“आत्महत्या”आखिर क्यों ?

-अक्षय कुमार डाबी

suicide

 

जिसने तुमको जन्म दिया,

उनको छोड़ जाओगे।
आएगी तुम्हारी याद,
तड़पता उनको छोड़ जाओगे।
क्या हक़ था तुम्हरा जो तुमन छीन ली जिंदगी अपनी,

क्या उनके अहसानो को योंही बोल जाओगे।
सजाये है जो सपने उन्होंने तुमसे ,
क्या हक़ नही उन्हें उनपर जीने का।
जो कि थी जिद तुमने सब कुछ पाने की ,
क्या अब हक़ नही तुम्हरा कुछ उन्हें देने का।
माना कि तुम्हारी मुश्किल बहुत होगी ,
पर यो मरने से तो मुश्किल कम नही होगी।
कुछ कर ऐसा की दुनिया देखे तुम्हे ,
यो खुदारी की जिंदगी जीने का हक़ नही तुम्हें।

 

सुसाइड……

“अगर हिम्मत नहीं थी तो मरने क्यूँ  आया?”

“अगर इतनी ही हिम्मत है तो मर क्यूँ रहा है”?

इन दो पंक्तियाँ गूढ़ विमर्श छुपा हुआ है. हमारे समाज में आत्मदाह को लेकर जितने विचार नहीं है उतनी भ्रांतियां है. हम लोग इस विषय पर बोलने को आतुर है पर समझने को अग्रसर नहीं. जीवन में सभी को कभी न कभी ये ख्याल आता है कि आखिर इस ज़िन्दगी का मतलब क्या है? क्यूँ जी रहा हूँ मैं? ज़िन्दगी बेज़ार लगती है और मौत आसान रास्ता. पर हम में ज़्यादातर लोग इस रास्ते को अख्तियार नहीं करते, शायद मौत का डर शायद ज़िन्दगी का मोह, शायद घरवालो की चिंता शायद दुनिया का ख़याल, बहुत से कारण होते है कि पाँव ठिठक जाते है. पर हमारे समाज में विडंबना अजीब है, हम लोगों को उनके फैसलों के लिए जज करते है. खासतौर पर उनके लिए जिनकी आत्मदाह का प्रयास विफल हो जाता है. सुसाइड किसी के मन की कमजोरी है या जुझारूपन की कमी ये निश्चित करने का अधिकार किसी को भी नहीं. “मेरे सामने भी तो आई थी ये समस्या मैंने तो आत्मदाह नहीं किया” ये वो बेहूदा वक्तव्य है जो टूटे हुए इंसान को और तोड़ने का काम करता है. जीवन की आशा जिसमे खो गयी हो उसपर सवाल उठाकर आप सिर्फ उसको और नीचे गिरा सकते हो. सुसाइड का तो आधार ही ये है कि जब इंसान को जीने का कोई रास्ता नहीं दिखता (यद्यपि रास्ते होते है). ज़रूरी नहीं कि आत्मदाह सोच समझ के किया जाए, कई बार तैश में आकर या क्षणिक असंतुलन का भी परिणाम होता है पर ऐसा भी नहीं कि आत्मदाह मूर्खता है. किसी के लिए उसका जूता खो जाना भी बहुत बड़ा दुःख है, निर्भर करता है व्यक्ति की मनोवृत्ति क्या है. समस्या तो ये भी है कि हमारे समाज में मनोरोगी को पागल और मनोचिकित्सक को पागलो का डॉक्टर मान लिया जाता है. तो अगर आपको समस्या भी है तो आप बताएँगे नहीं और बताएँगे नहीं तो आपकी कुंठा आपको अन्दर ही अन्दर खा जाएगी. और फिर जो आत्मदाह करने जायेगा वो महज एक खोखला शरीर होगा.

न दिल चाहिए न दर्द चाहिए

न आहें हमें कोई सर्द चाहिए

न रिश्तो का ढोंग न नातों का नाम

रहने दो हमें कहीं गुमनाम

गुमनाम हूँ जहां आराम है वहीँ

है नाम बड़ा जिसका नाम ही नहीं.

आत्मदाह करने वाला व्यक्ति वास्तव में अपनी अस्मिता को खो चुका होता है या अपने अस्तित्व से संघर्ष कर रहा होता है. अपनी काय को नष्ट करने का एक अभिप्राय ये भी है कि हम अपनी काया को अपना अस्तित्व मानकर बैठे है. मैं यहाँ आत्मा परमात्मा के विषय में बात नहीं कर रहा अपितु उस सत्य को इंगित कर रहा हूँ जो कई सालो पहले sartre ने कहा था- हम स्वयं को को चेतना के रूप में देखते है और दुसरे हमें काया के रूप में. आशय ये है कि जब हम आत्मदाह करने जा रहे है तो हम अपने अस्तित्व को भूला बैठे है. हम दिखती है तो बस एक काया. सुसाइड को जज करने से पहले उसे समझने की ज़रुरत है. हम सब को सहारा चाहिए अपना, दूसरो का, कम से कम भगवान् का. जब व्यक्ति आत्मदाह के लिए प्रेरित होता है तो वास्तव में वो अपना ही सहारा नहीं बन पाता. और इसलिए सुसाइड हर समय एक नया विमर्श खड़ा कर देता है- सुसाइड करना क्या वास्तव में इंसान का अपने शरीर पर हक को प्रमाणित करता है? या वास्तव में ये वो पल है जब मानव अपने आप पर ही हक खो बैठता है. प्रश्न विकट है  इसपर विमर्श चाहिए वार्तालाप चाहिए आक्षेप नहीं विवाद नहीं.

कितना आसान है रुला देना किसी को

मुश्किल है ये कितना भुला देना किसी को

हूँ अँधेरे में कब से सवेरा चाहिए

सवेरा चाहिए न अँधेरा चाहिए

न ज़िन्दगी हमें और ज़र्द चाहिए

न दिल चाहिए न दर्द चाहिए

न आहें हमें और सर्द चाहिए….A New Design (2)

बुजुर्ग

बुजुर्ग

-संतोष कुमार

 

घर में पार्टी जैसा माहौल. काफी चहल पहल. बच्चे आपस में शोरगुल और मौज मस्ती करते हुए. बड़े भी आपस में गपशप करते हुए. इसी शोरगुल के बीच एक बुजुर्ग व्यक्ति कमरे में दाखिल होता है. कुछ पल में कमरे में शोर थोडा कम हो जाता है. बुजुर्ग चुपचाप एक कोने में जाकर बैठ जाता है.

बेटा : पापा आप बेकार में आ गए यहाँ. अब बच्चो और हम जवानो के बीच बोर हो जायेंगे.

बुजुर्ग: अकेले कमरे में मन नहीं लग रहा था.

बेटा(कुछ उखड़कर): आ ही गए है तो बैठ जाईये

एक परिचित: सच बताईये अंकल जी, अकेले में डर तो नहीं लग रहा था न. जस्ट जोकिंग!!

बुजुर्ग एक पल उसे देखता है, फिर अपने बेटे को देखता है.

बुजुर्ग: खाली कमरे में डर नहीं लगता अब, भरी महफ़िल में दम घुटने लगा है…… बेटा इन्सान तब अकेला होता है जब अपने भी गैर लगने लग जाते है. जस्ट जोकिंग!!

(दोनों के मुंह बन जाते है)

बेटा: (आहिस्ता से दोस्त को कहता है)जब से माँ गयी है तब से उनका बर्ताव कुछ बदल सा गया है. उनको हम पर विश्वास नहीं रहा शायद. उनको लगता है हमने माँ का ठीक से ख्याल नहीं रखा.

(ये सुनते ही बुजुर्ग को पुरानी बाते याद आने लगती है)

बुजुर्ग और उसकी पत्नी कई सालो पहले टकटकी लगाये दरवाज़े पर बैठे है. पत्नी व्याकुल होकर इधर उधर फिर रही है जबकि बुजुर्ग थक कर सोफे पर बैठ जाता है.

पत्नी: कोई खबर आई? कोई फ़ोन, मेसेज?

बुजुर्ग: कुछ भी नहीं.

पत्नी: लगता है भूल गया है हमें. समझते है काम करता है, बिजी रहता है इसलिए खुद नहीं आ सकता पर कम से कम एक फ़ोन तो कर सकता है.

बुजुर्ग: इतनी टेंशन रहती है, भूल गया होगा.

पत्नी: कल को अपने माँ बाप को तो नहीं भूल जायेगा न?

बुजुर्ग: क्यूँ इतना नेगेटिव सोचती हो?

पत्नी: जब पढने के लिए बाहर गया तो हमने कभी शिकायत नहीं की. सोचा पढ़ रहा होगा भूल गया होगा. छुट्टियों में घर नहीं आया बोला पढ़ रहा हूँ. पढाई ख़त्म हुई तो शहर में नौकरी ले ली वापस नहीं आया. न खुद आता है न हमें आने देता है, कहता है अपना घर नहीं बनाया. अरे घर तो लोगों से बनता है, वरना तो ईंटो का ढेर है, उससे ज्यादा कुछ नहीं (बुरी तरह खांसने लगती है)

बुजुर्ग: तुम क्यूँ अपनी तबियत ख़राब करती हो? क्यूँ उसके लिए अपना दिल जलाती हो?

पत्नी: सोचती हूँ अगर जिंदा नहीं तो कम से कम मेरी लाश को देखने तो ज़रूर आएगा! (आंसू आ जाते है)

(वापस वर्तमान में)

बुजुर्ग(आहिस्ता से): तुम आये भी तो किसलिए….. जब मैंने अपना सब कुछ खो दिया!! तू जब नहीं था तो तेरी माँ तिल तिल करके मरी, अब तू है तो भी तिल तिल करके मर रहा हूँ.

(इससे पहले कि बात और गंभीर हो जाये. बुजर्ग को बच्चे बुजुर्ग को घेर लेते है. बुजुर्ग का ध्यान भंग होता है)

बच्चे: दादा जी कहानी सुनाइए न. पापा ने बोला आप अच्छी कहानी सुनाते हो.

बेटा: अरे मैं तो मज़ाक कर रहा था. चलो बच्चो सोने जाओ.

बच्चे: नहीं अब तो कहानी सुन के रहेंगे. दादा जी सुनाइए न

बुजुर्ग: मुझे सचमुच कोई कहानी नहीं आती.

बेटा: अब सुना भी दीजिये बच्चो का मन रखने के लिए. बस अपने गाँव की कहानी मत सुनाने लगना.

बुजुर्ग: ठीक है सुनाता हूँ.  ध्यान से सुनो. (कहानी को मजाकिया लहजे में कहने का प्रयास करता है लेकिन कई चेहरे और आवाज़ में असली भाव दिख जाते है और पता चल जाता है की कहानी वो नहीं जो बच्चे सुन रहे है कहानी वो है जो वो छुपाने का प्रयास का कर रहा है पर उसकी आँखें उसको धोखा दिए जा रहा है. उसकी आँखों में वो कहानी दिख जाती है जो शब्दों से पता नहीं चलती)

बहुत पहले की बात है. एक जोकर था. उसका काम था लोगों को हँसाना. वो उलटे पुल्टे करतब करता, उलटे सीधे मुंह बनाता, उछलता कूदता और सब खूब हँसते. सब उसे बहुत पसंद करते थे, जहाँ जाता महफ़िल जमा देता था, लोग उससे मिलने, उससे बात करने को आतुर रहते. पर धीरे धीरे वो जोकर बुड्ढा होने लगा. उछलना कूदना कम हो गया, चेहरे पर झुर्रियां पड़ने लगी, शरीर कमज़ोर हो गया. एक बार  उछलने कूदने लगा तो कमर लचक गयी, फिर तो वो जो रोया जो रोया कि लोगों की हंसी छूट गयी. जोकर रोता रहा लोग हँसते रहे.जब वो जोकर अपनी  कमर पकड़कर चल रहा था तो लोगों को बहुत हंसी आई. उस दिन उस जोकर को एहसास हुआ कि लोग उसके मज़ाक पर नहीं, उसपर हँस रहे थे. वो रोयेगा लोग हंसेगे, उसे चोट लगेगी तो लोगों को लगेगा मज़ाक कर रहा है. तो पता है उसने क्या किया?

बच्चे: क्या? (हैरत से)

उसने एक गुब्बारा बनाया. बहुत बड़ा जादुई गुब्बारा. सो भी दर्द जो भी दुःख, सारे आंसू, उस गुब्बारे में भरते जाता था और बदले में उस गुब्बारे से झूठी हंसी और दुसरो के लिए खुशियाँ ले जाता था. तो वो रोज़ सुबह शाम लोगों को खूब हंसाता खूब खुश करता और रात को गुब्बारे के सामने खूब रोता. गुब्बारा फूल फूल के बहुत बड़ा हो गया, और एक दिन…. फट गया. जोकर मरने लगा.  लेकिन जब लोगों ने मरते हुए जोकर को देखा तो उनकी हंसी छूट गयी…. चेहरे पे रंग पुता हुआ, दर्द से कराहता हुआ जोकर बड़ा फनी लग रहा था. कुछ लोगों को ये भी लगा कि मरने का नाटक कर रहा है अभी उठ खड़ा होगा. सब हँसते रहे, हँसते रहे और जोकर…. मर गया! पता है मरने से पहले जोकर के आखिरी शब्द क्या थे- “मुझे गुदगुदी करो, गाना गाओ, कोई जोक सुनाओ, मुझे हंसाओ कोई. मैं हँसना चाहता हूँ, रोना नहीं चाहता…रोना नहीं चाहता”. अरे कोई तो गुदगुदी करो, गुदगुदी करो!!

बच्चो ने गुदगुदी शब्द सुना तो हंसने लगे. “जोकर को गुदगुदी करो, जोकर को हँसना था. जाते जाते भी जोकर ने जोक ही  सुनाया. मुझे हंसाओ, मैं मर रहा हूँ!!” फिर बच्चे और जोर से हंसने लगे. एक बच्चा जोर जोर से बोलता और हँसता- “दादाजी ने आज क्या जोक सुनाया- जोकर कह रहा है लोगों से कि मुझे हंसाओ! मरता आदमी भी ऐसा बोलता है क्या, ये जोकर सचमुच जोकर था!!” बच्चे जोर से हँस रहे थे और बड़े भी मुस्कुराने लगे. लेकिन बुजुर्ग के आँखों से झर झर आंसू बहने लगे. अपने आंसू छुपाने के लिए वो कमरे से बाहर जाने लगा.

“वो रो रहे थे क्या?

“लेकिन मजाकिया कहानी में कोई रो कैसे सकता है?”

बुजुर्ग अपने आंसुओ पे काबू करते हुए अपने कमरे में पहुँचता है लेकिन कमरे में जाते ही वो फूट फूट कर रोने लगता है. काफी देर तक रोता रहता है. फिर दरवाज़े पर एक हलकी सी आहट होती है. बुजुर्ग जल्दी से अपने आंसू पोंछता है. उसे आशा थी कि शायद कोई उसकी कहानी का असली मतलब समझकर उसे सांत्वना देने आया है. पर दरवाज़ा खोला तो एक बच्चा खड़ा था.

बच्चे ने पूछा- “गुब्बारा फटने से जोकर मरा कैसे?”

“वो गुब्बारा उसका सहारा था, वो जरिया था अपनी बात कहने का. बिना सहारे कैसे जीता?”

“बड़ा पागल था जोकर. जब पता था कि गुब्बारा फट जायगा तो उतना भरा ही क्यूँ”

“दुःख बहुत अजीब चीज़ होती है बेटा. ये जीने का सहारा भी बनती है और मरने की वजह भी”

“ऐसा गुब्बारा असल में होत्ता है क्या दादाजी ?

“हाँ सब के पास होता है. कई लोग उसको दिल भी कहते है”. फिर अपने आप से –“जाने कब से इंतज़ार में हूँ. बस भरता जा रहा है, जाने कब फटेगा”. धीमे धीमे गाने लगता है-

“न दिल चाहिए न दर्द चाहिए

न आहे हमें कोई सर्द चाहिए

न रिश्तो का ढोंग

न नातो का नाम

रहने दो हमें कहीं गुमनाम

गुमनाम हूँ जहाँ आराम है वहीँ

है नाम बड़ा जिसका नाम ही नहीं”

कितना आसान है रुला देना किसी को;

मुश्किल है ये कितना भुला देना किसी को

हूँ अँधेरे में कब से- सवेरा चाहिए

सवेरा चाहिए, न अँधेरा चाहिए

न ज़िन्दगी हमें कोई ज़र्द चाहिए

न दिल चाहिए न दर्द चाहिए

न आहे हमें कोई सर्द चाहिए”

 

बुजुर्ग खाने की मेज़ पर आता है तो बच्चे फिर उसे घेर लेते है.

“एक सवाल तो पूछना भूल ही गया दादाजी?

“पूछो?”

“जोकर की मौत के बाद उसके परिवार का क्या हुआ?

“बड़े होकर उसका बेटा भी जोकर बन गया. वो भी बुड्ढा हुआ, उसे भी गुब्बारा मिला और वो भी रोते हुए मर गया और लोग हमेशा की तरह हँसते रहे. और ये दास्तान चलती रही”. ये कहकर बुजुर्ग ने अपने बेटे की ओर देखा. उसके बेटे के हाथ से चम्मच छूट गयी, और वो आवाक होकर अपने पिता को देखता रहा. आखिर में बस यही बोल पाया-

“न ये मजाकिया है, और न ये कहानी है”

“जानते हो वो गुब्बारा क्या है बेटा”

बेटा इसका जवाब नहीं सुनना चाहता था, वो जानता था उसे बर्दाश्त करने की हिम्मत उस में नहीं है.

“कुछ बहता हुआ सा मन मे है

जो बाहर आना चाहता है

है लावा या तूफान कोई

अंदर ही घुटता जाता है

सीने मे जलन करता है कभी

सपने या भ्रम बनता है कभी

ना रोता है ना हंसता है

अंदर ही अंदर डसता है

है लावा या तूफान कोई ये

जो मेरे अंदर बसता है

चिल्लाने को जी चाहता है

फट जाने को जी चाहता है

इतना बेचैन फिर रहा हूँ अब

थम जाने को जी चाहता है

उसे बाहर निकालू तो कैसे

वो कौनसा रास्ता जाता है

जो बाहर निकाले इसको मन से

दलदल मे फँसता जाता है

है लावा या तूफान कोई ये

बिन पूछे घुसता जाता है

ये हर दिन बढ़ता जाता है

मैं हर दिन झुकता जाता हूँ

मेरे अंदर का तूफान मेरा

अक्स बनते जाता है”

 

आत्मा तो मर चुकी है…..

जो भी बचपन में है  सीखा

उन सबको भूल जाने का

जो कुछ भी जाना हमने

उन बातो को ठुकराने का

आशाओं का उम्मीदों का

एक पल में टूट जाने का

दर्द के कडवे घूंटो को

पानी की तरह पी जाने का

ख्वाबो के सौ किले बनाकर

हकीकत में तोड़ते जाने का

जीवन का यही फलसफा है अपना

जीते जी मरते जाने का

 

रिश्ते नाते देख देखकर

जो भरोसा था भी हमको

वो सब भी उठ जाता है

तोड़ने हम रिश्ते सारे

जीने को अपने सहारे

आगे बढ़ते है एक कदम

फिर बाँध ले जाती है हमको

रिश्तो की ये बेड़ियाँ

खुद ही कूदता हूँ कुएं में

खुद ही झटपटाता हूँ

आँखे फोड़ के मन की फिरसे

मैं अँधा हो जाता हूँ.

 

घर में रेगिस्तान बसा है

मन में रेत सी भर चुकी है

जी रहा हूँ साँसे है पर

आत्मा तो मर चुकी है..

माँ का किचन

माँ
तुम्हारे किचन में
हींग की डिबिया  वैसी ही महकती होगी न
जैसे मेरे बचपन में महकती थी
कढ़ी बनाते -बनाते
बेसन की पीली  बिंदिया
माथे पर लग ही जाती होगी

सब्जी काटते वक़्त
तुम्हारे अँगूठे पर लगे
चाकू के सैकड़ो  निशान
तुम्हारे दर्द की कथा कहते  तो होंगे

सिलबट्टे पर पीसती हुई
पुदीने और अमिया की चटनी
चटकारे भरती  तो होगी
जुबान के किसी कोने में

आटा  गूँथते -गूँथते
तुम्हारी कमर पिराती तो होगी
और ममता की लोई
गोल रोटी के आकर में ढल जाती होगी
और तुम्हारे  स्वाभिमान की भाप से
फूलती भी होगी

अच्छा एक बात बताओ
अरहर की दाल में लगाये हुए
छौंके की लहर
आँगन में बैठी गौरैया की साँसों में
चुपचाप घुलती तो होगी
और तुम  आज भी कभी – कभी
दाल में नमक डालना
भूलती तो होगी

और वो बासमती चावल
भगोने में बुदबुदाते तो होंगे
और उनके पकने का किस्सा
खुशबु की शक्ल लेकर
पड़ोस वाली आंटी का दरवाजा
खटखटाता तो होगा

तुम्हारी डलिया में
गोभी ,गाजर , मूली, मैथी
लौकी , बैगन ,पालक
अपने -अपने खेतों से
बिछड़ने का दुःख
दिहाती  बोली में
गाते तो होंगे
बार -बार दोहराते तो होंगे

माँ ,तुम्हे पता है
वो कोने में रखा हुआ
धनिये का खिलखिलाता हुआ  गठ्ठर
आज भी तुमसे बहुत डरता होगा
कहीं तुम उसकी पत्ती -पत्ती
तोड़कर अलग न कर दो
यार ! परिवार से बिछड़ने का दुःख  तो
सबको होता है
वो फूल – पत्ती हो या फिर कोई इंसान

माँ ये मेरे और तुम्हारे बीच का
वो अतीत में डूबा हुआ संवाद है
जिसे दुनिया का कोई भी
इतिहासकार  शब्द नहीं दे सकता

इस अहसास को
तीन ही लोग बुन  सकते है
माँ
संतान
या फिर इन दोनों को
मिलाने वाला एक पुल
जिसे दुनिया
कवि कहती है

मुंबई में ये सब
याद आता है
फोन करना चाहता हूँ
पर कर नहीं पाता
कहता था न
निकल गया तो हाथ
नहीं आऊंगा
मैं परिंदा हूँ  परिंदा
आज डरता हूँ
अपने आँसुओ से
या शायद निर्मोही हूँ

देवेश तनय