विभाजन, हिंसा और साहित्य

  • सुकृति गुप्ता
  • एम.ए. हिस्ट्री

साहित्य ऐसे झूठ होते है जिनमें सच्चाई होती है और जब ये झूठ ऐतिहासिक पात्र बोलते है तो इन्हें पढना और भी ज़रूरी हो जाता है क्यूंकि कोई भी साहित्य शून्य में जन्म नहीं लेता. वह अपने इतिहास से प्रभावित होता है और अपने वर्तमान से भी, जो हमारा इतिहास बन चुका  है.

इतिहास अब राजाओ, शासनकालो और युद्धों का इतिहास नहीं रह गया है बल्कि ये मानवीय भावनाओ, उनके द्वारा झेली गयी त्रासदियों और अनुभवों का भी इतिहास है. इस सन्दर्भ में जब हम विभाजन और विभाजन के दौरान हुई त्रासदी की बात करते है तो इसके कई जवाब है- भारतीय जवाब, पाकिस्तानी जवाब, ब्रिटिश जवाब आदि. हर जवाब अपनी ही अलग विचारधारा से दिया गया है पर यदि हम उस दौर की त्रासदी को समझना चाहते है तो हमें उस दौर के साहित्य को देखना होगा क्यूंकि इतिहास जब अमानवीयता, द्वेष और हिंसा की बात करता है तो पीडितो की आवाज़ को सुनना ज़रूरी हो जाता है. हालाँकि यदि स्मृति के रूप में देखा जाए तो शायद वह आदर्श प्रतीत न हो पर हिंसा का अध्ययन किया जाता है तो सटीक स्मृति के बजाय कराहटें अधिक महत्त्वपूर्ण हो जाती है, जिनकी अभिव्यक्ति हमें साहित्य में  मिलती है.

इस सन्दर्भ में जब हम लोकप्रिय साहित्य पर गौर करते है उनमे उपमहाद्वीप के नेताओ के प्रति आक्रोश नज़र आता है तथा वे उनपर आरोप लगते है कि वे शक्ति के संतुलन संबंधी विवाद को सुलझा नहीं सके. वरिष्ठ पत्रकार अजीत भट्टाचार्यजी भी इसका उल्लेख करते है कि किस प्रकार विभाजन कठोरता से और जल्दबाजी से किया गया था कि ठीक से सीमा रेखा भी तय नहीं की जा सकी थी और न ही इसके लिए ठीक तरह से व्यवस्था की जा सकी थी. वे इस बात का उल्लेख करते है कि किस प्रकार तत्कालीन प्रधानमंत्री “वास्तविकता की गहराईयों” को छु नहीं सके थे और उनके इस भ्रम (self delusion) के सन्दर्भ में उन उक्तियों का उल्लेख करते है जो उन्होंने लियोनार्ड मोस्ले से १९६० में कही थी- “हम थके हुए आदमी है और हम में से बहुत कम ही है जो जेल जाना चाहते है और अगर हम  भारत की एकता के लिए खड़े होते है- तो हमें जेल जाना ही होगा. हमने पंजाब में लगी आग को देखा है, लोगों को मरते देखा है. विभाजन इससे बाहर निकलने का रास्ता था इसलिए हमने उसे अपनाया. हम उम्मीद करते है कि विभाजन अस्थायी होगा तथा पाकिस्तान को हमारे पास आने को बाध्य होना पड़ेगा.

विभाजन का इतिहास लोगों की जिंदगियों तथा उनके अनुभवों का इतिहास है. १९४० की घटनाओ को किस प्रकार उनकी पहचान से जोड़ दिया गया, उसका इतिहास है और अनिश्चितताओ जिन्होंने विभाजन को जन्म दिया या उसे थोपा, का इतिहास है. इस सन्दर्भ में मंटो प्रासंगिक प्रतीत होते है. वे अपने लेखन में विभाजन के दौरान हुए महाध्वंस की कहानियां कहते है. आलोक भल्ला विभाजन पर लिखी कहानियों को “सांप्रदायिक कहनियों” की संज्ञा देते है जिसके सन्दर्भ में वे कहते है कि इनमे पक्षपात है तथा ये दोनों और कि कहानियों को ठीक तरह से बयाँ नहीं करती.

वीना दास तथा आशीष नंदी का कहना है कि “विभाजन पर लिखा गया ज़्यादातर साहित्य अप्रमाणिक है क्यूंकि एक तरफ की हिंसा को दूसरी ओर से संतुलित करने का प्रयास किया गया है. और इसीलिए हिंसात्मक और अमानवीय  व्यवहारों के वर्णन में हमें समानता नज़र आती है, और फिर चाहे कोई ट्रेन लाहौर से आ रही हो या अमृतसर से, यदि एक वेश्या दो औरतो को पनाह देती है तो उनमे से एक हिन्दू और दूसरी मुस्लिम होगी.

पर मंटो इस सन्दर्भ में भिन्न प्रतीत होते है. उन्होंने खुद विभाजन का दर्द अनुभव किया था. वे कोई राजनीतिज्ञ नहीं थे तथा उन पर कोई विचारधारा हावी नहीं थी. उनकी मानवीयता किसी भी तरीके से धार्मिक लेबल को स्वीकार नही करती तथा क्रूरता तथा हिंसा को बर्दाश्त करने का विरोध करती है, जो उन्हें उनके समकालीनो से भिन्न बनाती है. जहाँ बाकि मर्द मार पीट कर रहे थे, औरतो की बेइज्ज़ती कर रहे थे, लोगों का खून कर रहे थे वहीँ मंटो अपने तंगी के दिनों में सस्ती वाली दारू पी रहे थे तथा इतनी दारु पीने के बाद भी  होश संभाले हुए थे.

वे एक स्वतंत्र विचारक थे जो उनके कथन से ज्ञात होता है- “ज़िन्दगी को वैसे ही दिखाना चाहिये जैसी वह है, न कि वो कैसी थी, कैसी होगी या कैसा होना चाहिए.” (Life ought to be presented as it is, not as it was or as it will be or should be) बम्बई शहर, जो उन्हें बेहद प्रिय था तथा जिससे वे बेहद प्यार करते थे, उन्हें छोड़ना पड़ा. वे मरते दम तक उसके लिए तरसते रहे. उन्हें विभाजन के बीज सिनेमा जैसे अधार्मिक क्षेत्र में भी नज़र आने लागे थे. उन्हें जब पता चलता है कि अशोक कुमार, जिनके साथ वो बॉम्बे टॉकीज में काम करते थे, को धमकी भरे पत्र (हेट मेल) मिल रहे है तथा उन पर आरोप लगाया जा रहा है कि वे कंपनी में मुस्लिमो को शामिल करने के लिए ज़िम्मेदार है, तो वे बहुत द्रवित होते है. उनका दिल टूट जाता है कि जो लोग उन्हें सआदत हसन मंटो की नज़र से देखते थे, उन्हें अब मुस्लिम की नज़र से देख रहे है. और इन सबसे तंग आकर वो पाकिस्तान चले जाते है जिसे वे जानते भी नहीं थे. उनकी इस टीस की अभिव्यक्ति हमें “टोबा  टेक सिंह” में मिलती है जिसमे अस्पतालों के अलावा बाकि बाहर की दुनिया पागल हुए जा रही है. उपमहाद्वीप के नेता इतने पागल हुए  जा रहे है कि वो पागलो की भी अदला बदली कर रहे है. ये पागल वो मुस्लिम है जिन्हें पाकिस्तान वापस लाया जा रहा है और जो गैर मुस्लिम है उन्हें भारत भेजा जा रहा है. इनमे अकेला बिशन सिंह जाने से इनकार कर देता है क्यूंकि वो पंजाब के एक छोटे से शहर टोबा  टेक सिंह में, जहां उसका जन्म हुआ था और उसके परिवार ने अपनी ज़िन्दगी जी थी, रहना चाहता था. वह न तो पाकिस्तान में और न ही भारत में बल्कि टोबा  टेक सिंह में रहना चाहता था. उनकी कहानी “मोज़ील ” धर्म के प्रभाव को उजागर करती है, साथ ही उसपर व्यंग्य भी करती है. मोज़ील का निर्वस्त्र बिना वजह मर जाना धार्मिकता को बिना वजह धारण करना है जो कि त्रिलोचन की पगंडी में निहित है. मोज़ील के इस कथन से इस बात की पुष्टि होती है जब वो कहती है “अपने इस धर्म को ले जाओ”.

टिटवाल का कुत्ता (The dog of Titwal) में भी लोगों को पागलपन तथा शक्ति और अधिकारीयों पर व्यंग्य करते है. ये बता पाना कठिन है कि कुत्ता एक देशभक्त की तरह मारा गया या उन्होंने अपने देश के कठोर, धार्मिक बेवकूफी को मारा है. ऐसा प्रतीत होता है कि वे हिंसा में मनोरंजन का आभास करने लगे है.

उनकी कहानी “खोल दो” हिंसा की सारी सीमाएं तोड़ देती है. वे बुरे या  दुष्टता के सन्दर्भ में धार्मिक समुदाय की विचारधारा का विरोध करते है तथा ये दिखाते है कि दुष्ट लोग किस प्रकार अपनी लालसाओ को पूरा करने के लिए ऐसी स्थितियों का फायदा उठाते है तथा आपके मज़हब के लोग ही आपको धोखा दे सकते है. वे दिखाते है कि हिंसा का कोई धर्म नहीं होता तथा ये अमानवीयता का परिणाम है. “आखिरी सलाम” (the last salute) बिना वजह लड़ने की कहानी है. सैनिक खुद नहीं जानते कि वे क्यूँ ऐसे देश के लिए लड़ रहे है जो उनके लिए अनजान है. वो खुद नहीं जानते ई उन्हें सच में कश्मीर चाहिए या नहीं.

मंटो को कश्मीर बेहद प्रिय था जिसका उल्लेख वो पंडित नेहरु को लिखे अपने पत्र में करते है. उनकी बहुत सी कहानियां जैसे “आखिरी सलाम” और “टिटवाल का कुत्ता” का कश्मीर पर केन्द्रित है. वे छोटी छोटी खुशियों के लिए तरसते जान पड़ते  है. उदाहरण के लिए वे पत्र में शिकायत करते है कि शायद यह बब्बुगोशा का मौसम है. मैंने यहाँ बहुत से गोश खाएं  है पर बब्बुगोशा खाए मुझे बहुत अरसा हो गया”. वे पत्र में  स्पष्ट तौर पर नेहरु जी से नाराजगी जताते है, कश्मीर और विभाजन के मुद्दे को लेकर पर साथ ही ये भी ज़ाहिर करते है कि वे कितने असहाय है. उदाहरण के लिए वे खुद को “डेढ़ सेर का पत्थर” (किसी ने उन्हें बताया था कि मंटो का अर्थ डेढ़ सेर का पत्थर होता है) तथा उन्हें “नदी” (नेहरु अर्थात नहर/नदी) कहकर संबोधित करते है. पर साथ ही वे यह भी कहते है कि यदि मैं डेढ़ सेर के पत्थर की जगह एक बड़ा पत्थर होता तो उस नदी में खुद को गिरा देता जिसे अपने बहने से रोक रहे है ताकि आप अपने इंजीनियरो की टीम के साथ इस पत्थर को हटाने के लिए बातचीत करने पर मजबूर हो जाए. वे उनके  कश्मीरी होने की दुहाई देते है. वे शिकायत करते है कि आप बड़े आदमी है, भारत जो कभी मेरा देश था, के शासक है आप पर आप ने कभी इस आदमी की फ़िक्र नहीं की. वे शिकायत करते है कि किस प्रकार भारत में प्रकाशक उनकी कहानियां बगैर उनकी मंज़ूरी के छाप रहे है वो भी अजीबो-गरीब नामो के साथ. किस प्रकार उनका मज़ाक उड़ाया रहा है. वे कहते है कि वे उन्हें अपने किताब की एक प्रति भेजेंगे जिससे कि नेहरु उनकी कहानियाँ पढ़े (जिन्होंने कभी उनकी कहानियाँ नहीं पढ़ी थी) तथा कहते है कि मुझे पूरा  विश्वास है कि आपको मेरी कहानियाँ पसंद नहीं आएँगी.

मंटो की प्रिय मित्र इस्मत चुगताई  कहती है कि ‘सियाह हाशिये’ की व्याख्या करते हुए मुहम्मद हसन अस्करी ने कहा है कि मंटो अन्यायी को अन्यायी की तरह नहीं देखते तथा उनकी कहानियों से प्रतीत होता है कि हिंसा करने  वाले पात्र ईश्वर द्वारा बनाये गए है. इस्मत चुगताई ये स्पष्ट करती है कि वे ऐसा नहीं सोचते. वो अन्याय को अन्याय कहने से डरेंगे क्यूँ? वे अन्याय करने वालों का विरोध करते है. वे कहती है कि मैं जानती हूँ कि मंटो ‘सियाह हाशिये’ लिखते वक़्त हँस नहीं रहे होंगे और न ही उन्होंने ये कहानियाँ हमें हँसाने के लिए लिखी है.

मंटो स्वयं अपने लेखन के सन्दर्भ में कहते है- “लम्बे अरसे से मैं देश के बंटवारे से उपजी उथल पुथल के नतीजो को स्वीकार करने से इनकार करता रहा. महसूस तो मैं अब भी वही करता हूँ पर मुझे लगता है कि आख़िरकार मैंने अपने आप पर तरस खाए या हताश हुए बगैर उस खौफनाक सच्चाई को मंज़ूर कर लिया. इस प्रक्रिया में मैंने इंसान के बनाये हुए लहू के इस समंदर से अनोखी आब वाले मोतियों को निकलने की  कोशिश की. मैंने इंसानों को मारने वाले इंसानों की एकचित धुन के बारे में लिखा, उनमे से कुछ के पछतावे के बारे में लिखा जो समझ नहीं पा रहे थे कि उनमे अब तक कुछ इंसानी जज्बे बाकि कैसे रह गए. इन तमाम और इनके अलावा और भी बहुत सी बाते मैंने अपनी किताब सियाह हाशिये में लिखी है’.

आलोक भल्ला मंटो के काल के बारे में बताते हुए मंटो की कहानियों के सन्दर्भ में कहते है- “ये कहानियां उस आदमी के द्वारा लिखी गयी है जो ये जानता था कि इस प्रकार की तबाही के बाद किसी भी तरह से माफ़ी तथा उसे भुलाया जाना जाना सम्भव नहीं है. जिन्होंने इस हत्याकांड को देखा था वे महज़ खड़े रहकर अपने मरने का इंतज़ार कर सकते थे. विभाजन ने नैतिकता को इस प्रकार मिटा दिया था कि कुछ भी वापस पाना तथा किसी भी प्रकार की उम्मीद करना संभव नहीं था. भाषा ने बहकाने का काम किया, और आम लोग क्रूर तथा खूनी बन गए, दहशत को दृढ़तापूर्वक देखा गया जिससे कि हम ये समझ सके कि किस प्रकार हम सभी इस बर्बर विश्व के निर्माण में भागीदार थे और अब हमें कुछ भी नहीं बचा सकता.

१९१५ में जन्मे भीष्म साहनी भी विभाजन की इस त्रासदी के गवाह थे. उन्होंने अपना बचपन ‘रावलपिंडी’ में बिताया था तथा इंटरमीडिएट तक की पढाई भी वहीँ से की थी. यह वो क्षेत्र था जो १८५७ के विद्रोह का गवाह भी रह चुका था, जहाँ अंग्रेजो का दबदबा था तथा पाश्चात्य संस्कृति की अच्छी झलक मिलती थी. उन्हें इन सबका अनुभव था जिसका प्रमाण उनके उपन्यास ‘तमस’ में भी स्पष्ट तौर पर देखने को मिलता है. कांग्रेस के स्थानीय अफसर यहाँ आते रहते थे तथा समाज सुधारक भी जिसका उल्लेख वो अपनी आत्मकथा में भी कारते है- “यहाँ पर कांग्रेस की जुलूस भी निकलते, गुरुद्वारे और आर्य समाज के के भी, मुहर्रम के ताजिये भी निकलते. गाहे बगाहे सांप्रदायिक तनाव भी होता, मगर लोग आम तौर पर बड़े स्नेह भाव से एक दूसरे के धर्म की मर्यादाओ की कद्र करते हुए रहते थे.

वे कांग्रेस की रिलीफ समिति में भी काम कर चुके थे, जैसा कि वे खुद इसका उल्लेख करते है- “देश के बंटवारे के समय जब सांप्रदायिक दंगे हुए तो मैं कांग्रेस की रिलीफ समिति में काम किया करता था और आंकड़े इकठ्ठा करता था कि वहाँ कितने मरे कितने घायल हुए, कितने घर जले आदि. तभी गाँव-गाँव घूमने और सांप्रदायिक दंगो के वीभत्स दृश्य देखने का अवसर मिला. “तमस” इस अनुभव पर आधारित है.

“तमस” साम्प्रदायिकता पर की जाने वाली राजनीति की कहानी है. यह दिखाती है कि किस प्रकार राजनितिज्ञ खुद ही इसके बीज बोते है और फिर खुद ही इसकी निंदा करने का स्वांग रचते है.

तमस की कहानी बस इतनी सी है कि एक म्युनिसिपल कमिटी का कारिन्दा और अंग्रेज़ सरकार का चमचा मुराद अली अंग्रेज़ सरकार के इशारे पर एक सीधे सादे चमार नाथू को ५ रूपए देकर उससे एक सूअर मरवाती है और उसे मस्जिद की सीढ़ियों पर फेंकवा देता है. इसकी प्रतिक्रिया में दूसरा वर्ग एक गाय की हत्या करवा देता है. इन दोनों घटनाओ की खबर ज्यों ज्यों फैलती है, विद्वेष की आग भड़कने लगती है और पूरे शहर में तनाव फ़ैल जाता है. नागरिको का शिष्टमंडल शांति स्थापित करने के उद्देश्य से अंग्रेज़ जिला कलेक्टर रिचर्ड से मिलता है और बिना किसी ठोस आश्वासन के लौट जाता है. जिला कांग्रेस समिति के सेक्रेटरी श्री बक्षी जी तथा कम्युनिस्ट नेता कामरेड शांति स्थापित करने में नाकामयाब रहते है तथा आसपास के गांवो में भी दंगे फ़ैल जाते है. इलाहिबक्ष, खानपुर, सैयदपुर आदि गांवों में लूट पाट और हत्याएं होती है. सिख और मुस्लिम दोनों मोर्चाबंदी करते है तथा इस मोर्चाबंदी में २०० वर्ष  पूमध्यकालीन जहनियत काम कर रही थी. तुर्कों के ज़ेहन में यहीं था कि अपने पुराने दुश्मन सिखो पर हमला बोल रहे है और सिखों के ज़ेहन में यही था कि वे भी अपने पुराने दुश्मन तुर्कों पर हमला बोल रहे है. पांचवे दिन अंग्रेज़ शांति कायम करने का प्रयास करते है. नगर में कर्फ्युं लगाया जाता है और एक ही दिन में पूरा माहौल बदल जाता है. जिसके इशारे पर ये तूफ़ान आया था, उसी इशारे पर सब तबाह करके गायब हो जाता है. इस तूफ़ान के बाद दृश्य बड़ा ही कारुणिक है तथा लोग जो शिकार हुए थे उनसे शरणार्थी कैंप भरे पड़े है. शांति कायम करने के लिए अंग्रेज़ कलेक्टर रिचर्ड की प्रेरणा से पंद्रह सदस्यों की अमन समिति बनायीं जाती है जिसमे ७ मुस्लमान, ५ हिन्दू और ३ सिख है. इस प्रकार जिसकी प्रेरणा से और जिसके द्वारा दंगे की शुरुआत हुई उसी की प्रेरणा से और उसके द्वारा ही दंगे का अंत भी हुआ. उनके उपन्यास को यदि ऐतिहासिक और सामाजिक सन्दर्भ में देखा जाए तो निम्न निष्कर्ष निकाले जा सकते है-

1- देश का विभाजन जिस सांप्रदायिक विद्वेष का परिणाम था उसके बीज ब्रिटिश कूटनीति ने बोये थे.

2- विभाजन के दौरान कांग्रेस के भीतर राष्ट्रीय एकता के प्रति गहरी निष्ठा का आभाव था. कांग्रेस स्वयं अनेक स्वार्थो की मिलन भूमि थी.

3- सांप्रदायिक दंगो में भाग लेने वालो की ज़हनियत मध्यकाल से जुडी हुई थी.

4- सदियों से साथ रहते गुए नगर और गाँव दोनों ही स्वरों पर हिन्दू और मुसलमानों की जीवन रेखा कुछ इस प्रकार घुल मिल गयी थी कि उनका चाहे कैसे भी विभाजन किया जाता वह कृत्रिम ही होता.

5- दंगो में हमेशा गरीब ही मारे जाते है. अमीर और प्रभावशाली लोग गरीबो के मूल्य पर अपना राजनीतिक खेल खेलते है और परस्पर एक दूसरे के हितो की रक्षा करते है.

6- शक्ति और पैसा बड़ी चीज़े है, वो मूल्यों को दबा सकते है, संस्कारो को तोड़ सकते है किन्तु मनुष्य की  जिजीविषा और भी बड़ी है. वो बड़ी से बड़ी विपत्ति झेलकर भी जीवित रहना चाहता है.

इस उपन्यास की एक महत्त्वपूर्ण बात ये है कि इस पूरे उपन्यास में वे प्रादेशिक कांग्रेस के सदस्यों पर व्यंग्य कसते रहते है तथा देशभक्ति और राष्ट्रीयता के संकीर्ण मापदंडो पर भी व्यंग्य करते है. उदाहरण के लिए कांग्रेस के शंकर जब दूसरे कांग्रेस सदस्य कोहली को अपना आजारबंद दिखाने को कहता है तथा उसके बारे में कहता है- “देख लीजिये साहिबान, नाडा रेशमी है. हाथ के कटे सूत का नहीं है. कांग्रेस रेशमी नाडा पहने? और आप उसे  प्रादेशिक सदस्य का उम्मीदवार बनाकर भेजेंगे? कांग्रेस का कोई उसूल है या नहीं?

जहां विभाजन पर ज़्यादातर साहित्य त्रासदी को बयाँ करता है वहीँ भीष्म साहनी द्वारा रचित “अमृतसर आ गया है” ये दर्शाता है कि कुछ क्षेत्रो में दंगे के बावजूद भी ज़िन्दगी में कोई अधिक परिवर्तन नहीं आया तथा लोग पहले की तरह हंसी मज़ाक करते है. उन्होंने ये दुनिया लाहौर से आने वाली ट्रेन में दिखाई है. पर ये भी रूढ़ छवियों से मुक्त नहीं है- (1) बाबू से पठान कहता है कि तुम दुबले पतले हो क्यूंकि तुम हमारी तरह मीट नहीं खाते. तुम हमारी तरह मीट खाकर तंदरुस्त हो जाओ या फिर महिलाओ के डब्बे में सफ़र करो, (2) सरदार पठान को समझाता है कि बाबू पठानों का भोजन नहीं लेता क्यूंकि वो अपने हाथ नहीं धोते अर्थात वे गंदे लोग है, (३) जब ट्रेन में ज़बरदस्ती लोग अन्दर घुसने की कोशिश करते है तो ट्रेन में बैठे लोग उन पर चिल्लाते है और पठान बदहवासी में एक महिला के पेट में लात मार देता है, (4) जब ट्रेन आग में झुलसते शहरो से होते हुए गुज़रती है तो लोग भयभीत हो जाते है, पर जैसे ही उन्हें ज्ञात होता है कि ये ‘वजीराबाद’ नामक मुस्लिम बहुल क्षेत्र था तो पठान का भय मर जाता है वहीँ सिखो और हिन्दुओ की चुप्पी गहरी हो जाती है, (5) वहीँ जब ट्रेन हरबंसपुरा और अमृतसर (हिन्दू-सिख बहुल क्षेत्र) पहुँचती है तो बाबू जो अब तक पठान की हर बेइज़्ज़ती झेल रहा था, चौड़ा हो जाता है तथा पठान पर धावा बोलता है- “ओ पठान के बच्चे! हिन्दू औरत को लात मारता है. हरामजादे

कमलेश्वर जो मंटो के प्रशंसक भी रहे है, उनकी कहानी “और कितने पाकिस्तान” पाकिस्तान बनने के असर को बयाँ करती है. वे पाकिस्तान को एक मुल्क नहीं बल्कि एक दुखद सच्चाई मानते है तथा इसलिए लेखक जहाँ कहीं जाता है उसे दृश्य दिखाई देते है, जिन्हें वह पाकिस्तान कहता है क्यूंकि वह उसे विध्वंस का कारण मानता है क्यूंकि ये “एहसास की रुकी हुई हवा है”. विध्वंस के चित्र इतने भयानक है कि वो अनुभव करता है कि वो मुस्लमान पर टूट पड़ना चाहता है और अपनी प्रेमिका को छीन लेना चाहता है जैसे कि वो कहता है- “उसी दिन से एक पाकिस्तान मेरे सीने में  शमशीर की तरह उतर गया था”

पाकिस्तान बनने का दर्द वह अपनी प्रेमिका सलीमा (जिसे वो प्यार से बन्नो कहता है क्यूंकि उसे सलीमा कहते डर लगता है) में भी महसूस करता है. उसके अन्दर का पाकिस्तान तब नज़र आता है जब वह अपने पति मुनीर को कोसती है “मुझे मालूम नहीं है क्या? जितनी बार बम्बई जाता है, खून बेचकर आता है. फिर रात भर पड़ा काँपता रहता है.

जब लेखक को ज्ञात होता है कि उसकी प्रेमिका वेश्या बन गयी है तो उसे समझ नहीं आता कि उसके साथ ऐसा क्यूँ होता है. बन्नो उसे टेढ़ी मुस्कराहट के साथ देखती है ख़ामोशी से व्यंग्य करती है तो उसके मुख से निकलता है- “पता नहीं ये बदला तुम मुझसे ले रही थी, मुनीर से या पाकिस्तान से?”

वह पाकिस्तान को और उसकी सच्चाई को हकीक़त मान चूका है- “अब तो फटा फटा आदमी ही सच लगता है. पूरे शरीर का आदमी देखकर दहशत होते है. विध्वंस के चिन्ह हर जगह दिखाई देते है जो आहत करते है- “अब कौन सा शहर है जिसे मैं छोड़कर भाग जाऊ. कहाँ कहाँ भागता फिरूँ जहां पकिस्तान न हो.

पाकिस्तान की यदि सच्चाई की बात की जाए तो वह अब भी नज़र आती है. नेहरु जिन्होंने विभाजन को अस्थायी बताया था वो स्थायी हो चूका है. इस सन्दर्भ में असगर वजाहत ने नाटक “जिस लाहौर जई देख्या ओ जम्याई नइ” का पाकिस्तान में मंचन न होने देना ये कहकर कि उसमे मौलवी की हत्या इस्लाम के विरुद्ध है तथा नाटककार भारतीय है, इसी का सूचक है. पर आख़िरकार जब नाटक होता है तो हाउसफुल रहता है वो भी कराची में वो भी इस तरह से  कि लोग पेड़ पर चढ़कर नाटक देख रहे थे. यह इस बात को इंगित करता है कि मानवीयता बड़ी बड़ी विपत्ति को झेलकर भी जीवित रहती है.

लगभग सभी विभाजन की कहानियों में महिलाओ को एक निश्चित रूप दे दिया गया है. दोनों ओर महिलाओ की स्थिति एक समान रूप से स्थिर कर दी गयी है. उसकी अपनी महत्वपूर्णता उस आदमी पर निर्भर करती है जिसकी वो औरत है या जिसने उसका उल्लंघन किया है या उन्हें प्रताड़ित किया है. और इस प्रकार इस सांप्रदायिक अस्पष्टता में वे प्रभावहीन सी जान पड़ती है. महिलाओ को शोषित करना, पुरुषो के लिए अपने विरोधी समुदाय को नीचा दिखने का माध्यम था, वहीँ कई पुरुषो के लिए ये स्थिति अपनी लालसाओ को पूरा करने का अच्छा अवसर था. इस सन्दर्भ में मंटो की कहानी “खोल दो” जिसमे ‘सकीना’ का दोनों ही समुदायों के पुरुषो द्वारा शोषण किया जाता है., इस बात को इंगित करता है कि हिंसा यहाँ महज़ सांप्रदायिक मुद्दा नहीं था बल्कि हिंसक पुरुषो के लिए एक अच्छा अवसर था तथा सम्प्रदायिकता ओढा आवरण मात्र था. महिलाएं उनके लिए इस लड़ाई में सुकून पाने का माध्यम थी. कहीं ये सुकून ‘अच्छा’ था तो कहीं ‘बुरा’ था. इस सन्दर्भ में तमस में भीष्म साहनी कहते है- “दुःख से छुटकारा पाने के लिए आदमी सबसे पहले औरत की तरफ मुड़ता है”. नाथू को जब अपनी गलती का एहसास होता है तो उसे अपनी पत्नी के पास जाने की इच्छा होती है. इस प्रकार की कहानियों में महिलाओ को निष्क्रिय दिखाया गया है तथा पुरुष ही उनकी नियति तय  करते है. पर “मोज़ील ” तथा “ठंडा गोश्त” में “कलवंत कौर” इस सन्दर्भ में कुछ अपवाद है.

मंटो अपनी कहानियों में प्रत्यक्ष तौर पर बोलते है और इसीलिए उनमे नाटकीयता नहीं है तथा उनकी नायिकाएं बिना अश्रु बहे सिसकियाँ लेती है. वो घृणा और द्वेष को झेलते-झेलते अपने दर्द के शून्य पद गयी है तथा अपनी हीन स्थिति का प्रदर्शन करते हुए समाज के पुरुषो पर व्यंग्य करती प्रतीत होती है. कमलेश्वर की कहानी “और कितने पाकिस्तान” की बन्नो भी ऐसी ही है. उसका अपने प्रेमी की ओर टेढ़ी मुस्कराहट के साथ देखना और पूछना “और कोई है” इसी का सूचक है. नायक अपनी ज़िन्दगी के तीन पडावो की बात करता है- “पहला, जब मुझे बन्नो मेहँदी की हवा लग गयी थी, दूसरा, जब मैंने तुम्हे पहली बार नंगा देखा था और तीसरा, जब तुमने कहा था “और कोई है”. चाहे मंटो की कहानियां हो या कमलेश्वर की कहनियाँ दोनों की कहानियों के पुरुष महज़ खूनी और बलात्कारी नहीं है. उनमे अब भी मानवीयता बाकी है. पर ये मानवीयता असहाय और कमज़ोर सी जान पड़ती है, जो स्त्रियों के शोषण और पतन का कारण जान पड़ती है. यह कमलेश्वर के “और कितने पाकिस्तान” और मंटो की कई कहानियों जैसे कि  The Woman in the Red Raincoat में स्पष्ट जाहिर होता है- “तुम दो औरतो के खूनी हो. एक मशहूर कलाकार थी और दूसरी वो जिसका जन्म तुम्हारे लिविंग रूम में मौजूद पहली औरत के शरीर से हुआ था जिसे तुमने उस रात अकेला छोड़ दिया था. (You are the murderer of two women. One who is known as a great artist & the other who was born from the body of the first woman in your living room that night & whom you alone know).

ज्ञानेंद्र पाण्डेय कहते है आलोचकों ने कि तीन प्रकार की हिंसा की बात की है-  (1) जो राज्य द्वारा की जाती है जैसे कि रूस, जर्मनी, साइबेरिया में हुआ, (2) एक दूसरे तरीके की हिंसा जहाँ राज्य पहले से भक्षक नहीं होता पर वो उसे रोक सकता था पर ऐसा नहीं करता. जैसे कि १९९२-९३ में विश्व हिन्दू परिषद् द्वारा बाबरी मस्जिद के विवाद पर की गयी हिंसा, (3)एक तीसरे तरह की हिंसा वह है जहाँ लोग खुद हिंसा से पीड़ित होते है और अपना मानसिक स्वास्थ्य खो देने के कारण एक दूसरे का खून करने लगते है. विभाजन को इसी प्रकार की हिंसा माना जाता है.

वे कहते है कि जावीद आलम का कहना है कि “इस तरह की हिंसा को हमें याद नहीं करना चाहिए जिससे कि लोग सामाजिक, राजनैतिक और व्यक्तिगत तौर पर सामान्य जिंदगी जी सके, शांतिपूर्ण तरीके से.

पण्डे इस तरह की धारणा को इतिहास के लिए हानिकारक बताते है तथा कहते है कि ऐसा प्रतीत होता है कि राष्ट्रवादी धारणा है जो ये तय करने की कोशिश करती है कि भारतीय इतिहास के लिए क्या उचित है और क्या अनुचित. पर वे हमें ये भी बताते है कि हाल ही मैं कई महत्त्वपूर्ण कार्य हुए है हिंसा पर जिनमे मुख्यतः ये समझने का प्रयास किया गया है कि हिंसा का दायरा कितना बड़ा है. वो समझने का प्रयास करते है-

१. क्रोधित पुरुषो की पीड़ा को,  २. १९४७ तथा उसके बाद महिलाओ तथा बच्चो की स्थिति को, ३. महिलाओ और बच्चो की सामुदायिक और राष्ट्रीय बानगियों को, ४. धर्म से अलगाव को किस प्रकार एक मात्र नागरिक पहचान के रूप में देखा जा सकता है, ५. राज्य के बेहया पितृसत्तावाद को. वे कहते है कि सभी रोज मर्रा की ज़िन्दगी का इतिहास पेश करती है- एक ऐसा इतिहास जिसमे राज्य और समाज दोनों फंसे है. इस सन्दर्भ में जब हम विभाजन पर लिखे साहित्य की बात करते है तो निष्कर्ष के तौर पर कहा जा सकता है कि “काल्पनिक लेखन की सबसे अच्छी बात यह है कि ये महज़ हिंसा की कहानियाँ ही बयान नहीं करती पर इस बात की भी जांच करती है कि क्या दहशत के बीच भी हममें कुछ नैतिकता बची थी”. (The best of the fiction writers about the partition are not concerned with merely telling stories of violence, but with making profoundly troubled inquiry about the survival of our moral being in the midst of horror). इसका उल्लेख आलोक भल्ला भी करते है और कई दफा उनकी अभिव्यक्तियाँ निजी प्रतीत होती है. उदाहरण के लिए “सहाय” (A tale of 1947) में  मुमताज़ का चरित्र तथा उसके द्वारा बॉम्बे छोड़कर पाकिस्तान का चरित्र तथा उसके द्वारा बॉम्बे छोड़कर पाकिस्तान जाना तथा उसके द्वारा अपने मित्र जुगल से प्रश्न करना कि क्या वो उसे मार सकता है? ये सब उनकी निजी जिंदगियों की पेश करते है. मंटो ने खुद ये सवाल अपने मित्र तथा अभिनेता  श्याम से किया था. इन कहानियों की एक महत्त्वपूर्ण बात ये है कि विभाजन के बाद भी लोग क्षेत्रीय सीमओं की फ़िक्र नहीं करते क्यूंकि वे सामजिक और सांस्कृतिक रूप से जुड़ चुके थे तथा क्षेत्रीय सीमओं के आधार पर यहाँ राष्ट्र-राज्य की कल्पना को विफल दिखाया गया है. उदाहरण के लिए “अमृतसर आ गया है” में ट्रेन के मुसाफिर क्षेत्रीय-सीमओं के बजाय सबसे पहले नेताओ की बात करते है. ये प्रश्न किया जाता है कि ‘पाकिस्तान’ बनने के बाद जिन्ना बॉम्बे में ही रहते रहेंगे या पाकिस्तान में रहेंगे? इस प्रकार मंटो की कहानियाँ तथा भीष्म साहनी का तमस दोनों ही इस बात को इंगित करते है कि हिन्दू और मुस्लिम, दोनों ही सांस्कृतिक रूप से इस प्रकार घुलमिल गए थे कि सीमओं के बल पर किसी के बल पर किसी भी प्रकार का कृत्रिम था तथा “माउंटबेटन प्लेन” के द्वारा जब इस प्रकार का असंवेदनशील निर्णय लिया जाता है तो वहां किसी भी प्रकार का  राष्ट्रवाद नज़र आता है. भारत के सन्दर्भ में तो बिलकुल नहीं! वे भारतीय स्थिति को समझे नहीं क्यूंकि उनके विश्व में सीमा रेखा के आधार पर राष्ट्रवाद की कल्पना की जा सकती है.

सन्दर्भ सूची

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Monto, Saadat Hasan, Pandit Manto’s First letter to Pandit Nehru.

Joshi, Shashi, the world of saadat Hasan manto, The Annual of Urdu Studies

Chughtai, Ismat, Communal Violence & literature

Hasan, Mushirul, Memories of Fragmented Nation: Rewriting the Histories of India’s Partion.

Panday, Gyanendra Remambering partition: Violence, Nationalism & History in India, By way of Introduction & ch-3, Cambridge University Press, 2001

Kumar, Sukrita Paul, Surfacing from Within Fallen Women in manto’s Fiction, The Annual of Urdu Studies

साहनी, भीष्म, राजकमल प्रकाशन

साहनी, भीष्म, अमृतसर  आ गया है

कमलेश्वर, और कितने पाकिस्तान, मुंबई, 1969

rekhta. Org

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Who was saadat Hasan Monto: A biography

वजाहत, असगर, जिस लाहौर नइ देख्या ओ जम्याई नइ, वाणी  प्रकाशन] 2006

http://www.columbia.edu/itc/mealac/pritchett/00urdu/tobateksingh/

Women through the prism of Religion part-2

-Priyanka Kaushik

Gender is undeniably one of the most important factors of any society. Not only gender molds socio-cultural relations, dictates terms of interaction of the sexes and exposes the underlying structures of patriarchy, it also provides an epistemology to understand different processes in different temporal-spatial zones and understand and help understand aspects of colonialism, nationalism, caste, religion etc with a new lens. Over the time, different scholars have worked on different aspects of gender and have tried to understand various phenomenon and challenge the existing notions through its gender analysis.

The question of gender is one of the most debatable concepts of our times. With the coming of gender consciousness gender constructs are no longer seen as inevitable ones and those are studies like one by “Kate millet” to suggest the relation between sex relations and power, as she says-“personal is political”. So we need to see these processes and layers of the gendered structures intertwined in such a way that a superficial imposed structure after a time looks inevitable and natural to us.

Gender is a field of huge contestation as this is a field where there is a lack of consensus among scholars over the meaning, nature and extent of gender distinctions. Thus the historiography of gender analysis is a complex and subjective discourse and need to be analyzed within a set of socio-economic context.

John W. Scott in her work “Gender: a useful category of historical analysis” analyzes the concepts of gender and proposing how a new understanding of gender influences our understanding of history.

but Scott’s understanding of gender also cast its effect on the discipline of history altogether. her theory revolves around knowledge, meanings and truths as constructive discourse, a structure, a way of “ordering the world” which is not strictly predecessor  to social organization. that’s why according to John Scott, the discipline of history produces knowledge generally about the past. feminist history, in that context, is not restricted to just an attempt to correct or supplement an incomplete record of the past but rather a critical understanding of history as a “site of production of knowledge of gender in general and knowledge in general”.

she also points out that as soon as historians will acknowledge the multivalent and constructed nature of society and knowledge, they will be forced to abandon single cause explanations for historical change. Power is central to Scott’s analysis, for she is interested in the notion of equality, and she argues that by studying gender relations, one can gain an understanding of (in)equality in general.

for this, she calls for us to alter our understanding of power: “we need to replace the notion that social power is unified, coherent and centralized with something like Michel Foucault’s concept of unequal relationships, discursively constituted in social “field of force”. so, power is not something that exists outside the social organization and is then wielded by persons. “The point of new historical investigation”,  Scott writes, is to disrupt the notion of fixity, to discover the nature of the debate or repression that leads to the appearance of timeless permanence. in this view, attention should not be given solely to people’s actions, but instead to the meaning that people (and their actions) acquire through social interaction. lastly Scott believes that the process of constructing gender relations can also be used to discuss class, race, ethnicity or any social process. so, it is indeed a “useful category of historical analysis”.

the question of gender is one of the most debatable concept of our times. with the coming of gender consciousness “gender constructs are no longer seen as inevitable ones” and there are studies, like by Kate Millet  to suggest the relation between sex relations and power, as she says- “personal is political”. in the context of India, religion is one of that dominant aspect through which gender relations are defined as well as justified. Most of the times, the nature of these religious texts are prescriptive and normative, but still as religion and religious texts enter into popular consciousness, they try to form crystallized categories. religious  symbols, iconography etc support the texts in building these difference. we are concerned here not just with religion per say but the gendered relations over the years and how religion plays a dominant role in the proceedings.

though the sati-pratha was abolished in the 19th century through legislation in 1829, there was a resurgence of the sati movement in 1980’s in Rajasthan. the basis of this movement was harking back to the glorious tradition of the “sati-mata” which was an antithesis to the wave of feminist movement in India at the same time.

Nevertheless, religious symbols are put to use in a very different way to justify a movement. another irony  lies in the fact that the most staunch supporters of the movement were women themselves. thus, it actually reveals the process of legitimizing and “sacralizing” the institution and the rhetoric to create an illusion of a glorious tradition. thus, religious tradition could themselves then be used as a text to study the dynamics of gender and the process of legitimization through religion.

As Michel Foucault points out- church, educational institutions and hospitals were three spheres of “discursive discourse” of sexuality through which the domain of sexuality which was repressed in the sphere and locus of “legitimate sexuality” was able to manifest itself without harking to the “illegitimate” sphere of sexuality. power structure has an indelible presence in the realm of gender relations but whether the relations are always hierarchical or sometimes the relation is rhizomatic as well,, whether the power structure is has an overarching presence or it emanated from different nodes of interaction. in that sense, religion may prove very useful in not only studying these interactions of power structures of  gender, but how the process of signification in the rhetoric of gender, becomes an enigma that creates an illusion of a hidden meaning that have to be prized out through a commentary (as in different interpretations of religious texts) and which sometimes create meanings which doesn’t exist in the first place. through deconstructing the structure we have to analyze the women’s sphere through the prism of religion, and similarly through the prism of history.

.  WOMEN THROUGH THE PRISM OF RELIGION

खलनायक….

कभी कभी पौराणिक या फंतासी कार्यक्रम देखते हुए बड़ी हंसी भी आती है और दुःख भी होता है. हंसी उन निर्माता-निर्देशकों की सोच पर आती है और दुःख उसके सांस्कृतिक प्रभाव पर. कभी गौर से कोई फिल्म, धारावाहिक या पौराणिक कार्यक्रम देखिये, कमोबेश हमारे सारे खलनायक एक ही ढर्रे पर नज़र आते है- अजीबो-गरीब वस्त्र, बड़े भारी थुलथुले शरीर, बड़ी बड़ी मूंछे, पौराणिक कार्यक्रम है तो सींग और दांत भी, पर साथ में “काला रंग”!! पर क्यूँ हमारे खलनायक अक्सर इतने अजीब से इतने अलग क्यूँ दिखते है. और काला रंग क्यूँ पाप और आसुरी प्रवृत्ति का प्रतीक माना जाता है. क्या हमारे खलनायक वाकई खलनायक है या इसका भी गहरा मनोविज्ञान है, समाजशास्त्र है, इतिहास है.

 

हमारे नायको को देखिये- अक्सर सफाचट चेहरा, गोरा रंग, कसा हुआ शरीर इनकी पहचान है. तो क्या नायको को खलनायको से अलग करने हेतु ये अंतर बनाये गए.पर क्यूँ हमारे खलनायक हम जैसे नहीं दिखते? क्या हम ये मानकर बैठे है कि पापी लोगों की एक अलग प्रजाति होती है (असुर, राक्षस, दानव और जाने क्या क्या नाम दिए गए है इनको) या शायद हम डरते है ये मानने से कि गुण-दोष, अच्छा-बुरा, पाप-पुण्य सब इंसानी फितरत का एक हिस्सा है और कोई इससे अछूता नहीं है, हम भी नहीं. कोई इन्सान अपने आप को पापी या खलनायक नहीं मानना चाहता शायद इसीलिए जिस क्षण हम खुद को नायक समझने लगते है उसी क्षण हम एक खलनायक की तलाश में भी लग जाते है, क्यूंकि खलनायक की तलाश से ही हमारा नायकत्व साबित हो सकता है. फिर चाहे वो धार्मिक प्रतिद्वंदी हो, निजी शत्रु, समाज से बहिष्कृत लोग हो, सांस्कृतिक रूप से अनजान लोग सबमें खलनायक बन जाने की संभावनाएं दिखती है. हर कोई खलनायक हो सकता है हमारी नज़र में, बस हमारे अलावा.

कितना विरोधाभास है न, मूँछों को मर्दानगी का प्रतीक माना जाता है और इसे असुरो के साथ बड़ी प्रमुखता से जोड़ा जाता है. मूंछो दाढ़ियों से युक्त नायक विरले ही दिखते है. और उससे भी विरले है काले नायक क्यूंकि कुछ भी कहो हम से बड़ा रंगभेदी  ढूंढना मुश्किल है, और विशेषकर तब जब हमारी संस्कृति और सभ्यता की परिभाषा उत्तर भारतीय परिवेश में अवस्थित हो, जब हम श्वेत रंग को प्रतिष्ठा  व काले को कुंठा का प्रतीक मानते हो तब जब सौंदर्य प्रसाधन की सामग्रियां गोरा होने को सुन्दर होना मानता हो, ऐसे समाज में ये बिलकुल विश्वसनीय है कि हमारे खलनायक काले होते है, और जाने अनजाने हम इन छवियो को आत्मसात कर लेते है, और ये छवियाँ अखरना बंद हो जाती है, ये अन्याय क्लेश नहीं पहुंचाता, न इसका झूठ कचोटता है. हम अपने आप को नायक मानने के फेर में इतना उलझ गए है कि ये भी भूल गए है कि हम किन लोगों को खलनायक बना रहे है. हम जिन लोगों पर हंस रहे है, क्या वो वास्तव में हंसने लायक है, हम जिनकी हार पर तालियाँ बजा रहे है हम उन्हें वास्तव में हारता हुआ क्यूँ देखना चाहते है.

हमारे खलनायक कितने भी मानवीय क्यूँ न हो यदि हम उन्हें खलनायक साबित कर सकते है और उनके तरफ की कहानी को दबाये रख सकते है तो वो खलनायक है. फिल्मो में कथाओ में विरले ही खलनायक के परिपेक्ष्य को, उसकी कहानी को महत्व दिया जाता है क्यूंकि एक डर है सांत्वना का. ये वही सांत्वना है जो किसी को नायक बनाती है. किसी भावुक पृष्ठभूमि का होना उसके किये सौ अन्यायों, हत्याओ, पापो पर मिटटी दाल देता है, और इसी का अभाव आवश्यक है किसी का खलनायक बने रहने को. कौरवो के पक्ष से महाभारत कही जाती तो क्या ऐसी ही होती जैसी ये वास्तव में है, शायद नहीं. इंसान को बांटने का अमोघ सिद्धांत यही है– “जिसे ऊपर उठाना हो उसे आवाज़ दे दो, और जिसे नीचे गिराना हो उसकी आवाज़ छीन लो”. और यहीं तो हमारे इतिहास में भी होता रहा है. युगों युगों से कुछ लोग इतिहास की परिधि के बाहर रखे जाते रहे और बाहर रखे जाते है भी. ऐसे लोगों को असभ्य, क्रूर, अमानवीय दिखाना बड़ा सरल है. ताड़का, हिडिम्बा जैसी राक्षसी और अनेकानेक असुर जो हमारे ग्रंथो में चित्रित है, या तो हमारे नायको द्वारा मारे जाते है अथवा ‘सभ्य’ बना दिए जाते है. कभी दिखाना हमारे साहित्य व चित्रपट में वन में रहने वाले लोगों को किस प्रकार चित्रित किया जाता है. कभी कभी तो इनकी दुष्टता और इन समाजो के प्रति इनकी कमज़ोर व भ्रांतिपूर्ण समझ में क्रोध आता है. क्यूंकि इन्हें अपने ‘सभ्य’ समाज से बाहर दिखाना, अपने से अलग दिखाना बहुत सरल है इसलिए वो लोग, जो अक्सर इतिहास के पन्नो में दर्ज नहीं होते उन्हें असभ्य बताकर और खलनायक बनाकर और अधिक शोषित करने का मूलमंत्र है हमारे पास.

राक्षस जोर जोर से अट्टाहास कर रहा है, सब खलनायक जोर जोर से हँस रहे है, वो हँस रहे है हमारे झूठे नायकत्व पर, हमारी सभ्यता के दम्ब पर, हमारी गैर ऐतिहासिकता, हमारी धर्मान्धता, हमारी मनोवैज्ञानिक हीनभावना पर, क्यूंकि ज़्यादातर खलनायक हमारे दिमाग में उपजते है, क्यूंकि हमें डर लगता है आईने में अपनी क्रूरता का प्रतिबिम्ब देखने में, इसलिए सदियों से कोई और ही खलनायक बनके हमारे नायकत्व के ढोंग का भार ढो रहा है. जो मेरे धर्म का नहीं, मेरी जाति का नहीं, मेरे परिवार का नहीं, मेरे व्यवहार का नहीं, मेरी संस्कृति का नहीं, मेरी अनुभूति का नहीं, वो खड़ा है कोने में खलनायक बनकर. खलनायक हँस रहे है मुंह फाड़ कर और हँसी के पत्र हम है…..  

 

History student in an ahistoric world

-SANTOSH KUMAR

Being a history student is not an easy task. You are questioned for choosing humanities after 10th (not all history students come from humanities background but many do) by your friends, relatives and even your own parents. By the time of your graduation you have a brilliant response for your defense-“I am preparing for UPSC!” but this article is not meant to elucidate the struggles of studying history but rather the struggles of a history student when he or she faces the world whose ideology and vision of historic seems to be Ahistorical. The struggle to deal with the historical myopia of the society and the struggle to convince yourself that you are doing nothing wrong in challenging those rigid traditions- religious, patriarchal, societal, cultural which are so imbibed in our day to day living that they seems to be eternal and inevitable unless we realize that these notions are in itself Ahistorical.

For most people history is nothing more than “bunch of facts”. It is easier to demarcate, categorize and classify than to critically analyze, introspect and be subjective. So people will expect from you to churn out facts, dates, events and it will be an arduous task to explain the developments in the study of history and how history is no longer a narrative of kings and battles. People get disappointed when they expect facts from us and we deliver theories. But this is not a simple individual problem, but rather I am pointing out to a grave social problem- conflicting ideologies, which see history just as a tool to justify and further their ideological claims. A history student even though steers away from generalizations, judgmental, objective facts and clear demarcation of categories, every word you speak is seen as a representation of some or other ideology (and mostly people believe in two extremes- right wing and left wing). So if you questioned the notion of “Akhand Bharat” or Gupta age as a “golden period”, you will be deemed a communist and vice-versa. Every day when I have discussions on history with people, I am met with sentences like- “are you a communist?”, “do you support the JNU row?”, and I have to remind myself and the person that it has hardly anything to do with our discussion. When people insist to categorize me in any of their pre-decided categories I have to offer them new categories like “post-structuralist” or “post-modernist” (I don’t claim to be a exponent of any of these categories) and a very amusing response I got was- “I can’t even pronounce it, how am I supposed to believe in it!?”  We live in a world where people believe history to be Ahistorical. So the whole ancient period (many people think it being equivalent to Hindu period) is a glorious period which turned into rubble with the onslaught of invaders (predominantly Muslim). In short, people envisage history as long periods of changelessness and vice-versa, sudden and phenomenal changes. People who have just heard the names of big historians like Romila Thapar, R.S. Sharma criticize them rather uncritically for writing incorrect history (what they actually mean is that views of these historians doesn’t fit with our understanding of history).

They want to demarcate good history from bad history, and heroes from villains. They just don’t want history; they need sociological categories with a peppering of facts and figures. And this ahistoricity is maintained consistently in defining culture, institutions, and people. So Nation is Ahistorical, origin of Indian culture is untraceable, mythology holds truth here, and any attempt to explain otherwise is met with contempt. Deep inside, there is a lack of appreciation of historical knowledge. Every person thinks he knows history, and history is no special knowledge, but ironically, most people and even the ruling regime try to alter history according to their own vision and reuirements. History becomes a tool of commemoration, something people can take pride in, driven by political exegesis, expressed in a language that is in most parts rhetorical and pragmatic to the extent of being adamant.

A history student is grieved when we see such disregard for history. When we give new names to places to suit our historical understanding, and in the process manipulate history. When we decide to commemorate a particular version of history which glorifies one strata of society over other, it shows our attitude towards history. History student scorns at the absurdity of historical shows which are not only factually inaccurate (this is the least thing we expect from them), but also manipulative, communal and provocative. And we hate when we have to clear the web for people who don’t see any difference between history and mythology. So people will ask you questions on historicity of Ramayana and Mahabharata and here lies the biggest misery of a history student, because most people are very sensitive to religious issues and any explanation, no matter how historically well placed may offend their feelings. Secondly, when people ask you question related to religion, they are actually testing you (and later blame your response to your English medium education and neglect of Indian culture) or they have pre-conceived notions about the issue and what they want is an affirmation of their viewpoints, and unfortunately this is one thing that our historical mind is unable to churn out. Forget strangers, distant friends, or relatives you can’t convince your own parents that you are talking out of historical curiosity and not vengeance against religion and nation (we are not anti-nationals, we are not iconoclasts of religion, and we are just students of history). People will give us snippets on the evidence of Ramayana and Mahabharata, or the greatness of their religion or civilization; you are left with only two options- either keep on debating, posing arguments and counter arguments with no avail, or to face palm and nod in affirmation. People hate historical insights in religion, so they would question the authenticity of history (what is history capable of? History is speculative or history is imperfect, you will never be able to solve the mystery of our culture no matter how much you try, you are product of orientalist education, these are all some jibes thrown to us).

Forget deconstruction of language, culture, traditions, people are not yet comfortable to go beyond the elitist paradigm of history, beyond the political contours which could be memorized in fingers, and because you can’t explain them in your language, you have to explain them in their language, but even this process seem futile, for people perceive history as chronology and account of kings and queens. How ironical is the condition where people are unwilling to know about their own existence because their mind is laden with accounts of a class unrelated to their past or present. They are better off either lamenting the loss of an elitist cultural glory or creating modern discourse out of an objective demarcation of categories of oppressor and oppressed. The world is not ahistoric, but the way we identify history, we have made our own existence Ahistorical. And by perceiving history as dead and buried past, we are making our present seem Ahistorical. Walking down the lanes, a history student see the changing histories- every moment of our existence that is part of history, he see the new history books of the new regime, the new nomenclatures for place, new commemoration, he is seeing history being changed every minute everywhere, but deep somewhere in the lanes of history, there is a tunnel where all changes are sucked by the darkness of mind, and all that is left is a stagnant world with a history that is so Ahistorical.

 

RĀMĀYANA TRADITION IN UTTRAKHAND: COMPARATIVE ANALYSIS OF KUMAUNI AND GARHWALI RĀMĀYANA

-SANTOSH KUMAR

M.A. HISTORY (F)

Ramayana is a very dynamic text. It exists in different cultures, in different forms, echoing different social ethos. Every tale has vivid descriptions of why and under which conditions a particular story or text has been written and these texts are responsive and reflexive to different telling of the story and within the same text, there is an element of self reflection[1]. Thus every tale though being placed at temporally and spatially a mythic time and space, the dynamics they reflect are very contemporary one.  I wish to do here, is to compare and contrast two local versions of Ramayana, originated in the regions of Garhwal and Kumaun in the state of Uttrakhand. Here, we must mention that there is nothing called an ‘original text’ and every so called “versions” of a text is in fact an entity in itself. So here we will study these local telling of Ramayana avoiding references to the “Vālmīki Ramayana” and treat them as primary texts.

 

There are a lot of similarities in the term of structure, folk elements and the content in both the Ramayanas.  But still there are some differences that we need to consider. The Kumauni Rāmāyana is a written text, but retains a lot of folk elements which makes it apt for recitation and performance. There are attempts to homogenize the text by introducing some literary devices into the text that are not found in the Garhwali Ramayana which remains a folk performative theatrical rendition of Ramayana even though printed versions of the Garhwali Rāmlīlā is available in Uttrakhand. The story in Kumauni Ramayana is narrated by luv-kush, sons of Rama whereas there is no narrator in the Garhwali Ramayana. While Kumauni Ramayana is written in Kumauni dialect, the Garhwali Ramayana is actually performed in Hindi and is known as Garhwali Ramayana because it is performed in the Garhwal region.

Here in my analysis, I will focus on two aspects of these texts. Firstly, a similarity found in both these texts and which is valid for many such texts- though the narrative is placed at a distant locus of time and space, almost immemorial and fictitious time and space, the ethos and values these telling represent are both contemporary in their feel and rooted in local traditions spatially. Secondly, we will try to understand the difference one finds in a text when it is undergoing a transition from oral telling to be put into writing. The whole argument about orality and textuality becomes very important here because we will see that the Kumauni Ramayana tries to develop itself into a literary text, while retaining the folk elements it possesses. Thus we can place the Kumauni Rāmāyana in a period of transition, from folk to literary written version. This transition has its own dynamics, while on one written text acquires a form which is accessible to a wider audience as well as provide homogeneity to the structure of the text (though there is a whole debate on the fluidity of the oral and written sources, we do find changes in the way both these texts come to us). On other hand, this transition also restricts the “inter-textuality” of the text[2]. It reduces the borrowings of textual material from other sources, in a way, that is possible for folk versions. Written sources also acquire a distinct style, language and even content that differentiates it with the locally rooted (in this context, the Garhwali Rāmāyana) telling. My analysis is based on comparison of two sources- one written version with elements of folk traditions, i.e. Kumauni Rāmāyana and an oral, folk, performative Garhwali Rāmāyana. This analysis and observations are text specific and may not apply to all such textual sources.

First, talking about the similarities, as said earlier, both the versions have certain folk elements, which give it a communal and performative aspect to the telling. So both the texts are composed in a mixed prose-verse style,  where verse have diverse functions to play- firstly, it acts as a narrative thread, and helps in effective narration of the story; secondly certain elements that can’t be performed are expressed through verses; thirdly, in terms of communal activity, these verses act as the medium through which a text is remembered through community singing and recitation of verses and fourthly, these verses represents the formulaic elements we find in the folk telling[3] (not necessarily all oral versions). But even here, we find certain differences in the approaches in the Garhwali and Kumauni Rāmāyana, as in the Kumauni Rāmāyana these verses are known as “hudki”, is used for either- for narration of the scene and the details of plots and character, or for expressing the inner psyche of the character- emotions, grieves etc. expressed through verses. On the other hand, the Garhwali Rāmāyana, apart from introducing the narrative and the scene, also use these verses to introduce characters, something that is, not found in the Kumauni telling. The reason for this difference can be ascribed to two factors- the performative aspect of Garhwali Ramayana pertaining to the Rāmlīlā tradition and secondly, the way the Kumauni Rāmāyana has been edited by its compilers/authors. Fancy introductions in the Rāmlīlā enhance the dramatic value of the performance. Also, there is a living tradition of mockery in parts of Uttrakhand, where people are mocked upon in festivals, occasions etc. for their extravagance, dressing styles, food habits etc. in good humor and that practices get reflected in their folk culture as well. The reason why this is not found in the Kumauni Rāmāyana can be seen in the introduction of the Kumauni Rāmāyana- “normally, in Rāmlīlā we find a tendency to mock kings etc for their dressing etc. but such ‘obscenities’ are not to be found here”. This also leads to our second point, that is, how a text is edited and acquires an all new meanings with the additions and deductions of the text.

So Kumauni Rāmāyana, which has some folk elements and which has been derived from folk versions of the Rāmāyana in Kumaun, is compiled not in Uttrakhand but rather in Delhi. Now, when a folk telling is edited to suit the aesthetics of a literary class, it acquires new language, new idioms and new representations. Two simultaneous and mutually contradictory activities are reflected in the Kumauni Rāmāyana. On one side, there has been attempt to reinforce the “pahari” identity and culture through the text and at the same time there has been a thorough editing and interpolations. Editor/compiler of the work attributed to Kundan Singh Manral ‘Pahadi’, himself was not just a passive compiler of the text but also had to make sense of the text in a particular context. The use of language is very significant here. The text is written in Kumauni dialect written in Devanagari script. Though there are attempts to use literary elements into the texts, the expressions used are not literary but more localized expressions and idioms. But conversely, there are some portions in the Kumauni Rāmāyana that seem to make the text a bit esoteric by introducing metaphysics and Upanişadic philosophy in the text perhaps targeting the urban literate class of Kumauni community and individuals in Delhi and in other regions as well, something that is not found in Garhwali Rāmāyana. So the “unsophisticated” material is edited out and new “sophisticated” material is infused in the text. Conversely, in the Garhwali Rāmāyana, there is hardly any metaphysical portion. So a very complicated question asked in this context- is there anything like the “original text” where every retelling of a narrative has its own variants. And can we identify any author of the text. If anyone interpolates and re-interpret the text, will he be considered an author, editor or compiler etc?[4] The transition from folk to literary version not only enhances but sometimes also restricts a text. While the Garhwali Rāmāyana borrows and takes inspiration from various sources from Rāmacharitmānas to even movie songs on some occasions, the nature of the Kumauni Rāmāyana restricts it from using any uncited, unacknowledged references from other sources.

Finally on the question of differences, as said earlier, though telling tale of a time immemorial, gives ethos of the contemporary times it is rooted in. both the text introduce many changes to the text, without altering the main story making the narrative more closer to the culture of the mountains. Apart from the changes in the narrative even the imageries reflected in the text gives you a peek at the culture and lives of the hilly regions. You can’t actually alter the story radically, what is altered are the motivations of the character, and the material culture reflected and additional conversations are added to express the local interpretation and emotions of the text. So, in Garhwali Rāmāyana, the character of Bāņāsur is introduced, who has a very interesting conversation with Rāvaņa during Sīta’s svayamvar where both try to outclass each other, thus exposing Rāvaņa’s weaknesses and ego. Kumauni Rāmāyana humanizes the villainous character of Manthara, by introducing Sumanta as the person responsible for provoking her, who then provoked Kakeyi to ask for boons. But apart from the new changes, there were minor touches in both the texts,   which reflect the “pahari” culture even within the framework of Rāmāyana tradition. So in the Kumauni Rāmāyana, the places Rāma visits during the years of exile have been placed in their local regions, and the folk they meet during their visits are introduced as “ghasyaris” (women grass cutters in Uttrakhand) thus localizing the narrative. In the Garhwali Rāmāyana, there are mentions of local products like beet-root, sweet potatoes, pumpkins (associated with the kings, thus localizing the royal culture), tobacco etc. within the framework of the narrative. There is a very significant scene in the Garhwali Rāmāyana, where Kevat the boatman, sings a song craving for tobacco.  We have already discussed that even movie songs were incorporated within the text perhaps it fit the situation, also because it was more easily relatable and it helps to make the text rooted in the local culture.

In conclusion, we may point out that different telling of Rāmāyana, apart from being part of a larger narrative tradition can also be seen as standalone texts on their own. This telling reflect their own dynamics, social pattern and cultural peculiarities and are placed in those local traditions as much they are linked to the larger tradition. Also, there has always been a debate related to orality and written sources, but here we must emphasize, that the relation between the two, though sometimes a bit uneasy is far from dichotomous. Both assimilate, overlap and influence each other. And written sources don’t indicate the end of the tradition in oral sphere, though this is also true, that when a folk tradition is written down, it just not indicate change of medium, but also language, audience, context and thus sometimes even content.  Thus here the narratives become part of both visual and oral archives.  . None of these sources are static but prevalent in textual and performative form in various places, even outside Uttrakhand in Delhi, Ghaziabad etc.  In this case texts themselves become an archive itself which needs to be critically analyzed like folklore because they try to construct meaning beyond the cultural context in which the folklore was actually constructed

 

Bibliography

  1. Pahadi, kundan singh manral- “Kumauni Rāmāyana”; New Delhi; Takshshila Prakashan; 2007
  2. Dharwadker, Vinay (ed.) – “The collected essays of A.K. Ramanujan”; New Delhi; oxford university press 1999
  3. Singh, Dhananjay- “Fables in the Indian narrative tradition”; New Delhi; D.K. print world pvt.ltd.

2011

  1. Bharucha, Rustom-“Rajasthan: an oral epic”; New Delhi; Penguin Books; 2003
  2. Ong, Walter J. – “Orality and Literacy”; London and New York; Methuen; 1982
  3. Lord, Albert B.- “Characteristics of Orality” inA Festschrift for Walter J. Ong, S.J., a special issue ofOral Tradition, vol. 2, no. 1 (1987), pp. 54–72.

 

 

 

 

 

 

[1] A.k. Ramanujan- “collected essays of A.K. Ramanujan” (1999), pp.7-8

[2] Roland Barthes, Julia Kristeva etc. worked on the inter-textuality of a text meaning no text is autonomous in itself but produced from other texts. See Dhananjay Singh, “fables in the Indian narrative” (2006), pp.164

[3] Use of formulas is one of the characteristics of father Ong’s description of “oral epics” though I have expanded the definition to include not just oral but different folk tales as well (written or unwritten). See Walter J. Ong- “Orality and Literacy: Technologizing of the Word” (1982)  and Albert B. Lord “Oral Traditions” (1987)

[4] Linguists like Roland Barthes questions the very assumption of an author as every text derives something from its predecessors, so there is neither original text nor any author. Rustam bharucha also asks this question that who is the author- the one who narrates the story or the one who compiles them. See, Roland Barthes in Dhananjay Singh’s “fables in the Indian narrative” (2006), pp. 164-66 and Rustam bharucha and Komal Kothari, “Rajasthan: an oral epic”

धर्मशास्त्र में नारी: याज्ञवल्क्य स्मृति में नारी की स्थिति का विश्लेषणात्मक अध्ययन

-SANTOSH KUMAR

M.A. HISTORY (FINAL YEAR)

 

 प्राचीन भारत का लैंगिक इतिहास बहसों, विवादों, व परस्पर विरोधाभासी व्याख्याओ से परिपूर्ण है. इस इतिहास से कोई एक निष्कर्ष निकालना इसकी बहुतायता व विविधता को दरकिनार करना होगा. अतएव हमारा उद्देश्य स्त्रोतों का अध्ययन करते हुए, उसकी सीमओं व अन्य संभावनाओ के विषय में भी चिंतन करना आवश्यक है. प्राचीन भारत में विभिन्न प्रकार के ग्रंथो, साहित्यों, काव्यो आदि की प्रचुरता है परन्तु उसे ऐतिहासिक परिपेक्ष्य में लाने की अपनी समस्याएं है जिन्हें शिरोधार्य करना आवश्यक है. धर्मशास्त्र ऐसे ही ग्रंथो का एक विशाल समूह जो अपने भीतर कई विरोधाभास, व्याख्याएं व समस्याएं लेकर बैठा है. साथ ही हमें रचना के काल क्रम व सामाजिक आर्थिक राजनैतिक सांस्कृतिक व वैचारिक पृष्ठभूमि का भी अध्ययन करना आवश्यक है. और साथ ही मूल ग्रन्थ के साथ उनपर लिखे भाष्य, टीकाओ का अध्ययन करना भी आवश्यक है और जैसा कि कुमकुम रॉय कहती है- भाष्य व टीकाओ के माध्यम से एक सार्वभौमिक, शाश्वत व स्थायी समझे जाने वाले ग्रंथो में भी मतभेद, व्याख्याओ व परिवर्तनों की जगह बनायीं जाती है[1]. एक और बात जो हमें ध्यान में रखने की आवश्यकता है वो ये है कि कोई भी रचना या ग्रन्थ एकांत में जन्म नहीं लेता, वो कुछ गुण अपने पूर्ववर्ती रचनाओ से उद्धृत करता है, एक लेखक की रचना के कई उसकी व्यक्तिगत पृष्ठभूमि, व सामाजिक स्थितियों पर निर्भर करती है. अतएव ये आवश्यक है कि हम रचना के कालक्रमों व लेखको की सामजिक पृष्ठभूमि का संज्ञान अवश्य ले. व किसी भी ग्रन्थ का तुलनात्मक अध्ययन करके विभिन्न ग्रंथो में आये अन्तरो को समझने का प्रयास करे.

भारतीय धर्मशास्त्रो पर जो अधिकतर काम हुआ है, उसका केंद्र बिंदु “मनुस्मृति” रहा है. १९वि सदी से ही, कानूनी व धार्मिक प्रयोजनों में मनुस्मृति का अधिकाधिक प्रयोग हुआ है. ये एक लोकमान्य भ्रान्ति है कि मनुस्मृति एकमात्र प्रभुत्वशाली धर्मशास्त्र है. आज भी अन्य स्मृति ग्रंथो के अध्ययन हेतु आलोचनात्मक व समीक्षात्मक अध्ययनों के तुलनात्मक अध्ययन का अभाव है. तथापि याज्ञवालाक्यस्मृति की पारंपरिक ख्याति के अलावा इसकी टीका “मिताक्षरा” का भी समकालीन विश्व में महत्त्वपूर्ण योगदान है, विशेषकर आधुनिक भारतीय न्याय संहिता में. अतएव इन ग्रंथो का विश्लेषण करना अतीव आवश्यक बन जाता है जिससे हम न केवल प्राचीन भारतीय समाज में नारी के विषय में निहित अवधारणाओ, चिन्ताओ आदि का ज्ञान होता है, अपितु आधुनिक काल में उन चिन्ताओ की अभिव्यक्ति व  पितृसत्तात्मकता के उद्भव बिन्दुओ को पहचानने में भी सहायक होती है.

याज्ञवल्क्यस्मृति के रचना काल को लेकर विचारको में मतभेद है. यद्यपि याज्ञवल्क्य को शुक्ल यजुर्वेद के उद्घोषक के रूप में पारंपरिक मान्यता मिली है तथापि ये रचना वास्तव में कब हुई इसका प्रमाण बहुत साफ़ नहीं है. य.व.स्मृति की ख्याति का बड़ा कारण उसपर लिखी टीकाए, विशेषकर विज्ञानेश्वर रचित “मिताक्षरा” है. इसकी विभिन्न टीकाओ, सूत्रों व अन्य रचनाकारों द्वारा किये गए वर्णन के आधार पर इसका काल क्रम पहली सदी ईसा पूर्व से लेकर तीसरी सदी ईस्वी माना गया. यद्यपि इतिहासकार इसको बाद की स्मृतियों यथा नारद, कात्यायन,बृहस्पति स्मृति के समकक्ष रखते है व इसका अध्ययन इसी परिपेक्ष्य में करते है. हमने भी याज्ञवल्क्यस्मृति का काल क्रम इसी परिपेक्ष्य में रखा है[2].

इतिहासकारों ने सामान्यतः धर्मशास्त्रो पर व विशेष रूप से याज्ञवालाक्य स्मृति का अध्ययन करते हुए विभिन्न मतों का प्रतिपादन किया है. अधिकतर मतों ने नारी के हीन स्थिति को इंगित किया गया है. किस तरह नारी की कामुकता को लेकर एक पितृसत्तात्मक समाज की बेचैनी इन ग्रंथो में परिलक्षित होती है, उसका विवरण इन कार्यो में विचारको ने दिया है, यद्यपि हम देखेंगे कि कुछ विचारक ऐसी व्याख्याओं से सहमत नहीं होते व आधुनिक पश्चिम-केन्द्रित नारीवादी चिंतन को पारंपरिक भारतीय ग्रंथो के अध्ययन में उपयोग किये जाने का विरोध करते है. इन ग्रंथो के अध्ययन द्वारा हम नारीवाद के विभिन्न आयामों का विश्लेषण कर सकते है- विवाह, पारंपरिक अधिकार, सामाजिक ओहदा, आर्थिक स्थिति व अधिकार आदि. इन सभी अनुभागो का विश्लेषण आवश्यक है.

इनमें से अधिकतर लेखको ने स्त्रियों के आर्थिक अधिकारों व “स्त्रीधन” जैसे विषयो पर अपना ध्यान केन्द्रित किया है यद्यपि हम स्त्रियों की सामाजिक दशा का भी चित्रण पाते है. कुमकुम रॉय आरंभिक समाज में स्त्रियों के चित्रण से जुड़े विभिन्न अध्यांनो का विश्लेषण करती है[3]. एक तरफ जहाँ वो ए.एस.अल्टेकर द्वारा वैदिक समाज में स्त्रियों के महिमामंडन व स्त्रियों की दशा के क्रमिक अधोपतन का विवरण देते है, उसे निरस्त करती है. अल्टेकर स्रियों की क्रमिक स्थिति के आधार पर आरंभिक भारत को ४ भागो में विभाजित करते है, जिसमें तीसरा (आरम्भिक स्मृतियों, महाकाव्यों व सूत्रों का काल) व चौथा काल (परवर्ती स्मृतियों व उनपर टीकाओ का काल) हमारे अध्ययन के लिए आवश्यक है. अल्टेकर के अनुसार तीसरे काल के आरम्भ से (५०० ईसा पूर्व से ५०० ईस्वी) आर्य पुरुषो व अनार्य व शुद्र महिलाओ के साथ समागम के कारण स्त्रियों के शिक्षा, भारतीय संस्कृतियों, रीतियों से अनिभिज्ञता के कारण स्त्रियों को कर्मकांडो से अलग किया गया. इसी कारण बाद के धर्मशास्त्रो में ऐसे प्रतिलोम विवाहों पर प्रतिबन्ध लगाया गया”[4]. कुमकुम रॉय अल्टेकर के सिद्धांतो को एक जटिल स्थिति का अति सामान्यीकरण मानती है. उनके अनुसार ऐसे अध्ययनों का कालक्रमिक व स्थानिक दायरा अत्यंत सीमित है. इन अध्ययनों में स्त्री को सामाजिक परिवर्तनों के एक निष्क्रिय तत्त्व के रूप में देखा गया, साथ ही कुछ अनुकूल ऐतिहासिक तथ्यों का चुनाव करके उन्हें विभिन्न ऐतिहासिक स्थितियों में आरोपित कर दिया जाता है[5]. उमा चक्रवर्ती ने इसकी विधिवत आलोचना की है. उमा चक्रवर्ती अल्टेकर के लेख में अन्तर्निहित तीन समस्याओ का वर्णन किया है. पहला- इस लेख में ब्रह्मणिक विचारधारा को परिलक्षित करती है, दूसरा ये ब्राह्मणों द्वारा अभिव्यक्त एक आदर्श आचार संहिता को आधार बनाकर अपना अध्ययन अवस्थित कर रहे है, जो कदाचित समाज की वास्तविकता न होकर आदर्शोंमुलक था; तीसरा प्रस्तुत अध्ययन अपने को महज़ ऊपरी जातियों तक सीमित रखते है व अतएव एक आंशिक इतिहास का ही विवरण देता है[6].

 

संपत्ति वो प्रमुख आयाम है जिस परिपेक्ष्य से याज्ञवल्क्यस्मृति का अध्ययन किया गया है. विजयनाथ ने वैदिक काल से लेकर पांचवी-छठी सदी के बीच स्त्रियों व संपत्ति के बीच संबंध का अध्ययन किया है. उनके अनुसार स्मृतियों व पुरानो के काल आने तक स्त्रियों की स्थिति अधोमुखी हो चली थी व उनका सामाजिक ओहदा शुद्रो के समान था. उनके अनुसार आरंभिक धर्मशास्त्रो में तो स्त्रियों के उत्तराधिकार संबंधी विचारों को हाशिये पर रखा गया था परन्तु कालांतर में स्त्रियों के संपत्ति अधिकार, विशेषकर स्त्री धन पर उनके अधिकार को मान्यता दी गयी है[7]. विजयनाथ  मानती है कि धर्मशास्त्रो के रचना काल में दो परस्पर विरोधाभासी बदलाव आ रहे थे. एक तरफ तो स्त्रियों की चलायमानता व कामुकता पर कड़े पित्त्रसत्तात्मक अंकुश लग रहे थे व स्त्रियों के सामाजिक स्थिति में गिरावट आ रही थी, वही उनकी संपत्ति के अधिकारों में कमोबेश सुधार हो रहा था. विजयनाथ इस परिवर्तन को दो अर्थो में देखति है- एक और तो कृषि के विस्तार व लाभांश में वृद्धि के कारण भूमि की महत्ता बढ़ गयी और साथ ही उसपर पितृसत्तात्मक नियंत्रण भी जिससे स्त्रियों के सामाजिक सरोकार पीछे छूट गए. वही दूसरी तरफ हमें इस काल में ये भी देखने को मिलता है कि स्त्रियों द्वारा बौद्ध, जैन जैसे मतों को दान के सबूत अधिकाधिक मिलते है. विजयनाथ का मत है कि अपने खोये हुए दान व सरंक्षण को वापस पाने की छह में स्त्रियों को कुछ संपत्ति में अधिकार प्रदान हुए[8].

रोमिला थापर के अनुसार जब तक बाद के धर्मशास्त्र लिखे गए, तब तक स्त्री की स्थिति में एक विरोधाभास उत्पन्न हो गया था. इन ग्रंथो में नारी की एक आदर्श छवि प्रस्तुत की परन्तु वास्तव में उस छवि पर खरे उतर्ने हेतु स्त्री को दबा कर रखा गया. यद्यपि शिक्षा का सीमित अधिकार कुछ उच्च जातियों की स्त्रियों को प्राप्त था तथापि उन्हें ये ज्ञान सार्वजनिक जीवन में उपयोग करने का अवसर नहीं मिला. इस समय के धर्मशास्त्रो में, यहाँ याज्ञवल्क्य, नारद, बृहस्पति स्मृति आदि में जिन विचारो को प्रतिपादित किया गया, भूमि स्वामित्व व जमींदार वर्गों में उसकी आभ्यासिक परिणिति भी हुई.परन्तु वो ये भी कहती है कि ये धर्मशास्त्र अपने विचारों में किसी भी प्रकार से सम नहीं  थे. याज्ञवल्क्य नारद कात्यायन व बृहस्पति, यद्यपि इनमे से कोई भी स्त्री के प्रति उदारवादी रुख अख्तियार नहीं करता था तथापि इनमे निहित कट्टरता की सीमाएं भिन्न थी[9].

वेंडी डोंगिएर यद्यपि स्वीकार करती है कि धर्मशास्त्र स्त्रियों के प्रति पक्षपाती रहा है तथापि वो ये भी कहती है कि विभिन्न धर्मशास्त्र विभिन्न कालक्रम व विभिन्न स्थितियों में परस्पर विरोधाभासी बातें कहते आये है. उनके अनुसार, स्त्री सबसे बुरी लत नहीं मानी जाती थी वरन ये एक ऐसी श्रेणी  थी जो लगभग सार्वभौमिक थी. ये ग्रन्थ स्त्री विरोधी तत्वों के अग्रणी दूत थे तथापि इन ग्रंथो को अक्षरशः नहीं पढना चाहिए. डोंगिएर कहती है कि इन ग्रंथो में निहित सैधांतिक मूल्यों व वास्तविक सामाजिक स्थिति में काफी गहरे गर्त है. बौद्ध अभिलेखों के अध्ययन से हम स्त्रियों की एक अन्य छवि का प्रतिपादन कर सकते है[10].

चंद्रकला पाडिया इन सभी नकारात्मक छवियो का खंडन करती है. अपनी पुस्तक की भूमिका में ही वो अपने उद्देश्य साफ़ कर देती है. उनके अनुसार भारतीय ग्रंथो का अध्ययन पश्चिमी शिक्षा प्रणाली में अभ्यस्त नारीवादी विचारको व पश्चिम से प्रेरित उपागमो से किया जाता है जो भारतीय ग्रंथो की नैसर्गिक गुणों का नत कर देती है. उनके अनुसार भारतीय प्राचीन ग्रंथो के अध्ययन हेतु एक भारतीय उपागम की आवश्यकता है जो पश्चिमी पूर्वाग्रहों से ग्रसित न हो. दूसरी समस्या जिसकी वो आलोचना करती है वो है आधुनिक नारीवादी विचारको द्वारा स्त्री के दुर्दशा के चित्रण पर अत्यधिक बल देना व प्राचीन ग्रंथो से बिना परिपेक्ष्य जाने नारी विरोधी श्लोको आदि को अपने अध्ययन हेतु उपयोग करना. अपनी सम्पादित पुस्तक “वीमेन इन धर्मशास्त्र” की भूमिका में वो इन सभी उद्देश्यों को रेखांकित करती है- १.पश्चिमी उपागमो के नारीवादी इतिहास में पुर्वग्राहित प्रयोग की समालोचना, २. धर्मशास्त्रों में महिलाओ की बेहतर स्थिति का चित्रण आदि. इसी परिपेक्ष्य में वो याज्ञवल्क्य स्मृति के उन बिन्दुओ को उधृत करती है जिसमे नारियों को संपत्ति में प्रचुर व लगभग स्वतंत्र संपत्ति अधिकारों का वर्णन किया गया है[11]. परन्तु उनके अध्ययन में हमें विरोधाभास नज़र आता है. पहले तो जिस बिंदु की वो आलोचना करती है वही गलती खुद भी दोहराती है- अपने अध्ययन के अनुकूल श्लोको को बिना परिपेक्ष्य जाने उद्धृत करना. दूसरा, भूमिका में वे धर्मशास्त्रो को महिमामंडित करती नज़र आती है व पुस्तक के अन्य लेखो की व्याख्या भी इसी तरह करती है. परन्तु पुस्तक के कसी लेखो से ये ज्ञात होता है कि सभी विचारको का उक्त विचारो के साथ सामंजस्य नहीं है.

 

 

इतिहासकारों के विचारो को जानने के पश्चात ये आवश्यक है कि मूल ग्रन्थ के तत्वों का भी संज्ञान लिया जाए. यहाँ हम प्रयास करेंगे यज्ञवालक्य स्मृति के श्लोको को ऐतिहासिक परिपेक्ष्य में देखने की व ये जानने की कि कैसे इस ग्रन्थ को हम लैंगिक इतिहास के निर्माण हेतु प्रयोग में ला सकते है.

याज्ञ वालक्य के पहले अध्याय का तीसरा प्रकरण है “विवाह प्रकरणं”. इस अध्याय में एक स्नातक (जिसने अपनी शिक्षा पूर्ण कर ली हो) के ब्रह्मचर्य से गृहस्थ आश्रम में जाने के निर्देश निहित है. यहाँ एक बात ध्यान देने की आवश्यकता ये है कि ये प्रकरण पुरुष के परिपेक्ष्य से लिखा गया है. पुरुषो को किस तरह ब्रह्मचर्य व्रता का पालन करना चाहिए, शिक्षा पर्यंत कैसे गृहस्थ धर्म में प्रवेश करना चाहिए, किस तरह उपयुक्त कन्या का चुनाव करना चाहिए आदि आदि. यहाँ स्त्रियों की भूमिका, उनकी शिक्षा के प्रकरण आदि को नज़रंदाज़ किया गया है. इसे बड़े स्तर पर देखे तो एहसास होता है कि समस्त पुरुषार्थ, एवं भौतिक व अध्यात्मिक साधनों की प्राप्ति का अधिकार पुरुषो के निमित्त रखा गया है. स्त्रियाँ या तो इस प्रक्रिया से नज़र नही आती और यदि नज़र आती है तो “सहधर्मचारिणी” के रूप में, जहाँ उनका ध्येय “पुरुषो को मोक्ष प्राप्ति में सहयोग करना है”

य.व.स्मृति (१:५२) में कहा गया है-

“अविप्लुतब्रह्मचर्यो लक्षणयां स्त्रिय मुद्वहेत

अनन्यपूर्विकाम कान्तामसपिंडाम यवीयसिम”[12]

जिसका अर्थ है कि एक ब्रह्मचारी युवक को ऐसी स्त्री से विवाह करे जो पहले किसी और पुरुष को ‘दान’ में नहीं दी गयी हो, जो अन्य किसी अन्य पुरुष द्वारा नहीं ‘भोगी’ गयी हो, असपिंड तथा आयु एवं कद में युवक से छोटी हो आदि.

इस श्लोक से कई विचारो का स्पंदन होताहै. “अविप्लुतब्रह्मचर्य” से अभिप्राय ब्रह्मचर्य के भंग होने से है. यहाँ आपको दिखता है कि कामुकता पर नियंत्रण का दबाव न केवल स्त्रियों अपितु पुरुषो पर भी लागू होता है विशेषकर उनके ब्रह्मचर्य अवस्था में. तो याज्ञ वलक्य ब्रह्मचर्य अवस्था में ही ब्रह्मचर्य के भंग होने पर प्रायश्चित का प्रावधान रखा है. इन प्रायश्चितो का विवरण आपको प्रायश्चित अध्याय में मिलता है. यहाँ प्रयुक्त शब्दावली को देखे तो हमें स्त्री के विषय में समाज में प्रचलित मनोदशाओ का भी पता चलता है. स्त्री को दान देना शास्त्रों के उस परिपेक्ष्य का द्योतक है जिसमे स्त्री को पति की “निजी संपत्ति” समझा जाता है. धर्मशास्त्र जब विवाह के प्रकारों की चर्चा करते है जो देव विवाह को सर्वोपरि मानते है, जिसमे कन्या को यज्ञ के लिए आये ऋत्विक को दान में दिया जाये. साथ ही कन्यादान की पूरी रस्म ही इस पूर्वाग्रहों की परिचायक है. “भोग” शब्द स्त्री के रति गुण को इंगित करती है. धर्मशास्त्रों में स्त्री की मर्यादा व कौमार्यता पर अत्यधिक बल देते है. इससे दो बाते समझ में आती है- १. स्त्री भोग की वस्तु समझी जाती है, २. कौमार्यता स्त्री का सबसे विशिष्ट गुण है.

या.व. (३:२५९) कहती है कि “गुरुपत्नी के साथ सम्भोग करने वाले पुरुष को टेप हुए लोहे की शय्या पर टेप हुए लोहे से बनी स्त्री के साथ शयन करे अथवा लिंग्साहित अन्डकोशो को काटकर हाथ में लेकर दक्षिण पश्चिम दिशा में अपने प्राण त्याग देने से व्यक्ति शुद्ध हो जाता है”[13].  हम नहीं जानते कि वास्तविक जीवन में ऐसे कठोर पालन होता था अथवा नहीं. बहुत सम्भावना है कि ये ग्रन्थ एक आचार संहिता के रूप में कार्य करता था. यद्यपि इसका अक्षरशः पालन न होता हो, परन्तु इसकी सैद्धैन्तिक सत्ता व सार्वभौमिकता को काफी हद तक स्वीकारा जाता था इसमें लेश मात्र भी संदेह नहीं. इस प्रकरण से दो बाते और निकल कर आती है. पहली तो ये कि मृत्युदंड का प्रावधान दर्शाता है कि समाज व स्मृतिकारो में कामुकता एक बड़ा विकट प्रश्न था. कामुकता को नियंत्रित करना  स्मृतिकारो का प्रमुख ध्येय प्रतीत होता है, और मानव जीवन को आचार संहिताओ से पाटना इसी बेचैनी की अभिव्यक्ति है. दूसरी बात ये कि इन ग्रंथो में एक अन्तर्निहित विरोधाभास झलकता है, एक संघर्ष है सैधांतिक अवधारणाओ व व्यवहारिक वास्तविकताओ के बीच. एक तो ऐसे नियमो का बनना दर्शाता है कि ऐसे क्रियाकलाप सामाजिक जीवन का हिस्सा थे. एक ऐसी वास्तविकता जिसका दमन स्मृतिकार करना चाहते थे, परन्तु साथ ही मृत्यु दंड का प्रावधान जटिल सामाजिक वास्तविकताओ का संज्ञान नहीं लेता. अपितु इस प्रकरण का अगला ही श्लोक पिछले श्लोक से विरोधाभासी बात सुझाता है.

“प्राजापत्यम चरेत्कृछम समा वा गुरुतल्पगः

चान्द्रायणं वा त्रिन्मासानभ्यसेद्वेदसंहिताम”[14]

अर्थात  गुरुपत्नी के साथ सम्भोग करने वाले व्यक्ति को ३ वर्षो तक प्राजापत्य कृच्छ व्रत का आचरण करे अथवा तीन मॉस तक वेड संहिता का जप करते हुए चान्द्रायण व्रत का आचरण करे.

मृत्यु दंड का व्रत अनुष्ठान में परिवर्तित हो जाना कहीं न कहीं सामाजिक वास्तविकताओ से साक्षात्कार करना था विशेषकर ब्राह्मण वर्ग को पोषित करने वाले गृहस्थ को सामाजिक व आर्थिक रूप से सशक्त बनाये रखना भी उतना ही आवश्यक था.

. याज्ञवल्क्य (१:५६-५७) में कहा गया है कि

“यदुच्यते द्विजतिनाम शुद्राछारोप संग्रहः

नैतन्मम मतं यस्मात्तत्रायम जायते स्वयं

तस्त्रोवर्णानुपूव्य्रेन द्वे तथैका यथाक्रमम

ब्राह्मणक्षत्रियाविशाम भार्या स्वा शुद्रजन्मन”[15]

“पहले के स्मृतिकारो ने द्विजातियो व शुद्रो के बीच स्त्री ग्रहण की जो बात कही गयी है वो  (मुझे) मान्य नहीं है”. यहाँ ये बात स्पष्ट करनी आवश्यक है कि मनुस्मृति यद्यपि शुद्र पत्नी के साथ संबंधो की नैतिक रूप से अवहेलना करते है (३:14-१५), तथापि वो स्वीकार करते है कि ब्राह्मण शुद्र पत्नी ग्रहण कर सकते है (३:३). अतएव याज्ञवल्क्य स्मृति के इस निषेध को अन्य स्मृतियों में निहित नियम आदि से जोड़कर देखना आवश्यक है क्यूंकि कोई भी ग्रन्थ एकाकी नहीं होता है. ये अपने पूर्ववर्ती ग्रंथो से प्रेरणा लेते है और अपने परवर्ती ग्रंथो को प्रेरणा देते है. यहाँ ये बात ध्यान देने योग्य है कि जहां मनुस्मृति में स्त्री के विवाह के निषिद्ध हेतु दस परिमाण दिए है- रोगी, कम या अधिक अंग वाली, रोमहीन, अधिक रोम वाली, भूरे नेत्र वाली, अंगहीन आदि अदि परंतु याज्ञवल्क्य स्मृति तीन परिमाण देते है- रोगिणी, स्व-गोत्र व स्व-परिवार में विवाह निषेध. ये वेंडी डोंगिएर के उस विचार को सार्थक करती है कि यद्यपि ये सभी ग्रन्थ एक पित्त्रसत्तात्मक सत्ता का प्रतिनिधत्व करती है तथापि स्त्रियों के अधिकारों व नियंत्रण के परिपेक्ष्य में सबकी सीमाएं व परिमाण भिन्न है, व कई बार विरोधाभासी भी.

उसके अगले ही श्लोक में वो व्यक्त करते है कि ऐसी कन्या से विवाह करे जिनके कुल में पुरुष दस पीढ़ियों तक वेदाध्ययन में प्रवीण हो[16]. न केवल ये श्लोक एक बेहद आदर्शोंन्मुलक विचार प्रस्तुत करते है, साथ ही ये बात भी साबित करते है कि वेदाध्ययन पुरुषो का ध्येय समझा जाता है. प्रस्तुत नियमो में सदैव किसी तार्किकता की अपेक्षा नहीं की जा सकती व कई बार ऐसा प्रतीत होता है कि कुछ सूत्रों की प्रेरणा सामाजिक परिपेक्ष्य न होकर व्यक्तिगत पूर्वाग्रह थे. साथ ही इन श्लोको से ये भी ज्ञात होता है कि विवाह के प्रसंग में कन्या ही नहीं, अपितु उसके परिवार के लिए मापदंड तय थे. फलस्वरूप स्त्री को कामुकता पर और अधिक बंधन लगते होंगे. एक तरफ विवाह से पूर्व स्त्री की कामुकता व आचार व्यवहार पर नियंत्रण रखा जाता था ताकि स्त्री की कामुकता के कारण उसके विवाह में कोई संकट न आये. फलस्वरूप आरम्भ से ही स्त्री को एक ख़ास तरीके से पली बढ़ी जाती है जो वास्तव में उसके विवाहोत्तर व्यवहार की तैयारी की तरह देखा जाता है. स्त्री का पहनावा, आचरण, भाषा, श्रृंगार सभी एक पितृसत्तात्मक समाज की आवश्यकता की पूर्ति का ही व्यवस्थित  ढांचा है. ये आवश्यकता पिता पक्ष की नहीं पति पक्ष की है, और गौर करने वाली बात ये भी है कि ये भूमिकाये स्थायी नहीं है. एक वधू पक्ष का व्यक्ति जब किसी दूसरे  समय में वर पक्ष का भाग होता है तो उसकी आवश्यकताएं भी अपने पितृसत्तात्मक वंश की तृप्ति हेतु कुछ वैसी ही होती है, जैसी वधू पक्ष के समय उसने पूरी की थी. तो स्त्रियों पर दोनों पक्षों से दबाव होता है, अपनी कामुकता को नियंत्रित करने का. वो शक्ति व सत्ता के टकराव की भुक्तभोगी दिखती है.

पिता पितामहो भ्राता सकुल्यो जननी तथा

कन्याप्रदः पूर्वनाशे प्रकृतिस्थः परः परः

अप्रयच्छन्समाप्नोति भ्रूणहत्यामृतावृत्तो

गम्यम त्वभावे दात्रणाम कन्या कुर्यात्स्वयम वरं[17]

प्रस्तुत श्लोक को यद्यपि स्त्री के अनुकूल बताकर व्याख्या का प्रयास किया गया है परन्तु ध्यान से देखने पर प्रतीत होता है कि वास्तव में स्त्री के अधिकार जैसी समझ में आने वाले तथ्य, स्त्री को मिलने वाली छूट भी एक पितृसत्तात्मक आवश्यकता की पूर्ति का निमित्त मात्र है. पिता पितामह, भाई के आभाव में कुल का कोई व्यक्ति अथवा माँ भी कन्यादान की अधिकारी है. उचित समय पर कन्या का विवाह न करने वालो को भ्रूण हत्या का पाप लगता है.  व यदि पिता पक्ष विवाह योग्य आयु में योग्य वर ढूँढने में असमर्थ हो तो कन्या अपने लिए वर स्वयं खोज सकती है.

यदि ध्यान से देखे तो कुछ बाते समझ में आती है. यद्यपि उक्त श्लोक स्त्री को विषम परिस्थिति में अपना पति चुनने का अधिकार देता है अथवा उसे कन्यादान का अधिकारी बनाता है. पहले तो, कन्यादान के अधिकार की भी एक अवरोही क्रम देखते है. जहाँ पिता, दादा व भाई (सभी पुरुष )सबसे पहले आते है और यहाँ तक कि विषम परिस्थितियों  मे भी कुल के किसी व्यक्ति (सामान्यतः पुरुष) को कन्या की माँ  से पहले वरीयता दी गयी है. ऐसे ही, यद्यपि कन्या को अपना वर चुनने का अधिकार प्रदान किया गया है परन्तु इस अधिकार का उद्देश्य भी इसी श्लोक में निहित है- स्त्री की प्रजनन शक्ति का उचित इस्तेमाल. एक पितृसत्तात्मक समाज स्त्री की प्रजनन क्षमता एक वंश की वृद्धि का आधार है. अतएव कन्या द्वारा सही समय पर विवाह न करना अपनी प्रजनन शक्तियों को व्यर्थ करना है, जिसको भ्रूण हत्या के सामान बताया गया है. तो कन्या द्वारा अपने वर का चुनाव करना वास्तव में पितृसत्तात्मक समाज की आवश्यकताओ का निमित्त बनना है. इससे एक बात और पता चलती है, वो ये कि कन्यादान व प्रजनन का महिमामंडन, दोनों अपनी प्रकृति से ही पुरुष प्रधान समाज का द्योतक है. जब स्त्री को इन मूल्यों की परिधि में लाया गया है तो आप स्त्री के माध्यम से पितृसत्तात्मक विचारो की परिणिति करते हो. इस तरह आप एक तरफ तो स्त्रियों को पितृ सत्ता में कुछ अधिकार प्रदान करते हो वही दूसरी तरफ स्त्रियाँ धीरे धीरे इन पितृ सत्तात्मक मूल्यों को आत्मसात भी करती है.

आगामी श्लोको में स्त्रियों के आचरण सम्बन्धी कुछ नियमो का ज्ञान होता है. याज्ञवल्क्य स्मृति कहती है कि यदि स्त्री पर पुरुष समागम की अपराधी हो तो उसे गंदे वस्त्र दिए जाए, भोजन में केवल एक कौर दिया जाए, एवं भूमि पर सोने को बाध्य किया जाए. साथ ही विषम परिस्थितियों के अलावा स्त्री द्वारा गर्भपात करने पर स्त्री को महापाप लगेगा भ्रूण की हत्या का भी व पति हत्या के समकक्ष पाप भी[18]. यद्यपि ये सूत्र कदाचित किसी भी प्रकार के अनिष्ट से बचने के लिया था, न केवल अनिष्ट की पूरी परिभाषा पुरुष प्रधान समाज की देन है, अपितु पर पुरुष समागम होने व गर्भपात होने, दोनों ही अवसरों में पाप का सारा ठीकरा स्त्री के हिस्से आता है. इससे एक बड़ा प्रश्न खड़ा होता है. क्या गर्भपात का निर्णय स्त्री की इच्छा से तय होता है, या इसमें पुरुष वर्ग एक अहम भूमिका अदा करते है (कई मामलो में पुरुष ही गर्भ पात का निर्णय लेते है एवं उस निर्णय को स्त्रियों पर थोपा जाता है). ऐसे में इसका श्रेय स्त्रियों को देकर उनके लिए दंड का विधान करना कहाँ तक सार्थक है? एक और बात प्रस्तुत ग्रन्थ गर्भपात के दो कारणों को स्वीकार करती है (वास्तव में दोनों कारण जुड़े हुए प्रतीत होते है). ये दो कारण है- पर पुरुष से हुए गर्भ धारण की स्थिति में एवं प्रायश्चित की स्थिति में. यहाँ हमें ये समझ में आता है कि चूँकि आरंभिक समाज में (वास्तव में किसी भी समाज में) ये तय करना अत्यंत कठिन है कि बच्चे का पिता कौन है (मातृत्व एक सत्य है, पितृत्व महज़ एक सम्भावना). अतएव वंश की शुद्धता तय करने हेतु स्त्री के कामुक आचरण व पुरुषो के साथ उनके सम्बन्ध को नियंत्रित करना अत्यंत आवश्यक बन जाता है. फलस्वरूप हमें धर्मशास्त्रो में ऐसे विधान देखने को मिलते है. साथ ही गर्भ पात को पति की हत्या के समकक्ष मानना संतान पर पिता के वर्चस्व व अधिकार के स्तर को दर्शाती है. याज्ञवल्क्य प्रायश्चित प्रकरण में गर्भ पात के लिए स्त्री को त्यागने का विधान तय किया गया है.

यहाँ से हम दूसरे प्रकरण के एक बेहद उपयोगी प्रकरण “दायभाग” की और चलते है जो स्त्री के संपत्ति अधिकारों पर चर्चा करता है. इस पर याज्ञ वल्क्य पर विज्नेश्वर की टीका “मिताक्षर” ने विस्तार से चर्चा की है व हमारे आधुनिक हिन्दू संपत्ति कानूनों का आधार मिताक्षर ही है जिससे इसकी उपयोगिता और अधिक बढ़ जाती है. यहाँ आपको स्त्री के संपत्ति के कुछ अनुकूल व तुलनात्मक रूप से उदारवादी नियम देखने को मिलते है.

यदि कुर्यत्समनम्शान पत्नयः कार्यः समान्शिकः

न दत्तं स्त्रीधनं यासां भत्रा व श्वशुरेण वा [19]

उक्त श्लोक में उन पत्नियों हेतु संपत्ति में हिस्से का प्रावधान किया गया है जिन्हें अपने पति अथवा ससुर से स्त्रीधन प्राप्त नहीं हुआ है. यहाँ एक बात देखने योग्य ये है कि इससे पिछले श्लोक में संपत्ति के बंटवारे के प्रश्न पर सभी पुत्रो के बीच संपत्ति के बंटवारे की बात की गयी है. इस प्रकरण में कहीं भी पुत्री के संपत्ति में हिस्से की बात नहीं गयी है, परन्तु स्त्रीधन के विवरण से ये लगता है कि स्मृतिकार कदाचित स्त्रीधन को ही पुत्री के संपत्ति का अंश मानते थे अतएव हमें इसके लिए अलग प्रावधान देखने को नहीं मिलते. यद्यपि हमें जिक्र मिलता है कि संपत्ति के बंटवारे के बाद प्रमुख भाई का कर्त्तव्य है भाइयो के उपनयन आदि का प्रबंध व बहनों के विवाह का प्रबंध करना. इस कार्य हेतु सभी भाइयो के हिस्से से एक चौथाई धन के व्यय का प्रावधान है. इसीलिए बार बार स्त्रीधन से वंचित स्त्रियों के संपत्ति अधिकारों की बात की गयी है. यहाँ तक कि पिता की मृत्यु के पश्चात यदि पुत्रो में संपत्ति का बंटवारा हो तो स्त्रीधन वंचित माँ भी संपत्ति में पुत्र सदृश अंश की अधिकारी है[20]. साथ ही विवाह के प्रकार, संतान उत्पत्ति का आधार व पत्नी के वर्ण को आधार रखकर भी स्मृति में संपत्ति का बंटवारा किया गया है. तो ब्राह्मण पत्नी से उत्पन्न अपेक्षाकृत अधिक भाग का अधिकारी है, तत्पश्चात क्षत्रिय, फिर वैश्य व फिर शुद्र. नियोग से उत्पन्न पुत्र को दोनों जनको की संपत्ति में अधिकार मिलता है, साथ ही जिस व्यक्ति की केवल कन्या हो उस स्थिति में पुत्री के पुत्र को औरस पुत्र के रूप में संपत्ति में अधिकार मिलता है. साथ ही दासी से उत्पन्न पुत्र भी संपत्ति में अंश्ग्रही होता है. वो संपत्ति का आधा हिस्सेदार अथवा अन्य पुत्रो के अभाव में सम्पति का पूर्ण अधिकारी होता है[21].

यहाँ हमें ज्ञात होता है कि वस्तुतः संपत्ति अधिकारों का मुख्या ध्येय पुरुषो के लिए नियत है परन्तु स्त्रियों को पुरुष प्रधान समाज के भीतर प्रतिनिधत्व प्राप्त हुआ है जो कि अन्य धर्मशास्त्रो व धर्मशास्त्रो के अन्य नियमो की तुलना में अपेक्षाकृत उदार है. प्रकरण के अंत में जाकर यद्य्यापी संपत्ति में भी नैतिकता का प्रश्न आता है. जहां पुत्र रहित सदाचारिणी स्त्रियों के भरण पोषण व व्यभिचारिणी स्त्री के निष्कासन का प्रावधान है[22]. यहाँ प्रश्न ये उठता है यदि इन नियमो के पालन करने की कोई व्यवस्था होती तो इस बात को कौन तय करता कि कौनसी स्त्री का चरित्र कैसा है और कैसे इन नियमो के दुरूपयोग को नियंत्रित किया जाता. ऐसे नैतिक प्रश्न इन नियमो की वास्तविक उपयोगिता पर प्रश्न चिन्ह लगाते है.

श्लोक १४३-१४८ स्त्री धन की चर्चा करते है. स्त्रीधन में माता पिता, बंधू बंधवो व पति से अर्जित आधिवेदनिक (दूसरी शादी के समय की क्षतिपूर्ति आदि सम्मिलित है. इससे ये भी पता चलता है कि स्मृतिकारो की नज़र में स्त्रियाँ सामान्यतः धन स्वयं अर्जित नहीं करती थी अपितु उन्हें उपहार स्वरुप प्राप्त करती थी. अतएव इसमें स्त्री द्वारा अर्जित धन का कोई जिक्र नहीं है. तथापि पहली बार प्रकरण मेये उल्लेख आता है कि सभी आठो प्रकार के विवाहों में यदी स्त्री की कन्या हो तो स्त्रीधन की उत्तराधिकारी वो होंगी. अन्य अवसर पर पति अथवा पिता (असुर, राक्षस, गन्धर्व विवाहों के परिपेक्ष्य में). साथ ही दूसरे विवाह से पूर्व विवाह के व्यय के बराबर का धन पहलिपत्नी को प्रदान करे. स्त्रीधन प्राप्त पहली पत्नी को व्यय का आधा हिस्सा प्रदान करने का विधान है[23]. यहाँ इन विधानों से ये तो ज्ञात होता है कि स्त्रियों को संपत्ति में प्रतिनिधत्व मिला है, पर साथ ही ये भी प्रतीत होता है कि इसमें स्त्रियों की प्रत्यक्षा भूमिका सीमित है. अधिकतर मामलो में स्त्री केवल प्राप्तकर्ता है. हमारे पास ये जानने का कदाचित साधन नहीं है कि स्त्रियाँ स्वयं इन नियमो में कितना हस्तक्षेप करती थी अथवा इन नियमो के आभ्यासिक प्रतिपादन में स्त्रियों की क्या भूमिका थी.

अपने निष्कर्ष में हम कुछ बिन्दुओ पर चर्चा करना चाहेंगे जिनमे से कुछ शायद हमारे अध्ययन की सीमओं का विस्तार करे. हमारी चर्चा से कई बाते परिलक्षित होती है. पहली ये कि  धर्मशास्त्रो में समाज को एक विशेष नियम आचरण से बाँधने का प्रयास किया गया जिसमे स्त्री की कामुकता को एक विनाशकारी तत्त्व अथवा स्थिरता में व्यवधान के रूप में देखा जाता रहा. अतएव स्मृतिकारो का प्रमुख ध्येय स्त्रियों को निमित्त बनाकर उन्हें आचारणबद्ध करने का प्रयास किया जो कि पित्त्रसत्तात्मक मूल्यों के अनुकूल हो.परन्तु हमें ये बात भी ध्यान में रखनी चाहिए कि याज्ञवल्क्य के गृहस्थधर्म व स्नातक धर्म प्रकरण आदिमे पुरुषो के लिए कड़े नियमो व आदर्शोंन्मुलक व अविश्वसनीय का विधान है. कहने का अभिप्राय ये कि यद्यपि हमारा अध्ययन लैंगिक असमानता का विश्लेषण करता  हो तथापि इसके समग्र अध्ययन हेतु हमें स्त्री पुरुष की परिपाटी से हटकर शक्ति विभाजन की प्रक्र्रिया व सरंचना का अध्ययन आवश्यक है. और इसका विश्लेषण करने पर हमें ज्ञात होता है कि कहीं न कहीं पितृसत्तात्मकता एक ढांचा है, एक ऐसा ढांचा जो इतने गहरे से हमारे अवचेतन में घर कर गया है कि जाने अनजाने हम सब उस सरंचना के अनुसार खुद को ढाल रहे है और अपना आचरण निर्धारित कर रहे है. ये एक ऐसी सरंचना जिसने समस्त समाज को एक विशिष्ट पहचान और आचार व्यवहार प्रदान किया है. हमारी पूरी अस्मिता, हमारी पहचान, हमारे आचरण कहीं न कहीं उस पितृ सत्तात्मक सरंचना को सार्थक करने का काम कर रहे है, हम सब उस सरंचना के दास है. इस सरंचना में हम ही शोषक भी है और हम ही शोषित भी. इन ग्रंथो को केवल पढना आवश्यक है, इनके पीछे की मनोदशा को समझना भी आवश्यक है. विभिन्न समूहों में इस पितृ सत्तात्मक सरंचना में वर्चस्व की लड़ाई व स्त्रियों की इस सरंचना में अपने अस्मिता की लड़ाई, इन सभी बातो के अध्ययन से विभिन्न धर्मशास्त्रो के बीच व एक धर्मशास्त्रों के बीच भी विरोधाभास उत्पन्न होता है. इस विरोधाभास का भी लैंगिक संबंधो की जटिलता को समझने में बहुत महत्व है. इन ग्रंथो को अक्षरशः लेने के स्थान पर इनके सामाजिक आधार व उपयोगिता व इन विरोधाभासो का एक साथ अध्ययन करना आवश्यक है.

 

Bibliography

  1. Yajnavalakya smriti translated by dr. keshav kumar kashyap; chowkhamba krishnadas academy; 2001; Varanasi
  2. Padia, Chandrakanta (ed.)- “women in Dharmasastras: a phenomological and critical analysis”; Rawat Publications; 2009; Banaras
  3. Roy, Kumkum and Chattopadhyaya, B.D.(eds.) – “women in early Indian societies”
  4. Nath, Vijay- “the Puranic world: environment, gender, ritual and myth”; 2009; manohar publishers; New Delhi
  5. Singh, Upinder- “a history of ancient and early medieval India”; 2009; Pearson Longman; New Delhi
  6. Thapar, Romila- “the penguin history of early India: from the origins to AD 1300”; 2001; Penguin books; New Delhi
  7. Doniger, Wendy- “Hindus: an alternative history”; 2009; the penguin press; New York
  8. Roy, Kumkum- “the power of gender and the gender of power”; 2010; oxford university press; New Delhi

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

[1] कुमकुम रॉय- “द जेंडर ऑफ़ पावर एंड द पावर ऑफ जेंडर”

[2] डॉ.केशव किशोर कश्यप- “भूमिका” इन “याज्ञवल्क्यस्मृति”

[3] कुमकुम रॉय- “इंट्रोडक्शन” ऑफ़ “वीमेन इन अर्ली इंडियन सोसाइटीज”

[4] ए.एस.अल्टेकर- “द पोजीशन ऑफ़ वीमेन इन हिन्दू सिविलाइज़ेशन” इन  “वीमेन इन अर्ली इंडियन सोसाइटीज”

 

[5]  कुमकुम रॉय- “इंट्रोडक्शन” ऑफ़ “वीमेन इन अर्ली इंडियन सोसाइटीज”

[6] उमा चक्रवर्ती- “बियॉन्ड द अल्तेकरानियन पैराडिम” इन  “वीमेन इन अर्ली इंडियन सोसाइटीज”

[7] विजय नाथ को उद्धृत किया गया है उपिन्दर सिंह-“हिस्ट्री ऑफ़ एन्शियंट एंड अर्ली मिडिवल इंडिया”

[8] विजयनाथ- “वीमेन एज  प्रॉपर्टी एंड दियेर राईट टू इन्हेरिट प्रॉपर्टी” इन “द पुराणिक वर्ल्ड”

[9] रोमिला थापर- “”पेंगुइन हिस्ट्री ऑफ़ अर्ली इंडिया”

[10] वेंडी डोंगिएर- “हिन्दू: एन अल्टरनेटिव हिस्ट्री”

[11] चंद्रकला पाडिया- “इंट्रोडक्शन “ इन “वीमेन इन धर्मशास्त्र”

[12] याज्ञवल्क्यस्मृति (१:५२)

[13] याज्ञवल्क्यस्मृति (३:२५९)

[14] याज्ञवल्क्यस्मृति (३:२६०)

[15] याज्ञवल्क्यस्मृति (१:४६-४७)

[16] याज्ञवल्क्यस्मृति  (१:५४)

[17] ibid (१:६४)

[18] याज्ञवल्क्य (१:६८-७०)

[19] ibid (२:११५)

[20] याज्ञवल्क्य स्मृति (२:१२३-२४)

[21] ibid (२:१२६-१३६)

[22] ibid (२:१४२)

[23] ibid (२:१४३-१४८)

Gender through fables: status of women in Pancatantra and Jātaka tales

 

-Santosh Kumar

M.A. HISTORY (FINAL YEAR)

 

 

 

 

Fables are an important and very popular genre in ancient Indian literature. But like any other literature of ancient India, even these fables don’t exist exclusively but rather are interspersed within a broader theme. Fables are most of times not the end but rather the means to the end. Not just rhythm, not just rasa, not just emotions; it also produce images. It also produces values. the texts in consideration in our paper-Pancatantra, Jātaka stories & in the portions of Śānti Parva in Mahābhārata etc. are not collections of fables per say but rather serves a greater purpose. We need to deconstruct not just the text but also the purpose for which it was used. Different scholars have differently interpreted the sources but there are still some problems associated with reading of sources that we first need to consider. It is important to also study how to read a text (a detail discussion is beyond purview of this paper). Our interpretation of a period, a society, a culture is directed by our particularistic understanding and interpretation of the text. Many a times, scholars cherry pick references in favor or against our arguments. Thus our understanding of the past gets colored by our perceptions of the present. We then overlook the underlying structure, the context, and the collective psyche of the society that produces and consumes such work. Also, most of the ancient texts are not work of a particular time. Composition of such works stretch to many centuries, especially in the case of fables, stories exist in oral form long time before they are finally written down. While reading ancient Indian texts we often assume the text as a unitary, homogenous and static text. Thus we overlook the influences exerted by other texts on the text in consideration and conversely, the influences exerted by the source text on later text. In fact a text is never a dead past, text is re-edited, interpolated, reiterated, debated through the centuries. Even in modern times, even though the exact rendering of the text, its social context is lost, the structure and discourse continue to reiterate the text. Through pedagogy, through oral telling, a text continues to exist as a structure, discourse. Julia Kristeva coined the term “inter textuality” to denote text that are not self contained or autonomous but produced from other texts[1]. The idea of text as a “movement of a discourse” was further developed by scholars like Roland Barthes[2]. Dhananjay singh points out that in the context of Indian fables, oral transmission made possible the inter textuality of these sources. Thus, we find a single narrative found in Jātakas may also be found in Pancatantra and Mahābhārata[3]. According to Tania Mehta, India has an organic history of more than two thousand years, which has been punctured and intervened and mediated by other histories too. Thus it is highly improbable for their narratives to be linear and monotonous[4].

 

In terms of gender studies to which we are primarily concerned with, these texts manifest different ideas for different scholars and we need to consider the earlier works undertaken by scholars in this regard. We can actually have two types of historiography-one specific to the texts in consideration and another gender in general, the understanding of which can aid us in understanding the text even better. Kumkum Roy has done a lot of work on Jātakas from the perspective of gender. She points out that Jātaka included popular stories that were reworked according to Buddhist traditions as a medium for interacting with lay and religious communities[5]. Thus the adulterous woman was prominent in the Jātakas as a warning to men and women.  Slightly less than half of the stories of Jātakas deal directly or indirectly, with the relationship between men and women[6].  The women in these stories range from slave women, queens, Brahmana wives, young as well as old women etc. Kumkum Roy identifies various stories in the Jātakas which talk about different kinds of women and anxieties associated with these women particularly the sexual anxieties.

Vijay Nath compares and contrasts the attitude towards women and their customary and property rights in Dharmaśāstras and Pāli literature. According to her, traditional brahmanical sources recognize the right of a man over a woman, most probably his wife as characteristic of a patriarchal society in order to reinforce male authority. This recognition of husband’s proprietary rights over his wife is borne out by the assumption underlying the status of the kşetraja son which regards wife as her husband’s property the fruit of the seed sown in the kşetra, the fruit belong to the owner of the land (the husband)[7]. Conversely, in Buddhist sources, according to her, even though we find evidence of husband’s proprietary rights over wife (for e.g. in Vessantara Jātaka, the king gifts his wife, among other things to Brahmins), the norm pertains only in the ruling strata, where patriarchal norms continued to be strong[8].  A second distinction she points out between the Dharmaśāstras and Pāli texts is the comparative freedom to women in Jātaka to engage in varied occupations, which is not reflected in brahmanical texts. She explains this difference to the different social milieus these texts represent. According to her, while the Dharmaśāstras were more relevant for the agricultural dominated rural milieu, whereas Pali literature focused on the commerce oriented urban milieu where the scope for individual agency, enterprise and accumulation of wealth was comparatively greater[9].

The only shortcoming in her analysis, it seems, is her over-reliance on economic causation, which predominates her analysis of all aspects of ancient India. But other scholars have compensated this by studying these texts in a wider socio-cultural context. According to Uma Chakravarti, several Jātaka tales project prejudices against women, particularly upper class women are depicted as fickle, untrustworthy and adulterous in these stories. She tries to explain the difference between the brahmanical culture and the Jātakas lies in their prohibition and representation of the transgression. While in the brahmanical texts, transgression is seen as a possibility, in the Jātakas transgression is actually practiced by women. We also find an intermingling of values of high culture and more popular beliefs about the ‘essential nature’ of women[10]. According to ananda k. coomarswamy, Jataka narratives about women articulate the monastic prejudice against women[11]. Their presence is perceived as a threat to the Bhikku seeking salvation. She points out to the possibility that the monks may have been involved in the production or rather restricting of Jātaka tales for Buddhist religious sphere[12].

According to Jasbir Jain, katha as a genre served the purpose of Buddhist and Jain preachers. One of the oldest is the category of Jataka tales, several of which are also traceable in the Ramayana and the Mahabharata. There are different approaches, according to her, through which these tales impart wisdom[13]. She also points out most of these stories have a set framework in which most of these narratives, kathas and fables are placed. Many of them begin with the kind of introductory phrase, which immediately locates the narrative in the remote past, and raises it to the level of the rich, the royal and the powerful and simultaneously, by stressing the didactic element, it connects it with the common man’s experience[14].

Nayana Sharma mukherjee points out the contradiction between the practice and expectation associated with intoxication of women. She points out that while drinking was not unusual for women and we find reference in Kumbha Jātaka that 500 women joined a drinking festival. But at the same time, we also find that the narrative describes the ‘inappropriateness’ of their conduct in the presence of Buddha, who strongly revoked this custom. Here, we get a candid admission of the fact that drinking was a common practice in India but it was proscribed for various classes which included apart from women, Brahmans, hermits etc.

 

Talking in the context of Pancatantra, A.K. Ramanujan compares and contrasts the male centered symbolisms used in Pancatantra with the symbols used in female centered tales. The great Indian epics-the Mahābhārata and the Rāmāyana-as well as the great collections of stories-the Buddhist Jātakas, the Pancatantra (fifth century) were originally oral traditions. According to him, these texts have a parallel existence in the arena of folk tales where many versions have feminist understanding of the text not found in Sanskrit telling[15]. Also, he points out that while Pancatantra uses animal symbols to teach kingship, Pancatantra becomes a male centric political treatise, on the other hand the women tale makes use of the same symbols in very different and contradictory meanings. The use of snake, tiger etc as a pedagogical device and as a narrative tool for women’s tale may have very different connotations[16].

Sanskrit scholar Acharya Dipankara in the introduction of Hindi translation of Pancatantra points out that Pancatantra was written with an urge to maintain the traditional position of women, as there was growing anxiety with women coming out of their traditional fold and getting afflicted with ‘vices’ like prostitution, intoxication etc. he compares and contrasts the declining status of women between the time of Kautilya’s Arthaśāstra and Pancatantra. He points out the role of superstitions in fuelling sexual urges among women which stories of Pancatantra try to portray, like in the story of “weaver in the disguise of Vishnu”[17]

Sucheta shinde has done a critical analysis of gender reflected in Pancatantra. The fables of Pancatantra according to her, was not written for children but its stories are widely translated and read to the children all over the world. Pancatantra is known as ‘Nītiśāstras’, that is, it means ‘a book of wise conduct in life’. The conversations between these animals make unnecessary comments on women. Also, no conversation ever takes place among female characters to demonstrate their knowledge. Only male characters are made to converse about all the wisdom and lessons of morality[18]. According to her, the world of Pancatantra is predominantly a male domain. The Pancatantra is a book by and for men, especially men of the court. It was written to instruct the future kings about the governance as well as duties and challenges of the kings. Kings are compared to women in their capriciousness which they need to ward off to become efficient in their role. In an article ‘A Critical Interpretation of Pancatantra’ Prof. Anuradha Sharma criticizes how the stories of Pancatantra socialize women to dance to the tune of male dictate[19].

Here I would like to introduce some scholars, who though haven’t worked on these sources per say but whose understanding of gender is very pertinent for us in understanding our sources in a better perspective and help us to analyze them better. First of all, Michel Foucault gives a very pragmatic yet insightful understanding of the norms of sexuality and the psyche that underlies these practices. According to him, Sexuality was carefully confined to the home. The conjugal family absorbed sexuality as a function of reproduction. , silence became the rule, on the subject of sex. The couple imposed itself as model, enforced the norm, safeguarded the truth, and reserved the right to speak while retaining the principle of secrecy. Bedroom was understood as the single locus of sexuality and it was acknowledged in social space as well as at the heart of every household. Repression of sexuality operated as a sentence to disappear, but also as an injunction to silence, an affirmation of nonexistence, and, by implication, an admission that there was nothing to say about such things, nothing to see, and nothing to know. To make place for these illegitimate sexualities, alternative avenues were opened like brothels[20]. Foucault’s understanding, though focused on 17th century Europe, can act as a model for understanding the dichotomy between repression of sexuality of women on one side and the complexities of “illegitimate” or “unbridled” sexualities whose existence cannot be discarded altogether.

Nivedita menon discusses how social norms are imposed and naturalized in a society. She compares it with the idea of ‘nude make up’. Nude make up is a way of applying makeup which gives an illusion that no makeup has been applied on the face. That is, it creates illusion of ‘naturalness’. Similarly, maintaining of social order is like that. According to her, it requires the faithful performance of prescribed rituals over and over again throughout one’s lifetime. Complex networks of cultural reproduction are dedicated to this sole purpose. But the ultimate goal of all this unceasing activity is to produce the effect of untouched naturalness[21]. This explains very well, why a structure a norm, a culture that is detrimental to a section of society become sanctified, naturalized and thus justified through the continuous reiteration of the norms. The texts in question are meant for the same purpose through pedagogy and religious teachings simultaneously for Pancatantra and Jātaka.

Lastly, it is imperative to mention Gerda Lerner because she provides a very important breakthrough point for our analysis. She points out that women have always been active agents and more or less equal actors in the affairs of history and in preserving the collective memory of the society in the oral tradition, but in the process of history writing women agency was neglected and subordinated to that of men. What women have done and experienced has been left unrecorded, neglected, and ignored in interpretation. Historical scholarship, up to the most recent past, has seen women as marginal to the making of civilization and as unessential to those pursuits defined as having historic significance. Thus Women’s History, according to her, is indispensable and essential to the emancipation of women[22]. This helps us in explaining two crucial points in our analysis- firstly, how the process of writing the text is related to the attitude the text reflect towards women, and secondly, how to read the silences, anxieties, absence and negative agency in these text to create an alternative version of women’s agency in ancient India, contrary to what is projected in the texts.

Having done a brief survey of scholars who have done work on Pancatantra and Jātakas, particularly in the realm of gender, we can see that beneath the layer of what appears to be harmless moral fables lies a deep patriarchal structure which through symbols, myths, analogies, pedagogy etc tries to incorporate, assimilate, justify and generalize gender stereotypes and misogyny. Now let’s move on to analyze some important portions of these texts to see how the structure was being implemented through the medium of fables.

 

 

2

Patriarchy exists all around us in different forms. We often define patriarchy as a structure of oppression mostly targeted against women, but actually patriarchy is a structure under which all of us, irrespective of our gender identity (which anyways is a social construct) are oppressed. In this structure, we are the oppressor and we are the oppressed as well. But patriarchy is not a tangible entity whose presence can always be seen or felt. Many a times, patriarchy exists in so many different forms that we don’t even realize the inherent patriarchy in it. And that situation is even more dangerous because it makes us a participant in our own oppression. Our everyday actions, our ideas, perceptions, festivals and rituals etc all reflect this structure. Here mythology, folk tales, anecdotes, allegories etc plays a very important role. These stories through metaphors and symbolic meaning not only convey stories but also moral statements. They are carriers of moral values and social norms in such a way that they make way to our culture, to our subconscious mind and become part of our existence. In long run, these cultural norms make us look patriarchy as a natural and everlasting institution. Another thing, most of the scriptures was written over a period of time and reflects the tensions and dynamics of that era. Most of these texts like Manusmriti, or Dharma-shastras, Niti-shastras and epics like Ramayana and Mahabharata were actually prescriptive texts, that is, they tell us what ought to be and not what was. Thus, they represent an ideal that was not always followed or not followed as strictly as presumed. But when these texts reappear (and are actually glorified by the revivalists) they are exalted in their status and their teachings are taken literally which makes patriarchy appear more rigid and narrow downs the scope of dynamics in the practice.

 

Pancatantra refers to the women a lot of times in the text and many a time stories are meant as a reference point to warn young men against women and their promiscuity. Almost in the entire text, the agency of women is thoroughly negative. The reason for such construct lies in the nature of the text. The very introduction of the text suggest that the text was primarily meant for pedagogical purposes, and as we see in the works of Michel Foucault how pedagogy is also a very important and institutionalized means to repress sexuality. Sometimes, when the story doesn’t warranty the use of misogynist polemics, such biases gets reflected in the language, analogies, metaphors, examples etc. especially reflected in the verses accompanying the stories in prose.

 

Here, we must mention that language, words, syntax, syllables are not just grammatical entities. We don’t just speak a language, we don’t just convey messages and meanings, and we also convey its cultural idioms. Words are never bereft of its cultural landscape. It has multiple layers into it- the words that are spoken, the tone of the expression, the arrangement of words, the context of the words and the psyche of the speaker and receiver of the words. Words don’t always project the expected meanings; words always project something beyond what is apparent. As Michael Foucault points out- “signified is in excess to signifier”[23]. This is even truer in the context of fables interspersed by verses. Poetic language is a creative way to express and not just express; express it in the words of Sigmund Freud- “what is being repressed in serious talks”[24]. Thus, even within the limited scope of action and limited free hand available for the authors/compilers (due to the requirements of the texts and the audience); they are able to express something beyond what is not apparent, nor visible. We need to deconstruct the structure of these songs to reveal these hidden meanings. But we also need to see another objective of songs- create imagery, images that have cultural nuances, prejudices, biases of the author. We can reveal the psyche of the authors through the fables, through the verses. In the case of tales, many a times certain thoughts come alive not because they reflect the personal thoughts of the authors, but rather because they are the dominant discourses prevalent during the time of the composition. Therefore the onus should also be on class which patronizes such work because eventually they are the one who consume and approve the texts.

We shall now look at the major and minor instances in the text where the agency, biases, character etc of women get reflected directly or indirectly in the text. In major parts of the text, a man (especially a king) is deemed a “svāmi” of his subjects, weapons, horses, books, instruments and women (1:2:111)[25]. So there are attempts to “commoditification” of women.  The stories frequently quotes passages from texts like Manusmŗti, Arthaśāstra, Nītisāra etc. to give credibility to his text and its misogynist biases. Some verses dealing with “strīsvabhāva” are the longest verses in the text and are entirely focused on their promiscuity. In Pancatantra (1:3:146-156) in the story of dantil and gorumbh, which by the way is a story on heresy not directly on women,  the whole series of verses points out that

“They (women) talk to one person, and eye the other

Focus on the third one….. It’s difficult to read the mind of women”

And further,

“As fire remains unsatisfied with n number of wood, ocean remains unfulfilled by n number of rivers, god of death is never satisfied by devouring people, similarly women is never satisfied enough by the company of men”

And finally,

“She never gets a quiet corner; she never got the right opportunity

She didn’t have a love seeker, that’s why a woman is still virtuous….

A women is disciplined as long as she doesn’t get a lustful man”

 

These verses are full of disgraceful lines directed against women. One difference between this text and smŗti literature is that Pancatantra never claims any religious affinity, nor is it any authoritarian text, nor does it stakes claim of originality. But what it does is disseminate the shastric knowledge in a way that could be used for practical purposes in a more accessible way. What I feel is that even though both smŗti literature and texts like Pancatantra have their own set of anti women discourses, while smŗtikāras were motivated by a sense of anxiety regarding the sexuality of women which needs to be regulated according to the needs of the patriarchal society, in Pancatantra there is no such social need, but a prejudice against women who are seen as obstacle in the pursuit of material and diplomatic successes as well as an inferior being that could be controlled like a property by strong men. In this regard Pancatantra resembles more to a Nitiśāstra than a book of fables. This approach is also visible in the Jātaka albeit it has a religious purpose and its stories are meant for spiritual attainment for monks as well as lay persons. Although there are many stories which are common between the two but you see differences in their approach.  For example the story of the dove and the hunter appears in both Pancatantra and Jātakas. But while the Jataka version focus on the sacrifice of the pigeon to satisfy the hunger of the host the version in the Pancatantra has a preceding portion before coming to the main story. In this portion, the male and female pigeon long for each other and consummate. In this context, the female is quoted saying-

“Whose husband is not satisfied by her, the woman is not worth being called a woman. If ‘swami’ gets satisfied, all deities are fulfilled. If he is not satisfied, then there is no purpose for living in life. A brother-father-son can give only limited happiness to a woman, only the husband can give eternal pleasure to a woman, so why should not a woman venerate her husband”[26]

 

These descriptions are important on various grounds- firstly, it tells us how our culture, our pedagogy inculcates ‘virtues’ like unquestionable devotion to husband, which is a characteristic feature of a patriarchal society. Secondly, this idea is not something that emerged in isolation. It carries forward the tradition of the Dharmaśāstras which very clearly formulates such norms and at the same time, we find many important later texts that express the same idea in different context, different language but probably same intention and same patriarchal structure. This is where “inter textuality” becomes so important. We have dialogue between Draupadi and Subhadra in Mahābhārata, between anusuya and sita in Rāmāyana, Buddha’s discourse to Sujata in Anguttara nikāya, all express the same idea.

 

Jātakas have their own dynamics, especially when we try to understand it in the context of gender. The difference between the brahmanical version and the Jātakas may perhaps be ascribed to their different approaches towards household. While Pancatantra draw its inspiration from Nītiśāstras and brahmanical treatises and though it actually talks about diplomacy, kingship and statecraft, the household concerns reflected in the text are very similar to that of brahmanical texts. Conversely, Jātakas emphasize on the need to reject the role of household (as also emphasized by Uma Chakravarti) and follow the renunciatory path. Thus, while in Pancatantra the concern associated with women is the urge to control the sexuality of women within the household, in Jātakas the immediate necessity is to avoid being tempted by the unbridled sexuality of women that could deviate a person from his path to salvation. Also, while in the Pancatantra the issue associated with women is resolved by the main characters of the narrative itself (usually the male counterpart), in Jātakas most of the stories require the need of a mediator, who is almost always the bodhisattva, and the very introduction of bodhisattva helps in assimilating Buddhist philosophy and theology within the framework of a fable. Pancatantra similarly utilizes the stories as a means of pedagogical tool to teach worldly matters and practical wisdom.

 

Taking some more examples from Pancatantra, we find certain attitudes in the text towards women in different stories of the text. For example, in the very popular story of Book IV, ‘Monkey and Crocodile’ (which is also found in Jātakas), the wife of crocodile and her female friends are presented as evil and crafty, who plot to kill her husband’s friend, the monkey. In the next story in the same chapter, ‘An Ass Without Ears and Heart’ where King Lion orders his minister Jackal to get an ass for him, Jackal goes to a village, finds a distraught ass, lures him of female asses in jungle and brings him to the lion. In this story female asses are presented as mere sexual objects. The only positive agency provided, if any, to women is either as a devoted and servile wife or a mother. But even a wife is seen with grave suspicion for her moral conduct. These reiterate the idea that a woman can remain moral and chaste only under strict control and regulation of a man. This poses multiple problems; firstly, there is so much emphasis on norms of “chastity”. In one of these stories, women are punished for committing adultery, by losing her nose. That particularly story is most explicit in its anti-women polemics.

 

“If the weather is unpleasant or the lanes are choked by rains

Husband has gone away to foreign land

This is ideal condition for a woman of bad character”[27]

 

“All those illusions possessed by great demons, are well known by women

Women traps men by laughing, crying, through sweet talks etc.

She can falsify truth and vice-versa

How can a man protect himself from such an illusionary woman?”[28]

 

Talking about the Jātakas, the stories are garbed in religious philosophy but still has clear despicable attitude towards women. In “Cula Paduma Jātaka”, we get accounts of despicability of women through story of an adulterous wife who sorts to adultery with a criminal and attempts to kill her husband, even though her life was saved earlier by the husband. The story also provides justice and punishment- husband survives, is later installed as king and order her killing[29]. In “bandhana mokkha Jātaka”, queen commits adultery with each royal messenger who came for her welfare in absence of her husband. The story makes its intentions very clear at the end of the narrative-

“The passions of woman are insatiate

And she does but act according

To her inborn nature”[30]

These stories thus act as an agent for reinforcing time and again the “strīsvabhāva”, promiscuous, untrustworthy and adjectives like this. While accessing the role of women, every assessment becomes relative. Thus, Jātakas can be compared to brahmanical sources and here we find a comparative better condition and better scope for mobility but if we compare the condition of men and women, cracks begin to appear. In most cases we find women workers as impoverished, like in Ummadantī Jātaka, conversely, these low status women are also shown to be more mobile than the ruling class or high status women, who are often depicted in a state of vulnerability and protection, often resisting public gaze[31].

 

Thus, we find that though these texts tell us a lot about gender and status of women, we should not take the category of women for granted or generalize their condition as even the women within the same texts and between two different texts, are divided among class, caste, economic status and other lines of differentiation. So the status of women is meager and unstable in a patriarchal society but the degree of negotiations and compromises within the structure depend upon these and other external factors as well as interplay between these factors and the power structure. This also suggests that “where there is power, there is resistance”. But these texts skillfully omits any sign of resistance on the part of women in the text which itself suggest a lot regarding the composition and purpose of these texts. Also, we can point out in our assessment that even if we find agency of women in Jātakas (much less positive agency reflected in Pancatantra) is exercised within the structure. All the compromises, negotiations, resistance and agency of women exist within the structure of patriarchy. There have never been enough attempts to challenge the structure which carries these norms and which has kind of naturalized the institution of patriarchy. Pancatantra is a strong part of our pedagogical and knowledge system but we don’t realize how by reading those “children’s fables” we are subconsciously imbibing norms and values that are discriminatory and that eulogizes gender differences. In modern times, we may not have read any Veda, any Dharmaśāstras but we all know the stories of Pancatantra and Jātaka. And a prescriptive text of ancient period, in my opinion becomes even more dangerous.

In conclusion I would like to recall certain points discussed in the 1st part of the essay. The “inter textuality” of the text and the popularity of the text ensure that these travelled far and wide creating different discourses. This is how in these discourses, in these retellings, oral narrations, these texts get naturalized and these texts conversely naturalize the norms it reflects. This is how as Nivedita menon pointed out, culture and society reinforces patriarchal institutions. Another point to make is the repression of sexuality pointed out by Foucault. Both these texts repress sexuality but their intentions are different from each other. While in Pancatantra the site of repression is house hold in most cases, Jātakas focus on the renunciatory tradition and the site of repression is heterogeneous urban milieu as well as the monasteries. Apart from being a site, repression also act as a medium for higher goals for men. Repression of sexuality helps in achieving kingship or various material gains in Jātakas repression is meant for spiritual gains. But in both cases, or rather we should say in almost all cases the onus of sexual propriety always falls on women.

Finally, we don’t find role of women in compiling any of these texts which gets reflected in the attitude of authors towards women. While in modern times, there have been attempts of alternative readings and interpretations of other such ‘patriarchal’ texts like Rāmāyana and Mahābhārata which tries to give greater agency to women, such attempts are not yet prominent for Pancatantra and Jātakas. Modern feminist scholar Suniti Namjoshi has rewritten some of the Pancatantra fables as ‘Feminist Fables’ published in 1981. In one of the story she has introduced the Blue Donkey, replacing the Blue Jackal in original Pancatantra. Suniti’s female Blue Donkey, whose color sets her apart as a strange creature, can stand for many things—the figure of the female writer, or of those discriminated against for their sexual choices or the color of their skin, a creature who makes those around her uneasy because they don’t know where to place her[32]. More such works are needed to deconstruct and demystify the structure of patriarchy that prevails over such work. An even more difficult task is to deconstruct and to challenge the structure that we have inherited through our culture that we carry with us, our language, food, dressing, behavior etc that is all dictated by patriarchy. To challenge that is in a way is to challenge and introspect our own existence, our own culture, our own behavior. But that introspection can widen our horizon to the more broad understanding of gender, which then goes beyond the narrow compartmentalization of men and women, to understand what lie beneath the structure.

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

Bibliography

 

Primary sources-

  1. Pancatantra translated by basant singh bhring; Rigubhadra prakashan; 2000; New Delhi
  2. Jātakas volume 1: Buddha’s stories for young and old” translated by Todd Anderson; Buddha dharma education association inc.; 1994; USA

Secondary sources-

  1. Roy, Kumkum- “the power of gender and the gender of power”; 2010; oxford university press; New Delhi
  2. Singh, Dhananjay- “fables in the Indian narrative tradition”; 2011; D.K. print world pvt.ltd. New Delhi
  3. Kaul, Shonaleeka (ed.) – “cultural history of early south Asia: a reader”; 2014; orient black swan; New Delhi
  4. Singh, Upinder- “a history of ancient and early medieval India”; 2009; Pearson Longman; New Delhi
  5. Nath, Vijay- “the Puranic world: environment, gender, ritual and myth”; 2009; manohar publishers; New Delhi
  6. Dharwadker, Vinay (ed.) – “the collected essays of A.K. Ramanujan”; 1999; oxford university press; New Delhi
  7. Foucault, Michel – “the history of sexuality volume 1: an introduction”; 1978; Pantheon books; New York
  8. Lerner, Gerda- “the creation of patriarchy”; 1986; oxford university press; New Delhi
  9. Menon, Nivedita- “seeing like a feminist”; 2012; Zubaan and Penguin books India; New Delhi

 

Articles-

  1. Shinde, sucheta- “Panchatantra: Critical Analysis from Feminist Perspective”; EUROPEAN ACADEMIC RESEARCH Vol. II, Issue 10/ January 2015
  2. Rege, Sharmila- “Institutional Alliance between Sociology and Gender Studies: Story of the Crocodile and Monkey”; Economic and Political Weekly, Vol. 32, No. 32 (Aug. 9-15, 1997)
  3. Mehta, Tania- “The Changing Configurations of the Indian Short Story: Sites, Space and Semantics”; Indian Literature, Vol. 48, No. 2 (220) (March-April 2004)
  4. Jain, Jasbir – “ek tha raja, ek thi rani: patriarchy, religion and gender in religious kathas”; India International Centre Quarterly, Vol. 31, No. 1 (SUMMER 2004)

 

 

 

 

 

 

[1] Julia Kristeva-“the bounded text” and “word, dialogue and novel” cited in dhananjay Singh-“fables in the Indian narrative tradition” pp 164

 

[2] Roland Barthes-“from work to text” cited in ibid.

[3] Dhananjay Singh- “fables in the Indian narrative tradition”

[4] Tania Mehta- “The Changing Configurations of the Indian Short Story: Sites, Space and Semantics”

[5] Kumkum Roy- “representing the courtesanal tradition: an exploration of early historic texts” in Roy’s “the power of gender and the gender of power: explorations in early Indian history”

[6] Ibid- “the other kshetra: some aspects of procreation and peasantization in north India (2nd century bce-2nd century ce)

[7] Vijay Nath- “women as property and their right to inherit property” in “the Puranic world”

[8] ibid

[9] ibid

[10] Uma Chakravarti- “the Jataka as popular tradition” in shonaleeka kaul (ed.) “cultural history of early south asia”

[11]  Anand k. coomarswamy quoted in ibid.

[12] Ibid.

[13] Jasbir jain- “ek tha raja, ek thi rani: patriarchy, religion and gender in religious kathas”

[14] ibid

[15] A.K. Ramanujan- “Tell It to the Walls: On Folktales in India Culture” in “the collected essays of A.K. Ramanujan”

[16] A.K. Ramanujan- “A Flowering Tree: A Woman’s Tale” in ibid.

[17] Acharya deepankar- “introduction” in “Pancatantra” translated by basant Singh bhring

[18] Sucheta shinde- “Panchatantra: Critical Analysis from Feminist Perspective”

[19] Anuradha Sharma referred to in ibid.

[20] Michel Foucault- “history of sexuality volume 1”

[21] Nivedita menon- “Seeing like a feminist”

[22] Gerda Lerner- “the creation of patriarchy”

[23] Michel Foucault- “The order of things”

[24] Sigmund Freud- “the collected works of Sigmund Freud”

[25] Pancatantra- (1:2:111)

[26] Pancatantra- (3:8:147-49)

[27] Pancatantra- (1:4:184-87)

[28] Pancatantra- (1:4:194-209)

[29] Jātaka stories in “Buddha’s tales for young and old volume 1”

[30] Cited in Uma Chakravarti-“the Jātaka as popular tradition”

[31] Kumkum Roy- “engendering the urban world”

[32] Suniti namjoshi referred to in sucheta shinde’s “Panchatantra: Critical Analysis from Feminist Perspective”