“आत्महत्या”आखिर क्यों ?

-अक्षय कुमार डाबी

suicide

 

जिसने तुमको जन्म दिया,

उनको छोड़ जाओगे।
आएगी तुम्हारी याद,
तड़पता उनको छोड़ जाओगे।
क्या हक़ था तुम्हरा जो तुमन छीन ली जिंदगी अपनी,

क्या उनके अहसानो को योंही बोल जाओगे।
सजाये है जो सपने उन्होंने तुमसे ,
क्या हक़ नही उन्हें उनपर जीने का।
जो कि थी जिद तुमने सब कुछ पाने की ,
क्या अब हक़ नही तुम्हरा कुछ उन्हें देने का।
माना कि तुम्हारी मुश्किल बहुत होगी ,
पर यो मरने से तो मुश्किल कम नही होगी।
कुछ कर ऐसा की दुनिया देखे तुम्हे ,
यो खुदारी की जिंदगी जीने का हक़ नही तुम्हें।

 

सुसाइड……

“अगर हिम्मत नहीं थी तो मरने क्यूँ  आया?”

“अगर इतनी ही हिम्मत है तो मर क्यूँ रहा है”?

इन दो पंक्तियाँ गूढ़ विमर्श छुपा हुआ है. हमारे समाज में आत्मदाह को लेकर जितने विचार नहीं है उतनी भ्रांतियां है. हम लोग इस विषय पर बोलने को आतुर है पर समझने को अग्रसर नहीं. जीवन में सभी को कभी न कभी ये ख्याल आता है कि आखिर इस ज़िन्दगी का मतलब क्या है? क्यूँ जी रहा हूँ मैं? ज़िन्दगी बेज़ार लगती है और मौत आसान रास्ता. पर हम में ज़्यादातर लोग इस रास्ते को अख्तियार नहीं करते, शायद मौत का डर शायद ज़िन्दगी का मोह, शायद घरवालो की चिंता शायद दुनिया का ख़याल, बहुत से कारण होते है कि पाँव ठिठक जाते है. पर हमारे समाज में विडंबना अजीब है, हम लोगों को उनके फैसलों के लिए जज करते है. खासतौर पर उनके लिए जिनकी आत्मदाह का प्रयास विफल हो जाता है. सुसाइड किसी के मन की कमजोरी है या जुझारूपन की कमी ये निश्चित करने का अधिकार किसी को भी नहीं. “मेरे सामने भी तो आई थी ये समस्या मैंने तो आत्मदाह नहीं किया” ये वो बेहूदा वक्तव्य है जो टूटे हुए इंसान को और तोड़ने का काम करता है. जीवन की आशा जिसमे खो गयी हो उसपर सवाल उठाकर आप सिर्फ उसको और नीचे गिरा सकते हो. सुसाइड का तो आधार ही ये है कि जब इंसान को जीने का कोई रास्ता नहीं दिखता (यद्यपि रास्ते होते है). ज़रूरी नहीं कि आत्मदाह सोच समझ के किया जाए, कई बार तैश में आकर या क्षणिक असंतुलन का भी परिणाम होता है पर ऐसा भी नहीं कि आत्मदाह मूर्खता है. किसी के लिए उसका जूता खो जाना भी बहुत बड़ा दुःख है, निर्भर करता है व्यक्ति की मनोवृत्ति क्या है. समस्या तो ये भी है कि हमारे समाज में मनोरोगी को पागल और मनोचिकित्सक को पागलो का डॉक्टर मान लिया जाता है. तो अगर आपको समस्या भी है तो आप बताएँगे नहीं और बताएँगे नहीं तो आपकी कुंठा आपको अन्दर ही अन्दर खा जाएगी. और फिर जो आत्मदाह करने जायेगा वो महज एक खोखला शरीर होगा.

न दिल चाहिए न दर्द चाहिए

न आहें हमें कोई सर्द चाहिए

न रिश्तो का ढोंग न नातों का नाम

रहने दो हमें कहीं गुमनाम

गुमनाम हूँ जहां आराम है वहीँ

है नाम बड़ा जिसका नाम ही नहीं.

आत्मदाह करने वाला व्यक्ति वास्तव में अपनी अस्मिता को खो चुका होता है या अपने अस्तित्व से संघर्ष कर रहा होता है. अपनी काय को नष्ट करने का एक अभिप्राय ये भी है कि हम अपनी काया को अपना अस्तित्व मानकर बैठे है. मैं यहाँ आत्मा परमात्मा के विषय में बात नहीं कर रहा अपितु उस सत्य को इंगित कर रहा हूँ जो कई सालो पहले sartre ने कहा था- हम स्वयं को को चेतना के रूप में देखते है और दुसरे हमें काया के रूप में. आशय ये है कि जब हम आत्मदाह करने जा रहे है तो हम अपने अस्तित्व को भूला बैठे है. हम दिखती है तो बस एक काया. सुसाइड को जज करने से पहले उसे समझने की ज़रुरत है. हम सब को सहारा चाहिए अपना, दूसरो का, कम से कम भगवान् का. जब व्यक्ति आत्मदाह के लिए प्रेरित होता है तो वास्तव में वो अपना ही सहारा नहीं बन पाता. और इसलिए सुसाइड हर समय एक नया विमर्श खड़ा कर देता है- सुसाइड करना क्या वास्तव में इंसान का अपने शरीर पर हक को प्रमाणित करता है? या वास्तव में ये वो पल है जब मानव अपने आप पर ही हक खो बैठता है. प्रश्न विकट है  इसपर विमर्श चाहिए वार्तालाप चाहिए आक्षेप नहीं विवाद नहीं.

कितना आसान है रुला देना किसी को

मुश्किल है ये कितना भुला देना किसी को

हूँ अँधेरे में कब से सवेरा चाहिए

सवेरा चाहिए न अँधेरा चाहिए

न ज़िन्दगी हमें और ज़र्द चाहिए

न दिल चाहिए न दर्द चाहिए

न आहें हमें और सर्द चाहिए….A New Design (2)

हैरान हूँ

कृति त्रिपाठी

इंसान के इंसान को ना समझ पाने से परेशान हूँ,

बेहद हैरान हूँ।

इस झूठे संसार से अनजान हूँ,

बेहद हैरान हूँ।

जीती जागती इस दुनिया में बेजान हूँ,

बेहद हैरान हूँ।

क्या इतना आसान है

किसी की आत्मा को क्षण भर में कुचल देना?

क्या इतना आसान है

किसी के सपनों को पल भर में धूल कर देना?.

क्या इतना आसान है

किसी बिलखते हुए के आंसुओं को अनदेखा कर देना?

क्या इतना आसान है

पाप को भी पुण्य साबित कर देना?

क्या इतना आसान है

मंझधार में साथ छोड़ देना?

क्या इतना आसान है

किसी की आँखों में देखकर झूठ बोलना?

क्या इतना आसान है

किसी को उसके आवरण से तोलना?

क्या इतना आसान है

किसी के हृदय पर वार करना?

क्या इतना आसान है

किसी के वजूद पर सवाल खड़े करना?

क्या इतना आसान है

किसी के सच को झूठ करना?

क्या इतना आसान है

किसी की ईमानदारी को बेईमान करना?

क्या इतना आसान है

खुदा के सामने भी खुद को काफिर करार करना?

क्या इतना आसान है

खुद की अंतरात्मा को झुठलाना?

क्या इतना आसान है

अपनों से बेज़ार हो जाना?

क्या इतना आसान है

वाकिफ होते हुए भी अनजान हो जाना?

क्या इतना आसान है

किसी के जीवन के साथ खेल जाना?

क्या इतना आसान है

इंसान होते हुए भी इंसानियत का खो जाना?

क्या इतना आसान है

ये सब करते हुए भी अपनी भूल जान ना पाना?

अगर ये सब आसान है,

तो इस आसानी को ना समझ पाने की अपनी नाकामी पर,

मैं बेहद हैरान हूँ।

झूठ का सच

कृति त्रिपाठी

झूठ की खासियत है अनोखी

लगता है अपने आप में सम्पूर्ण.

धूल दूसरों की आँख में झोंकी

और मानते हो खुद को परिपूर्ण।

सच को तो कभी याद रखना ना होता

और झूठ भूलने का सवाल ही पैदा ना होता,

सच और झूठ की लड़ाई में

विजय झूठ की होती है,

क्योकि सच में साबित करने की गुंजाइश कहाँ होती है।

ये कहानी आखिर शुरू कैसे होती है?

एक सच को छुपाने पर

पहला झूठ अपने आप बन जाता है,

फिर आने वाले कई झूठ में

वो अपने आप तब्दील होता जाता है।

चेहरे पर इतने मुखौटे चढ़ा लिए जाते हैं,

कि इंसान खुद को पहचान ही नहीं पाता है,

मज़े की बात तो ये है,

कि चेहरे पर चढाए इन चेहरों से,

तुम दूसरों को नहीं,

बल्कि अपने आप को धोखा देते हो,

आवाज़ ही न सुनाई दे कभी,

इस कदर अन्तरात्मा को मार देते हो।

इंसान इतना पत्थर होता जा रहा है,

कि दूसरों के आंसू देखने में उसे आनंद आ रहा है।

झूठ के इस पैमाने को इतना भी न भरो,

कि छलक कर तुम्ही पर गिर जाए।

सब्र की इतनी इन्तेहा न लो,

कि बाँध ही टूट कर ढह जाए।

किसी की अच्छाई को उसकी कमजोरी न समझो,

कि इंसानियत से भरोसा ही उठ जाए।

तीर जैसे इन शब्दों से इतना भी न भेदो,

कि लहू का रंग ही सफ़ेद पड़ जाए।

रोने पे इतना भी मजबूर न करो ,

कि आँखें ही सूख जाए।

किसी को इतना भी मत डराओ,

कि डर ही ख़तम हो जाए।

इतने काफिर भी न बनो,

कि खुदा के दर से ही शर्म आए।

इतने झूठ भी न बुनो,

कि सच की परिभाषा ही फिर याद न आए।

खैर झूठ के बुने इस जाल में

एक दिन खुद को जकड़ा पाओगे,

क्योंकि आसमान में थूकने वाले को ये पता नहीं

कि पलट कर थूक उसी के मुँह पर आकर गिरता है,

और एक दिन ऐसा आता है

जब आईना भी तुम्हारी शिनाख्त करने से मुकरता है।

और तब अपने अस्तित्व का सच खोजने निकलना,

जो पाप किये हो उन्हें गंगा में धोने निकलना,

लेकिन ये बात याद रखना,

कि उस दिन गंगा में पानी नहीं होगा,

पर जिस रेगिस्तान से तुमने बेईमानी की है,

वहाँ कभी न मुरझाने वाला एक फूल ज़रूर खिला होगा ।

बुजुर्ग

बुजुर्ग

-संतोष कुमार

 

घर में पार्टी जैसा माहौल. काफी चहल पहल. बच्चे आपस में शोरगुल और मौज मस्ती करते हुए. बड़े भी आपस में गपशप करते हुए. इसी शोरगुल के बीच एक बुजुर्ग व्यक्ति कमरे में दाखिल होता है. कुछ पल में कमरे में शोर थोडा कम हो जाता है. बुजुर्ग चुपचाप एक कोने में जाकर बैठ जाता है.

बेटा : पापा आप बेकार में आ गए यहाँ. अब बच्चो और हम जवानो के बीच बोर हो जायेंगे.

बुजुर्ग: अकेले कमरे में मन नहीं लग रहा था.

बेटा(कुछ उखड़कर): आ ही गए है तो बैठ जाईये

एक परिचित: सच बताईये अंकल जी, अकेले में डर तो नहीं लग रहा था न. जस्ट जोकिंग!!

बुजुर्ग एक पल उसे देखता है, फिर अपने बेटे को देखता है.

बुजुर्ग: खाली कमरे में डर नहीं लगता अब, भरी महफ़िल में दम घुटने लगा है…… बेटा इन्सान तब अकेला होता है जब अपने भी गैर लगने लग जाते है. जस्ट जोकिंग!!

(दोनों के मुंह बन जाते है)

बेटा: (आहिस्ता से दोस्त को कहता है)जब से माँ गयी है तब से उनका बर्ताव कुछ बदल सा गया है. उनको हम पर विश्वास नहीं रहा शायद. उनको लगता है हमने माँ का ठीक से ख्याल नहीं रखा.

(ये सुनते ही बुजुर्ग को पुरानी बाते याद आने लगती है)

बुजुर्ग और उसकी पत्नी कई सालो पहले टकटकी लगाये दरवाज़े पर बैठे है. पत्नी व्याकुल होकर इधर उधर फिर रही है जबकि बुजुर्ग थक कर सोफे पर बैठ जाता है.

पत्नी: कोई खबर आई? कोई फ़ोन, मेसेज?

बुजुर्ग: कुछ भी नहीं.

पत्नी: लगता है भूल गया है हमें. समझते है काम करता है, बिजी रहता है इसलिए खुद नहीं आ सकता पर कम से कम एक फ़ोन तो कर सकता है.

बुजुर्ग: इतनी टेंशन रहती है, भूल गया होगा.

पत्नी: कल को अपने माँ बाप को तो नहीं भूल जायेगा न?

बुजुर्ग: क्यूँ इतना नेगेटिव सोचती हो?

पत्नी: जब पढने के लिए बाहर गया तो हमने कभी शिकायत नहीं की. सोचा पढ़ रहा होगा भूल गया होगा. छुट्टियों में घर नहीं आया बोला पढ़ रहा हूँ. पढाई ख़त्म हुई तो शहर में नौकरी ले ली वापस नहीं आया. न खुद आता है न हमें आने देता है, कहता है अपना घर नहीं बनाया. अरे घर तो लोगों से बनता है, वरना तो ईंटो का ढेर है, उससे ज्यादा कुछ नहीं (बुरी तरह खांसने लगती है)

बुजुर्ग: तुम क्यूँ अपनी तबियत ख़राब करती हो? क्यूँ उसके लिए अपना दिल जलाती हो?

पत्नी: सोचती हूँ अगर जिंदा नहीं तो कम से कम मेरी लाश को देखने तो ज़रूर आएगा! (आंसू आ जाते है)

(वापस वर्तमान में)

बुजुर्ग(आहिस्ता से): तुम आये भी तो किसलिए….. जब मैंने अपना सब कुछ खो दिया!! तू जब नहीं था तो तेरी माँ तिल तिल करके मरी, अब तू है तो भी तिल तिल करके मर रहा हूँ.

(इससे पहले कि बात और गंभीर हो जाये. बुजर्ग को बच्चे बुजुर्ग को घेर लेते है. बुजुर्ग का ध्यान भंग होता है)

बच्चे: दादा जी कहानी सुनाइए न. पापा ने बोला आप अच्छी कहानी सुनाते हो.

बेटा: अरे मैं तो मज़ाक कर रहा था. चलो बच्चो सोने जाओ.

बच्चे: नहीं अब तो कहानी सुन के रहेंगे. दादा जी सुनाइए न

बुजुर्ग: मुझे सचमुच कोई कहानी नहीं आती.

बेटा: अब सुना भी दीजिये बच्चो का मन रखने के लिए. बस अपने गाँव की कहानी मत सुनाने लगना.

बुजुर्ग: ठीक है सुनाता हूँ.  ध्यान से सुनो. (कहानी को मजाकिया लहजे में कहने का प्रयास करता है लेकिन कई चेहरे और आवाज़ में असली भाव दिख जाते है और पता चल जाता है की कहानी वो नहीं जो बच्चे सुन रहे है कहानी वो है जो वो छुपाने का प्रयास का कर रहा है पर उसकी आँखें उसको धोखा दिए जा रहा है. उसकी आँखों में वो कहानी दिख जाती है जो शब्दों से पता नहीं चलती)

बहुत पहले की बात है. एक जोकर था. उसका काम था लोगों को हँसाना. वो उलटे पुल्टे करतब करता, उलटे सीधे मुंह बनाता, उछलता कूदता और सब खूब हँसते. सब उसे बहुत पसंद करते थे, जहाँ जाता महफ़िल जमा देता था, लोग उससे मिलने, उससे बात करने को आतुर रहते. पर धीरे धीरे वो जोकर बुड्ढा होने लगा. उछलना कूदना कम हो गया, चेहरे पर झुर्रियां पड़ने लगी, शरीर कमज़ोर हो गया. एक बार  उछलने कूदने लगा तो कमर लचक गयी, फिर तो वो जो रोया जो रोया कि लोगों की हंसी छूट गयी. जोकर रोता रहा लोग हँसते रहे.जब वो जोकर अपनी  कमर पकड़कर चल रहा था तो लोगों को बहुत हंसी आई. उस दिन उस जोकर को एहसास हुआ कि लोग उसके मज़ाक पर नहीं, उसपर हँस रहे थे. वो रोयेगा लोग हंसेगे, उसे चोट लगेगी तो लोगों को लगेगा मज़ाक कर रहा है. तो पता है उसने क्या किया?

बच्चे: क्या? (हैरत से)

उसने एक गुब्बारा बनाया. बहुत बड़ा जादुई गुब्बारा. सो भी दर्द जो भी दुःख, सारे आंसू, उस गुब्बारे में भरते जाता था और बदले में उस गुब्बारे से झूठी हंसी और दुसरो के लिए खुशियाँ ले जाता था. तो वो रोज़ सुबह शाम लोगों को खूब हंसाता खूब खुश करता और रात को गुब्बारे के सामने खूब रोता. गुब्बारा फूल फूल के बहुत बड़ा हो गया, और एक दिन…. फट गया. जोकर मरने लगा.  लेकिन जब लोगों ने मरते हुए जोकर को देखा तो उनकी हंसी छूट गयी…. चेहरे पे रंग पुता हुआ, दर्द से कराहता हुआ जोकर बड़ा फनी लग रहा था. कुछ लोगों को ये भी लगा कि मरने का नाटक कर रहा है अभी उठ खड़ा होगा. सब हँसते रहे, हँसते रहे और जोकर…. मर गया! पता है मरने से पहले जोकर के आखिरी शब्द क्या थे- “मुझे गुदगुदी करो, गाना गाओ, कोई जोक सुनाओ, मुझे हंसाओ कोई. मैं हँसना चाहता हूँ, रोना नहीं चाहता…रोना नहीं चाहता”. अरे कोई तो गुदगुदी करो, गुदगुदी करो!!

बच्चो ने गुदगुदी शब्द सुना तो हंसने लगे. “जोकर को गुदगुदी करो, जोकर को हँसना था. जाते जाते भी जोकर ने जोक ही  सुनाया. मुझे हंसाओ, मैं मर रहा हूँ!!” फिर बच्चे और जोर से हंसने लगे. एक बच्चा जोर जोर से बोलता और हँसता- “दादाजी ने आज क्या जोक सुनाया- जोकर कह रहा है लोगों से कि मुझे हंसाओ! मरता आदमी भी ऐसा बोलता है क्या, ये जोकर सचमुच जोकर था!!” बच्चे जोर से हँस रहे थे और बड़े भी मुस्कुराने लगे. लेकिन बुजुर्ग के आँखों से झर झर आंसू बहने लगे. अपने आंसू छुपाने के लिए वो कमरे से बाहर जाने लगा.

“वो रो रहे थे क्या?

“लेकिन मजाकिया कहानी में कोई रो कैसे सकता है?”

बुजुर्ग अपने आंसुओ पे काबू करते हुए अपने कमरे में पहुँचता है लेकिन कमरे में जाते ही वो फूट फूट कर रोने लगता है. काफी देर तक रोता रहता है. फिर दरवाज़े पर एक हलकी सी आहट होती है. बुजुर्ग जल्दी से अपने आंसू पोंछता है. उसे आशा थी कि शायद कोई उसकी कहानी का असली मतलब समझकर उसे सांत्वना देने आया है. पर दरवाज़ा खोला तो एक बच्चा खड़ा था.

बच्चे ने पूछा- “गुब्बारा फटने से जोकर मरा कैसे?”

“वो गुब्बारा उसका सहारा था, वो जरिया था अपनी बात कहने का. बिना सहारे कैसे जीता?”

“बड़ा पागल था जोकर. जब पता था कि गुब्बारा फट जायगा तो उतना भरा ही क्यूँ”

“दुःख बहुत अजीब चीज़ होती है बेटा. ये जीने का सहारा भी बनती है और मरने की वजह भी”

“ऐसा गुब्बारा असल में होत्ता है क्या दादाजी ?

“हाँ सब के पास होता है. कई लोग उसको दिल भी कहते है”. फिर अपने आप से –“जाने कब से इंतज़ार में हूँ. बस भरता जा रहा है, जाने कब फटेगा”. धीमे धीमे गाने लगता है-

“न दिल चाहिए न दर्द चाहिए

न आहे हमें कोई सर्द चाहिए

न रिश्तो का ढोंग

न नातो का नाम

रहने दो हमें कहीं गुमनाम

गुमनाम हूँ जहाँ आराम है वहीँ

है नाम बड़ा जिसका नाम ही नहीं”

कितना आसान है रुला देना किसी को;

मुश्किल है ये कितना भुला देना किसी को

हूँ अँधेरे में कब से- सवेरा चाहिए

सवेरा चाहिए, न अँधेरा चाहिए

न ज़िन्दगी हमें कोई ज़र्द चाहिए

न दिल चाहिए न दर्द चाहिए

न आहे हमें कोई सर्द चाहिए”

 

बुजुर्ग खाने की मेज़ पर आता है तो बच्चे फिर उसे घेर लेते है.

“एक सवाल तो पूछना भूल ही गया दादाजी?

“पूछो?”

“जोकर की मौत के बाद उसके परिवार का क्या हुआ?

“बड़े होकर उसका बेटा भी जोकर बन गया. वो भी बुड्ढा हुआ, उसे भी गुब्बारा मिला और वो भी रोते हुए मर गया और लोग हमेशा की तरह हँसते रहे. और ये दास्तान चलती रही”. ये कहकर बुजुर्ग ने अपने बेटे की ओर देखा. उसके बेटे के हाथ से चम्मच छूट गयी, और वो आवाक होकर अपने पिता को देखता रहा. आखिर में बस यही बोल पाया-

“न ये मजाकिया है, और न ये कहानी है”

“जानते हो वो गुब्बारा क्या है बेटा”

बेटा इसका जवाब नहीं सुनना चाहता था, वो जानता था उसे बर्दाश्त करने की हिम्मत उस में नहीं है.

“कुछ बहता हुआ सा मन मे है

जो बाहर आना चाहता है

है लावा या तूफान कोई

अंदर ही घुटता जाता है

सीने मे जलन करता है कभी

सपने या भ्रम बनता है कभी

ना रोता है ना हंसता है

अंदर ही अंदर डसता है

है लावा या तूफान कोई ये

जो मेरे अंदर बसता है

चिल्लाने को जी चाहता है

फट जाने को जी चाहता है

इतना बेचैन फिर रहा हूँ अब

थम जाने को जी चाहता है

उसे बाहर निकालू तो कैसे

वो कौनसा रास्ता जाता है

जो बाहर निकाले इसको मन से

दलदल मे फँसता जाता है

है लावा या तूफान कोई ये

बिन पूछे घुसता जाता है

ये हर दिन बढ़ता जाता है

मैं हर दिन झुकता जाता हूँ

मेरे अंदर का तूफान मेरा

अक्स बनते जाता है”

 

अश्वत्थामा मारा गया…..

मैं कौन हूँ, ये केवल एक अस्तित्ववादी प्रश्न नहीं है, इस में हमारे तुम्हारे सबके जीवन, समाज और राष्ट्र का सार तत्व छुपा है. मेरा नाम क्या है, और किसी को क्या सरोकार. एक पंछी हूँ बस जो उड़ने को आतुर है, जो मंजिल तलाश रहा है अपनी. और जीवन के पंछियों को न नाम की ज़रुरत है न पहचान की, बस एक उदीश्य और एक मंजिल, यही उसकी ज़रुरत है. पर फिर भी लोग पूछते है कौन हो तुम, पहचान क्या है तुम्हारे, भीड़ में किस से जोड़कर देखते हो खुद को. और तब मैं कहता हूँ कि मैं अश्वत्थामा हूँ, मैं ही क्यूँ आप भी अश्वत्थामा है, हम सब आने जीवन के किसी के किसी क्षण में अश्वत्थामा हो जाते है. हाँ मैं ये बात जानता हूँ कि हम में से कोई अश्वत्थामा नाम से नहीं पहचाना जाना चाहता, एक ऐसे नाम से जिससे महाभारत के युद्ध की क्रूरता और धूर्तता याद आ जाती है. अब भला हम अश्वत्थामा कैसे हुए? इस प्रश्न का सीधा उत्तर है- हाँ हम सब अश्वत्थामा है, पर अश्वत्थामा इंसान नहीं……अश्वत्थामा हाथी!!

महाभारत की कहानी तो सुनी होगी न आपने. पांडव सेना द्रोणाचार्य के नेतृत्व वाली कौरव सेना के समक्ष त्राहि त्राहि कर रही थी, विजय की केवल एक आशा थी द्रोणाचार्य की मृत्यु और उनकी एकमात्र कमजोरी उनका पुत्र अश्वत्थामा. तब पांडवो ने द्रोणाचार्य के वध हेतु अश्वत्थामा का सहारा लिया….. अश्वत्थामा हाथी का. इस महाभारत के युद्ध का सबसे दुखद क्षण था ये केवल इसलिए नहीं कि द्रोण की मृत्यु हुई अपितु उससे अधिक किसी के नाम किसी की पहचान के साथ खिलवाड़ हुआ. आज भी यही होता है. कुछ नामो में भरकर हमारी पहचान निर्धारित कर दी जाती है और जीवन भर कोई पांडव हमारी पहचान को अपने पैरो तले रौंद कर चला जाता है. मेरा नाम किसी और ने रखा, मेरी पहचान मुझे किसी और से मिली, मेरा धर्म मेरा नहीं, मेरी जाति मेरी नहीं, मेरा देश मेरा नहीं. बस मिल गया और मान लिया अपना लिया… और इसमें कोई बुराई. कमी तब हुई जब हमारी इच्छा के विरुद्ध हमपर पहचाने थोपी गयी. किसी ने किसी धर्म से जोड़कर हिंसा की, किसी ने जाति पूछकर पक्षपात, कभी रंग देख्कार भर्त्सना हुई, कभी अशिक्षा का मज़ाक. इन सभी पहचानो का भार जब भी हमारे कंधो ने लादा हा अश्वत्थामा हो गए. जब कुछ हिन्दू कुछ मुसलमानों ने अपनी हिंसा के कारण पूरी कौम का नाम बदनाम किया, तो बाकि सब हिन्दू मुस्लिम अश्वत्थामा हो गए, जब आम आदमी का नाम लेकर किसी ने गाड़ियाँ फोड़ी, आग लगायी और उन्ही आम आदमियों को कष्ट पहुंचाया, तो अपनी गाडी या दूकान के टूटे हुए अवशेषों को निहारता हर शख्स अश्वत्थामा है. जब विचारधारा के नाम पर कुछ “राष्ट्रवादियों” ने कुछ “गैर राष्ट्रवादियों” पर हिंसा को जायज़ ठहराया तो भीड़ में खड़े उन छात्रो ने जो बेवजह बेरहमी से पीटा गया, वो अश्वत्थामा है.

हम सब ही शोषक भी है हम सब ही शोषित भी है. जाने अनजाने हम कभी भीड़ का हिस्सा जब बन जाते है, जब भीड़ की एक आवाज़ से १०० करोड़ पहचाने जाते है, जब लोगो के हुजूम में अपनी अस्मिता हम खो जाते हा तब हम सब उसी क्षण अश्वत्थामा हो जाते है. जिस क्षण हम किसी को संज्ञा दे देते है  उसी दिन हम दो पहचाने गढ़ते है उनकी और अपनी.  हर पुलिस वाला जो भ्रष्ट है उसके पीछे एक आम आदमी है जिसकी आवश्यकताएं असीमित है पर संसाधन सीमित. हर इंसान के पीछे उसका इतिहास होता है. किसी को संज्ञा देना उस इतिहास का ह्रास है. वास्तव में हम जनमानस ही है जिसमे सब कुछ निहित है सब अच्छा है सब बुरा भी है. हर उस दमन में हम हिस्सा लेते है या तो शोषक के रूप में, या तो शोषित के रूप में और अंत में मूक साक्षी के रूप में. हम ही है जो आदर्शो की वकालत करते है और हम ही है जो उन आदर्शो को अपने स्वार्थ के तले कुचलकर आगे बढ़ जाते है. और ऊनि आदर्शो में कुचले जाते है असंख्य अश्वत्थामा.

मैं जानता हूँ यहाँ से जाने के बाद आप सब भूल जायेंगे, आपके जीवन में विचारो में निर्णयों में कोई परिवर्तन नहीं आएगा. मेरी बातो का शायद ही आप लोगों का कोई असर हो, और भला हो भी क्यूँ. मैं भी तो उसी जुर्म का दोषी हूँ जिसमे आप लोग संलग्न है. बस एक बार घर जाकर दो मिनट चिंतन अवश्य कीजियेगा. कि हम संसार की सबसे भ्रष्ट संस्था है….. क्यूंकि हम जनता है. अश्वत्थामा कल भी मारा जाता था, अश्वत्थामा आज भी मारा जाता है, अश्वत्थामा कल भी मारा जाएगा, फर्क बस इतना है कि आज कृष्ण कहीं नहीं है…..

और ये सब मैं इसलिए नहीं कह रहा हूँ कि मुझसे आप लोगों से कोई आशा है बल्कि इसलिए कि मैं निराश हो चूका हूँ. अपनी ख़ामोशी से भी, अश्वत्थामा की मौत से भी. अश्वत्थामा रोज़ मरते है, कभी इंसान मरते है, कभी पहचान मरती है, कभी ज़मीर मरता है कभी ज़बान मरती है. पांडव कौरव लड़ते जाते है और अश्वत्थामा मरते जाते है. आज भी किसी कॉलेज में किसी घर में किसी दफ्तर में, कहीं मंदिर मस्जिद गुरुद्वारों में, कहीं चार दीवारों में अश्वतथामा मारा जा रहा है. लोगों को पहचानो के साँचो में मत डालो तो अच्छा, इंसान को इंसान ही रहने दो तो अच्छा, मैं बस एक हाथी हूँ न पांडव हूँ न कौरव हूँ, अपनी अहं की जीत में मुझे न मारो तो अच्छा. वरना कुछ और नहीं कह पाओगे बस यही बचेगा कहने को कि ……. अश्वत्थामा मारा गया….!!

भीड़ में छितरा हुआ सा

एक तिनका मैं भी हूँ

खून के इन आंसुओं का

एक कतरा मैं भी हूँ

भीड़ आती है

कुचलती है मसलती है

किस कदर ये जान मेरी

उफ़ मचलती है

जुल्मियों के इस जहाँ में

किसकी चलती है

इज्ज़तो के रास्तो पर

रूहे जलती है

 

हाँ मैं एक छोटा सा तिनका

घुटती जिसकी सांस है

कितने जन्म बीते यहाँ

मुक्ति की फिर भी आस है

जानता हूँ इस जगत का

मैं एक हिस्सा मात्र हूँ

आज भी इंसानियत के

तलवों में मेरा वास है

 

प्यार में “ग्रो उप”…… गन्दी बात है

-संतोष कुमार

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यूँ तो अपने हाथ में हमेशा पुस्तक का होना सामान्य बात है तथापि कुछ पुस्तके ऐसी भी होती है जिनके पढने की आतुरता कुछ अधिक ही होती है और ये पिपासा पुस्तक की समाप्ति पर ही समाप्त होती है. ऐसी ही एक पुस्तक से कल साक्षात्कार हुआ (क्षितिज भाई को इस सप्रेम भेंट के लिए बहुत बहुत अभिवादन). पुस्तक का नाम था “गन्दी बात” और इनके लेखक है क्षितिज रॉय. मेट्रो से घर जाने के सफ़र में ही आधी किताब पढ़ डाली, और बाकी आधी अगली सुबह कॉलेज जाते हुए. पुस्तक पढ़ते हुए इतने विरोधाभासी विचार मन में आये कि कभी कभार तो ऐसा लगा कि एक विचार पर चिंतन करने से कहीं पिछला विचार भूल न जाऊ. वास्तव में ऐसी कुछ रचनाये होती है जो साहित्य के सिद्धांत का निर्माण करती है, अधिकतर साहित्य उन सिद्धांतो का अनुकरण करती है, और अंततः कुछ रचनायें ऐसी होती है जो बनी बनायीं  परिपाटियों को तोड़ देती है और आपको साहित्य के सिद्धांतो पर पुनर्विचार करने को बाध्य करती है. कुछ ऐसी रचनायें जो आपको ये एहसास कराती है कि साहित्य को पढना भी साहित्य लेखन की तरह एक कला है. “गन्दी बात” ऐसी ही एक रचना है.

हमें आदत पड़ गयी है मौखिक व लिखित शब्दों को पृथक मानने की. हम जैसी भाषा व भाव का प्रयोग अपने दैनिक जीवन में करते है उसका उपयोग साहित्य में करने की कल्पना भी नहीं कर सकते. हमारी भाषा में एक संभ्रांतता आ जाती है और हमारी शैली में एक जटिलता. बोलचाल की भाषा को अक्सर साहित्यिक दृष्टि से हेय समझा जाता है. ऐसे में पूरा का पूरा उपन्यास ठेठ स्थानीय कलेवर में लिख जाना न केवल अनोखा व अनूप प्रयोग है अपितु ये हमारी साहित्य की समझ को भी चुनौती देता है जो अक्सर तत्सम भावी शब्दों को अच्छे शब्दों का पैमाना मान लेते है. पुस्तक की भाषा, पृष्ठभूमि, कथानक, संवाद, चरित्रों सब में एक खुलापन है, एक ऐसा खुलापन जो कई बार अखरता भी है आपकी साहित्यिक संवेदनशीलता को चुनौती देता है परन्तु जैसे जैसे आप किरदार से जुड़ते जाते है आप उनसे बनते जाते हो. शुरू शुरू में खुद को ये याद दिलाना पड़ा कि मैं “एक प्यारी सी प्रेम कहानी” नहीं अपितु “गन्दी बात” पढ़ रहा हूँ. और इसका असर कुछ ये हुआ की कुछ दूर आकर हम  “क्या हो गया ये” को “क्या हो गया बे” पढने लगे थे!

कहानी का कथानक क्या है, साफ़ साफ़ बताना मुश्किल है. सरसरी तौर पर तो ये एक युगल के बीच पत्रों के आदान प्रदान और उनके प्रेम की बदलते परिपाटी, और उनके बदलते समाजशास्त्र व मनोविज्ञान की कथा लगती है, परन्तु ये कहानी केवल गोल्डन या डेज़ी की नहीं है, गोल्डन या डेज़ी जैसे छिछले नाम वास्तव में एक प्रतीक है एक बिम्ब है उन प्रेम कहानियों की जो छोटे नगरो कस्बो में फलती फूलती है और बड़े शहरो की दमघोंटू आबो-हवा में दम तोड़ देती है. ये कथा और चरित्र अपनी भाषा, अपने लहजे और अपनी बातो से अभद्र भी लग सकते थे और कुछ हद तक लगते भी है (जो इसके शीर्षक गन्दी बात को चिर्तार्थ करती है) पर इस अभद्रता और खुलेपन में गहरा मनोविज्ञान गहरा समाजशास्त्र है. कहानी पढ़कर कई बार ऐसा भी प्रतीत हुआ कि वास्तव में, गोल्डन और डेज़ी की कहानी न होकर गोल्डन और डेज़ी खुद एक कथानक है, एक बड़ी कहानी का हिस्सा है. ये कथानक दो सतहों में चलती है- एक बदलती प्रेम कहानी और एक बदलता शहर. मुझे ये कहानी एक “meta narrative” प्रतीत हुई जहां बिहार के छोटे कसबे एक किरदार है, दिल्ली शहर एक किरदार है और सिनेमा सबसे बड़ा किरदार है. जब डेज़ी गोल्डन को “ग्रो उप” पर एक लम्बा व्याख्यान झाडती है और उसे पलटकर गोल्डन से भी जवाब मिलता है, तो ऐसा प्रतीत हुआ मानो दिल्ली जैसे आधुनिक, संभ्रांत शाहर छोटे कस्बो को हिदायत दे रहा हो- “लालायित नजरो से मेरी तरफ देखने भर से मुझे पाना न संभव है न हितकर, सो यदि आगे बढ़ना है और खुद को भीड़ में खो जाने से बचाना चाहते हो तो ग्रो उप” और कसबे झिड़ककर बड़े शहरो को कहते है- “तुम्हारा अनुकरण करने में मैंने अपनी पहचान, संस्कृति, परिवेश, मासूमियत सब गँवा दी  अब तुम चाहते हो कि तुम जैसा बनकर अपनी अस्मिता ही खो दूँ. नहीं कदापि नहीं”. प्यार में “ग्रो उप” करने से अधिक “गन्दी बात” क्या होगी, वो बढ़ना जो बेफिक्र, मनमौजी, अल्हड, बिंदास गोल्डन के मन में एक ऐसा लावा पैदा कर देता है जो कहानी के अंतिम क्षणों में फूट पड़ता है और “ये शहर नहीं सर्कस है”अध्याय में फूटे इस लावे के साथ पूरा कथानक ही दिशा बदल लेता है. गोल्डन का झूठ बोलकर शहर में आना और बेसुध शहर से भाग जाना दोनों शहर के क्रूर चेहरे को उजागर करता है. सिरसा का मुख जहां इंसान तेज़ी से घुसता है, और फिर इस कदर फँस जाता है, कि एक छोटा सा सुराख़ मिलते ही उससे तेज़ी से निकल जाना चाहता है.

सिनेमा इस पूरी रचना का एक बेहद महत्त्वपूर्ण पक्ष दिखाई पड़ता है. न केवल ये कहानी शहर का अपितु सिनेमा का भी meta narrative है. कहानी में शुरुआत में हमें फिल्म राँझना याद आ गयी, और इस फिल्म को कथानक में देखने के लिए हमें अधिक इंतज़ार नहीं करना पड़ा, और १८वे पृष्ठ पर आपको फिल्म का ज़िक्र मिल जाता है. परन्तु ये एकलौता ऐसा मौका नहीं है, कहानी में इतने फिल्मो व गीतों का ज़िक्र आया है कि यदि उनको कहानी से हटा दिया जाए तो प्रतीत होता है ये उपन्यास लघु कथा रह जायगी. प्रेम की अधिकतर प्रेरणाओ की जननी सिनेमा ही है. कुछ कुछ होता है और डीडीएलजे से प्रेम के पाठ सीखने वाली और कुमार सानू के गीतों में अपनी भावनाओ की अभिव्यक्ति तलाशने वाली हमारी पीढ़ी वास्तव में एक फिल्म में जी रहे है, एक ऐसी फिल्म जिसमें नायक हम है, और हम अपने दैनिक जीवन में उस नायकत्व की तलाश में रहते है जो सिनेमाई दुनिया में हमें बहुत प्रभावित करती है. जो हमें सामाजिक सरोकारों से विद्रोह करने की प्रेरणा देती है और हमारी मानसिकता में रच बस जाती है. गोल्डन और डेज़ी की प्रेम कहानी उस नायकत्व को वास्तविकताओ में सार्थक करने के प्रयास की भी कथा है और कथा है उस वर्ग संघर्ष को पाटने की भी, जो डेज़ी के एलएसआर (लेडी श्री राम कॉलेज) में दाखिल होने से और भी बढ़ गया था. और जिसे पाटने के लिए गोल्डन ने दिल्ली में ड्राईवर बनना स्वीकार किया परन्तु वास्तव में देखा जाए तो गोल्डन के इस फैसले ने उन दोनों के वर्ग विभेद को और अधिक बढ़ा दिया. कहानी का अंत एक सिनेमा के अंत की तरह प्रतीत होता है जहां किरदार अपना वजूद या तो तलाश लेते है या उन्हें उनकी तलाश में एकांत छोड़ दिया जाता है और उसको आत्मसात किये हुए दर्शक को ये एहसास होता है कि वो जो भी देख रहा था वो एक कल्पना थी. गोल्डन और डेज़ी अपनी कहानी के नायक नायिका है, पर वो एक और कथा के किरदार है, एक कहानी उनकी है और दूसरी कहानी के नायक शहर है. एक ऐसा शहर जिसे गोल्डन अपनी महबूबा बनाना चाहता है क्यूंकि वो कभी समाप्त नहीं होती, पर वही शहर जो उसे अंत में भागने को मजबूर कर देती है.

अंत में गोल्डन के करदार के विषय में अंतिम अध्याय में डेज़ी ने जो बाते कही जिससे मेरे ह्रदय में कुछ पंक्तियाँ उभर आई. कैसे समय और परिवेश के साथ इंसान की मासूमियत भी धूमिल  हो जाती है-

“वो लड़का मेरे भीतर का

जो खिलखिलाकर हँसता था

बेपरवाह था, मस्तमौला

आंसुओ का वक़्त नहीं था

न शिकन थी जिसकी बातों में

न दिन में कोई पर्दा था

न घुप अँधेरा रातो में

उस वक़्त में है लौटना

जहाँ रूह को सुकून मिले

वो शांति वो आरजूवो धड़कने वो जुस्तजू

वो नींद और वो ख्वाब

वो भूख का एहसास

सब बिछड़ गए जो हमसे

उन्हें फिर से पाना चाहता हूँ

ताले जड़कर शहर को मैं

घर को जाना चाहता हूँ”