसने ना लगाया।

तुम्हारा तिनका था उसकी लक्षमण-रेखा,

जिसके पार कभी ना तुम्हें देखा।

फिर तुम्हारे परमेश्वर के भक्त आए,

तुम्हारी सुरक्षा का संदेशा लाए।

जीत के बाद उस मर्द ने फिर मांगी अग्निपरीक्षा,

और तब भी न मिली तुम्हें कोई शिक्षा।

उस अग्नि को तुमने ओढ़ लिया,

फिर भी पुरुषोत्तम ने मुँह मोड़ लिया।

मैं पूछती हूँ उस अग्नि में तुम भस्म क्यों न हो गयी,

क्यों लव-कुश को जन्म दिया?

क्यों उस समाज के आदेशों में तुम बंध गयी,

जिसने तुम्हें दुत्कार दिया।

आज भी वो राम समाज के कंधों पे है,

और गर्भवती सीता तुम उस समाज के क़दमों में।

इस मर्यादित समाज से मैं बहुत दूर भागती हूँ,

हे राम! आज मैं तुम्हें त्यागती हूँ।

 

कृति त्रिपाठी

‘MAN’ KI BAAT

-Karil Soral

A lot has changed since I started with my MA. I am not only talking about the rapid ‘reforms’ taking place in the university itself but talking about a whole global political climate. Of course, one can argue that change is always for the good and some can argue against it. However, how would a person, who is stuck in between these stands and at the same time being not allowed to argue, discuss or debate make his/her ground? Through this paper, I would like to take a look at some of these ‘changes’ or ‘reforms’ taking place within our country (and globally) and try to establish (if I can) its linkages with a rapid and aggressive assertion of masculinity.

I begin my attempt with taking a look at the global political trends. Of course when one talks about ‘trends’, the Donald cannot be far. I remember watching a speech of US Ex-President Barack Obama roughly a year back when the US election campaigns were in full swing. I still remember one of his concluding lines (I think it was the State of the Union speech), he said and I quote, “the next time when someone will be addressing you, I believe that person will be a ‘she’”(referring to the lady in the high castle, our very own Hillary Clinton). He couldn’t have been more wrong. The election results brought in ‘unexpected’ results and Donald Trump was elected the US Presidential Elect (by popular vote). It is not my agenda to go into the debate of the US elections etc. I am more concerned here with the brash, misogynist, rowdy, xenophobic Mr. Trump. His campaign slogan ‘make America great again’ I think sums it all up. The violent assertion of white masculinity, not only on what they call ‘immigrants’ but also on their own citizens is for all to see. And to say that it was suppressed in this ‘new age of reason, post-enlightenment, post-globalization’ and all such hullabaloo would be an understatement. Attacks by ‘Islamic radicals’ (as the media houses CNN and BBC reported) were reported before the elections, the most famous one being of course the shooting in a Gay bar in Orlando. When it comes to some of the tweets, interviews and even the presidential debates of President Elect Donald Trump, I think we all know enough already but I want to highlight the fact that in almost every such instance is a hidden ideology that “I as a rich, white American man, have the freedom to say anything and do anything because the world revolves around me and I rule the world”.  A new violent, aggressive and masculinist man has come to the party! This is not an isolated instance by any means. One can look at Russia and the leadership of Putin there as well which runs almost on similar lines. Germany and France are also catching up in this ‘trend’.

Now, lets come to home sweet home, or how it has been sold to the world in recent times, ‘Incredible India’. The changes in the socio-political and cultural spheres here in India also have not been short of rapid. I began this paper by mentioning that a lot has changed in the country since I joined MA. This cannot be more true when it comes to the voices I hear around the university campus and even within it. Some students have been more vocal and aggressive as well as assertive than others. The ‘age of hot young blood has ushered in’, as I was told while talking to one of my fellow classmates. But before moving into what has led to this increasingly vocal and aggressive as well as brash ‘breed’ of ‘hot young blood’, lets take a look at the changes taking place at the wider scale. There is a character in the Harry Potter series whose fear is such that J.K Rowling has given him the title of ‘he, who must not be named’. I shall refer to a particular person sitting at the top of the political rung in our country at the moment by that very title. Part of the reason for me giving him this title is because of the fear he and he and his followers (lets call them Death Eaters) instill on others who question them (but ‘he who must not be named’ in particular) and are critical of them. Now lets see how ‘he who must not be named’ is presented to us or rather how he projects himself. He is very hard working. ‘Facts’ about him working his ass off for the country are every once in a while circulated in social media. They state that he wakes up early in the morning works for eighteen hours, manages to remain healthy and is travel to other countries for leisure trips, oops I mean important meetings with politicians of other countries. He is a devout ‘Hindu’ and speaks his mind (on certain occasions he is very silent somehow).

Jokes aside, I want to highlight how it is not he who must not be named who sells but his masculinity. He is projected as a person too much involved in his work and therefore there is obviously no space or time in his life for unimportant things like his wife and mother. Seldom the media talks about these junior artists. Still, the rhetoric that emerges from the Death Eaters is that “he is wholeheartedly working for the betterment of the nation”. It  is almost but an attempt to project he who must not be named as an unmarried (but married to the nation state), devout and chaste person who has given everything up for the country. The nation (BHARAT MATA) is his EVERYTHING. What he does can and is only for the betterment of us all inhabitants of India. He is the patriarch. Like any other patriarch who to assert his masculinity keeps a close check on his household, so does he as well. Time and again he to show his authority and assert his control on his household comes up with instruments of check and balance (like the UGC fiasco, JNU case and now demonetization). It is a reminder to all the inhabitants in his household that they better behave and that they not be unruly else they could be labelled as traitors to ‘mother India’. However, like with every family there are some unruly children nonetheless and they need to be beaten and bashed and be checked upon the most. This unruly child in the northern most part of the country as well as the north east bears the brunt of his authority. Coming to the lower levels, the Death Eaters do the messy work in his household. The Death Eaters go from place to place and cleanse the household of any unwanted visitors like many people of other religions living in his household for many years. They are made to return to their homes.  The homes are given ‘proper’gender roles and women and homosexuals are segregated. As he who must not be named is hygienic and clean so should be the populace, his household. Hence, the schemes of ‘swachh Bharat’ etc. I will elaborate this in the coming paragraphs.

When I was given this assignment and was asked to go around and explore what all is happening around and observe, I thought that I would never be able to explore so much. But then I realized that one of these ‘spaces’ of exploration which I every time ignored was the one which I was the most familiar with, i.e. the Delhi Metro. It is really amazing how much you can observe by just taking your headphones off for a bit and listen! I came across this advertisement in the metro which was an advert for LPG subsidy. It showed a woman sitting on the kitchen floor smiling and doing ‘her job’, along with a photo of he who must not be named. When I clicked the photo, a gentleman seeing what I was doing got up and asked me what my profession was, to which I replied that I am a post graduate student majoring in History. I do not know what I did but he gave me a full lecture of 45 minutes on the metro throughout my journey on why and how he who must not be named is perfect for the job of running the country and that women’s role is ‘better suited’ in the kitchen. He was a well educated person (he was an MBBS and a practicing orthopedist at one of the most reputed hospitals in Delhi and in the country as well).  I let him get it all out on me. I roamed around the campus (DU) and got into random discussions with my friends in DSE, FMS as well as some of the colleges. I found out a very interesting thing. Every time I asked my friends anything about the government, the opinions of my friends be it in agreement or disagreement with the government almost every time centered on he who must not be named. For those who were in agreement with him, their argument was that they don’t agree with his party’s ideology but trust he who must not be named only, because they believe that ‘he is actually trying to make things better’. I think this a point that need to emphasized. Almost everyplace you go nowadays (market places, bus stops, railway station etc) you can see a photo of the man who must not be named as occupying the most space in any of the party advert and his various ‘welfare’ schemes. People identify with he who must not be named, even his own party I think now sells itself through him. He who must not be named is a very marketable commodity these days, almost a brand in itself.

Further, there are some trends that can be noticed in the cultural spheres as well which I believe have also played a crucial role in this new Indian masculinity to emerge. Lets take a look at how the music scene has changed over the past decade. With the likes of Indie-pop artists going into decline there has emerged a new breed of Punjabi (more specifically Jat influenced) rap. Alas, it is bad upon my part that I am not fond of rap music much but some of the song titles are easily recognizable – ‘Blues eyes hypnotize’ ( a classic for me when it comes to the objectification of women), ‘Chittiya Kalaaiya’ etc. If one listens closely one can see how the singer asserts his masculinity almost in an unapologetic way.  One can take a walk in any street and can here such songs be played and sung joyfully by both men and women.  It is also worth noting that seeing the movies that involved the unruly child of he who must not be named ten years back and now, except for one or two movies every other movie involves ‘action’ by the Indian government against ‘terrorists’ or ‘threat to nation’ (‘Baby’, ‘Holiday’ to name a few). A few movies have also been made which have tried to sensitized people on gender and consent and I hope more such movies be made. But he who must not be named is not leaving movie industry to function independently as well.

There is also an increased number of gyms that have opened up in the past few years. An increasing number of youths are enrolled in these gyms. Fitness and hygiene (I mentioned about ‘swachh bharat’ etc in the preceding paragraphs) are now being increasingly emphasized. A mention must also be made about media (social media as well). We saw prime time news on Indian news channels, their anchors screaming at the top of their voice, giving their own opinions and flashing them as news flash. Debate and discussion seem to have taken a unimportant role. Another issue attached to this is of the role of social media. Distracting the people and strong opposing anyone critical of he who must not be named has become the norm. The other celebrity face that can be seen practically everywhere is that of a very flexible man. He has come out with his own brand of ‘indigenous’ products and is now becoming a brand in itself. Be it toothpaste, soap, spices and what not he is everywhere. I will correct the previous line, he is everywhere but one, he still hasn’t entered the condom market. Herbal flavored condoms is what we all want. However, I don’t think this will be out anytime soon because some of the Death Eaters want ‘Hindu women’ to produce four to five ‘sons’ (obviously not daughters, because dowry, duh!).

I want to clarify that just because I am critical of he who must be named doesn’t mean that I am aligned to the Left. The Left for me is also doing its fair share of hocus-pocus. Lets take for example a protest march that I went to recently. A collective of female students of universities of Delhi/NCR organized a protest against sexual harassment, fewer number of hostel seats for them as compared to male students as well as against curfew timings. Now this march had an agenda which was quite different from the issue of the unruly child in the northernmost part of India. Still, some of feminists associated with the Left joined the march and started chanting slogans which might have been related to the larger feminist meta-narrative but not necessarily with that particular march. Moreover, the person who chanted those slogans is not a member of that particular collective. There is also this incident that took place in JNUSU elections. There various wings of the Left combined to decimate the Right there but they went a bit ahead when they performed ‘last rites’ of the Right there. I understand the emotions that they would have been going through but I still believe that they shouldn’t have done that. What I fear the most is that the Left doesn’t do anything stupid and impulsive which I think will give the Right an excuse to go all out on them. Also, from what I have read in many feminist articles of late (be it pertaining to my gender papers or any newspaper articles) is that the Left is increasingly associating itself with feminist movement and that is not allowing for the various definitions of feminism to come together. My understanding of feminism is that, that it has many definitions. People say that it is a wrong thing. But why? Why is it having many definitions a bad thing? Doesn’t it allow it to be flexible and for its greater application across various backgrounds (be it transnational feminist discourse, inter sectional feminist discourse, sociological feminist discourse or historiographical feminist discourse)? Both the Right and the Left are not allowing for this movement to flourish, I believe. I would also like to mention that we, MA students of Department of History have our whats app group. Since DU (or any university for that matter) consists of people coming from various backgrounds, so are in our very classroom as well. During various controversies of late, opinions of both Right and Left were very evident in the ‘conversations’ that took place. It seemed that the whole of the class was divided into the Right on the one hand and the Left on the other. Students on both sides let it all out on each other and we other students who did not abide with both, enjoyed a first row seat to the mayhem.

The other major issue that I have seen around of late (both as student as well as a gender equality activist) is that we talk about inter-disciplinary in practically every paper we study. We as students of history cannot study the subject in isolation to anthropology, sociology, political science, English etc. However, when it comes to a world and interaction outside our studies there is practically no interaction both between the students of other departments and teachers/professors on a formal level. Informal interaction between the students is there but that is also not of a significant scale, its minuscule. I found this really astonishing. We as students of history don’t know what or how lets say students of botany or mathematics are being taught and how they approach research work. There is no interaction. So much for inter-disciplinary studies! We as students and people involved in academia need to bridge this divide. Why can’t we have inter-department interactions on a formal level? Won’t this only better the level of academic research in our country? Doctors don’t think outside their profession, scientists are involved in their own research and so are historians and students of history. This is a very sensitive matter and at a time when education is being targeted by he who must not be named and Death Eaters, academia needs to stick together. It is high time that we leave aside our differences and do whatever we can to educate, debate and discuss (be it over tea and cigarettes or over rum) as many people as we can, because as easy as they may seem, they are not and they are the wheels which will drive our country forwards and to greater heights.

तुम्हें क्या लगा?

मैं सिर्फ एक शरीर नहीं

ये बात जान लो,

मुझमें बसी है एक रूह

उसे पहचान लो।

 

तुम्हारी गन्दी नज़र ने है ऐसा जकड़ा,

की बस देखा और जला गए।

नहीं हूँ मैं मांस का कोई टुकडा,

जिसे तुमने नोचा और खा गए।

 

मेरे जिस्म पर लिपटी साड़ी को

मेरी कमज़ोरी ना समझना,

मेरे मुलायम शरीर को

मेरी बदकिस्मती ना समझना।

तुम जब आते हो अपने दोस्तों के साथ

और हटा देते हो मेरी लाज के कपड़े,

तो तुम्हें क्या लगा,

तुमने मेरी आत्मा को नंगा कर दिया?

तुमने मेरे बदन पर जो किये वार,

तो तुम्हें क्या लगा,

उस लहू ने मेरे अंतर्मन को मैला कर दिया?

 

हां तुम्हारे समाज ने मुझे उस नज़र से देखा,

मैं बनी रही दोषी और तुम्हें एक बेचारा नौजवान बताया,

पर ये समाज मेरी ठोकर में है।

 

मैं नहीं सीता जो देगी अग्निपरीक्षा,

ना ही द्रौपदी जो बनेगी पांच पांडवों की भिक्षा,

हूँ मैं एक सशक्त नारी,

जिसने कभी ना हिम्मत हारी,

जिसकी एक नज़र अब तुम पर पड़ेगी भारी।

 

तुम मुझ पर अत्याचार बड़े करते हो,

गालियाँ भी मेरे नाम पे गढते हो,

लेकिन एक बात तो तुम भूल ही गए,

की इस संसार में आने से पहले,

नौ महीने तुम मेरे ही पेट में बढ़ते हो।

 

अगर मालूम होता

तो खुद से तुम्हें अलग कर लिया होता,

अगर मालूम होता

तो खुद से खुद ही को जन्म दिया होता,

अगर मालूम होता

तो इस संसार में मेरा भाग्य निर्भया सा न होता,

पर मालूम होता तब ना।

-कृति त्रिपाठी