मेरी आँख का काँटा….

मेरी आँख का काँटा मेरी आँखों को चुभता तो है पर दूसरो के आँखों में ज़रा सी धूल मुझे अधिक बेचैन कर देती है. वो धूल इसलिए अधिक दिखती है क्यूंकि दूसरो को परखना खुद को परखने से बहुत सरल होता है. और हो भी क्यूँ न, ये हमारे अहं की तृप्ति जो करता है. अपने स्वयं को जिस सांचे में ढाल लिया है हम चाहते है दुसरे भी उसिसांचे में ढल जाए. एक आस्तिक एक नास्तिक को हेय दृष्टि से देखता है और नास्तिक व्यक्ति सामने वाले को मुर्खाधिराज की उपाधि देने में देर नहीं लगाता. हेगेल ने कहा था कि “हर विचारक के अनुयायी यही समझते है कि उन्ही को एकमात्र सत्य व सर्वगुण संपन्न दर्शन की प्राप्ति हुई है, और यही कारण है कि वो अन्य सभी दर्शनों को हीन व अधूरा मानते है. ये अनुयायी इस विचार से प्रेरित है कि इनका दर्शन अपरिवर्तनीय, संपूर्ण व अंतिम सत्य है, इससे आगे कुछ और नहीं जानने को और इसके अलावा कोई और मार्ग नहीं है जानने का. अतएव ये सत्य प्रश्न व शंकाओ से परे है और किसी भी  आलोचना से इस ज्ञान की रक्षा आवश्यक है. ये दार्शनिक कदाचित ये नहीं समझ पाते कि सत्य की अनेकानेक परिभाषाएं वास्तव में सत्य का विस्तार करता है”.

मेरी आँख में लगी धूल  तुम्हे दुखी नहीं करती है ये तो तुम्हारा तरीका है अपनी शक्ति और सामर्थ्य के प्रदर्शन का. पावर हर जगह है बस हम कैसे उसका इस्तेमाल कर सकते है इसके बहुत से तरीके है. मेरी आँख में धूल के कण हम ढूंढें न ढूंढें लोगों के दिलो में कांटे ज़रूर बो देते है. और इस कटुता को छुपाने के बहुत से बहाने है हमारे पास- “मैं तो सच बोलने में यकीन रखता हूँ. सच तो हमेशा कड़वा होता है”. जी नहीं बंधु सत्य हमेशा कड़वा हो ये आवश्यक नहीं, काफी कुछ बोलने वाली की नीयत पर निर्भर करता है. जो दिल दुखाकर पूछते है कि “मैंने कुछ गलत बोला क्या?” जी हाँ बंधु. कई बार दोस्त हंसी मज़ाक में दूसरो को गालियाँ भी दे देते है और कोई बुरा नहीं मानता और कई बार हलकी फुलकी कोई छोटी सी बात बहुत गहरी चुभ जाती है. बोलने वाले की नीयत और सुनने वाले की सहनशीलता दोनों की परीक्षा है ये.

हाँ ये बात सत्य है कि ये बताना सम्भव नहीं कि कोई व्यक्ति आपकी किस बात पर बुरा मान ले. ये बताना कदापि संभव नहीं कि सामने वाला व्यक्ति आपकी बात को किस तरह ग्रहण करता है. “बुरा मान जाना” या “आपत्ति होना” अपने आप में एक मनोविज्ञान है जिसमे विस्तृत विमर्श की आवश्यकता है, और इसलिए इस विषय को अगले लेख के लिए छोड़ देना बेहतर है. फिलहाल प्रश्न ये उठता है कि तेरी आँखों का मैल मेरी आँखों के कांटे से अधिक क्यूँ चुभता है. क्या इसलिए कि मेरी आँखों के कांटे ने मुझे इस कदर अँधा कर दिया कि अपनी आत्मा का अस्तित्व हमें नज़र नहीं आती. हम एक ऐसी ज़िन्दगी जी रहे है जो हम अपने आप के लिए नहीं बल्कि दूसरो के लिए जीते है, हर ख़ुशी को हर गम को तोलकर देखते है दूसरो के साथ. तो अगर मेरी एक आँख फूटी है तो मेरे पडोसी की दो फूट जाए. मेरे ६० नंबर बुरी बात है, मेरी दोस्त के ५५ आये दिल को थोडा सुकून मिला, खुद की आशाओ से हार गया लेकिन सामने वाले से तो जीत गया. मेरा अस्तित्व अस्तित्व कम अहं अधिक है. और शायद इसलिए हम दूसरो की आँखों का धूल  देखते है कि अपनी आँखों के कांटे से अपना ध्यान हटा सके.

हम सब नेता बनना चाहते है हमारे एक भैया कहते है. सच भी है, हम अपना ज्ञान तब तक अधूरा मानते है जब तक १० लोगों के सामने उसका पांडित्य प्रदर्शन न कर ले. ऐसे में ज्ञान का उद्देश्य हमारे अहं की तृप्ति हो जाती है. दूसरो के समक्ष खुद को ज्ञानी साबित करना, बेहतर साबित करना अपने आप में अलग अनुभूति है. वास्तव में हम पूरे संसार को या तो अपने प्रतिरूप के रूप में देखना चाहते है अथवा अपने अनुयायी के रूप में. मैं भी क्यूँ लिख रहा हूँ शायद इसलिए कि आप मेरी वाहवाही करे. आलोचना करेंगे तो मैं उसका प्रतिकार करूँगा क्यूंकि आपने मेरे लेख में मेरी आँख की धूल देख ली अब आपके कमेंट्स में आपके आँखों की धूल देखूंगा.

बाइबिल के न्यू टेस्टामेंट के गोस्पेल ऑफ़ मैथ्यू के सातवे अध्याय में लिखा है बहुत खूब-

१.Judge not, that ye be not judged.
२ .For with what judgment ye judge, ye shall be judged: and with what measure ye mete, it shall be measured to you again.
३.And why beholdest thou the mote that is in thy brother’s eye, but considerest not the beam that is in thine own eye?
४.Or how wilt thou say to thy brother, Let me pull out the mote out of thine eye; and, behold, a beam [is] in thine own eye?
५.Thou hypocrite, first cast out the beam out of thine own eye; and then shalt thou see clearly to cast out the mote out of thy brother’s eye.

मुझे नहीं लगता इन पंक्तियों को समझाने की आवश्यकता है. हाँ भले ही लोगों को जज करना एक सामान्य मानवीय क्रिया भी हो सकती है, और इसमें कोई गुरेज़ भी नहीं, बर्शते नीयत सही हो. हर इन्सान अन्दर ही अन्दर इस बात से वाकिफ होता है कि उसने कोई बात क्यूँ कही है. तो कृपया-“तुम नाराज़ क्यूँ हो गए, मैंने ऐसा क्या कह दिया” वाली भोली शक्ल वाला दिखावा न ही करे तो बेहतर है. क्यूंकि फिराक गोरखपुरी जी बहुत सही कह गए है-

“जो मुझको बदनाम करे है काश वो इतना सोच सके;

मेरा पर्दा खोले है या अपना पर्दा खोले है”

इन सब बातों ने मेरी आदत छूटेगी न आपकी, बस इतना तो कर ही सकते है कि दूसरो की आँखों की धूल को देखते देखते कभी कभी अपनी आँखों से काँटा निकले का भी प्रयास कीजियेगा.क्या पता आँखों के मैल से अधिक भी कुछ दिखने लगे. और वो नहीं गाहे बगाहे कभी कभी अपने गिरेबान में भी झाँक कर देख लेना, क्या पता दूसरो के मीन मेख खोजते हुए अपने मन में कितनी कालिख पोत दी हो हमने. और ख़ास तौर पर उन लोगों के लिए जो दूसरो में कमियाँ खोजते है, किसी के व्यवहार में, किसी के विचार में, किसी के आचार में, और जिनको कुछ नहीं मिलता वो शक्ल-सूरत में कमियाँ खोजते है. विचार की कमी खोजने को आलोचना समझ सकते है लेकिन जो आपके शरीर का आपके रूप का मखौल उदय वो तो निरीह वैमनस्यता ही है.

बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय,

जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय।

नफरत का बाज़ार

  • -santosh kumar

हमारे दैनिक जीवन में निरंतर हमारा साक्षात्कार होता है तरह तरह के उत्पादों से, और उनको बेचने वाले अनगिनत विज्ञापनों से. इन विज्ञापनों के भरोसे इन उत्पादों की बिक्री होती है और कई कलाकारों का जीवन यापन होता रहता है. पर दुनिया में एक ऐसी चीज़ भी है जिसका उत्पादन धड़ल्ले से होता है, और उतनी ही धड़ल्ले से उसकी बिक्री भी होती है. जितना इसका उत्पादन होता है, उतना इसका प्रसार और इतनी इसकी मांग. इसके उत्पादन में कोई खर्चा नहीं होता पर इसके भरोसे विभिन्न लोगों की दुकाने चलती है. ये एक ऐसा बाज़ार है जिसका व्यापार कभी ठंडा नहीं पड़ता, यहाँ हर कोई उत्पादक है और हर कोई खरीददार. आईये आईये ये है नफरत का बाज़ार.

नफरत का बाज़ार लगा है

तुम भी आकर देख लो

सबके दिल में आग लगी है

हाथ तुम भी सेंक लो

जल जाने दो दुनिया को

बंद दिलो की किवाड़ो में

मौत के मंज़र खौफ का आलम

भर दो मन की किताबो में

एक बिगड़ी तस्वीर, एक झूठा तथ्य, शब्दों का मायाजाल यही सब काफी है चिंगारी भड़काने के लिए, काफी है हमारे अन्दर के पक्षपातो व दुर्भावो, हमारे अतार्किक भय को सामने लाने के लिए. हम बात मुहब्बत की करते है, पर विश्वास तो हमें नफरत पर अधिक है. ऐसा नहीं कि मुहब्बत करना बहुत खूब बात है, है तो ये भी एक सामाजिक संरचना पर जाने क्यूँ हमें नफरत करना बहुत पसंद है. पहले हम धारणाएं बनाते है, फिर उन्ही धारणाओ के आधार पर अपने व्यवहार को स्वीकृति देते है. कोई हमसे बेहतर है तो अहं से जन्मी नफरत, कोई हमसे कमजोर है तो हे दृष्टि में छुपी घृणा, कोई हमसे परिचित है तो एक तरह की घृणा (जैसी हम अपने रिश्तेदारों से करते है) कोई हमसे अपरिचित हो तो दूसरे तरह की घृणा (कभी मेट्रो या बस में किसी का हाथ छु जाए तो जो घृणा निकलती है). कोई मेरे धर्म का नहीं, कोई  मेरे वर्ण का नहीं, कोई मेरे वर्ग का नहीं, कोई मेरे जैसा नहीं इसलिए. और जिससे नफरत करने का कोई कारण न हो उससे भी नफरत करो…क्यूँ? “ऐसे ही”

हमारे विचार हमारी धारणाएं, हमारी सोच, हमारी पसंद सब एक परिपेक्ष्य में अस्तित्व में रहती है. पर जब ये विचार और धारणाएं, ये पसंद-नापसंद आपकी पहचान से जुड़ जाए, आपका अहं बन जाए तो हर विपक्षी, विरोधी विचार घृणा का आधार बनेगा. आपको अच्छे होने के लिए जाने क्यूँ किसी न किसी को बुरा होना आवशयक है. हम वास्तव में जानते ही नहीं कि हम नफरत क्यूँ करते है. क्या ये घृणा, उन लोगों के लिए भी जिनका हमसे दूर दूर तक कोई वास्ता नहीं है, और जिनको हम जानते भी नहीं, क्या वास्तव में घृणा है या हमारे अहं और कुंठा की अभिव्यक्ति है

नफरत का बाज़ार लगा है. यहाँ पर रंग बिरंगे चश्मे है. हर चश्मे से एक ख़ास रंग में रंगी दुनिया दिखाई देती है. यहाँ पर डिक्शनरी भी है. नफरत को शब्दों के जाल में डाल कर एक माला पिरो दो. नफरत की भी एक शब्दावली है, जिसको कुछ नहीं आता उसको भी ये शब्दावली बखूबी आती है. अच्छा यहाँ एक स्केल मिलेगा, मापने के औज़ार भी, पूरी दुनिया को अलग अलग टुकडो में बांटने के बहुत काम आएगी. अच्छा ये जानवर हमारा, वो जानवर तुम्हारा, ये रंग हमारा वो तुम्हारा, ये शब्द हमारा वो तुम्हारा, पूरी दुनिया को बांटकर अपने टुकडे को सच्चा टुकड़ा घोषित कर देंगे. नफरत का बाज़ार लगा है, बहुत भीड़ है पर बाज़ार भी तो बड़ा है. मैं भी सुबह उठते ही कुछ नफरत मोल लेता है और रात को आँखे बंद होते ही वो नफरत अपने दिल में सहेज लेता हूँ.

कितनी नफरत खरीदी मैंने

कितनी और अभी बाकी है

कितना अँधियारा फैला है

दीये में तेल कितना बाकी है

चलो अपनी नफरत की खुराक ले ले. फिर मेट्रो में किसी यात्री से लड़ेंगे, फिर क्लास के किसी बच्चे की चुगली करेंगे, किसी का मज़हब किसी की जात, नफरतों की सारी बात. स्टॉक ख़तम हो गया कहीं तो सोचने पर बाध्य हो जायेंगे- कि हम आखिर है क्या, नफरत के सौदागर या इस बाज़ार के एक ग्राहक. क्या पता किसी दिन किसी सड़क पर खुद ही को देख लूँ, एक नयी नफरत को नए शब्दों में, नए दूकान के नए बोर्ड लगाकर, चीख चीखकर बेचते हुए. और उस दिन हमें विश्वास हो जायगा कि  ये दुनिया कुछ और नहीं बस एक नफरत का बाज़ार है. काश ये दिन कभी न आये वरना खुद से भी नफरत हो जायगी. दूसरो से नफरत करके तो ज़िन्दगी चल जाती है, खुद से नफरत करके कैसे जियेंगे पता नहीं. तो भटकते रहो उन्ही गलियों में जब तक या तो बाज़ार ख़त्म हो जाए या खरीदने की औकात.

दिल में अपने पत्थर भरने

का अचूक औज़ार है

आओ आओ जल्दी आओ

ये नफरत का बाज़ार है.

 

 

 

सवाल क्या है…..?

-संतोष कुमार

सवाल क्या है?…. ये सबसे विकट सवाल है आज का. और ये सवाल सबसे है- अपने आप से, आप से, शायद सब से.हम सब के मन में हर दिन जाने कितने विचार जन्म लेते है, कितने द्वन्द, कितने सवाल, कितने विचार, कितने ख्याल. खुद से सवाल पूछते है और खुद ही जवाब देने का प्रयास करते है. पर वो ज्ञान ही क्या, जो  आप तक सीमित रहे, वो ज्ञान ही क्या जो आप औरो को न बता सके. उस ज्ञान के क्या मायने जब तक लोग आपको ग्यानी न समझे. हमारे विचार, हमारे ख्याल, हमारा ज्ञान हमारे लिए नहीं, औरो के लिए है. एक प्रदर्शनी है विचारो की. सिर्फ अनुभूति काफी नहीं, अभिव्यक्ति आवश्यक है.  हेगल ने जब स्वामी-दास द्वन्द के विचार का प्रतिपादन किया था तब उस विचार का आधारभूत बिंदु यही था कि व्यक्ति तब तक अपनी स्वतंत्रता के प्रति आश्वस्त नहीं हो सकता है जब तक कि कोई अन्य व्यक्ति उसे स्वीकृति न दे. दास का होना और दास का व्यक्ति को अपना स्वामी समझना, व्यक्ति की स्वतंत्रता की अभिव्यक्ति है.

कहीं न कहीं हम भी कमोबेश ऐसे ही है. हमें भी तलाश है लोगों की जो हमारे विचारो को न केवल  सुने अपितु उसे निर्विवाद समर्थन भी दे. हम लोगों में अपने प्रशंसक व अनुयायी ढूंढते है. हम बहस करते है, चर्चा करते है न केवल इसलिए कि हमको लोगों से कुछ सीखना है, अपितु अपने विचार लोगों तक पहुचाने के लिए, और लोगों को अपना बुद्धिमता का स्तर बतलाने के लिए. इसी कारण हम ये भी मान लेते है अपने आप ही कि सामने वाला व्यक्ति हमसे कम बुद्धिमान है, उसका बौद्धिक  स्तर हमसे नीचे है. इससे दो विचार उभरते है हमारे मन में- एक कि सामने वाले व्यक्ति को ज्ञान देना हमारा नैतिक दायित्व है, और दूसरा क्यूंकि सामने वाला व्यक्ति हमसे कम बुद्धिमान है, ये हमारे विचारों को काटने में असक्षम है. समस्या तब होती है जब सामने वाला व्यक्ति भी आपके विषय में यही सोच रहा होता है. ऐसे में स्थिति कुछ ऐसी हो जाती है जहां दो व्यक्ति आपस में चर्चा तो करते है, लेकिन वो चर्चा ज्ञान की अभिव्यक्ति न होकर अहं की अभिव्यक्ति बन जाती है. कैसी होंगी वो सभा जहां सबके मुंह खुले हो, कान बंद, बुद्धि शिथिल और आत्मा मृत!!

प्रश्न उठाया ये था मैंने कि आखिर सवाल क्या है. किसी क्लास में, किसी सेमिनार में, किसी चर्चा में, किसी बहस में, हम सवाल तो पूछते है, और अच्छे सवाल पूछते है. पर क्या हम वास्तव में सवाल ही पूछते है? क्या हम वास्तव में जवाब ही जानना चाहते है? जब हम किसी से उसकी राय मांगते है तो क्या हम वास्तव में उसकी राय जानना चाहते है?  लगता तो नहीं है. जिस तरह सवाल पूछे जाते है, वो सिर्फ सवाल नहीं होते है, प्रश्न में लिपटा प्रदर्शन होता है. अपने ज्ञान का प्रदर्शन. सवाल तो सिर्फ एक लाइन का होता है, पर उसकी व्याख्या करने में ५ मिनट लगा देते है. मतलब साफ़ है, जवाब नहीं चाहिए बस ये कह दो कि जो हम कह रहे है वो सही है या वो ही सही है. सवाल पूछने के लिए व्यक्ति को ये  स्वीकार करना आवश्यक है जवाब देने वाला उस विषय में कम से कम उससे ज्यादा जानता है. पर अपने ही दोस्तों, निकट संबंधो के बीच इस बात को स्वीकार कर लेना मुश्किल है. हमारा अहं इस प्रक्रिया में आड़े आ जाता है. हम चाहे भी कितने भी अच्छे दोस्त हो ये स्वीकार करना बड़ा कष्टदायक होता है कि मेरा दोस्त मुझसे ज्यादा जानता है. तो हमारे सवाल वास्तव में सामने वाले के तर्क को काटना व उसका प्रत्युत्तर देकर सामने वाले को आपके प्रभुत्व को स्वीकार करने की परिपाटी बन जाती है. और जब हम किसी को अपने से अधिक ज्ञानी मान भी लेता है तब भी हमारा औचित्य ज्ञान अर्जित करने से अधिक उनकी नज़र में अपने लिए इज्ज़त पाना होता है. आप उनको ये एहसास कराना चाहते है कि आप भी कम ज्ञानी नहीं है. उनको भी, दूसरो को भी और सबसे बढ़कर खुद को भी.

क्लास में एक प्रतिद्वंदिता का माहौल बन जाता है, जहां जब कोई एक सवाल पूछता है (दूसरे अर्थो में अपने ज्ञान का प्रदर्शन करता है) तो दिल में एक बेचैनी घर करने लगती है, दिमाग सवालों का निर्माण करने का भीषण प्रयास करने लगता है, आँखों से इर्षा टपकती है, मुंह से अहंकार. और सवाल भाषा की चाशनी में लिपटी अहं की तृप्ति बन जाती है. और इस प्रयास से जब इंसान बाहर  निकलता है तो खुद ही से सवाल करता है. भाई ये बताओ कि सवाल क्या था….?

सवाल क्या है…..? ये ऐसा सवाल है जिसका जवाब मेरे पास तो नहीं है. आपके पास हो तो बताये.

कर्मभूमि

-santosh kumar

 

राजेश अपनी उम्र के युवको की भाँति ही निरुद्देश्य सा था. बीटेक  किया फिर एमबीए और अब यूपीएससी की तैयारी कर रहा था. पर उसको पता था की उसका मन कहीं नही लगने वाला. उसके पापा आर्मी मे मेजर थे इसलिए राजेश फौज के तौर तरीक़ो से सर्वथा परिचित था. पर फौज से उसे कोई लगाव हो ऐसा नही था. उल्टा फ़ौजियो की शराब पीने की आदत उसको उनसे  दूर ले जाती थी. जब भी कोई जय जवान के नारे लगता तो उसे अजीब सा लगता. देशभक्ति सेना की मोहताज हो, वो ऐसा नहीं मानता था. सच तो ये था कि उसने अपने आसपास के फ़ौजियो मे रत्ती भर देशभक्ति नही देखी थी. अपने पापा मे भी नही. वो सोचता था- “काश लोगों को देशभक्ति का अर्थ मालूम होता”.

दो बार यूपीएससी दिया पर दोनो बार असफल. एक तरफ उम्र निकली जा रही थी, अब अगले साल 25साल का हो जायगा और फौज मे 25 के बाद ऑफिसर्स की भर्ती नही होती. एक धुंधली सी आशा देखकर राजेश के पिता ने आग्रह किया की इस बार यूपीएससी के साथ सीडीएस  की भी परीक्षा दे दे. राजेश ने भी पिता की बात का मान रखा. उसने दोनो परीक्षाओ की तैयारी की परंतु दिल ही दिल मे ये प्रार्थना की कि उसका यूपीएससी प्रीलिम्स क्लियर हो जाए. सीडीएस  मे वो जाना  तो नही चाहता था लेकिन फिर  भी इस डर से पढ़ा कि अगर कम अंक आए तो पिता को दुख होगा. रिज़ल्ट आया और तीसरी बार  भी वो यूपीएससी मे नाकाम रहा. पर साथ ही वो सीडीएस  की परीक्षा में उत्तीर्ण हो गया.  पिता के चेहरे का रौब देखते ही बनता था. राजेश ने भी पिता की लाज रखते हुए सभी परीक्षाएं उत्तीर्ण की. सेना को ही अपना भविष्य मान कर शिरोधार्य किया.

ये राजेश के लिए नयी चीज़ थी, पर उसे ये आशा थी कि बीटेक एमबीए की तरह  वो ये भी कर लेगा. और उसने किया भी और साबित किया की वो हर स्थिति के अनुकूल खुद को ढाल  सकता है या यूँ कहे हर फील्ड मे हाथ आजमा सकता है. पर ज़िंदगी तुक्को से नही चलती ये बात भी उसको जल्दी ही  समझ में आ गयी

शुरुआती सालो मे तो उसे आसान पोस्टिंग मिली पर चेहरे पे मूँछ और वर्दी पे स्टार के साथ उसकी जिम्मेदारियां  भी बढ़ गये. एक तरफ तो शादी हुई परिवार भी हुआ. पहले पहले तो पत्नी भी राजेश के साथ जाती थी हर पोस्टिंग पर लेकिन इस बार उसकी पोस्टिंग संवेदनशील इलाको में हुई तो पत्नी और बच्चो ने राजेश के पिता के घर में ही रहने का फैसला किया. उधर बॉर्डर से लगे सेक्टर्स का नेतृत्व जब उसे दिया गया तो शायद उसे अंदाज़ा नहीं था कि उसका काम उसकी सोच से कहीं बढ़कर है. कई बार दुश्मनों से भी अधिक मुश्किलें आपके अपने लोग खड़े कर देते है.

एक  रात को अपने डायरी के पन्नो को भरते हुए उसका ध्यान गोलियों की तड़तड़ाहट से भंग होता है

हड़बड़ाकर उठता है, देखता है दोनो तरफ से गोलीबारी हो रही थी. उस वक़्त उनको रोकने का अर्थ था अपने सैनिको की जान खोना. उसने तुरंत सैनिको को दूर दूर छितर जाने का आदेश दिया पर ऑर्डर काफ़ी देर से आया. जब तक संकट हटा काफ़ी गोलियाँ चल चुकी थी. रात को गश्त लगाई गयी तो पता चला की आस पास के इलाक़ो मे दो आदमी मारे गये. कुछ घरो की दीवारे छलनी हो गयी थी. आम लोगो में दहशत का माहौल था. कुछ पड़ोसी देश को कोस रहे थे, कुछ सरकार को और कुछ अपनी किस्मत को.

“मुझे बताओ कल क्या हुआ था?” सुबह सुबह राजेश ने सबकी परेड लगाई. गरजकर पूछा “तुम्हे शूट करने का ऑर्डर किसने दिया? गिव मी एन आंसर damn it”

पड़ोसी देश ने हमला किया सर. हम तो चुपचाप खा रहे थे

और पी भी रहे थे. क्यूँ है या नही?

सबके कंधे लटक गये

सच सच बताओ पहले गोली किसने चलाई?

सर बताया तो. उन्होने चलाई. अभी तक तो प्रेस मे भी आ गयी होगी.

प्रेस में वही बात जाती है आर्मी के बारे मे जो हम बताना चाहते है. मैं सच जानना चाहता हूँ

हम अपने बयान पे कायम है सर. गोली उन्होने चलाई

अच्छा अगर पहली गोली उन्होंने चलायी तो तुमने किसकी परमिशन से गोली चलायी.  मुझसे बिना पूछे गोली कैसे चली?

सर सब इतनी जल्दी में हुआ कि रियेक्ट करने का समय नहीं था.

इस जवाब से न राजेश संतुष्ट था न बड़े अफसर. उन्हें इससे साज़िश की बू आ रही थी. इन्क्वायरी समिति बैठी. मामला गंभीर था. यद्यपि राजेश का इस प्रकरण में कोई हाथ नहीं था तथापि लापरवाही और नेतृत्व की असफलता को लेकर उसकी खूब भर्त्सना हुई और उसे भी वार्निंग दी गयी. राजेश इसे अपनी व्यतिगत पराजय मान रहा था. रह रह कर यही बात मन में आ रही थी कि वो सेना के लिए उपयुक्त नहीं है.

मीडिया में  रिपोर्ट गयी की पड़ोसी देश ने पहले गोली चलाई और इंडियन आर्मी ने जवाबी कार्यवाही की. पर इस रिपोर्ट पर खुद राजेश को विश्वास नही था. खैर बात आई गयी हो गयी.

 

कुछ महीनो बाद फिर गोलीबारी हुई. पर इस बार गोलीबारी बाहर नही अंदर हुई. एक सिपाही ने दूसरे सिपाही को गोलियो से भून दिया. सिपाही शराब के नशे मे धुत था पर गोलियों की आवाज़ से उसका नशा टूटा. सामने जो देखा तो विश्वास नही हुआ कि ये उसी का किया धरा है. हाथ से बंदूक छूट गयी. उसे पकड़ के लाया गया

राजेश ने उसे बंदूक के बट से मारा. यूँ तो सिपाही राजेश से बलिष्ठ था पर अपराध बोध के  के कारण उसने प्रतिकार नही किया

क्यूँ किया?

कोई जवाब नही

मुझे जवाब दो

पर कोई आवाज़ नही

कोई मुझे ये बताएगा  यहाँ क्या हुआ?

एक सिपाही आगे हुआ.

सर एक पुरानी बात पर  झगड़ा हो गया

कौनसी बात?

दोनो खूब पिए हुए थे. ये जो मरा है इसने नशे मे ताना मारा- “तूने ग़लत किया उस दिन बॉर्डर पे गोली चलाके”. उस दिन भी ये पिया हुआ था, दोनों तरफ से गालियाँ बाकि जा रही थी, लेकिन ये कुछ ज्यादा तैश में आ गयाऔर….. गोली चला दी

तो मैं सही था. अब समझ नही आता इसे किस बात की सज़ा दूं उस दिन की या आज की

गर्दन झुकाए सिपाही बोला- “आज जो किया है चाहो तो सर फाँसी चढ़ा दो कोई गुरेज़ नही. पर उस दिन जो हमने किया सही किया”.

सही किया?!! तुम्हारे कारण हमारे सिपाही मारे गए  दो सिविलियन मरे, हमारी बदनामी हुई…. क्या अच्छा किया?

देश का दुश्मन हमारा दुश्मन सर उनके साथ कोई हमदर्दी नही. मेरा बस चले तो एक एक को भून डालूं

तुम्हे यहाँ किस लिए रखा है सुरक्षा के लिए या हिंसा के लिए ?

आपको किनसे हमदर्दी है सर उनसे या हमसे?

क्या कहा!! गेट लॉस्ट फ्रॉम हियर. इसे हाउस अरेस्ट मे रखो. सुबह इसपर डिपार्टमेंटल एक्षन लिया जायगा

यस सर

और एक और बात…. वो बॉर्डर वाली बात…. किसी के सामने नही आनी चाहिए.  देश की बदनामी होगी.

आज राजेश को समझ नही आया की उससे क्या चूक हुई. उसको एहसास हुआ कि वो ज़िन्दगी के इम्तिहान में भी फेल हो गया. रह रह कर बातें याद आने लगी.   “मेरे होते हुए ऐसा कैसे… हाँ शायद एक बीटेक और एमबीए वाला दिमाग़ लोगो को नही संभाल सकता. तभी तो यूपीएससी में कभी निकल नही पाया. पापा के कारण मैने आर्मी ज्वाइन तो कर ली  पर शायद इस काम के लिए मैं नही बना. आई डोंट डिज़र्व दिस प्लेस. आई डोंट डिज़र्व एनीथिंग!!  अंदर से एक आवाज़ ये ज़रूर आई कि “भूल जा, ज़िन्दगी में ऐसे मौके आते रहते है, आज इतने सालो बाद ये कैसी बात लेकर बैठ गया ” पर उसपर नेगेटिविटी इतनी हावी हो गयी थी की उससे कुछ समझदारी की आशा बेकार थी.

रात के अंधेरे मे गश्त लगाने के बहाने बाहर निकला. बॉर्डर पर खड़े सिपाहियो को अचरज ज़रूर हुई पर कोई कुछ कह नही पाया. बॉर्डर के किनारे एक पहाड़ी रास्ता था. वहाँ से जाया जा सकता है. पर कहाँ. एक तरफ पड़ोसी देश का बॉर्डर  दूसरी तरफ सहमे दबे डरे लोग. कहीं भी तो जाया  नही जा सकता. जितना भी दूर जाऊ अँधेरा दूर नहीं होगा.

हां छुट्टी की दरख़्वास्त दी जा सकती है,पर अभी ऐसी घटना के बाद बहुत तनाव होगा ऐसे मे उसकी छुट्टियाँ मिलना मुश्किल है. राजेश का जी खट्टा हो गया. अब हर दिन बोझ था,  जैसे भार डाल दिया हो किसी ना और ढोने को कोई और कंधा ना बचा हो.

कई महीनो बाद आख़िर छुट्टी की अर्ज़ी मंजूर हो गयी.  दो महीने का अवकाश. लेकिन राजेश का मन घर जाने का नही था. जी तो चाहता था कहीं ऐसी जगह चली जाऊ कि लौट के यहाँ ना आना पड़े. घर का टिकट कटाया ज़रूर  पर घर पहुँचा नही. न ही वापस अपने पोस्ट पर रिपोर्ट की.  सबको लगा कही बीच मे फंस गये. उन दिन कुछ इलाक़ो मे भूस्खलन आया था वही कहीं फंसे  होगे. बहुत खोजा पर नही मिले. संपर्क का कोई साधन नहीं. फ़ोन, पर्स बैग सब बीच रास्ते छोड़ आया था. फ़ोन मिला पर्स मिला सामन मिला पर राजेश का कहीं अता पता नहीं लगा.

कई महीने बीत गये. फौज के अधिकारीयों  ने राजेश को भगोड़ा और देशद्रोही घोषित किया. उसे गुमनाम या शहीद भी माना जा सकता था बर्शते उसके होते हुए सिपाहियो का कांड ना हुआ होता. इस घटनाक्रम से उसकी बहुत किरकिरी हुई. उसकी भूमिका पर इंक्वाइरी भी बैठी थी पर कोई सबूत ना मिला. उसके भाग जाने से सबकी उँगलियाँ उसपर उठ गयी. मामले का सारा ठीकरा उसके ही सर पर फूटा.

 

*****

 कई साल बीत गये और किसी अनजाने गाँव में एकांत वास करते हुए बाबा को अब एहसास हो गया था की वो इतने सालो से ग़लत ही सोचता था. एक पल के अंधकार ने उसको कितने सालो तक अँधा कर रखा था. वो पूरे गांव को या यूँ कहे पूरे इलाके को बिना कोई हुकुम दिए बिना किसी सख्ती के संभाल  सकता है. जाने उस रात को वो नामुराद ख़याल कहाँ से आया.

“आज हमारी ख्याति कई गाँव मे फैल गयी है. पर क्या करे उस ख्याति का जब परिवार ही साथ नही. कोई अपना पास नही”. वो जानता था सरकार उसे दगाबाज़ और  देशद्रोही समझती है

तभी उनका एक अनुयायी उसका चिंतन भंग करता  है

बाबा शहर से कोई मिलने आए है आपसे

कौन है?

आपका आशीष लेने आए है

आने दो

“बाबा जी!” बाबा उठ कर देखते है और देखते ही उनकी आँखे भीग जाती है. सामने उसके पिता खड़े है. और साथ मे उसकी अपनी पत्नी!! यद्यपि घनी दाढ़ी के आवरण और साधू की वेशभूषा में उसे पहचानना बहुत मुश्किल था तथापि शर्म के मारे आधे चेहरे को चादर से ढक दिया.

“बाबा कई साल हो गये, मेरा बेटा गायब हुआ और फिर नही आया….पता नहीं जिंदा भी या नहीं”

एक पल तो बाबा को धक्का लगा . दिल तो चीख चीख कर कह रहा था कि मैं जिंदा हूँ. किसी तरह आँखों को भीगने और शब्दों को फूटने से रोका. शांतचित्त होकर बोले-“तो अपने बेटे को ढूँढ रहे हो. चिंता मत करो, तुम्हारा बेटा जिंदा है. एक पल के असंयम ने उसे अपने जीवन पथ से भटका दिया था पर जल्द ही वो लौटेगा तुम्हारे पास, धीरज रखो”

 

नही बाबा जी मैं जनता हूँ वो हमे याद करता होगा…. पर इतने साल मे इतना इंतज़ार किया की अब आशा ही खो दिया…. इसलिए…….

 

बाबा फिर बोले- “आशा कभी ना छोडना. तुम्हारा बेटा जल्द ही वापस आएगा”

 

“अब आकर भी क्या करेगा. जितना सहना था हमको सह लिया. बाबा जी  बहू की दूसरी शादी कराई. ये तो तैयार नही थी पर अब जा कर मानी है. पीछे खड़े युवक को इशारा करता है. “इनको आशीर्वाद दीजिए”.

 

बाबा देखते रहे बस देखते रहे और कोसते रहे उस दिन को मन ही मन. सोचा अभी चोगा उतार के बोलूं कि मैं आपका बेटा राजेश हूँ . पर कह नही पाया. उसने अपनी कर्मभूमि के साथ छल किया था, आज ज़िन्दगी उस छल का प्रतिकार ले रही थी.

अपनी ही पत्नी के सर पर हाथ रखके बोला “सौभाग्यवती भव:” पर आज ये आशीर्वाद उसके लिए नही था