विभाजन, हिंसा और साहित्य

  • सुकृति गुप्ता
  • एम.ए. हिस्ट्री

साहित्य ऐसे झूठ होते है जिनमें सच्चाई होती है और जब ये झूठ ऐतिहासिक पात्र बोलते है तो इन्हें पढना और भी ज़रूरी हो जाता है क्यूंकि कोई भी साहित्य शून्य में जन्म नहीं लेता. वह अपने इतिहास से प्रभावित होता है और अपने वर्तमान से भी, जो हमारा इतिहास बन चुका  है.

इतिहास अब राजाओ, शासनकालो और युद्धों का इतिहास नहीं रह गया है बल्कि ये मानवीय भावनाओ, उनके द्वारा झेली गयी त्रासदियों और अनुभवों का भी इतिहास है. इस सन्दर्भ में जब हम विभाजन और विभाजन के दौरान हुई त्रासदी की बात करते है तो इसके कई जवाब है- भारतीय जवाब, पाकिस्तानी जवाब, ब्रिटिश जवाब आदि. हर जवाब अपनी ही अलग विचारधारा से दिया गया है पर यदि हम उस दौर की त्रासदी को समझना चाहते है तो हमें उस दौर के साहित्य को देखना होगा क्यूंकि इतिहास जब अमानवीयता, द्वेष और हिंसा की बात करता है तो पीडितो की आवाज़ को सुनना ज़रूरी हो जाता है. हालाँकि यदि स्मृति के रूप में देखा जाए तो शायद वह आदर्श प्रतीत न हो पर हिंसा का अध्ययन किया जाता है तो सटीक स्मृति के बजाय कराहटें अधिक महत्त्वपूर्ण हो जाती है, जिनकी अभिव्यक्ति हमें साहित्य में  मिलती है.

इस सन्दर्भ में जब हम लोकप्रिय साहित्य पर गौर करते है उनमे उपमहाद्वीप के नेताओ के प्रति आक्रोश नज़र आता है तथा वे उनपर आरोप लगते है कि वे शक्ति के संतुलन संबंधी विवाद को सुलझा नहीं सके. वरिष्ठ पत्रकार अजीत भट्टाचार्यजी भी इसका उल्लेख करते है कि किस प्रकार विभाजन कठोरता से और जल्दबाजी से किया गया था कि ठीक से सीमा रेखा भी तय नहीं की जा सकी थी और न ही इसके लिए ठीक तरह से व्यवस्था की जा सकी थी. वे इस बात का उल्लेख करते है कि किस प्रकार तत्कालीन प्रधानमंत्री “वास्तविकता की गहराईयों” को छु नहीं सके थे और उनके इस भ्रम (self delusion) के सन्दर्भ में उन उक्तियों का उल्लेख करते है जो उन्होंने लियोनार्ड मोस्ले से १९६० में कही थी- “हम थके हुए आदमी है और हम में से बहुत कम ही है जो जेल जाना चाहते है और अगर हम  भारत की एकता के लिए खड़े होते है- तो हमें जेल जाना ही होगा. हमने पंजाब में लगी आग को देखा है, लोगों को मरते देखा है. विभाजन इससे बाहर निकलने का रास्ता था इसलिए हमने उसे अपनाया. हम उम्मीद करते है कि विभाजन अस्थायी होगा तथा पाकिस्तान को हमारे पास आने को बाध्य होना पड़ेगा.

विभाजन का इतिहास लोगों की जिंदगियों तथा उनके अनुभवों का इतिहास है. १९४० की घटनाओ को किस प्रकार उनकी पहचान से जोड़ दिया गया, उसका इतिहास है और अनिश्चितताओ जिन्होंने विभाजन को जन्म दिया या उसे थोपा, का इतिहास है. इस सन्दर्भ में मंटो प्रासंगिक प्रतीत होते है. वे अपने लेखन में विभाजन के दौरान हुए महाध्वंस की कहानियां कहते है. आलोक भल्ला विभाजन पर लिखी कहानियों को “सांप्रदायिक कहनियों” की संज्ञा देते है जिसके सन्दर्भ में वे कहते है कि इनमे पक्षपात है तथा ये दोनों और कि कहानियों को ठीक तरह से बयाँ नहीं करती.

वीना दास तथा आशीष नंदी का कहना है कि “विभाजन पर लिखा गया ज़्यादातर साहित्य अप्रमाणिक है क्यूंकि एक तरफ की हिंसा को दूसरी ओर से संतुलित करने का प्रयास किया गया है. और इसीलिए हिंसात्मक और अमानवीय  व्यवहारों के वर्णन में हमें समानता नज़र आती है, और फिर चाहे कोई ट्रेन लाहौर से आ रही हो या अमृतसर से, यदि एक वेश्या दो औरतो को पनाह देती है तो उनमे से एक हिन्दू और दूसरी मुस्लिम होगी.

पर मंटो इस सन्दर्भ में भिन्न प्रतीत होते है. उन्होंने खुद विभाजन का दर्द अनुभव किया था. वे कोई राजनीतिज्ञ नहीं थे तथा उन पर कोई विचारधारा हावी नहीं थी. उनकी मानवीयता किसी भी तरीके से धार्मिक लेबल को स्वीकार नही करती तथा क्रूरता तथा हिंसा को बर्दाश्त करने का विरोध करती है, जो उन्हें उनके समकालीनो से भिन्न बनाती है. जहाँ बाकि मर्द मार पीट कर रहे थे, औरतो की बेइज्ज़ती कर रहे थे, लोगों का खून कर रहे थे वहीँ मंटो अपने तंगी के दिनों में सस्ती वाली दारू पी रहे थे तथा इतनी दारु पीने के बाद भी  होश संभाले हुए थे.

वे एक स्वतंत्र विचारक थे जो उनके कथन से ज्ञात होता है- “ज़िन्दगी को वैसे ही दिखाना चाहिये जैसी वह है, न कि वो कैसी थी, कैसी होगी या कैसा होना चाहिए.” (Life ought to be presented as it is, not as it was or as it will be or should be) बम्बई शहर, जो उन्हें बेहद प्रिय था तथा जिससे वे बेहद प्यार करते थे, उन्हें छोड़ना पड़ा. वे मरते दम तक उसके लिए तरसते रहे. उन्हें विभाजन के बीज सिनेमा जैसे अधार्मिक क्षेत्र में भी नज़र आने लागे थे. उन्हें जब पता चलता है कि अशोक कुमार, जिनके साथ वो बॉम्बे टॉकीज में काम करते थे, को धमकी भरे पत्र (हेट मेल) मिल रहे है तथा उन पर आरोप लगाया जा रहा है कि वे कंपनी में मुस्लिमो को शामिल करने के लिए ज़िम्मेदार है, तो वे बहुत द्रवित होते है. उनका दिल टूट जाता है कि जो लोग उन्हें सआदत हसन मंटो की नज़र से देखते थे, उन्हें अब मुस्लिम की नज़र से देख रहे है. और इन सबसे तंग आकर वो पाकिस्तान चले जाते है जिसे वे जानते भी नहीं थे. उनकी इस टीस की अभिव्यक्ति हमें “टोबा  टेक सिंह” में मिलती है जिसमे अस्पतालों के अलावा बाकि बाहर की दुनिया पागल हुए जा रही है. उपमहाद्वीप के नेता इतने पागल हुए  जा रहे है कि वो पागलो की भी अदला बदली कर रहे है. ये पागल वो मुस्लिम है जिन्हें पाकिस्तान वापस लाया जा रहा है और जो गैर मुस्लिम है उन्हें भारत भेजा जा रहा है. इनमे अकेला बिशन सिंह जाने से इनकार कर देता है क्यूंकि वो पंजाब के एक छोटे से शहर टोबा  टेक सिंह में, जहां उसका जन्म हुआ था और उसके परिवार ने अपनी ज़िन्दगी जी थी, रहना चाहता था. वह न तो पाकिस्तान में और न ही भारत में बल्कि टोबा  टेक सिंह में रहना चाहता था. उनकी कहानी “मोज़ील ” धर्म के प्रभाव को उजागर करती है, साथ ही उसपर व्यंग्य भी करती है. मोज़ील का निर्वस्त्र बिना वजह मर जाना धार्मिकता को बिना वजह धारण करना है जो कि त्रिलोचन की पगंडी में निहित है. मोज़ील के इस कथन से इस बात की पुष्टि होती है जब वो कहती है “अपने इस धर्म को ले जाओ”.

टिटवाल का कुत्ता (The dog of Titwal) में भी लोगों को पागलपन तथा शक्ति और अधिकारीयों पर व्यंग्य करते है. ये बता पाना कठिन है कि कुत्ता एक देशभक्त की तरह मारा गया या उन्होंने अपने देश के कठोर, धार्मिक बेवकूफी को मारा है. ऐसा प्रतीत होता है कि वे हिंसा में मनोरंजन का आभास करने लगे है.

उनकी कहानी “खोल दो” हिंसा की सारी सीमाएं तोड़ देती है. वे बुरे या  दुष्टता के सन्दर्भ में धार्मिक समुदाय की विचारधारा का विरोध करते है तथा ये दिखाते है कि दुष्ट लोग किस प्रकार अपनी लालसाओ को पूरा करने के लिए ऐसी स्थितियों का फायदा उठाते है तथा आपके मज़हब के लोग ही आपको धोखा दे सकते है. वे दिखाते है कि हिंसा का कोई धर्म नहीं होता तथा ये अमानवीयता का परिणाम है. “आखिरी सलाम” (the last salute) बिना वजह लड़ने की कहानी है. सैनिक खुद नहीं जानते कि वे क्यूँ ऐसे देश के लिए लड़ रहे है जो उनके लिए अनजान है. वो खुद नहीं जानते ई उन्हें सच में कश्मीर चाहिए या नहीं.

मंटो को कश्मीर बेहद प्रिय था जिसका उल्लेख वो पंडित नेहरु को लिखे अपने पत्र में करते है. उनकी बहुत सी कहानियां जैसे “आखिरी सलाम” और “टिटवाल का कुत्ता” का कश्मीर पर केन्द्रित है. वे छोटी छोटी खुशियों के लिए तरसते जान पड़ते  है. उदाहरण के लिए वे पत्र में शिकायत करते है कि शायद यह बब्बुगोशा का मौसम है. मैंने यहाँ बहुत से गोश खाएं  है पर बब्बुगोशा खाए मुझे बहुत अरसा हो गया”. वे पत्र में  स्पष्ट तौर पर नेहरु जी से नाराजगी जताते है, कश्मीर और विभाजन के मुद्दे को लेकर पर साथ ही ये भी ज़ाहिर करते है कि वे कितने असहाय है. उदाहरण के लिए वे खुद को “डेढ़ सेर का पत्थर” (किसी ने उन्हें बताया था कि मंटो का अर्थ डेढ़ सेर का पत्थर होता है) तथा उन्हें “नदी” (नेहरु अर्थात नहर/नदी) कहकर संबोधित करते है. पर साथ ही वे यह भी कहते है कि यदि मैं डेढ़ सेर के पत्थर की जगह एक बड़ा पत्थर होता तो उस नदी में खुद को गिरा देता जिसे अपने बहने से रोक रहे है ताकि आप अपने इंजीनियरो की टीम के साथ इस पत्थर को हटाने के लिए बातचीत करने पर मजबूर हो जाए. वे उनके  कश्मीरी होने की दुहाई देते है. वे शिकायत करते है कि आप बड़े आदमी है, भारत जो कभी मेरा देश था, के शासक है आप पर आप ने कभी इस आदमी की फ़िक्र नहीं की. वे शिकायत करते है कि किस प्रकार भारत में प्रकाशक उनकी कहानियां बगैर उनकी मंज़ूरी के छाप रहे है वो भी अजीबो-गरीब नामो के साथ. किस प्रकार उनका मज़ाक उड़ाया रहा है. वे कहते है कि वे उन्हें अपने किताब की एक प्रति भेजेंगे जिससे कि नेहरु उनकी कहानियाँ पढ़े (जिन्होंने कभी उनकी कहानियाँ नहीं पढ़ी थी) तथा कहते है कि मुझे पूरा  विश्वास है कि आपको मेरी कहानियाँ पसंद नहीं आएँगी.

मंटो की प्रिय मित्र इस्मत चुगताई  कहती है कि ‘सियाह हाशिये’ की व्याख्या करते हुए मुहम्मद हसन अस्करी ने कहा है कि मंटो अन्यायी को अन्यायी की तरह नहीं देखते तथा उनकी कहानियों से प्रतीत होता है कि हिंसा करने  वाले पात्र ईश्वर द्वारा बनाये गए है. इस्मत चुगताई ये स्पष्ट करती है कि वे ऐसा नहीं सोचते. वो अन्याय को अन्याय कहने से डरेंगे क्यूँ? वे अन्याय करने वालों का विरोध करते है. वे कहती है कि मैं जानती हूँ कि मंटो ‘सियाह हाशिये’ लिखते वक़्त हँस नहीं रहे होंगे और न ही उन्होंने ये कहानियाँ हमें हँसाने के लिए लिखी है.

मंटो स्वयं अपने लेखन के सन्दर्भ में कहते है- “लम्बे अरसे से मैं देश के बंटवारे से उपजी उथल पुथल के नतीजो को स्वीकार करने से इनकार करता रहा. महसूस तो मैं अब भी वही करता हूँ पर मुझे लगता है कि आख़िरकार मैंने अपने आप पर तरस खाए या हताश हुए बगैर उस खौफनाक सच्चाई को मंज़ूर कर लिया. इस प्रक्रिया में मैंने इंसान के बनाये हुए लहू के इस समंदर से अनोखी आब वाले मोतियों को निकलने की  कोशिश की. मैंने इंसानों को मारने वाले इंसानों की एकचित धुन के बारे में लिखा, उनमे से कुछ के पछतावे के बारे में लिखा जो समझ नहीं पा रहे थे कि उनमे अब तक कुछ इंसानी जज्बे बाकि कैसे रह गए. इन तमाम और इनके अलावा और भी बहुत सी बाते मैंने अपनी किताब सियाह हाशिये में लिखी है’.

आलोक भल्ला मंटो के काल के बारे में बताते हुए मंटो की कहानियों के सन्दर्भ में कहते है- “ये कहानियां उस आदमी के द्वारा लिखी गयी है जो ये जानता था कि इस प्रकार की तबाही के बाद किसी भी तरह से माफ़ी तथा उसे भुलाया जाना जाना सम्भव नहीं है. जिन्होंने इस हत्याकांड को देखा था वे महज़ खड़े रहकर अपने मरने का इंतज़ार कर सकते थे. विभाजन ने नैतिकता को इस प्रकार मिटा दिया था कि कुछ भी वापस पाना तथा किसी भी प्रकार की उम्मीद करना संभव नहीं था. भाषा ने बहकाने का काम किया, और आम लोग क्रूर तथा खूनी बन गए, दहशत को दृढ़तापूर्वक देखा गया जिससे कि हम ये समझ सके कि किस प्रकार हम सभी इस बर्बर विश्व के निर्माण में भागीदार थे और अब हमें कुछ भी नहीं बचा सकता.

१९१५ में जन्मे भीष्म साहनी भी विभाजन की इस त्रासदी के गवाह थे. उन्होंने अपना बचपन ‘रावलपिंडी’ में बिताया था तथा इंटरमीडिएट तक की पढाई भी वहीँ से की थी. यह वो क्षेत्र था जो १८५७ के विद्रोह का गवाह भी रह चुका था, जहाँ अंग्रेजो का दबदबा था तथा पाश्चात्य संस्कृति की अच्छी झलक मिलती थी. उन्हें इन सबका अनुभव था जिसका प्रमाण उनके उपन्यास ‘तमस’ में भी स्पष्ट तौर पर देखने को मिलता है. कांग्रेस के स्थानीय अफसर यहाँ आते रहते थे तथा समाज सुधारक भी जिसका उल्लेख वो अपनी आत्मकथा में भी कारते है- “यहाँ पर कांग्रेस की जुलूस भी निकलते, गुरुद्वारे और आर्य समाज के के भी, मुहर्रम के ताजिये भी निकलते. गाहे बगाहे सांप्रदायिक तनाव भी होता, मगर लोग आम तौर पर बड़े स्नेह भाव से एक दूसरे के धर्म की मर्यादाओ की कद्र करते हुए रहते थे.

वे कांग्रेस की रिलीफ समिति में भी काम कर चुके थे, जैसा कि वे खुद इसका उल्लेख करते है- “देश के बंटवारे के समय जब सांप्रदायिक दंगे हुए तो मैं कांग्रेस की रिलीफ समिति में काम किया करता था और आंकड़े इकठ्ठा करता था कि वहाँ कितने मरे कितने घायल हुए, कितने घर जले आदि. तभी गाँव-गाँव घूमने और सांप्रदायिक दंगो के वीभत्स दृश्य देखने का अवसर मिला. “तमस” इस अनुभव पर आधारित है.

“तमस” साम्प्रदायिकता पर की जाने वाली राजनीति की कहानी है. यह दिखाती है कि किस प्रकार राजनितिज्ञ खुद ही इसके बीज बोते है और फिर खुद ही इसकी निंदा करने का स्वांग रचते है.

तमस की कहानी बस इतनी सी है कि एक म्युनिसिपल कमिटी का कारिन्दा और अंग्रेज़ सरकार का चमचा मुराद अली अंग्रेज़ सरकार के इशारे पर एक सीधे सादे चमार नाथू को ५ रूपए देकर उससे एक सूअर मरवाती है और उसे मस्जिद की सीढ़ियों पर फेंकवा देता है. इसकी प्रतिक्रिया में दूसरा वर्ग एक गाय की हत्या करवा देता है. इन दोनों घटनाओ की खबर ज्यों ज्यों फैलती है, विद्वेष की आग भड़कने लगती है और पूरे शहर में तनाव फ़ैल जाता है. नागरिको का शिष्टमंडल शांति स्थापित करने के उद्देश्य से अंग्रेज़ जिला कलेक्टर रिचर्ड से मिलता है और बिना किसी ठोस आश्वासन के लौट जाता है. जिला कांग्रेस समिति के सेक्रेटरी श्री बक्षी जी तथा कम्युनिस्ट नेता कामरेड शांति स्थापित करने में नाकामयाब रहते है तथा आसपास के गांवो में भी दंगे फ़ैल जाते है. इलाहिबक्ष, खानपुर, सैयदपुर आदि गांवों में लूट पाट और हत्याएं होती है. सिख और मुस्लिम दोनों मोर्चाबंदी करते है तथा इस मोर्चाबंदी में २०० वर्ष  पूमध्यकालीन जहनियत काम कर रही थी. तुर्कों के ज़ेहन में यहीं था कि अपने पुराने दुश्मन सिखो पर हमला बोल रहे है और सिखों के ज़ेहन में यही था कि वे भी अपने पुराने दुश्मन तुर्कों पर हमला बोल रहे है. पांचवे दिन अंग्रेज़ शांति कायम करने का प्रयास करते है. नगर में कर्फ्युं लगाया जाता है और एक ही दिन में पूरा माहौल बदल जाता है. जिसके इशारे पर ये तूफ़ान आया था, उसी इशारे पर सब तबाह करके गायब हो जाता है. इस तूफ़ान के बाद दृश्य बड़ा ही कारुणिक है तथा लोग जो शिकार हुए थे उनसे शरणार्थी कैंप भरे पड़े है. शांति कायम करने के लिए अंग्रेज़ कलेक्टर रिचर्ड की प्रेरणा से पंद्रह सदस्यों की अमन समिति बनायीं जाती है जिसमे ७ मुस्लमान, ५ हिन्दू और ३ सिख है. इस प्रकार जिसकी प्रेरणा से और जिसके द्वारा दंगे की शुरुआत हुई उसी की प्रेरणा से और उसके द्वारा ही दंगे का अंत भी हुआ. उनके उपन्यास को यदि ऐतिहासिक और सामाजिक सन्दर्भ में देखा जाए तो निम्न निष्कर्ष निकाले जा सकते है-

1- देश का विभाजन जिस सांप्रदायिक विद्वेष का परिणाम था उसके बीज ब्रिटिश कूटनीति ने बोये थे.

2- विभाजन के दौरान कांग्रेस के भीतर राष्ट्रीय एकता के प्रति गहरी निष्ठा का आभाव था. कांग्रेस स्वयं अनेक स्वार्थो की मिलन भूमि थी.

3- सांप्रदायिक दंगो में भाग लेने वालो की ज़हनियत मध्यकाल से जुडी हुई थी.

4- सदियों से साथ रहते गुए नगर और गाँव दोनों ही स्वरों पर हिन्दू और मुसलमानों की जीवन रेखा कुछ इस प्रकार घुल मिल गयी थी कि उनका चाहे कैसे भी विभाजन किया जाता वह कृत्रिम ही होता.

5- दंगो में हमेशा गरीब ही मारे जाते है. अमीर और प्रभावशाली लोग गरीबो के मूल्य पर अपना राजनीतिक खेल खेलते है और परस्पर एक दूसरे के हितो की रक्षा करते है.

6- शक्ति और पैसा बड़ी चीज़े है, वो मूल्यों को दबा सकते है, संस्कारो को तोड़ सकते है किन्तु मनुष्य की  जिजीविषा और भी बड़ी है. वो बड़ी से बड़ी विपत्ति झेलकर भी जीवित रहना चाहता है.

इस उपन्यास की एक महत्त्वपूर्ण बात ये है कि इस पूरे उपन्यास में वे प्रादेशिक कांग्रेस के सदस्यों पर व्यंग्य कसते रहते है तथा देशभक्ति और राष्ट्रीयता के संकीर्ण मापदंडो पर भी व्यंग्य करते है. उदाहरण के लिए कांग्रेस के शंकर जब दूसरे कांग्रेस सदस्य कोहली को अपना आजारबंद दिखाने को कहता है तथा उसके बारे में कहता है- “देख लीजिये साहिबान, नाडा रेशमी है. हाथ के कटे सूत का नहीं है. कांग्रेस रेशमी नाडा पहने? और आप उसे  प्रादेशिक सदस्य का उम्मीदवार बनाकर भेजेंगे? कांग्रेस का कोई उसूल है या नहीं?

जहां विभाजन पर ज़्यादातर साहित्य त्रासदी को बयाँ करता है वहीँ भीष्म साहनी द्वारा रचित “अमृतसर आ गया है” ये दर्शाता है कि कुछ क्षेत्रो में दंगे के बावजूद भी ज़िन्दगी में कोई अधिक परिवर्तन नहीं आया तथा लोग पहले की तरह हंसी मज़ाक करते है. उन्होंने ये दुनिया लाहौर से आने वाली ट्रेन में दिखाई है. पर ये भी रूढ़ छवियों से मुक्त नहीं है- (1) बाबू से पठान कहता है कि तुम दुबले पतले हो क्यूंकि तुम हमारी तरह मीट नहीं खाते. तुम हमारी तरह मीट खाकर तंदरुस्त हो जाओ या फिर महिलाओ के डब्बे में सफ़र करो, (2) सरदार पठान को समझाता है कि बाबू पठानों का भोजन नहीं लेता क्यूंकि वो अपने हाथ नहीं धोते अर्थात वे गंदे लोग है, (३) जब ट्रेन में ज़बरदस्ती लोग अन्दर घुसने की कोशिश करते है तो ट्रेन में बैठे लोग उन पर चिल्लाते है और पठान बदहवासी में एक महिला के पेट में लात मार देता है, (4) जब ट्रेन आग में झुलसते शहरो से होते हुए गुज़रती है तो लोग भयभीत हो जाते है, पर जैसे ही उन्हें ज्ञात होता है कि ये ‘वजीराबाद’ नामक मुस्लिम बहुल क्षेत्र था तो पठान का भय मर जाता है वहीँ सिखो और हिन्दुओ की चुप्पी गहरी हो जाती है, (5) वहीँ जब ट्रेन हरबंसपुरा और अमृतसर (हिन्दू-सिख बहुल क्षेत्र) पहुँचती है तो बाबू जो अब तक पठान की हर बेइज़्ज़ती झेल रहा था, चौड़ा हो जाता है तथा पठान पर धावा बोलता है- “ओ पठान के बच्चे! हिन्दू औरत को लात मारता है. हरामजादे

कमलेश्वर जो मंटो के प्रशंसक भी रहे है, उनकी कहानी “और कितने पाकिस्तान” पाकिस्तान बनने के असर को बयाँ करती है. वे पाकिस्तान को एक मुल्क नहीं बल्कि एक दुखद सच्चाई मानते है तथा इसलिए लेखक जहाँ कहीं जाता है उसे दृश्य दिखाई देते है, जिन्हें वह पाकिस्तान कहता है क्यूंकि वह उसे विध्वंस का कारण मानता है क्यूंकि ये “एहसास की रुकी हुई हवा है”. विध्वंस के चित्र इतने भयानक है कि वो अनुभव करता है कि वो मुस्लमान पर टूट पड़ना चाहता है और अपनी प्रेमिका को छीन लेना चाहता है जैसे कि वो कहता है- “उसी दिन से एक पाकिस्तान मेरे सीने में  शमशीर की तरह उतर गया था”

पाकिस्तान बनने का दर्द वह अपनी प्रेमिका सलीमा (जिसे वो प्यार से बन्नो कहता है क्यूंकि उसे सलीमा कहते डर लगता है) में भी महसूस करता है. उसके अन्दर का पाकिस्तान तब नज़र आता है जब वह अपने पति मुनीर को कोसती है “मुझे मालूम नहीं है क्या? जितनी बार बम्बई जाता है, खून बेचकर आता है. फिर रात भर पड़ा काँपता रहता है.

जब लेखक को ज्ञात होता है कि उसकी प्रेमिका वेश्या बन गयी है तो उसे समझ नहीं आता कि उसके साथ ऐसा क्यूँ होता है. बन्नो उसे टेढ़ी मुस्कराहट के साथ देखती है ख़ामोशी से व्यंग्य करती है तो उसके मुख से निकलता है- “पता नहीं ये बदला तुम मुझसे ले रही थी, मुनीर से या पाकिस्तान से?”

वह पाकिस्तान को और उसकी सच्चाई को हकीक़त मान चूका है- “अब तो फटा फटा आदमी ही सच लगता है. पूरे शरीर का आदमी देखकर दहशत होते है. विध्वंस के चिन्ह हर जगह दिखाई देते है जो आहत करते है- “अब कौन सा शहर है जिसे मैं छोड़कर भाग जाऊ. कहाँ कहाँ भागता फिरूँ जहां पकिस्तान न हो.

पाकिस्तान की यदि सच्चाई की बात की जाए तो वह अब भी नज़र आती है. नेहरु जिन्होंने विभाजन को अस्थायी बताया था वो स्थायी हो चूका है. इस सन्दर्भ में असगर वजाहत ने नाटक “जिस लाहौर जई देख्या ओ जम्याई नइ” का पाकिस्तान में मंचन न होने देना ये कहकर कि उसमे मौलवी की हत्या इस्लाम के विरुद्ध है तथा नाटककार भारतीय है, इसी का सूचक है. पर आख़िरकार जब नाटक होता है तो हाउसफुल रहता है वो भी कराची में वो भी इस तरह से  कि लोग पेड़ पर चढ़कर नाटक देख रहे थे. यह इस बात को इंगित करता है कि मानवीयता बड़ी बड़ी विपत्ति को झेलकर भी जीवित रहती है.

लगभग सभी विभाजन की कहानियों में महिलाओ को एक निश्चित रूप दे दिया गया है. दोनों ओर महिलाओ की स्थिति एक समान रूप से स्थिर कर दी गयी है. उसकी अपनी महत्वपूर्णता उस आदमी पर निर्भर करती है जिसकी वो औरत है या जिसने उसका उल्लंघन किया है या उन्हें प्रताड़ित किया है. और इस प्रकार इस सांप्रदायिक अस्पष्टता में वे प्रभावहीन सी जान पड़ती है. महिलाओ को शोषित करना, पुरुषो के लिए अपने विरोधी समुदाय को नीचा दिखने का माध्यम था, वहीँ कई पुरुषो के लिए ये स्थिति अपनी लालसाओ को पूरा करने का अच्छा अवसर था. इस सन्दर्भ में मंटो की कहानी “खोल दो” जिसमे ‘सकीना’ का दोनों ही समुदायों के पुरुषो द्वारा शोषण किया जाता है., इस बात को इंगित करता है कि हिंसा यहाँ महज़ सांप्रदायिक मुद्दा नहीं था बल्कि हिंसक पुरुषो के लिए एक अच्छा अवसर था तथा सम्प्रदायिकता ओढा आवरण मात्र था. महिलाएं उनके लिए इस लड़ाई में सुकून पाने का माध्यम थी. कहीं ये सुकून ‘अच्छा’ था तो कहीं ‘बुरा’ था. इस सन्दर्भ में तमस में भीष्म साहनी कहते है- “दुःख से छुटकारा पाने के लिए आदमी सबसे पहले औरत की तरफ मुड़ता है”. नाथू को जब अपनी गलती का एहसास होता है तो उसे अपनी पत्नी के पास जाने की इच्छा होती है. इस प्रकार की कहानियों में महिलाओ को निष्क्रिय दिखाया गया है तथा पुरुष ही उनकी नियति तय  करते है. पर “मोज़ील ” तथा “ठंडा गोश्त” में “कलवंत कौर” इस सन्दर्भ में कुछ अपवाद है.

मंटो अपनी कहानियों में प्रत्यक्ष तौर पर बोलते है और इसीलिए उनमे नाटकीयता नहीं है तथा उनकी नायिकाएं बिना अश्रु बहे सिसकियाँ लेती है. वो घृणा और द्वेष को झेलते-झेलते अपने दर्द के शून्य पद गयी है तथा अपनी हीन स्थिति का प्रदर्शन करते हुए समाज के पुरुषो पर व्यंग्य करती प्रतीत होती है. कमलेश्वर की कहानी “और कितने पाकिस्तान” की बन्नो भी ऐसी ही है. उसका अपने प्रेमी की ओर टेढ़ी मुस्कराहट के साथ देखना और पूछना “और कोई है” इसी का सूचक है. नायक अपनी ज़िन्दगी के तीन पडावो की बात करता है- “पहला, जब मुझे बन्नो मेहँदी की हवा लग गयी थी, दूसरा, जब मैंने तुम्हे पहली बार नंगा देखा था और तीसरा, जब तुमने कहा था “और कोई है”. चाहे मंटो की कहानियां हो या कमलेश्वर की कहनियाँ दोनों की कहानियों के पुरुष महज़ खूनी और बलात्कारी नहीं है. उनमे अब भी मानवीयता बाकी है. पर ये मानवीयता असहाय और कमज़ोर सी जान पड़ती है, जो स्त्रियों के शोषण और पतन का कारण जान पड़ती है. यह कमलेश्वर के “और कितने पाकिस्तान” और मंटो की कई कहानियों जैसे कि  The Woman in the Red Raincoat में स्पष्ट जाहिर होता है- “तुम दो औरतो के खूनी हो. एक मशहूर कलाकार थी और दूसरी वो जिसका जन्म तुम्हारे लिविंग रूम में मौजूद पहली औरत के शरीर से हुआ था जिसे तुमने उस रात अकेला छोड़ दिया था. (You are the murderer of two women. One who is known as a great artist & the other who was born from the body of the first woman in your living room that night & whom you alone know).

ज्ञानेंद्र पाण्डेय कहते है आलोचकों ने कि तीन प्रकार की हिंसा की बात की है-  (1) जो राज्य द्वारा की जाती है जैसे कि रूस, जर्मनी, साइबेरिया में हुआ, (2) एक दूसरे तरीके की हिंसा जहाँ राज्य पहले से भक्षक नहीं होता पर वो उसे रोक सकता था पर ऐसा नहीं करता. जैसे कि १९९२-९३ में विश्व हिन्दू परिषद् द्वारा बाबरी मस्जिद के विवाद पर की गयी हिंसा, (3)एक तीसरे तरह की हिंसा वह है जहाँ लोग खुद हिंसा से पीड़ित होते है और अपना मानसिक स्वास्थ्य खो देने के कारण एक दूसरे का खून करने लगते है. विभाजन को इसी प्रकार की हिंसा माना जाता है.

वे कहते है कि जावीद आलम का कहना है कि “इस तरह की हिंसा को हमें याद नहीं करना चाहिए जिससे कि लोग सामाजिक, राजनैतिक और व्यक्तिगत तौर पर सामान्य जिंदगी जी सके, शांतिपूर्ण तरीके से.

पण्डे इस तरह की धारणा को इतिहास के लिए हानिकारक बताते है तथा कहते है कि ऐसा प्रतीत होता है कि राष्ट्रवादी धारणा है जो ये तय करने की कोशिश करती है कि भारतीय इतिहास के लिए क्या उचित है और क्या अनुचित. पर वे हमें ये भी बताते है कि हाल ही मैं कई महत्त्वपूर्ण कार्य हुए है हिंसा पर जिनमे मुख्यतः ये समझने का प्रयास किया गया है कि हिंसा का दायरा कितना बड़ा है. वो समझने का प्रयास करते है-

१. क्रोधित पुरुषो की पीड़ा को,  २. १९४७ तथा उसके बाद महिलाओ तथा बच्चो की स्थिति को, ३. महिलाओ और बच्चो की सामुदायिक और राष्ट्रीय बानगियों को, ४. धर्म से अलगाव को किस प्रकार एक मात्र नागरिक पहचान के रूप में देखा जा सकता है, ५. राज्य के बेहया पितृसत्तावाद को. वे कहते है कि सभी रोज मर्रा की ज़िन्दगी का इतिहास पेश करती है- एक ऐसा इतिहास जिसमे राज्य और समाज दोनों फंसे है. इस सन्दर्भ में जब हम विभाजन पर लिखे साहित्य की बात करते है तो निष्कर्ष के तौर पर कहा जा सकता है कि “काल्पनिक लेखन की सबसे अच्छी बात यह है कि ये महज़ हिंसा की कहानियाँ ही बयान नहीं करती पर इस बात की भी जांच करती है कि क्या दहशत के बीच भी हममें कुछ नैतिकता बची थी”. (The best of the fiction writers about the partition are not concerned with merely telling stories of violence, but with making profoundly troubled inquiry about the survival of our moral being in the midst of horror). इसका उल्लेख आलोक भल्ला भी करते है और कई दफा उनकी अभिव्यक्तियाँ निजी प्रतीत होती है. उदाहरण के लिए “सहाय” (A tale of 1947) में  मुमताज़ का चरित्र तथा उसके द्वारा बॉम्बे छोड़कर पाकिस्तान का चरित्र तथा उसके द्वारा बॉम्बे छोड़कर पाकिस्तान जाना तथा उसके द्वारा अपने मित्र जुगल से प्रश्न करना कि क्या वो उसे मार सकता है? ये सब उनकी निजी जिंदगियों की पेश करते है. मंटो ने खुद ये सवाल अपने मित्र तथा अभिनेता  श्याम से किया था. इन कहानियों की एक महत्त्वपूर्ण बात ये है कि विभाजन के बाद भी लोग क्षेत्रीय सीमओं की फ़िक्र नहीं करते क्यूंकि वे सामजिक और सांस्कृतिक रूप से जुड़ चुके थे तथा क्षेत्रीय सीमओं के आधार पर यहाँ राष्ट्र-राज्य की कल्पना को विफल दिखाया गया है. उदाहरण के लिए “अमृतसर आ गया है” में ट्रेन के मुसाफिर क्षेत्रीय-सीमओं के बजाय सबसे पहले नेताओ की बात करते है. ये प्रश्न किया जाता है कि ‘पाकिस्तान’ बनने के बाद जिन्ना बॉम्बे में ही रहते रहेंगे या पाकिस्तान में रहेंगे? इस प्रकार मंटो की कहानियाँ तथा भीष्म साहनी का तमस दोनों ही इस बात को इंगित करते है कि हिन्दू और मुस्लिम, दोनों ही सांस्कृतिक रूप से इस प्रकार घुलमिल गए थे कि सीमओं के बल पर किसी के बल पर किसी भी प्रकार का कृत्रिम था तथा “माउंटबेटन प्लेन” के द्वारा जब इस प्रकार का असंवेदनशील निर्णय लिया जाता है तो वहां किसी भी प्रकार का  राष्ट्रवाद नज़र आता है. भारत के सन्दर्भ में तो बिलकुल नहीं! वे भारतीय स्थिति को समझे नहीं क्यूंकि उनके विश्व में सीमा रेखा के आधार पर राष्ट्रवाद की कल्पना की जा सकती है.

सन्दर्भ सूची

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Monto, Saadat Hasan, Pandit Manto’s First letter to Pandit Nehru.

Joshi, Shashi, the world of saadat Hasan manto, The Annual of Urdu Studies

Chughtai, Ismat, Communal Violence & literature

Hasan, Mushirul, Memories of Fragmented Nation: Rewriting the Histories of India’s Partion.

Panday, Gyanendra Remambering partition: Violence, Nationalism & History in India, By way of Introduction & ch-3, Cambridge University Press, 2001

Kumar, Sukrita Paul, Surfacing from Within Fallen Women in manto’s Fiction, The Annual of Urdu Studies

साहनी, भीष्म, राजकमल प्रकाशन

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rekhta. Org

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Who was saadat Hasan Monto: A biography

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http://www.columbia.edu/itc/mealac/pritchett/00urdu/tobateksingh/