मेरी आँख का काँटा….

मेरी आँख का काँटा मेरी आँखों को चुभता तो है पर दूसरो के आँखों में ज़रा सी धूल मुझे अधिक बेचैन कर देती है. वो धूल इसलिए अधिक दिखती है क्यूंकि दूसरो को परखना खुद को परखने से बहुत सरल होता है. और हो भी क्यूँ न, ये हमारे अहं की तृप्ति जो करता है. अपने स्वयं को जिस सांचे में ढाल लिया है हम चाहते है दुसरे भी उसिसांचे में ढल जाए. एक आस्तिक एक नास्तिक को हेय दृष्टि से देखता है और नास्तिक व्यक्ति सामने वाले को मुर्खाधिराज की उपाधि देने में देर नहीं लगाता. हेगेल ने कहा था कि “हर विचारक के अनुयायी यही समझते है कि उन्ही को एकमात्र सत्य व सर्वगुण संपन्न दर्शन की प्राप्ति हुई है, और यही कारण है कि वो अन्य सभी दर्शनों को हीन व अधूरा मानते है. ये अनुयायी इस विचार से प्रेरित है कि इनका दर्शन अपरिवर्तनीय, संपूर्ण व अंतिम सत्य है, इससे आगे कुछ और नहीं जानने को और इसके अलावा कोई और मार्ग नहीं है जानने का. अतएव ये सत्य प्रश्न व शंकाओ से परे है और किसी भी  आलोचना से इस ज्ञान की रक्षा आवश्यक है. ये दार्शनिक कदाचित ये नहीं समझ पाते कि सत्य की अनेकानेक परिभाषाएं वास्तव में सत्य का विस्तार करता है”.

मेरी आँख में लगी धूल  तुम्हे दुखी नहीं करती है ये तो तुम्हारा तरीका है अपनी शक्ति और सामर्थ्य के प्रदर्शन का. पावर हर जगह है बस हम कैसे उसका इस्तेमाल कर सकते है इसके बहुत से तरीके है. मेरी आँख में धूल के कण हम ढूंढें न ढूंढें लोगों के दिलो में कांटे ज़रूर बो देते है. और इस कटुता को छुपाने के बहुत से बहाने है हमारे पास- “मैं तो सच बोलने में यकीन रखता हूँ. सच तो हमेशा कड़वा होता है”. जी नहीं बंधु सत्य हमेशा कड़वा हो ये आवश्यक नहीं, काफी कुछ बोलने वाली की नीयत पर निर्भर करता है. जो दिल दुखाकर पूछते है कि “मैंने कुछ गलत बोला क्या?” जी हाँ बंधु. कई बार दोस्त हंसी मज़ाक में दूसरो को गालियाँ भी दे देते है और कोई बुरा नहीं मानता और कई बार हलकी फुलकी कोई छोटी सी बात बहुत गहरी चुभ जाती है. बोलने वाले की नीयत और सुनने वाले की सहनशीलता दोनों की परीक्षा है ये.

हाँ ये बात सत्य है कि ये बताना सम्भव नहीं कि कोई व्यक्ति आपकी किस बात पर बुरा मान ले. ये बताना कदापि संभव नहीं कि सामने वाला व्यक्ति आपकी बात को किस तरह ग्रहण करता है. “बुरा मान जाना” या “आपत्ति होना” अपने आप में एक मनोविज्ञान है जिसमे विस्तृत विमर्श की आवश्यकता है, और इसलिए इस विषय को अगले लेख के लिए छोड़ देना बेहतर है. फिलहाल प्रश्न ये उठता है कि तेरी आँखों का मैल मेरी आँखों के कांटे से अधिक क्यूँ चुभता है. क्या इसलिए कि मेरी आँखों के कांटे ने मुझे इस कदर अँधा कर दिया कि अपनी आत्मा का अस्तित्व हमें नज़र नहीं आती. हम एक ऐसी ज़िन्दगी जी रहे है जो हम अपने आप के लिए नहीं बल्कि दूसरो के लिए जीते है, हर ख़ुशी को हर गम को तोलकर देखते है दूसरो के साथ. तो अगर मेरी एक आँख फूटी है तो मेरे पडोसी की दो फूट जाए. मेरे ६० नंबर बुरी बात है, मेरी दोस्त के ५५ आये दिल को थोडा सुकून मिला, खुद की आशाओ से हार गया लेकिन सामने वाले से तो जीत गया. मेरा अस्तित्व अस्तित्व कम अहं अधिक है. और शायद इसलिए हम दूसरो की आँखों का धूल  देखते है कि अपनी आँखों के कांटे से अपना ध्यान हटा सके.

हम सब नेता बनना चाहते है हमारे एक भैया कहते है. सच भी है, हम अपना ज्ञान तब तक अधूरा मानते है जब तक १० लोगों के सामने उसका पांडित्य प्रदर्शन न कर ले. ऐसे में ज्ञान का उद्देश्य हमारे अहं की तृप्ति हो जाती है. दूसरो के समक्ष खुद को ज्ञानी साबित करना, बेहतर साबित करना अपने आप में अलग अनुभूति है. वास्तव में हम पूरे संसार को या तो अपने प्रतिरूप के रूप में देखना चाहते है अथवा अपने अनुयायी के रूप में. मैं भी क्यूँ लिख रहा हूँ शायद इसलिए कि आप मेरी वाहवाही करे. आलोचना करेंगे तो मैं उसका प्रतिकार करूँगा क्यूंकि आपने मेरे लेख में मेरी आँख की धूल देख ली अब आपके कमेंट्स में आपके आँखों की धूल देखूंगा.

बाइबिल के न्यू टेस्टामेंट के गोस्पेल ऑफ़ मैथ्यू के सातवे अध्याय में लिखा है बहुत खूब-

१.Judge not, that ye be not judged.
२ .For with what judgment ye judge, ye shall be judged: and with what measure ye mete, it shall be measured to you again.
३.And why beholdest thou the mote that is in thy brother’s eye, but considerest not the beam that is in thine own eye?
४.Or how wilt thou say to thy brother, Let me pull out the mote out of thine eye; and, behold, a beam [is] in thine own eye?
५.Thou hypocrite, first cast out the beam out of thine own eye; and then shalt thou see clearly to cast out the mote out of thy brother’s eye.

मुझे नहीं लगता इन पंक्तियों को समझाने की आवश्यकता है. हाँ भले ही लोगों को जज करना एक सामान्य मानवीय क्रिया भी हो सकती है, और इसमें कोई गुरेज़ भी नहीं, बर्शते नीयत सही हो. हर इन्सान अन्दर ही अन्दर इस बात से वाकिफ होता है कि उसने कोई बात क्यूँ कही है. तो कृपया-“तुम नाराज़ क्यूँ हो गए, मैंने ऐसा क्या कह दिया” वाली भोली शक्ल वाला दिखावा न ही करे तो बेहतर है. क्यूंकि फिराक गोरखपुरी जी बहुत सही कह गए है-

“जो मुझको बदनाम करे है काश वो इतना सोच सके;

मेरा पर्दा खोले है या अपना पर्दा खोले है”

इन सब बातों ने मेरी आदत छूटेगी न आपकी, बस इतना तो कर ही सकते है कि दूसरो की आँखों की धूल को देखते देखते कभी कभी अपनी आँखों से काँटा निकले का भी प्रयास कीजियेगा.क्या पता आँखों के मैल से अधिक भी कुछ दिखने लगे. और वो नहीं गाहे बगाहे कभी कभी अपने गिरेबान में भी झाँक कर देख लेना, क्या पता दूसरो के मीन मेख खोजते हुए अपने मन में कितनी कालिख पोत दी हो हमने. और ख़ास तौर पर उन लोगों के लिए जो दूसरो में कमियाँ खोजते है, किसी के व्यवहार में, किसी के विचार में, किसी के आचार में, और जिनको कुछ नहीं मिलता वो शक्ल-सूरत में कमियाँ खोजते है. विचार की कमी खोजने को आलोचना समझ सकते है लेकिन जो आपके शरीर का आपके रूप का मखौल उदय वो तो निरीह वैमनस्यता ही है.

बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय,

जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय।